ढूंढ़ते रह जाओगे...!
घोटालों और घपलों के आरोपित मंत्रियों को प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने इस अदा से निर्दोष ठहराया मानो उनके आचरण में लोग दाग ढूंढते रह जायेंगे और दाग नहीं मिलेगा। किन्तु, लोगों की आकांक्षाओं का समाधान राव के प्रमाण पत्र से नहीं होता। यदि ऐसे ही दोषियों को निर्दोष घोषित किया गया तो दाग मिले न मिले भविष्य में कांग्रेस को अवश्य ढूंढना पड़ेगा जो चुनावों में निराकार हो सकती है। (23.12.1994)
पहले ये बेदाग घोषित हुए फिर उन्होंने त्याग पत्र दिये। एन्टोनी महान है कि त्यागपत्र देने के बाद बेदाग घोषित हुए। कल्पनाथ राय महान है कि अंततः त्याग पत्र दे दिया और कोई पोल नहीं खोली। रामेश्वर ठाकुर और बी.शंकरान्द इसलिये महान है कि संसद पर उन्होंने अहसान किया और वृद्ध कांग्रेस की झुकी रीढ़ टूटे, इससे पहले अपना बोझ कम करके उसे टूटने से बचा लिया वैसे हमारे प्रधानमंत्री ने एक-एक कर सभी को बेदाग घोषित कर दिया है। चीनी हो या प्रतिभूति घोटाला, इतना कीचड़ उछला और सभी का दामन बेदाग रह गया, मानो प्रधानमंत्री का वक्तव्य नहीं हो दूरदर्शन पर आने वाला उस डिटरजेंट पाउडर का विज्ञापन हो, जिसमें महिलाआंखे मटका मटका कर कहती है "दाग ढूंढते रह जाओगे।" स्वाभाविक भी है, चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की होली जल चुकी है तो धुलेंडी तो मनेगी ही और शालीनता के रंग नहीं होंगे तो कीचड़ तो उछलेगा ही और कीचड़ से चेहरे काले पड़ेंगे तो राजनीति के गंगा राम को अपने लोगों को बेदाग बताने के लिये पार्टी को डिटरजेंट की पुड़िया बनाना पड़ेगा। अब यह तो धोबी ही बता सकते हैं कि डिटरजेंट कोई सा भी और कितना भी लगाया जाये कुछ दाग़ छुटाये नहीं छूटते। यह बात अलग है कि जिसे अपने दामन पर दाग लगे होने का संदेह हो वह दूसरे के दामन के दागों को देखकर भी अनदेखा कर दे।मगर भगवान भी बड़ा निर्दयी है, उसने यह देश सूरदासों का नहीं बनाया। नहीं बनाया है, शायद इसीलिये पिछले चुनाव में चार राज्यों में कांग्रेस धुंधले कांच में उभरी बेपनाह तस्वीर की तरह रह गई। यहां तक कि आंध्र में लोकतंत्र में दो रुपया किलो बिकना और बहुरूपिये के मुकुट का मोरपंख बनना पसंद किया। एक पादरी था, अक्षरश: ईसाई सड़क के पर जा रहा था कि किसी विरोधी ने एक चांटा मारा, उसने सच्चे ईसाई की तरह प्रभु यीशु से उसे क्षमा कर देने और सुबुद्धि देने की प्रार्थना की और दूसरा गाल भी सामने कर दिया विरोधी भी कोई शैतान रहा होगा, उसने दूसरे गाल पर भी चांटा जड़ दिया। फिर क्या था उस हट्टे-कट्टे पादरी ने चांटा मारने वाले की धुनाई शुरू कर दी। पिटने वाला परेशान पादरी होकर तुम इस बेरहमी से मार रहे हो ? उसने पूछा। पादरी ने कहा, ईसा मसीह ने एक गाल पर चांटा मारने वाले के सामने दूसरा गाल करने को कहा है, दूसरे गाल पर भी यदि वह चाटा मार दे, तो क्या करना चाहिए यह उन्होंने नहीं बताया। इसलिये में वह कर रहा हूँ जो मुझे करना चाहिए। हिन्दुस्तान की जनता भी उसी पादरी की तरह है। एक चांटा सहकर उसने आंध्र या कर्नाटक में आपकी सरकार बनवा दी थी, जब आपके कर्मों का दूसरा चांटा भी उसे पड़ा, तो उसने आपको धुनक दिया। फरवरी में फिर आपके कर्मों की परीक्षा होने जा रही है और गुजरात तथा महाराष्ट्र मे मुस्टण्डे पादरी की तरह जनता अपना दूसरा गाल सामने किये खड़ी है।
जब तूफान आता है तो समुद्र के कई द्वीप डूबते हुए और कई उथले डूबे द्वीप उभरते दिखाई देते हैं। भय यह भी होता है कि जल का भीषण जलजला महाद्वीप को भी जलमग्न नहीं कर दे। शकरानंद जैसे लघुद्वीप डूबते लगते हैं और राव जैसा महाद्वीप उन्हें कंधे पर बिठा लेता और बचा लेता है। अर्जुन सिंह जैसे द्वीप उभरते हुए लगते हैं और महाद्वीप अपना हाथ फैलाकर फिर उन्हें नीचे बिठा देता है। तूफान में मिल कर एक होकर खड़े होने और बच जाने की बात सब करते हैं मगर काम भय का मनोविज्ञान ही करता है कि वह डूब जाए और में उबर जाऊ ऐसे में किसे कौन बचाये ? आशंका फरवरी के बाद प्रलयकारी तूफान की भी है। राजनीति के मौसम विज्ञानी बताते हैं कि तब सोनिया आंधी भी पूरे वेग से चलेगी। जल को थल और थल को जल करेगी और जिस द्वीप के हाथ में आंधी की उंगली होगी उसी द्वीप की तूती बजेगी। कौन होगा वह द्वीप, जो तीन माह बाद आंधी की उंगली पकड़ कर महाद्वीप बनेगा? लोग कहते हैं कि शरद पवार या नारायण दत्त तिवारी की हथेलियां इतनी चिकनी हैं कि आंधी की उंगली फिसल जायेगी। यह कला अर्जुन सिंह में ही है कि कछुए की खाल के दस्ताने पहन ले और आंधी की उंगली पकड़ लें। उनके समर्थकों का दावा है कि यदि आंधी ने साथ दिया, तो दक्षिण के बहुमत सांसद उड़कर उनसे चिपक जायेंगे और वे महाद्वीप बन जायेंगे। वे महाद्वीप बने तो कांग्रेस में फिर हिमालय की तरह उभार होगा और एवरेस्ट पर पंजा वाला तिरंगा फहरा रहा होगा। उनमें करिश्मा करने की कुव्वत है, अल्पसंख्यकों के दिल में उनके लिये मुरव्वत है और गरीबों का मसीहा कहलाने में उनको कहां दिक्कत है? हो सकता है सिमसिम की तरह म.प्र. के भाग्य खुलें। मगर यह तो भविष्य की संभावना की बात है। फिलहाल तो कांग्रेस में "सब बेदाग है और सब ठीक है। आइंस्टीन सापेक्षतावाद का सिद्धांत खोजते खोजते निरपेक्ष हो गये थे, नरसिंह राव इतने निरपेक्ष हैं कि सापेक्ष उन्हें प्रभावित ही नहीं करता। एक बार आइंस्टीन अपने काम में तल्लीन थे। पत्नी ने आकर नौकर की शिकायत की कि नौकर बहुत मक्कार हो गया है, इसे निकाल देना चाहिए। आइंस्टीन ने कहा- ठीक है। फिर नौकर ने आकर कहा, मेम साहब बड़ी बददिमाग हो गई हैं, तो आइंस्टीन ने कहा- ठीक है। मेम साहब ने सुना तो आग बबूला हो गई। तैश में आइंस्टीन से बोली- आप बहुत असभ्य हैं, नौकर के सामने मुझे बेइज्जत करते हैं। आइंस्टीन ने कहा, ठीक है। मेम साहब और नौकर का झगड़ा ऐसे ही चलता रहा, मेडम आइंस्टीन को बुरा भला कहती रहीं और आइंस्टीन कहते रहे सब ठीक है और निरपेक्ष रहकर सापेक्षतावाद का सिद्धांत खोज निकाला। राव साहब भी उतने ही निरपेक्ष हैं। प्रतिभूति घोटाले में हजारों करोड़ रूपये डूब गये तो भी ठीक रहा, चीनी घोटाला हुआ तो भी ठीक रहा, अर्जुन सिंह ने इस्तीफा दिया या न दिया तो भी ठीक रहा। अब लोग उनकी निरपेक्षता में सापेक्षतावाद का सिद्धांत ढूंढ रहे हैं कि प्रतिभूति घोटाले में कौन-कौन संबंधी लाभान्वित हुए या चीनी घोटाले में किस-किस अभिन्न को किस-किस जिन्न ने लायसेन्स दिया। पता नहीं दाग़ ढूंढते रह जाने की चुनौती देने वाला डिटरजेंट कब चुक जाये और नरसिंह राव की निरपेक्षता में सापेक्षता ढूंढती कांग्रेस कब निराकार हो जाये। अभी दाग नहीं ढूंढ पा रहे हैं कल कांग्रेस ढूंढते रह जाएंगे।
महेश श्रीवास्तव
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