युवती भागने वाले साधु की कहानी
स्थानीय संस्थाओं के चुनाव में मतदान से पूर्व इंका सांसदों ने भाजपा के दो पूर्व मंत्रियों पर भाजपा शासन में जमीन हड़पने और करोड़ों की संपत्ति बटोरने के आरोप लगाये। लोकायुक्त में शपथ पत्र भी दिये और दस्तावेजों की फोटो प्रतियां भी दीं। उस समय लिखी गई टिप्पणी में साधु दिखने वाले भाजपा मंत्रियों को लड़की भगाने वाला ढोंगी माना गया। बहुत बाद में लोकायुक्त ने आरोप निराधार और दस्तावेज झूठे पाये । यह कांग्रेस का राजनीतिक षडयंत्र सिद्ध हुआ। (28.11.1994)
यह जो पिछले दिनों स्थानीय संस्थाओं के चुनाव हुए, कई मायनों में अद्भुत थे। कांग्रेस अपने कपड़े उतार चुकी थी और मतदान से पूर्व भाजपा नेताओं और उसके शासन के कपड़े तार-तार कर रही थी। जगतपति पुराण का प्रतिदिन अखण्ड पाठ चल रहा था और के. एन. प्रधान, पचोरी और गुफरान भाजपा के पूर्व मंत्रियों की तिजोरियों से हड़पी गई जमीनों के दस्तावेज निकाल कर उनकी पतंगे उड़ा रहे थे। माहौल सनसनाया हुआ था और पाठकों के फोन आ रहे थे कि इस सब पर टिप्पणी चाहिए। मगर मैं मौन था क्यों कि वह उचित समय नहीं था इसलिए क्योंकि हमारा समाज अनेक अंधविश्वासों में जीता है और हर कोई इसी समाज का अंग है अतः सनसनाते और उल्लेजित माहौल में किसी भी विचार को सही सदर्भों में समझने के बजाय पूर्वाग्रहों के आधार पर पक्ष या विपक्ष में अर्थ या अनर्थ में समझा जा सकता है। हमारे गांव में एक अंधविश्वास चलता है कि यदि गर्भवती महिला को सांप देख ले तो वह अंधा हो जाता है। अब महिला के गर्भ और सांप के अंधे होने से क्या संबंध ? नगर संबंध जोड़ दिया ताकि महिला सांप को नहीं देखे और भागे नहीं और कहीं गर्भपात न हो जाये। एक तार्किक स्थिति की अतार्किक अभिव्यक्ति अब चूंकि निगमों, पालिकाओं और पंचायत चुनाव के प्रसव के दोनों दौर गुजर चुके हैं इसलिए विचार के शेषनाग को बाहर आने में कोई खतरा नहीं खतरा तो वैसे भी नहीं था, क्योंकि विचार कभी अंधत्व से समझौता नहीं करता, मगर समाज का कोई एक भाग या दल अपने पूर्वाग्रहों में उसे पक्ष या विपक्ष में मान ही ले तो कोई क्या कर सकता है। विचार आज भी सर्प ही है जिसे हम अपने अंधविश्वास में 364 दिन लाठी लेकर मारने और 365 वे दिन अधविश्वास में ही दूध पिलाने जैसी अप्राकृतिक क्रिया में जुट जाते हैं।
तो बात जगतपति पुराण और तीन सांसदों (पूर्व और वर्तमान) के भाजपा के दो पूर्व मंत्रियों के प्रशस्ति गान की थी। स्थानीय निकायों से ठीक पूर्व भदभदा के द्वार की तरह खुले इन पिटारों का तात्कालिक लक्ष्य निश्चित ही और जाहिर तौर पर भाजपा को पराजित होते देखना था। किन्तु यदि अवसर के महत्व को छोड़ दिया जाये तो आरोपों की विश्वसनीयता गंभीर और चौकाने वाली है। जगतपति कमेटी तो एक अधिकृत कमेटी थी ही, तीन पूर्व और वर्तमान सांसद भी जो बात कह रहे थे वह प्रमाण के साथ कर रहे थे और उन्होंने अपनी बात की सत्यता सिद्ध करने और असत्य होने पर दण्ड भुगतने की वचनबद्धता के साथ लोकायुक्त में रिपोर्ट भी करवाई है। आरोपों में पूर्ण नहीं आशिक सच्चाई भी हो तो भी वह दिल दहला देने वाली और कचोटने वाली है। सरकार कोई भी हो सार्वजनिक या लोक कल्याण का कार्य करने वाली संस्थाओं, जरूरतमंद कमजोर वर्ग के लोगों या साहित्य, कला विज्ञान आदि के क्षेत्र में काम करने वालों को जमीनें देती ही है। अब हमें यह भी बुरा नहीं लगता कि विधायकों या सांसदों या रिश्तेदारों को कोई आवासीय या व्यापारिक भूखण्ड आवंटित कर दिया जाय। किन्तु यह तो कल्पनातीत है कि बहुमूल्य भूमि एकड़ों में भवन निर्माताओं को आवंटित कर दी जाये और उसके लाभ का आधा हिस्सा, रिश्तेदारों की तिजोरियों में चोर दरवाजे से पहुंच जाये। लोकतंत्र में जहां लोक ही कल्याण के विश्वास के साथ जन प्रतिनिधि को जिताता और लोक के कल्याण के लिए उसमें शक्तिया आरोपित करता है, वहां जन प्रतिनिधि ही यदि परिवार कल्याण तक केन्द्रित हो जाये, जनविश्वास की आंखे निकालकर उसकी संपदा की गठरी को अपनी तिजोरी में भर ले तो निंदनीय तो यह होता ही है, लोकतंत्र के रथ के चकों में घुन भी लगाता है। वे जो आपको जिताते हैं शर्म से अपना मुंह अपने गिरेबान में छुपाते हैं। शर्म से सिर तब और झुक जाता है जब वह देखते हैं कि लंगोट लगाकर चिमटा बजाते, राष्ट्रप्रेम की अलख जगाते जिन धूनी बाबाओं ने सत्ता के महल में प्रवेश किया था वे जब वहां से निकले हैं तो उनकी जूतियां सोने की है और हार में हीरे दमक रहे है। कहा लुप्त हो जाता है उनका साधुवेश, कुछ पता नहीं चलता। भाजपा की अनुशासित जमात दिल्ली का सिंहासन मिलते ही अपने मंत्री को तेल डालकर आग लगाने की चेष्टा करती है, म.प्र. में सत्ता में आते ही उसके मंत्रियों के त्याग का पानी उतर जाता है और स्वार्थ का पट्टा गले में लटक जाता है। सत्ता की मेनका के सामने कैसे टूटता है भाजपा के विश्वामित्रों का ब्रह्मचर्य, यह दुखद प्रसंग भी राजर्षि के भक्तों के सामने आता है। कांग्रेस में भी दोष नहीं है, ऐसी बात नहीं। मगर वह भाजपा की तरह स्वयं को साधुओं की जमात घोषित नहीं करती। वह मनुष्यों की पार्टी है जिसे सत्ता प्राप्ति के लिए कभी-कभी गिरोह भी कहा जाता है। उसमें वे सभी बुराईया है जो किसी भी मनुष्य में हो सकती हैं किन्तु ये अच्छाईया भी है जो मनुष्य में ही हो सकती है। मनुष्यों की पार्टी में सब होगा मगर साधुओं की जमात में स्वार्थ का ताण्डव चौकाता है। संस्कृति का यह कौन सा अध्याय है जो भाजपा के मंत्रियों ने लिखा और जगतपति तथा ईका नेताओं ने लोगों के सामने पढ़ने के लिए रखा।
बात चुनाव के साथ समाप्त नहीं होना चाहिए जो आरोप लगे हैं उन्हें उनके वांछित परिणाम तक पहुंचने में कोई बाधा नहीं बने। यदि कोई राजनीतिक समझौता हुआ तो कांग्रेस भी शरीके गुनाह होने के आरोप से नहीं बचेगी। लोकायुक्त ने पिछले दिनों कुछ साहसिक निर्णय करके अपनी प्रतिष्ठा को आसमान दिखाया है वह जमींदोज नहीं हो। न्याय के लिए उत्तरदायी व्यक्तियों और कठघरे में खड़े साधुओं को अंगरेजो के जमाने का एक रोचक न्याय प्रकरण याद दिलाना शायद उचित होगा जो "अदालतों के रोचक प्रसंग में संकलित हैं।
बात अंगरेजों के जमाने की है। प्रयाग में एक अंगरेज आई.सी.एस. अफसर ज्वाइंट मजिस्ट्रेट थे। वे बहुत अच्छी हिन्दी ही नहीं जानते थे बल्कि रामचरित मानस के अद्भुत विद्वान और प्रेमी भी थे। उनकी अदालत में एक साधु का प्रकरण पेश हुआ। साधु पर एक युवती को भगाने का आरोप था। पुलिस की ओर से सारी गवाहियां पेश हो गई और मामला लगभग प्रमाणित हो गया, तब साधु को अपनी सफाई देने के लिए कहा गया। आरोप सही था, साधु क्या उत्तर देता, अतः उसने मानस की चौपाई सुना दी
होइहै सोई जो राम रचि राखा
को करि तर्क बढ़ावहि शाखा!
मजिस्ट्रेट महोदय ने अभियुक्त को चार साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाते
हुए, यह चौपाई भी सुनाई-
कर्म प्रधान विश्व करि राखा
जो जस करहि सो तस फल चाखा!
-हे राम !
महेश श्रीवास्तव
Leave A Comments