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राव को अपदस्थ कर स्वयं प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा की उत्तेजक भावुकता में अर्जुनसिंह ने केन्द्रीय मंत्रिमंडल से त्याग पत्र दे दिया। - महेश श्रीवास्तव की टिप्पणियां

24 Sep, 2021 | 452 views

राव को अपदस्थ कर स्वयं प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा की उत्तेजक भावुकता में अर्जुनसिंह ने केन्द्रीय मंत्रिमंडल से त्याग पत्र दे दिया। - महेश श्रीवास्तव  की टिप्पणियां
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त्याग पत्र: एक साथ हंसने और रोने का विषय 

राव को अपदस्थ कर स्वयं प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा की उत्तेजक भावुकता में अर्जुनसिंह ने केन्द्रीय मंत्रिमंडल से त्याग पत्र दे दिया। लेखक का मत कि अननुकूल परिस्थितियों में लिया गया यह अदूरदर्शी निर्णय अर्जुन सिंह के राजनीतिक जीवन के लिये अत्यंत घातक होगा और भविष्य में अब कभी वे प्रधानमंत्री तो बन ही नहीं पायेंगे (26.12.1994)

अभी चार दिन पूर्व ही उन्होंने कहा था कि कांग्रेस में कोई करिश्माई नेता नहीं है। यह कहते हुए उन्होंने अपने बारे में विनम्र मुस्कुराहट छोड़ी थी और सोनिया जी के बारे में संभावनाओं की एक भावुक डोर। जाहिर तौर पर हथौड़ा श्री नरसिंह राव के व्यक्तित्व पर मारा गया था। अपनी बात को व्यवहार से स्पष्ट करने के लिए दो दिन बाद ही उन्होंने डमरू बजाकर मजमा जुटाया और दर्शकों के बीच से कहीं से भी उठ खड़े होने का करिश्मा दिखाने के लिये वे त्यागपत्र की सन्दूक मे बंद हो गये। मगर नरसिंह राव ने उस पर स्वीकृति का ऐसा ताला जड़ दिया, जो किसी भी चाबी से नहीं खुलता। पता नहीं संदूक भी यह है अथवा नहीं जिसमें पीछे सन्द होती है और जादूगर, जिससे लोगों की निगाह बचा कर निकलता है और दर्शकों के पीछे से गिली-गिली करता हुआ दौड़ता हुआ आता है और तालियां बादलों की तरह गड़गड़ाहट करने लगती हैं। फिर नरसिंह राव स्वयं भी तो गोगिया पाशा से कम नहीं क्या पता सन्दूक की जगह ताबूत रखवा दिया हो। अभी तो प्रत्यक्ष इतना ही दिख रहा है कि ताला ऐसा लगा है, जो किसी चाबी से नहीं खुलता।

          अर्जुन सिंह का त्याग पत्र देना एक असाधारण घटना है। असाधारण इसलिए क्योंकि उन्होंने कभी इतनी उतावली में त्याग पत्र नहीं लिखा। नरसिंह राव ने एक बार अपने मंत्रिमंडल के पुनर्गठन के लिए सभी मंत्रियों से त्याग पत्र मांगे तो अर्जुन सिंह दो दिन के लिए दिल्ली से भोपाल आ गये। तिरूपति में कार्यसमिति में निर्वाचन के बाद त्याग पत्र मांगा तब भी उन्होंने नहीं दिया, केवल मनोनीत होना स्वीकार कर लिया और म.प्र. के नागरिकों को यह भी याद है कि लाटरी कांड में उच्च न्यायालय की विपरीत टिप्पणियों और कांग्रेस उच्च कमान के निर्देश के बावजूद उन्होंने तब तक त्यागपत्र नहीं दिया जब तक कि बूटासिंह भोपाल आकर दो दिन पड़े नहीं रहे और उन्हें साम, दाम, दण्ड और भेद से त्यागपत्र देने के लिए मजबूर नहीं कर सके।

          ऐसे व्यक्ति का एकाएक दिया त्याग पत्र अनेक प्रश्नों को जन्म देता है। क्या उन्हें भरोसा नहीं था कि अनिर्णय के बीमार नरसिंह राव उनके त्यागपत्र को इतनी शीघ्र स्वीकार कर लेंगे? क्या दस जनपथ अर्थात् सोनिया गांधी के समर्थन के कोई  केप्सूल उन्हें प्राप्त हुए है अथवा विश्वनाथ प्रताप सिंह का इतिहास वे दोहराना चाहते है ? मगर तीनों ही तत्व बहुत कमजोर नज़र आते हैं। तीन दिन पूर्व ही संसद के गलियारे में जब अर्जुन सिंह के त्याग पत्र की बात उठी थी तब प्रधानमंत्री के विश्वस्त भुवनेश चतुर्वेदी ने पूछा था कहां है वह त्याग पत्र, जिसके बारे में दो दिन से आप लोग बात कर रहे हैं? भिजवाइये तो सही मंजूर करवा देते हैं। यह बात अर्जुन सिंह तक नहीं पहुंची होगी, यह मानना गलत है। प्रधानमंत्री निवास के मूड को पौरुष विहीन समझ कर चुनौती देने का खतरा उन्होंने उठाया, तो निश्चय ही पुरुषार्थ का कोई शक्ति केन्द्र भी सहारे के लिए तलाशा होगा। क्या वह शक्ति केन्द्र सोनिया गांधी हैं? अपने त्याग पत्र के साथ प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में राजीव गांधी हत्याकांड की जांच को जिस तरह उन्होंने बार-बार उछाला और राजीव गांधी को जिस प्रकार बार बार महान नेता निरूपित किया है उससे यह कयास सहज ही लगता है किन्तु, क्या सोनिया गांधी वर्तमान में, वास्तव में इतनी बड़ी शक्ति केन्द्र है कि समस्त कांग्रेस पार्टी और उसकी स्थापित सत्ता को चुनौती दे सकें? उनके कंधे पर रख कर बन्दूक चलाना तो तभी संभव होगा, जब वे अपना कंधा आपको सौंपने को तैयार होंगी। जिसकी कोई भारतीय राजनीतिक दृष्टि नहीं हो, जिसके सामने अपने परिवार की सुरक्षा पहला प्रश्न हो, जिसके पास राजीव फाउन्डेशन या नेहरू परिवार की अकूत सपित्त का साम्राज्य हो और जिसे बोफोर्स काण्ड या फाउन्डेशन में अपने परिवार की बदनामी की शंका सता सकती हो, वह क्यों अपने कंधे को आपकी सीढ़ी बनायेगी? दस जनपद श्रद्धा या भावुक आस्था का केन्द्र हो सकता है, फिलहाल वह शक्ति केन्द्र तो नहीं है। यदि श्रद्धा या आस्था के केन्द्रों में अपनी शक्ति भी हुआ करती तो गजनवी जैसा आक्रमण कारी सोमनाथ की मूर्ति तोड़ कर उसमें भरे हुए हीरे जवाहरात निकाल पाता? विश्वनाथ प्रताप सिंह बनने के लिए भी स्थितियां वैसी अनुकूल कहा है, हालांकि जो विचारणीय मुद्दे उठाये गये हैं उनमें झलक, बी.पी. सिंह द्वारा उठाए गए बोफोर्स के मुद्दे जैसी है। नगर प्रकाश को परावर्तित करने के लिए दर्पण के साफ होने या दिखने की शर्त भी तो होती है तभी परावर्तित प्रकाश दूसरी या तीसरी शक्ति होने का भ्रम उत्पन्न कर सकता है। दर्पण पर पुरानी ओस के चिन्ह अभी बरकरार है।

          नैतिक दृष्टि से अर्जुन सिंह द्वारा उठाये गये मुद्दे राजनीति को पवित्र करने के महत्वपूर्ण सुझाव बन सकते हैं किन्तु न्याय तो सूर्य की रोशनी की तरह होना चाहिये जो प्रतिभूति घोटाले को प्रकाशित करे तो बोफोर्स घोटाले को भी करे, फिर चाहे उसमें इटली का कोई गांधी परिवार के निकट का व्यक्ति ही सम्मिलित दिखाई देता हो। वैसे शंकरानन्द और ठाकुर के त्याग पत्र के बाद प्रतिभूति घोटाले का जो बुखार उतरा होगा, अर्जुन सिंह के त्याग पत्र से पारा फिर कुछ दिनों तक चढ़ा रहेगा और लोगों को प्रधानमंत्री से यह पूछने की प्रेरणा देगा कि यदि प्रतिभूति या चीनी घोटाले में आपके सारे मंत्री निर्दोष है तो क्या इस देश की जनता इन घोटालों के लिए दोषी है? जाहिर है, फरवरी में महाराष्ट्र और गुजरात के चुनावों में भी यह प्रेरणा कांग्रेस के विरुद्ध जायेगी, जहां चुनाव होना तय है। बिहार और उड़ीसा में तो मतदाता पहचान - पत्र न बन पाने के कारण चुनाव ही संदिग्ध हैं। अयोध्या प्रकरण में मुसलमानों से क्षमा मांगने का उनका आह्वान भी रंग लायेगा। गुजरात तथा महाराष्ट्र में, जहां मुसलमान मतदाता के पास कांग्रेस की झोली में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, वहां भी उसे उत्तेजित करेगा और विकल्प तलाश करने की प्रेरणा देगा। हो सकता है इन दोनों प्रदेशों में कांग्रेस के नेस्तनाबूद हो जाने के बाद ही राव का पतन हो और बाजी अर्जुन सिंह के हाथ लगे। मगर शंकरानंद जैसे लोग आदर्श और नैतिकता के बखान को भी उचित नहीं मानते। कहा जाता है कि जो व्यक्ति स्वयं आरोपों की डाइबिटीज़ से पीड़ित हो उसे यदि आदर्शों की फुंसियों में नैतिकता की मीठी खुजली चले तो भी सब से काम लेना चाहिये वरना घाव शीघ्र भरते नहीं है और पक कर उनके फफोले बन जाने का खतरा भी बना रहता है।

         केन्द्र में जो राजनीतिक संघर्ष चला है उसमें बाज़ी फिलहाल राव के पक्ष में दिखाई देती है। ऐसा नहीं कि वे शंकरानंद या ठाकुर को हटाना नहीं चाहते थे मगर यह उन्होंने 10 जनपथ या उसके इशारे पर अर्जुन सिंह द्वारा छेड़े गये अभियान के बाद किया। राजनीति को पढ़ते रहने वाले लोगों को याद होगा कि जब राष्ट्रपति का चुनाव हो रहा था, डा. शंकर दयाल शर्मा राव के और शंकरानन्द दस जनपथ के तथा परोक्ष रूप से अर्जुन सिंह के भी उम्मीदवार थे। रामेश्वर ठाकुर भी वहीं का पानी पीकर बड़े हुए हैं। राव ने दोनों को निर्दोष घोषित कर दोनों का दिल भी जीत लिया है और दोनों को अपने विरोधियों के पीछे भी लगा दिया है।

           अर्जुन सिंह के त्याग पत्र पर उनके समर्थक क्या करें? गौतम बुद्ध के जन्म का एक किस्सा उनकी स्थिति व्यक्त कर सकता है। राजा शुद्धोधन ने अपने पुत्र का भविष्य जानने के लिए काल देवल नामक ब्राह्मण को बुलाया। बालक को देखकर पहले ब्राह्मण हंसा और फिर रोने लगा। राजा ने कारण पूछा तो ब्राह्मण ने कहा में प्रसन्न इसलिये हुआ क्योंकि मैंने उस बालक को देखा जो भविष्य में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करेगा और दुखी इसलिये हुआ क्योंकि जब वह संसार को अपना ज्ञान बांटेगा तब उसके प्रवचन सुनने के लिए में जीवित नहीं रह सकूंगा। उनके समर्थक प्रसन्न हो सकते हैं कि उनका नेता आज देश का सबमें बड़ा आदर्शवादी और अल्पसंख्यक समर्थक बन गया और दुखी भी हो सकते हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में देख पाना शायद अब संभव नहीं होगा।

 

 महेश श्रीवास्तव 

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