विधानसभा का पहला दिन
दो बोध कथाएं
नई सरकार और नई विधानसभा का पहला दिन। सशक्त प्रतिपक्ष भाजपा और सत्तारूढ़ कांग्रेस के लिये दो बोध कथायें। क्यों भाजपा सत्ताच्युत हुई और क्या नहीं किया तो कांग्रेस का भी यही हश्र हो सकता है।(24.12.1993)
विधानसभा का पहला दिन सभी नवनिर्वाचित विधायकों के कसम खाने का दिन। भाजपा के विधायकों, खासकर वरिष्ठों में गहरी पीड़ा के ऊपर बनावटी मुस्कान। अपने हाथों अपना आशियाना जला चुकने वालों का क्षोभ और सामने दिखती हुई नखशिख श्रृंगार किये सत्ता सुन्दरी की मोहक भाव भंगिमाओं सी कुर्तियां। दूसरी ओर कांग्रेस विधायक रोम-रोम से छलकती छींका टूटने की खुशी, पराजितों के प्रति गुप्त किन्तु अप्रकट नहीं हेय भाव और उत्साह से लबरेज आनंद का छलकता जाम। देखते-देखते दो बोध कथायें हो आई याद एक भाजपा और दूसरी कांग्रेस के लिए।
भाजपा के लिये - ओशो रजनीश अपने प्रवचनों में कबीर के जीवन की - एक कथा सुनाते थे। पहली बार पढ़ी थी तो भीतर बहुत गहरे तक हिल गया था।
ओशो ने भी इस कथा के बारे में कहा था ऐसा कहा जाता है। प्रामाणिक अर्थात - लिखित तो कबीर के जीवन के बारे में कुछ नहीं के बराबर है। तो कहानी यों है कि कबीर गरीब तो थे ही, मगर साधु संत उनके यहां बहुत आते थे हर अतिथि को भोजन कराना वे अपना धर्म समझते थे अतः स्वाभाविक रूप से भोजन का सामान उधार आता था, किराने की दुकान वाले का कर्ज बढ़ता जाता था। दुकानदार नानुकर तो करता था मगर आखिर में उधार दे देता था कर्ज बहुत बढ़ गया, बनिये का तगादा भी बढ़ता गया और इसी बीच साधुओं की जमात कबीर के घर आ गई। धर्मसंकट आ पड़ा। साधुओं को भूखे भी विदा नहीं किया जा सकता, घर में है भी नहीं और बनिया उधार भी नहीं देगा। कबीर ने अपनी पत्नी से कहा जा बनिये से इस बार और उधार ले आ, किसी तरह पटा देंगे। कबीर शायद जानते थे कि उन्हें तो बनिया अब उधार देगा नहीं, पत्नी महिला है शायद मान जाये। बामुश्किल उनकी पत्नी गई। दुकानदार बहुत झल्लाया कबीर की पत्नी ने बड़ी मिन्नत की साधु भूखे चले जायेंगे तो अधर्म हो जायेगा। अंततः दुकानदार ने वह दुःसाहस कर ही लिया जिसके बारे में वह शायद कई दिनों से सोच रहा होगा। कबीर की पत्नी, कहते हैं तब युवा भी थी और सुंदर भी होगी ही दुकानदार ने बेशर्म प्रस्ताव किया उधार दे देता हू, रात को मेरे घर आना पड़ेगा। एक क्षण को तो कबीर की पत्नी सन्न! मगर दूसरे ही क्षण कबीर का चेहरा याद आया और उसने उधार ले लिया।
साधु भोजन कर गये बाहर पानी गिर रहा था। पत्नी ने कबीर को दुकानदार की शर्त बताई। शायद कबीर कुछ देर चुप रहे, फिर बोले कपड़े बदल ले तैयार हो जा वरना वह क्या कहेगा कि कैसी मैली कुचैली आ गई पत्नी तैयार हुई। कबीर ने छाता उठाया चल तुझे छोड़ आऊं, रास्ते में अंधेरा है और कीचड़ भी, भटक या फिसल नहीं जाये। कबीर भीगते गये और पत्नी को दुकानदार के घर छोड़ कर बाहर बैठ गये। अंधेरी और बरसती रात में दरवाजा खटका तो दुकानदार ने खोला वह हक्का-बक्का! वाकई में कबीर की पत्नी आ गई। थोड़ा संभला तो पूछा बाहर पानी गिर रहा है, तेरे कपड़े भी नहीं भीगे? कबीर छोड़ने आये हैं उसने कहा जब तू कह देगा वे मुझे वापस ले जायेंगे। दुकानदार पर तो मानो बादल फूट पड़ा। बाहर जैसे बादल बरस रहे थे वैसे ही उसकी आंखें बरसने लगीं। दौड़ा दौड़ा गया और रोते रोते पैरों में लोट लोट कर कबीर से माफी मांगने लगा।
भाजपा ने जब तक सत्ता थी, उधार लेकर दावतें कीं। भोजन साधु करते इससे पहले ही खुद टूट पड़े और गिद्धों की तरह झगड़े। जनता अपना कर्ज मांगने आई तो उसे लट्ठ दिखाया। आखिर एक दिन ऐसा आया कि सत्ता जनता के पास वापस चली गई और कमरा बंद कर कांग्रेस के साथ बैठ गई। सत्ता का कुछ नहीं बिगड़ता और वह लौट आती, यदि तुम कबीर होते सत्ता ही नहीं लौटती जनता भी तुम्हारे चरणों में लौटती। मगर तुमने लोकहित के साधुओं को भोजन कराने के लिए कर्ज नहीं लिया, भोजन के लिये गिद्धों की तरह झगड़े और जब जनता ने अपना वचन याद दिलाया तब शक्ति के मद में लट्ठ हाथ में लेकर अकड़े।
कांग्रेस के लिये - राजा दिग्विजय करके लौटा था और दरबार में जश्न मन रहा था। वह एक बड़ा कक्ष था, रात का वक्त था, मशालें जल रही थी और सभासद स्तुतिगायन कर रहे थे। दृश्य कुछ विधानसभा की तरह रहा होगा। अचानक एक अधेड़ साधु सभा कक्ष में घुस आया। लोगों ने पहचाना तो हाथ तलवार की मूठ पर चले गये। यह वही औघड़ था जो जब भी जंगल से शहर में आता था तो गली-गली राजा की आलोचना करता था विजय के उत्साह और आनंद में डूबे लोग कुछ करते इसके पूर्व ही वह कक्ष में खड़ा था। राजा ने मंत्री की ओर देखा तो मंत्री ने बताया यह औघड़ साधु पास के जंगल में रहता है, यदाकदा ही इसने महाराज के गुण गाये हैं अक्सर तो यह आग ही उगलता रहता है। राजा ने साधु की ओर देखा साधु ने कहा राजा तुम्हारा मंत्री सत्य को झूठ की तरह बोल रहा है। सत्य यह है कि में आग उगलता हूं और झूठ यह है कि आग उगलना बुरा है राजा, प्रकाश में रहना चाहते हो तो अग्नि को प्रज्जवलित और पूजित रखो वरना अन्धकार में डूबने से तुम्हें कोई नहीं रोक सकता। मंत्री ने आदेश दिया यह साधु उदण्ड है, इसे राजा से बात करने की तमीज़ नहीं, इसकी संपत्ति जब्त कर लो। साधु सिर्फ एक लंगोटी लगाये था, खोली और सिंहासन की ओर फेंक दी और नंग धडंग खड़ा हो गया। सब हतप्रभ ! मंत्री ने आदेश दिया इस उदण्ड का सर कलम कर दो साधु ने अट्टहास किया राजा, मेरा शरीर मेरा सिंहासन है। जैसे सिंहासन नहीं होने पर भी तू रहेगा वैसे ही तू शरीर के नहीं रहने पर भी मैं रहूंगा राजा ने रोका, उसके भीतर कुछ कौंधा। इसका वध नहीं होगा। इसके अग्नि वचनों से मैं नहीं डरता साधु ने फिर अट्टहास किया। राजा तू डरता है इसीलिये निडर होने की बात करता है। मेरा वध नहीं करता क्योंकि मेरे वध में तुझे अपना सिंहासन छिनता हुआ दिखता है। राजा ने साधु के वचनों में सत्य पाया हाथ जोड़ कर उसके सामने आया साधु धीरे से मुस्कुराया, क्या दृश्य है ! राजा विनय का अभिनय कर रहा है, सैनिक नंगी तलवार उठाये खड़े है और मंत्री दांत पीस रहा है। साधु ने कहा-राजा प्रकाश चाहिये तो अग्नि प्रज्जवलित रखना। सत्य अग्नि की तरह होता है और हां, मेरा तेरी सभा में कोई काम नहीं था, मैं तो यह कहने आया था कि तेरा एक योद्धा डाकुओं के आक्रमण से जंगल में घायल पड़ा है, उसे मेरी कुटिया तक पहुंचा दे ताकि में उसकी सेवा कर सकूं। और हां, क्योंकि तू राजा है और में साधु हूं, अतः इतना जरूर कहूंगा, मेरी कुटिया टूट रही है उसे बवा देना ताकि में उसमें चैन से बैठ सकू और तेरे विरुद्ध आग उगल सकूं।
क्यों याद आई यह कथा? क्या उस साधु का नाम "जनमत" था राजा जब उसका वध करेगा उसके सिंहासन का भी वध होगा। उल्लसित सभासद और आपा खोये महामंत्री पर भी राजा को नियंत्रण रखना होगा।
महेश श्रीवास्तव
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