शायद और संदेह के बीच कांग्रेस
आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और सिक्किम के चुनावों में कांग्रेस की घोर पराजय के कारणों की तलाश और विश्लेषण। (11.12.1994)
पैरों के नीचे से जमीन खिसके या जमीन पर से पैर फिसले परिणाम एक ही होता है जो आंध्रप्रदेश, कर्नाटक या सिक्किम में कांग्रेस के साथ हुआ। इस प्रकार की घटनायें इतनी अप्रत्याशित होती हैं कि व्यक्ति या दल समझ ही नहीं पाता और वह अपने को चित पड़ा हुआ पाता है, चमकते हुए सूरज के बावजूद उसे आसमान में तारे नजर आते है और रीढ़ में लगी चोट उसे काफी समय तक हिलने डुलने से भी मोहताज कर देती है। यह कष्ट तब और बढ़ जाता है जब लगभग डेढ़ माह बाद उसे फिर चुनाव में उतरना हो और वह पशोपेश में हो कि सेनापति बदले या आत्मघाती दस्ते की तरह रामभरोसे मैदान में कूद जाये। अब अपनी टूटी हुई मीनारों और धसकी हुई दीवारों पर विश्लेषण का कैसा भी पलस्तर चढ़ाया जाए और कारणों का कोई भी पिटारा खोला जाये, कांग्रेस अपनी वैसे ही स्पष्ट पराजय नहीं छुपा सकती जैसे कोई स्त्री अपनी वृद्धावस्था नहीं छुपा सकती। उत्तर भारत के अनेक राज्यों में अंतिम दिन गिन चुकी कांग्रेस के लिए दक्षिण में भी वृद्धावस्था के बाद का काल प्रारंभ हो चुका है, अब यह भी स्पष्ट दिखाई देता है।
यदि आप पराजय के कारणों की स्थूल तलाश में जुट कर किसी आत्मसम्मोहन की स्थिति में ही जीना चाहते हैं, तो कह सकते हैं कि रामाराव के 2 रुपये किलो चावल देने के नारे ने कमाल कर दिया या सर्वेक्षण करवा लें कि पराजय का कारण केन्द्र सरकार से नहीं राज्य सरकारों से नाराजी भी या एक वाक्य में कह दें कि राज्यों में पराजय का अर्थ लोकसभा में भी पराजय नहीं होता। मगर सो टके की एक बात यह है कि इन राज्यों में मतदाता ने पूरी निष्ठा और संकल्प के साथ कांग्रेस को पराजित किया है और पराजित ही नहीं किया जितने कम प्रत्याशी कांग्रेस के जीते हैं उससे सिद्ध होता है कि कांग्रेस को मारा ही नहीं गया मार कर गढ्डे में भी डाल दिया गया है। आंध्र में प्रधानमंत्री के महाबली पुत्र तक का पराजित हो जाना और कर्नाटक जहां आपके 170 विधायक परचम लहराते थे वहां 35 का आंकड़ा पार नहीं कर पाना कांग्रेस के गर्त में जाने का प्रमाण है। यह तर्क कि पिछले पांच सालों में जिन 20 विधानसभाओं के चुनाव हुए वहां सत्तारूढ़ दल पराजित ही हुआ है अत यह पराजय एक स्वाभाविक प्रक्रिया का परिणाम है, मन समझाने वाला ख्याल है क्योंकि यहां कांग्रेस को पराजित ही नहीं किया गया उसे कुचला भी गया है। कुचलना प्रक्रिया की अंतिम क्रिया होती है।
क्यों था कांग्रेस के प्रति इतना आक्रोश मतदाता में? वह भी उस प्रदेश के मतदाता में जिसने आपातकाल के बाद भी पूरे देश में चली कांग्रेस विरोधी हवा के बावजूद कांग्रेस को नवाजा था और जिसे अपनी मिट्टी के लाल के भारत का प्रधानमंत्री होने का गौरव हासिल है। कारण शायद गहरा और गूढ़ है। आंध्र या कर्नाटक कांग्रेस को शायद उसी चारित्रिक आभा और संघर्षशील ओज में देखने के आदी है जिसमें उन्होंने कांग्रेस को आजादी के प्रारंभिक काल में देखा था। कांग्रेस के प्रति इन राज्यों का भावुक मन उन घटनाओं को नहीं पचा पाया जो पिछले चार सालों में घटी। नरसिंह राव तेलगू देशम के सांसदों के टुकड़े करके उसका एक अंश पचा जायें यह शायद आंध्र को मंजूर नहीं था और जनता दल को सन्तरे की तरह फांक-फांक कर चूस जायें यह शायद कर्नाटक को पसंद नहीं आया। सिक्किम में भी भण्डारी पर पद-प्रहार कर लिम्बू का राजतिलक कर देना शायद वहां की जनता को रास नहीं आया। आंध्र और कर्नाटक शायद कांग्रेस से यह अपेक्षा भी नहीं करते थे कि राव मंत्रिमंडल के सदस्य ही चुनाव के पूर्व मुसलमानों के आरक्षण का मुद्दा उछालें, दूरदर्शन पर उर्दू समाचार प्रसारण का लालीपाप दिखायें या ऐन चुनाव से पूर्व जाति, जनजाति या पिछड़े वर्गों के आरक्षण में बढ़ोत्री करने का अध्यादेश निकालें। आंध्र और कर्नाटक की जनता को शायद अपनी कल्पना की कांग्रेस जैसी महान पार्टी का यह साम्प्रदायिक और जातिवादी राजनीति का खेल पसन्द नहीं आया और शायद यही कारण था कि कांग्रेस का कथित वोट बैंक अर्थात मुसलमान, हरिजन, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग आंध्र में देशम् और कर्नाटक में जद के खाते में चला गया।
यह पराजय कांग्रेस की तो है ही, प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष की भी है।इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने अपनी नीतियों और विशेषकर खुली अर्थव्यवस्था पर वोट मांगे थे और अध्यक्ष के रूप में ही उन्होंने दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों को शतरंज के पैदल मोहरों की तरह चला और पिटवाया था और मतदाता से यह आग्रह भी किया था कि केन्द्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने से विकास अच्छा होता है मतदाता ने सभी बातों को तल से अस्वीकार कर दिया है। अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि यदि राज्य में विरोधी दल की सरकार होती है और इस दौरान हुए लोकसभा चुनाव में वह पराजित हो जाती है और केन्द्र सरकार इसे जनता का विश्वास खो देना मान कर राज्य सरकार को भंग कर देती है, तो जिन राज्यों के सांसदों की विराट संख्या केन्द्र सरकार को बहुमत देती है वहां यदि केन्द्र का सत्तारूढ़ दल विधानसभा में बुरी तरह पराजित हो जाये तो केन्द्र को क्या करना चाहिए? यद्यपि दक्षिण की पराजय कांग्रेस, उसके अध्यक्ष और प्रधानमंत्री की निर्णायक पराजय है, किन्तु इस समय तो कांग्रेस के पास अपने नेता में विश्वास व्यक्त करने के अलावा कोई चारा ही नहीं है। ज्यादा से ज्यादा अध्यक्ष पद पर किसी अन्य को बिठा कर नैतिकता का दुशाला ओढ़ा जा सकता है। अभी फरवरी में जहां चुनाव होने वाले हैं अर्थात् गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, उड़ीसा और अरुणाचल प्रदेश, वहां भी कांग्रेस की क्या हालत होगी कहा नहीं जा सकता। अतः अर्जुन सिंह, नारायण दत्त तिवारी या शरद पवार को कोई निर्णायक लड़ाई लड़ना ही होगी तो मार्च का महीना ही सर्वोत्तम रहेगा।
महेश श्रीवास्तव
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