बसपा: बस पा लिया जो पाना था
सदियों से दमित और शोषित उत्थान की आकांक्षा में उत्तेजनात्मक ढंग से बसपा के साथ हुए, किन्तु, मायावती के स्वार्थ, अहंकार और बेलगाम जुबान ने उभरती हुई। पार्टी को भारी क्षति पहुंचाई। महात्मा गांधी को शैतान की औलाद कहना तो अहसान फरामोश और नपुंसक राष्ट्र सह गया किन्तु मुसलमानों को गद्दार कहना मुसलमानों को सहन नहीं हुआ। वे बसपा से अलग हुए और बसपा को नुकसान हुआ। (3.7.1994)
बहुजन समाज पार्टी की बहु मंजिली इमारत की मीनारें हिल रही हैं। हर मंजिल शिखर बनने पर आमादा है और भवन के बने रहने की शर्त ही यह है कि केवल कोई एक मंजिल ही शिखर पर रह सकती है। यह अलग बात है कि इमारत जमींदोज हो जाये और हर मंजिल को मैदान में खड़े होकर अपने को शिखर की मंजिल कहने का मौका मिल जाये। उ.प्र. में मायावती की माया के विरुद्ध मुस्लिम ज्ञान-तीर चला रहा है तो मप्र के एक मात्र बसपा सांसद भीम सिंह बसपा का अखाड़ा छोड़कर किसी दूसरे अखाड़े में दण्ड पेलने का निर्णय कर चुके है। भीमसेन ने अपने भीमसेनी काजल की टीकी अपने नेताओं के गालों पर टोटके की तरह लगा दी, यह कहकर कि जिस पार्टी में टिकट भी पैसे लेकर बांटे जाते हो उस पार्टी में क्या रहना सांसद होकर पार्टी छोड़ने के बावजूद उनकी सांसदी को कोई खतरा भी नहीं क्योंकि जिस पार्टी के कुल तीन सांसद हो उसका एक सांसद भी एक तिहाई होता है और दलबदल का कानून उसे बांधकर संसद के बाहर नहीं कर सकता। वे लगोट घुमा रहे हैं और अखाड़ा तलाश रहे हैं। मप्र में तो आजकल एक ही अखाड़ा लाम पर है और वह है कांग्रेस का, भीमसेन भी शायद वहीं लामवन्दी करें।
म.प्र. मे तो भीमसेन ने बसपा नेताओं के सुर्ख हो रहे गालों पर काजल की टिकली लगा कर टोटका ही किया है मगर उ.प्र. बसपा में तो कोलतार की होली खेली जा रही है। हटे या हटाये गये शिक्षा मंत्री डा. मसूद अहमद और पार्टी से इस्तीफा दे चुके महासचिव मोहम्मद इस्लाम डामर के ड्रम को अलाव पर चढ़ा कर बैठे हैं और बाल्टियों से मायावती के सिर पर डाल रहे हैं। मुद्दे तो अनेक हैं मायावती बेलगाम हैं, बदजुबान हैं, अकूत संपत्ति बटोरी, अपनी पार्टी के मंत्री को जाजम पर और अपने चहेते अफसर को कुर्सी पर बिठा कर, अपमानित किया है आदि, मगर मुख्य मुद्दा है मायावती का मुसलमानों को गद्दार कहना अब कोई मुसलमान कांग्रेसी जैसे तो है नहीं या इस देश के अहसान फरामोश नागरिक भी नहीं कि मायावती महात्मा गांधी को शैतान की औलाद कह दें और देश खीसे निपोरता रहे। सो बसपा से जुड़े अधिकांश मुसलमानों ने मायावती को सबक सिखाने की ठान ली है और वे बसपा की बहुमंजिला इमारत की ईंट से ईंट बजा देने पर आमादा है। नाराजी मुसलमानों की ही नहीं है, हर जाति और विरादरी के विधायकों की अपनी-अपनी शिखर मांगे शुरू हो गई है मसलन, कहा जा रहा है कि चूंकि बसपा विधायकों में चमार बिरादरी के विधायकों की संख्या ज्यादा है अतः राजबहादुर को, जो इसी बिरादरी के हैं, विधान मंडल पार्टी का नेता बनाया जाये। यह तो एक उदाहरण है। बसपा की हर मंजिल अपने को शिखर कहने लगी है और बसपा के आम कार्यकर्ता की हालत किसी शायर के अंदाज में "जिस मोड़ का हर जर्रा यह कहता हो कि में मंजिल हूं, उस पे दीवाना भटक जाये तो किधर जाये? '' जैसी है।
मुलायम सिंह बसपा के इस विवाद से चिन्तित भी हो सकते हैं और आनन्दित भी। मगर एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह वे जानते हैं कि विषय उनकी चिन्ता प्रदर्शित करने किन्तु वास्तव में आनन्दित होने का है। जब से सरकार बनी थी कांशीराम और मायावती उनकी छाती पर मूंग दल रहे थे। सरकार को बनाये रखने की मजबूरी में उन्हें प्रशासन को फुटबाल का मैदान बनाना पड़ा था। गांधी और पंत के प्रति कहे गये अपशब्दों को उन्हें कान में तेल डालकर सुनना पड़ा और बसपा नेताओं की मनमानी चलने देने के बावजूद यह धमकी हमेशा मिलती रही कि कभी भी सरकार की धोती की गाँछ खोली जा सकती है। नाम से मुलायम किन्तु चरित्र से कठोर प्रशासक को शायद अब अवसर मिला है कि वह हांके जाने के स्थान पर हांकना शुरू करे कुशल
राजनीतिज्ञ की तरह मुलायम सिंह ने रास थाम ली है। कांशीराम की महीनों से चली आ रही इस मांग को उन्होंने अस्वीकार कर दिया कि मुख्य सचिव को केवल इसलिए बदल दिया जाये क्योंकि वह ब्राह्मण है सिवल सेवा में रहकर जातिवादी संगठन चलाने वाले सचिव स्तर के उस अधिकारी को, जिसे मायावती अपने साथ कुर्सी पर और बसपा के मंत्री को जमीन पर बिठाती थी, स्थानांतरित कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश सरकार डॉ. अम्बेडकर के लेखों और भाषणों को संपूर्ण रूप से दस खण्डों में प्रकाशित कर रही है, जिसके दसवें खण्ड में डॉ. अम्बेडकर ने मुसलमानों के बारे में कहा है कि वे वतन परस्त और तरक्की पसंद नहीं हैं। जिसमें कहा गया है कि यदि देश पर कोई इस्लामी देश आक्रामण कर दे तो मुसलमान अपने वतन के बजाय आक्रामक इस्लामी देश का साथ देंगे। मुसलमान हिन्दुस्तान में धर्म के नाम पर ऐसी परंपरायें चलाते हैं जो इस्लामी राष्ट्रों में भी नहीं चलती और राजनीति में वे गुण्डागर्दी करते है। डॉ. मसूद और डॉ. इस्लाम इन्हीं बातों का प्रचार कर रहे हैं कि मायावती ही नहीं उनके पूर्वजों ने भी मुसलमानों को गद्दार कहा है अत: बसपा में रहकर उसे नेस्तनाबूद कर देना हमारा धर्म है। जाहिर है इन बातों से कांशीराम का मुसलमानों और हरिजनों को साथ लेकर दिल्ली के तख्त पर कब्जे का सपना तो चूर हुआ ही है, मुसलमान बसपा से घृणा करने की स्थिति में आ गये हैं और यह भी जाहिर है कि उप में मुसलमानों का प्रेम मुलायम सिंह से ही प्रगाढ़ हो सकता है। इन हालातों में बसपा सरकार गिराने का काम भी नहीं कर सकती। मोहम्मद इस्लाम का तो दावा है कि 69 में से 55 विधायकों के लिए तो सरकार भूखे के हाथ में सिकी रोटी की तरह है, उसे कौन छोड़ेगा और मार्क्सवादी, जनता दल आदि के विधायकों का प्रवाह भी शायद समाजवादी दल की तरफ ही है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बसपा रेत के महल की तरह बिखर रही है। सदियों से शोषित और दमित अपने उत्थान की आकांक्षा में उत्तेजनात्मक ढंग से एक हो सकें ऐसा अवसर नहीं हो पाता। न्याय, सम्मान और सुकून के लिये ये कभी किसी व्यक्ति तो कभी किसी पार्टी के पीछे होते हैं और वह व्यक्ति या उस पार्टी को चलाने वाले लोग कभी अपने स्वार्थ, कभी अहंकार और कभी अज्ञान के कारण दलित चेतना के आंदोलन को नष्ट कर देते हैं। राजनीति के आकाश में दलित चेतना के एक-एक कर डूबते हुए तारे फिर कितने समय बाद जाज्वल्यमान होंगे, कौन जाने? यह दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है? तात्कालिक संतोष का विषय केवल यह हो सकता कि बसपा के शीर्ष नेता ब्राह्मण या मुसलमान या ठाकुर या गांधी तक को, गालियां देकर घृणा के जो नश्तर लगा रहे थे, उनसे होने वाला समाज की एकता का रक्तस्राव कुछ दिन रुक जायेगा।
महेश श्रीवास्तव
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