आरक्षण: रक्षण या प्रतिभा का क्षरण क्षण-क्षण
व्यावसायिक शिक्षा परीक्षा में एक प्रतिशत अंक पाने वाले आरक्षितों को भी उत्तीर्ण करने का आदेश। प्रतिभा के दमन के मूल्य पर राजनीतिक हित सिद्धि का प्रयत्न। आरक्षितों को योग्य बनाने के स्थान पर अयोग्यता को प्रश्रय देने का आत्मघाती कदम। जन्म और जाति के आधार पर इतना विराट भेदभाव पतन की दिशा का संकेत। (6.8.1994)
अकबर और बीरबल के अनेक किस्से गांव-गांव में प्रचलित है। यह कहना तो कठिन है कि वे सभी किस्से सच होगे। मनगढ़ंत भी होंगे, मगर सभी रोचक हैं और मूढ़ बादशाही पर प्रत्युत्पन्न गति की विजय का प्रतीक भी कहते हैं एक बार अकबर की बेटी के पांव में कांटा चुभ गया अब राजा तरंगी और दंभी तो होते ही थे, सो उन्होंने बीरबल को आदेश दिया कि उनके साम्राज्य के सारे मार्गों पर चमड़ा बिछवा दो ताकि फिर कभी जब शहजादी किसी मार्ग पर चले तो उसे पांव में कांटा नहीं चुभे बीरबल परेशान तत्काल कुछ बोले तो पता नहीं जान बचे या नहीं बचे। जो हुक्म! कहकर बीरबल ने आदाब बजाया और दरबार से बाहर हुए पूरे साम्राज्य के सभी रास्तों पर, साम्राज्य के सभी पशुओं को मारकर भी चमड़ा नहीं बिछ सकता था सो उन्होंने तरकीब निकाली। मुलायम चमड़े की खूबसूरत जूतियां शहजादी के पावों में पहना दी और बादशाह को सूचित कर दिया कि अब शहजादी कहीं भी जाये, काटे की क्या औकात कि वह शहजादी के पैर में चुभ जाये। इन किस्सों में जैसा होता है वैसा हुआ होगा अकबर बहुत समझदार बादशाह था, उसने बीरबल की तारीफ की होगी, इनाम इकराम दिया होगा अकबर की जगह कोई और होता तो हुक्म उदूली में बीरबल का सिर भी कलम करवा सकता था मगर इतिहास को कभी बीरबल का सिर नहीं मिला इसलिए मानने का कारण है कि अकबर इस फैसले से खुश हुआ होगा।
किस्सा यो याद आया कि हमारे मप्र के राज दरबार ने भी एक आदेश जारी किया है। आदेश है कि अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के छात्र जिस राजमार्ग से तकनीकी महाविद्यालयों से प्रवेश करते हैं, उस मार्ग पर दो प्रतिशत न्यूनतम अंक प्राप्त करने का दो सूत का कांटा उनके पांवों में चुभता है अतः उसे नेम्नानाबूद कर दिया जाये मार्ग विद्युत चलित कर दिया जाये, जिस पर इस वर्ग का छात्रा हो और सीधा गांधी चिकित्सा महाविद्यालय या मौलाना आजाद अभियांत्रिकी महाविद्यालय की सबसे ऊपर की मंजिल पर पहुंच जाये। अर्थात् यात्री नहीं, मार्ग चले और मंजिल उन्हें तोहफे में मिले। युग बदलता है तो राज दरबार के आदेश भी बदलते हैं। अब रास्तों पर चमड़ा बिछाने या चमड़े के सिक्के चलाने का जमाना गया, अब तो रास्ते चलेंगे और चहेते यात्री खड़े रहेंगे और मंजिल उन्हें तोहफे में मिलेगी अब कोई बीरबल तो बचा नहीं जो बादशाह को यह समझाये कि प्रदेश का सारा पशुधन बर्बाद करने के बजाय शहजादी को खरगोश की खाल की बुद्धि और ज्ञान की महीन सी जूती भी पहना दी जाये तो दो सूत के कांटे के चुभने का भय ही खतम हो जाये। मगर कौन कहे? जरूरी नहीं कि हर बादशाह के पास एक बीरबल हो और हो तो यह भी जरूरी नहीं कि वह अकबर की तरह सहिष्णु हो। क्या पता इस सलाह पर राजा का हाथ तलवार की मूठ पर चला जाये और बीरबल का सर कलम हो जाये।
मगर किसी को तो बीरबल बनना होगा और यह पूछना होगा कि यह क्या ओर क्यों हो रहा है? सब जानते और मानते भी हैं कि अनुसूचित जाति और जनजाति का भारतीय समाज में सदियों तक शोषण हुआ है और उन्हें आरक्षण मिलना चाहिये। जिन्हें आप पिछड़ा कह रहे हैं, वे हैं या नहीं इस तर्क में न पड़ते हुए यह भी मान लिया जाये कि ये भी आरक्षण के अधिकारी हैं तो भी यह कैसे माना जा सकता है कि आरक्षण के लिये न्यूनतम अकों की, वह भी दो प्रतिशत अंकों की कोई बाध्यता नहीं होना चाहिए। जब क्लर्क बनाने से पहले किसी का हायर सेकेण्डरी होना अनिवार्य होता है, बहुमत होते हुए भी यदि जाति, जनजाति या पिछड़े वर्ग का कोई व्यक्ति योग्यता के अभाव में मुख्यमंत्री नहीं बन सकता है तो सौ में से दो अंक भी नहीं ला पाने वाला कोई छात्र डाक्टर या इंजीनियर कैसे बन सकता है? मगर आप बना रहे हैं तो यह दया है या राजनीतिक स्वार्थ? यदि यह दया है तो भी बुरी है क्योंकि यह सिद्ध करती है कि सरकार की दृष्टि में इन वर्गों में इतने योग्य छात्र भी नहीं जो दो प्रतिशत अंक भी प्राप्त कर सकें तकनीकी परीक्षाओं के गत वर्षों के परिणाम बताते है कि इन वर्गों के कई छात्रों ने अच्छे ही नहीं बहुत अच्छे अंक भी प्राप्त किये है। सरकार का निर्णय इन वर्गों की अयोग्यता का घोषणा पत्र भी है और इन वर्गों के लिए अपमानजनक भी। जिसे आप डोली में बिठाकर मंजिल पर पहुंचाते है उसके पांव भविष्य में इतने बंध जाते हैं कि वह चलना तो दूर अपने आप खड़े होना भी नहीं चाहता। यह जीवन भर बैसाखी लगाता और आपके राजनीतिक उत्थान की सीढ़ी बना रहता है। हमने जाति, जनजाति के लोगों को खैरात की तरह सुविधाएं और आरक्षण बाटे हैं। उन्हें योग्य बनाने, उनमें आत्मसम्मान पैदा करने और प्रतियोगिता में भाग लेने जितना बल देने की कोशिश नहीं की ताकि वे उपकृत रहें और हमारी जय जयकार करते रहें। यह निर्णय भी उन्हें बुद्धिहीन सिद्ध करने, स्वयं उनकी वैसाखी - बनने और परोक्ष रूप से उन्हें नहीं स्वयं को मजबूत बनाने वाला है और इसलिए उन वर्गों और देश के लिए भी खतरनाक है।
खतरनाक है, क्योंकि इससे समाज या तो हीन भावना से ग्रस्त होता है या आक्रोश से उबलता है। दोनों ही स्थितियां समाज को बीमार बनाती है और बीमार समाज विकास के सोपान तय नहीं कर सकता। चालीस साल बाद भी दलितों और दमितों को यह समाज क्या दे पाया? उनके कुछ लोग नेता और अफसर बन गये और उनसे अलग होकर श्रेष्ठी वर्ग में शामिल हो गए। आज भी उनके मसीहा कांशीराम या मायावती खुद कुर्सी पर बैठकर उन्हें जमीन पर बिठाते हैं और उनके प्रति सहानुभूति दिखाने वाले कांग्रेस, भाजपा या अन्य किसी पार्टी के नेता उन्हीं में से कुछ को विशेष बनाकर उनसे अपनी राजनीति का रथ खिंचवाते हैं। इसी सिक्के का दूसरा पहलू भी है। यदि जन्म, जाति, भाषा या लिंग के आधार पर इस देश का संविधान कोई भेद नहीं करता तो उन बच्चों का क्या दोष है जिन्होंने सामान्य वर्ग के लोगों के यहां जन्म लिया ? जन्म कौन कहां ले यह निर्णय किसी के हाथों में नहीं होता। हर सामान्य वर्ग का व्यक्ति सम्पन्न भी नहीं होता। फिर जाति के आधार पर एक बालक अस्सी प्रतिशत अंक प्राप्त करके भी तकनीकी शिक्षा प्राप्त नहीं कर सके और दूसरा एक प्रतिशत अंक प्राप्त करके भी दाखिला पा जाये तो यह लोकतंत्र संविधान और प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध भी है। कोई भी देश या समाज प्रतिभा को हलाल करके प्रगति नहीं कर सकता। जो भी सत्ताधारी अपने तात्कालिक लाभ के लिये प्रतिभा को सूली पर चढ़ाता है वह देश के भविष्य को सूली पर चढ़ाता है। जाति, जनजाति या पिछड़े वर्गों को प्रलोभन देकर अपने पक्ष में रखने के बजाय उनकी प्रतिभा का विकास कर उन्हें योग्य बनाकर अपने पक्ष में करने का प्रयत्न ही राष्ट्रहित का प्रयत्न भी बनेगा। आजादी के 46 साल बाद भी यह नहीं हुआ है तो शायद इसलिए कि उनके योग्य और प्रतिभा सम्पन्न होने पर उन्हें अपने पक्ष में बनाये रखने में हमारे राजनीतिज्ञों को संदेह है, मगर यह संदेह राष्ट्र के लिए घातक है।
महेश श्रीवास्तव
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