छाती तो कांग्रेस की ही फटेगी
प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष नरसिंह राव की निरंतर आलोचना का परिणाम अर्जुन सिंह के निलंबन में निकला। वे शायद यह चाहते भी थे। किन्तु, कांग्रेस के संदर्भ में यह द्वंद्व अहितकर ही था। जैसे कर्ण और अर्जुन के युद्ध में जीते कोई हारना कुन्ती को था, इसी प्रकार इस द्वंद्व में छाती तो कांग्रेस की ही फटना है। (25.1.1995)
राव फूंक-फूंक कर पांव रख रहे थे और अर्जुन सिंह धूल उड़ाये जा रहे थे। गर्द और गुबार बढ़ गया तो नरसिंह राव ने धूल झाड़ दी। जिस लक्ष्मण रेखा के पार होने की बात उन्होंने युवक कांग्रेस रैली में कही थी उसका परिणाम उन्होंने सेवा दल को संबोधित करने वाले दिन निकाला। लोगों को आश्चर्य, अर्जुन सिंह के कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित होने पर कम, किन्तु 24 दिसम्बर को मंत्रिमंडल से त्याग पत्र देने के बाद लगातार अपने मिसाइल छोड़ते रहने के बावजूद कार्यवाही ठीक एक माह बाद होने पर अधिक है।
कांग्रेस का यह आंतरिक युद्ध भी बड़ा मजेदार था। अर्जुन सिंह के विष बुझे बाण कितने ही चुभने वाले रहे हो किन्तु ऊपर से उनकी मखमली मुलायमियत पुच्छल तारे की तरह थी। बांदा की सभा में बोले गये उनके जिस वाक्य ने एकता के प्रयासों पर पानी फेर दिया यह था जो पार्टी हकीकत से मुंह मोड़ती है, वह इतिहास के कूड़ेदान में जाती है। और फिर मद्रास में उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि “जब पार्टी कमजोर होगी तो उसका नेता कैसे मजबूत होगा?" निश्चय ही राजनीतिक दर्शन के ये सर्वमान्य सिद्धांत हो सकते हैं किन्तु, जब अर्जुन सिंह ये वाक्य बोल रहे थे तब न तो वे दर्शन शास्त्र के प्राध्यापक की भूमिका निभा रहे थे और न ही उनके सामने राजनीति शास्त्र के छात्र थे। उनके सामने वह जनता थी जिसके बीच जाकर वे फैसला कर लेने की बात कह चुके थे और फैसला किससे? प्रतिद्वंद्वी तो सिर्फ राव ही थे। जाहिर है, निशाने सब उधर ही सधे रहे। दूसरी ओर राव थे जो स्थितप्रज्ञ की मुद्रा अपनाये हुए थे और उनके अनुयायी उनका शवासन छुड़वाने के लिये उन्हें कोंच कोंचे जा रहे थे। बहुत हुआ तो वे लक्ष्मण रेखा बताकर और अनुकूल दुश्मन कह कर फिर समाधिस्थ हो गये बार बार वही हुआ जो उस साधु के साथ हुआ था जिसने अपने शिष्य को नदी से पानी लाने भेजा और शिष्य बार-बार इसलिए लौट आया क्योंकि नदी से गाड़ियां निकली थी और पानी गंदला था। साधु समझता रहा कि आवेश की गाड़ियां निकल जायेंगी तो जल फिर निर्मल हो जायेगा किन्तु, जब उसे मालूम हुआ कि जल गाड़ियों के कारण गंदा नहीं हो रहा है, कोई व्यक्ति जानबूझकर इसलिए जल गंदा कर रहा है ताकि साधु प्यासा रह जाये तो साधु अपना चिमटा लेकर कान पकड़ने दौड़ पड़ा। परिणाम सामने है।
अर्जुन सिंह के विरुद्ध कार्यवाही से राव समर्थक तो खुश होंगे ही स्वयं अर्जुन सिंह भी दुखी नहीं होंगे। दुखी तो वे इसलिए थे कि राव कोई कार्यवाही नहीं कर रहे थे और वे उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक हर दिशा और हर जगह से राव को ठूसा मार रहे थे। मान लो राव बिल्कुल ही ध्यान नहीं देते तो बहुत दिनों तक वे अखबारों में कैसे रहते ? माना अखबारों में छपने से कोई आदमी प्रधानमंत्री नहीं बनता मगर उसकी ध्वजा तो फहराती रहती है। बस मार्च तक रथ हो या न हो ध्वजा फहराती रहे। पांच विधानसभा के चुनाव परिणाम आयें और कांग्रेस का, जैसी कि कुछ लोग उम्मीद बांधे हैं, सूपड़ा साफ हो जाये तो कांग्रेसी राव के जहाज से वैसे ही भागेंगे जैसे डूबते जहाज से चूहे भागते हैं। भाग कर जायेंगे कहां? वे अर्जुन सिंह की ध्वजा देखेंगे और मस्तूल से जा चिपकेंगे। जो जहाज डूबता है वह चूहों को डूबता हुआ दिखता है किन्तु जो जहाज डूब चुका है और जिसका मस्तूल और ध्वज दिख रहा है चूहे उसे समुद्र से बाहर निकलता जहाज मान लेते हैं और मस्तूल से जा चिपकते हैं। इसलिए ध्वजा तो लहराना ही चाहिए। कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से निलंबन पर सवाल जवाब होंगे और अखबार चुनाव समाचारों से कम, अर्जुन उवाच से ज्यादा भरे रहेंगे।तब तक फरवरी निकल जायेगा और मार्च का कुरुक्षेत्र आ जायेगा।
नरसिंह राव ने बड़ी सोच समझ के साथ उन्हें निष्कासित नहीं किया सिर्फ निलंबित किया है। बलिवेदी पर खड़ा भी कर दिया पर तख्ता हटाने को मना कर दिया। निष्कासित होते तो अर्जुन सिंह संसद सदस्य भी रहते और कांग्रेस सरकार के विरुद्ध मतदान करने को भी स्वतंत्र रहते,अब वे कांग्रेस की किसी शाखा के सदस्य भी नहीं रहे और संसद में कांग्रेस सरकार के विरुद्ध मतदान भी नहीं कर सकते। हालांकि उनका मामला अनुशासन समिति को देने से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि अनुशासन समिति बोलने पर लगाम नहीं लगा सकती। वह निष्कासन कर सकती है मगर जो उच्च कमान निलंबन में एक माह लगा सकता है वह निष्कासन में भी एक साल लगाना चाहेगा, ताकि तब तक लोकसभा चुनाव आ जाये और अर्जुन सिंह के किसी हाथ में लड्डू नहीं रह पाये। वैसे तो वे इंकार कर चुके हैं किन्तु, यदि अब कोई नई पार्टी भी बनाते हैं तो संसद से भी त्याग पर देना होगा। हालांकि जो व्यक्ति मंत्री पद छोड़ सकता है वह संसद सदस्यता भी छोड़ सकता है और यदि परिस्थितियां मंत्री पद छोड़ने को मजबूर करने की पैदा कर दी गई थीं तो निलंबन संसदसदस्यता छोड़ने को मजबूर करने का उपक्रम भी माना जा सकता है।
कांग्रेस की हालत तो महाभारत की कुन्ती की तरह हो गई। कर्ण और अर्जुन दोनों ही उसके पुत्र थे और युद्ध में आमने सामने खड़े थे। जीते कोई, हारना तो कुन्ती को ही था। यहां भी जीत किसी की हो, हार तो कांग्रेस की ही होना है। कोई कांग्रेस की हार में अपनी जीत देख रहा है तो कोई कांग्रेस तो हार रही है फिर भी खुद जीत रहा है। परिवार तो रावण का भी बहुत बड़ा था किन्तु जब उसका अंत हुआ तब लिखा गया था
"इकलख पूत सवा लख नाती, सो रावण घर दिया न बाती ''
क्या कांग्रेस का यही होना है?
महेश श्रीवास्तव
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