कांग्रेस की सेना मैं हाथी पर
सवार गणेश
हर पराजय के बाद कोई कारण दिखा कर, नेतृत्व में आस्था व्यक्त कर देना कांग्रेस कार्यसमिति की परंपरा बन गई है। जैसे गणेश चूहे पर बैठ कर माता-पिता की परिक्रमा कर लें और मानें कि पृथ्वी की परिक्रमा कर ली। मगर ऐसे पृथ्वी छोटी नहीं होती और समस्या भी हल नहीं होती। (7.4.1995)
कांग्रेस कार्यसमिति की विस्तारित बैठक में क्या निकला ? जो निकला, वह पहाड़ नहीं खोदा जाता तो भी निकलता। आकार प्रकार से तो शायद अब कांग्रेसी गणेश रूपी कम ही मिले, मगर बुद्धि से अवश्य वे गणेश हो गये हैं, यह सिद्ध हो रहा है। बैठकें करते हैं और बड़े परिश्रम से अपना वाहन ढूंढ निकालते हैं और पार्टी के पितृदेव की परिक्रमा करके पृथ्वी नाप ली गई, मान लेते हैं। किस्सा बताना शायद जरूरी है। भगवान शंकर के दो पुत्र गणेश और कार्तिकेय गणेश भारी भरकम और उनका वाहन भी चूहा कार्तिकेय स्लिम शरीर और उनका वाहन भी मयूर जैसा हर घर में होता है कार्तिकेय अपने भाई को थुलथुल कह कर चिढ़ाते होंगे और गणेश अपनी बुद्धि का रोब झाड़ते हुए कार्तिकेय को बुद्दू बताते होंगे। एक रोज इसी बात पर ठन गई कि ज्यादा बल और बुद्धि किसमें? और दोनों पहुंचे मां-बाप से फैसला करवाने तो भगवान शंकर ने प्रतियोगिता की घोषणा कर दी कि जो पहले पृथ्वी का चक्कर लगा कर आयेगा वही श्रेष्ठ होगा। कार्तिकेय की तो बांछे खिल गई मगर गणेश भी उदास नहीं हुए। कार्तिकेय बैठे मयूर पर और उड़ चले पृथ्वी का चक्कर लगाने गणेश बैठे चूहे पर और शंकर पार्वती का चक्कर लगाया और आराम से लड्डू खाने लगे। कार्तिकेय और उनका मयूर हाफते, पसीना पसीना होते हुए पहुंचे तो सारी थकान मिट गई, सोचा गणेश अपने चूहे के साथ यही बैठे है सो श्रेष्ठता की शील्ड उन्हें मिल गई। दोनों शंकर जी के पास पहुंचे तो उन्होंने श्रेष्ठ गणेश को घोषित किया परेशान कार्तिकेय को समझाया जिसने माता-पिता का चक्कर लगाया। उसने पृथ्वी का चक्कर लगाया गणेश श्रेष्ठ हुए। दिल्ली की कार्यसमिति में कांग्रेसी गणेश सिद्ध हुए। पितृतुल्य नरसिंहराव का चक्कर लगा लिया, जो चाहे करने की छूट दे दी और स्वयं लड्डू खाने की छूट ले ली जान छूटी और लड्डू हाथ में है और फिर अभी तो प्रसाद वितरण के कार्यक्रम और होना है। एकाध लड्डू और हाथ लग जाये। उम्मीद से रहना चाहिये।
विधानसभा चुनावों में पराजय पर भी बड़ा जोरदार विश्लेषण हुआ। विद्रोही नेताओं ने सारा खेल बिगाड़ा वरना सिंहासन पैरों तले होता। सबने जिम्मेदारी के दाग को एक वाक्य में धो दिया। माने विद्रोही नहीं होते तो कांग्रेस जीतती विद्रोही भी अर्जुन सिंह और नारायण दत्त तिवारी यदि उनका रहना ही कांग्रेस की जीत का कारण था तो उनका पाद प्रक्षालन करके भी उन्हें रखना चाहिये था और यदि उनके रहने से ही कांग्रेस जीतती है तो बाकी की इतनी बड़ी फोन की क्या जरूरत? अर्जुन सिंह तो खैर निष्कासित है मगर नारायण दत्त वितारी को पहले आपने निमंत्रण कहा भेजा, बाद में जो पत्र भेजा उसमें भी लिखा कि अध्यक्ष ने आपका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है अत: आप कार्य समिति की बैठक में भाग ले सकते हैं जैसे तिवारी दरवाजे पर खड़े दरवाजा ठोक रहे हो और आप कहें, अच्छा दरवाजा खोल देते हैं, आना हो तो आ जाना। मतलब साफ यदि विद्रोहियों ने विद्रोह तय कर लिया है तो आपने भी बन्दूक उठा ती है। विद्रोह होता है तो बन्दूक का हाथ में आना स्वाभाविक होता है। किन्तु, यदि विद्रोही के जाने से कांग्रेस साफ हो सकती है तो आप यह भी समझ सकते हैं कि विद्रोही पर चली गोली कांग्रेस के सीने पर भी लगती है। मगर सब बन्दूक थामे हैं ताकि निगाह विद्रोहियों से हट कर उनके अपने नकारापन पर नहीं पहुंच जाये। मामले के प्रति संवेदनशील भी इतने हैं कि यदि दिग्विजय सिंह मप्र में अर्जुन सिंह की महत्ता का बखान कर दें तो बौखला जाते हैं और अनुशासन सबके लिए समान होने की बात कर दें तो तिलमिला जाते हैं। मगर आपके बौखलाने से यह तथ्य भ्रष्ट नहीं होता कि यदि अर्जुन सिंह नहीं चाहे तो मप्र में कांग्रेस की सरकार चल नहीं सकती और आप कितने ही तिलमिलायें जनता में यह प्रश्न है कि यदि तिवारी नेतृत्व की आलोचना करते हैं तो उन पर कार्यवाही क्यों नहीं होती? क्या अर्जुन सिंह केक्टस और नारायण दत्त तिवारी गुलाब है? एक सीधी बात को भी इस रूप में देखना कि तिवारी को निकलवाने का प्रयोजन अर्जुन सिंह को बल पहुंचाने के उद्देश्य से प्रेरित है, सीधी पोंगली से घुमा घुमा कर रस्सी निकालने जैसा है। हां, राजनीति में रस्सियां निकलती जरूर ऐसे ही हैं। क्या पता अर्जुन और तिवारी की रस्सिया सोनिया गांधी के इशारे पर बाहर निकली हो?
अब कांग्रेस के अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री के पास अधिकार है कि ये नीचे से ऊपर तक ऐसे परिवर्तन कर दें कि कांग्रेस फिर महाबली हो जाये और लोकसभा सदस्यता का एक-एक गुलाबजामुन हर संसद सदस्य की प्लेट में टपक जाये। अब राव जी की आदत ही तरसा तरसा कर और टूंगा - टूंगा कर देने की है सो अप्रैल में वे कायाकल्प कर ही लेंगे, यह जरूरी नहीं और करने का मन भी बना लिया तो आप ताकतवर, निष्ठावान और जुझारु कांग्रेसी लायेंगे कहां से जहां नेता के चरण दाबते हुए सिर पर चढ़ जाना और नारे लगा कर नाक के बाल बन जाना ही सच्चे कांग्रेसी की एकमात्र पहचान रह गई हो और पार्टी की पीड़ा से सच उगल देने वाले निर्जीव की तरह बोरे में भरकर घूरे पर फेक दिये गये हो वहा अभिनेता ही मिलेंगे नेता नहीं। इतिहास तो आपको याद होगा। सिकन्दर से पोरस इसलिये नहीं हारा था कि वह योद्धा कमतर था या उसकी सेना कमजोर थी या उसके पास ताकत कम थी। वह इसलिये हारा कि उसके नायक हाथियों पर सवार होकर लड़े और सिकन्दर इसलिये जीता क्योंकि उसके सैनिक घोड़ों पर सवार थे। युद्ध में घोड़े काम आते हैं क्योंकि वे तेज दौड़ते, मुड़ते और वफादार होते हैं। हाथी से न मुड़ते बनता है न भागते और घायल होकर बिगड़ जाये तो अपनी सेना को ही रौंद देता है। आपकी पार्टी में चने खाकर दौड़ लगाने वाले घोड़े कहा है, मन भर खाकर तन फैलाने वाले हाथी है। इससे कहा फर्क पड़ता है कि उनका रंग क्या है। फिर सफेद तो और भी देखने के ही होते हैं। हाथी ही पालना है तो जब तक सत्ता है जलसे कीजिए, जुलूस निकालिये। युद्ध करना है तो घोड़े पालिये, अभी से उन्हें दौड़ाइये ये चने खाकर भी अच्छा काम चला देंगे। अभी तो वही हुआ जो होना था। राव में आस्था व्यक्त हुई क्योंकि दिल्ली में कांग्रेस की सरकार को रहना है। राव को सब अधिकार दिये ताकि, शेष चैन से लड्डू खाते रहें। राव ही एक मात्र और सब कुछ हो गये ताकि यदि अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सफल नहीं हो, जिसकी संभावना अभी दिख भी रही है, तो आलोचना का कचरा डालने भी अनेक स्थानों पर नहीं जाना पड़े और शेष सब सुरक्षित रहे। कांग्रेस में नारे लगाने और नाला दिखाने वाले नेता जो शेष है।
महेश श्रीवास्तव
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