समझे उसका भी भला ,न समझे उसका भी भला
नारायणदत्त तिवारी उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद त्याग कर राव के विरोध में अर्जुनसिंह के साथ हो लिये। कितना दूरदर्शी था उनका यह कदम और क्या सचमुच राव देश और कांग्रेस को बर्बाद कर रहे थे? (22.3.1995)
जब वृक्ष किसी पत्ते को जीवन प्रदान करना बंद कर देता है तो वह सूखने लगता है। पत्ते की नियति यह रह जाती है कि या तो वह स्वयं टूट कर गिर जाये अथवा आंधी के थपेड़े उसे वृक्ष से अलग कर दें। नारायण दत्त तिवारी के साथ यही हुआ। पहले कांग्रेस में उन्हें महत्व नहीं मिला, फिर मिला और उ.प्र. कांग्रेस अध्यक्ष बने तो उनकी एक नहीं मानी गई।न मुलायम सरकार से समर्थन वापस लिया न बर्खास्त किया। अध्यक्ष पद से त्याग पत्र दिया तो पहले हिलगाये रखा और अंततः स्वीकार कर लिया। तिवारी का खार खाना और अर्जुन सिंह की भोपाल रैली में आना, फिर शहीदों की याद में पंजाब में हो रहे आयोजन में अर्जुन सिंह के साथ शामिल होने की घोषणा करना, इसी खीज का परिणाम थे। कांग्रेस उच्च कमान को शायद यह ना पसंद था कि तिवारी कांग्रेस के शिखर के कंगूरे (कार्य समिति सदस्य) भी रहें और निष्कासित नेता के साथ हममंच भी बनें सो अनुशासन समिति के सदस्य और उसी पंजाब के मुख्यमंत्री, जहां होने वाले कार्यक्रम में तिवारी जाने वाले हैं, तथा केंद्रीय मंत्री बलराम जाखड़ ने उन्हें आंधियों की तरह थपेड़े दिये। कांग्रेस में जगह नहीं होने, अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं करने और अनुशासनहीन लोगों को निकाल बाहर करने जैसी बातें कहीं विदेश राज्यमंत्री सलमान खुर्शीद द्वारा उ.प्र. पहुंचकर ही यह कहना कि कांग्रेस अगला लोकसभा चुनाव मुलायम सिंह के साथ मिलकर लड़ने पर विचार कर सकती है, तिवारी को व्याकुल करने के लिए पर्याप्त था। जिस मुलायम सिंह को उखाहने में वे अपना बुढ़ापा और सफेदी खर्च कर रहे हो उसी मुलायम सिंह को कांग्रेस विजय स्तंभ मानकर माला पहनाने की घोषणा करे तो तिवारी तो दूध की मक्खी रह गये। उनके पास त्यागपत्र देने और पंजाब में अर्जुन सिंह के साथ रहने की खम ठोक घोषणा के अलावा शेष बचा ही क्या था।
प्रकृति के नियम के अनुसार वृक्ष से पत्ते दो ही अवसरों पर झड़ते हैं या तो पतझड़ हो अथवा वृक्ष ने अपनी आयु पूरी कर ली हो और वह स्वयं सूख रहा हो। आंध्र, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात की पराजय के बाद निराशावादियों का कयास है कि वृक्ष के दिन पूरे हो गये, वृक्ष सूखेगा तो पत्ते भी झड़ेंगे ही। आशावादी इसे पतझर का मौसम मानते हैं। अस्थाई प्रक्रिया सारे पत्ते झड जायें और वृक्ष रूण्डसुण्ड दिखने लगे फिर भी कोंपले फूटने लगती हैं और वृक्ष पुन हरा भरा हो जाता है। उड़ीसा को आप बड़ी कोंपल का शकुन भी मान सकते हैं। बड़े राज्यों की पराजय को वृक्ष का सूखना नहीं कहा जा सकता। आपातकाल के बाद तो कांग्रेस की जड़े ही खुद गई थी और उनमें मठा डल गया था। कांग्रेस की तब की श्वासनलिका इंदिरा गांधी तक चुनाव हारी थी राजीव गांधी ने दो तिहाई बहुमत से सरकार शुरू की और दो साल बीते न बीते विरोधी दलों की सरकार बन गई, तो क्या कांग्रेस सूख गई। कांग्रेस तो भारतीय स्वतंत्रता का बोधिवृक्ष है जिसे हजारों साल जीना है। यह नीचे बैठने वाले पर निर्भर है कि वह गौतम की तरह बोधिसत्व प्राप्त करे या किसी सिंह की तरह शिकार की तलाश में बैठकर समय का इंतजार करे। आशावादी नेतृत्व में भी कोई दोष नहीं तलाशते, बल्कि गुण गाते हैं। नरसिंह राव ने अल्पमत सरकार को बहुमत में किया तो क्या पार्टी के हित में नहीं किया, पंजाब में जहां होलिका दहन चलता था वहां अमन का अधीर और रास का रंग बिखेर दिया तो क्या देश के हित में नहीं किया, दुनिया की नजर में दीवालिया हो चुके देश को दरिद्रता का दरिया पार करवा दिया तो क्या गुनाह किया और अब बजट की सम्मोहनी चलेगी तो अगले लोकसभा चुनाव के बाद केन्द्र में कांग्रेस की सरकार बनेगी। वे मानते हैं कि मुसलमान भी छह-आठ माह गुजरात और महाराष्ट्र में भाजपा का शासन देखकर फिर कांग्रेस के पाले में आ जायेंगे। फिर कांग्रेस को कौन रोकेगा ?
मगर लक्षण इतने मधुर नहीं दिख रहे शरद पवार को केन्द्र में भाजपा के सवार हो जाने का भय सताता है तो इसे आप पराजय के बाद की मानसिकता मान सकते हैं, मगर लोकसभा चुनाव के संदर्भ में कांग्रेस मुलायम की मालिश करने लगे, लालू को लालीपाप देने लगे और जयललिता से जरा बचके चलने लगे तो परोक्ष रूप से ही सही आपके मन का भय तो उजागर होता ही है। माना कि उप्र में मुलायम कांग्रेस की लाठी बन सकते हैं और तिवारी, जो स्वयं पिछले विधानसभा चुनाव में अपनी जमानत तक नहीं बचा सके थे, कांग्रेस की रीढ़ नहीं बन सकते। मगर ऐसा भी नहीं कि कांग्रेस में कभी तिवारी की तूती नहीं बोली हो राजनीति और समाज में भी, यह होता अवश्य है कि जिन सहारों से आप ऊपर पहुंचते हैं, वे ही आपको सर्वाधिक अखरते हैं। आप उन सहारों का स्मारक भले ही नहीं बनवायें, कूड़ेदान में फेंकने के बजाय सम्मान से गोदाम में तो रखवा ही सकते हैं। राजनीति में कोई चिराग बेकार नहीं होता, तेल और बाती बदलना पड़े तो भी उसे जलाये रखना चाहिये। प्रकृति का क्या भरोसा कब आपकी बिजली चली जाये और तब कोने में फेंका हुआ पुराना दीया ही आपके काम आये।
मगर दीया है कि झुलसाता रहता है और बल्ब है कि दीये को हिकारत की नजर से देखता है। समझोता और कठिन होता जाता है। न हाकी के हाथ दिखाने से सांसद सांसत में आते हैं और न त्याग पत्र किसी का तर्पण बन सकता है। डमरू बजाकर मजमा तो इकट्ठा किया जा सकता है मगर थोड़ी ही देर में भीड़ अपने घर का रास्ता पकड़ लेती है, उसे रास्ता बताने की जरूरत नहीं होती। न तो त्यागपत्र के उमरू से सांसद सरकारी घर का रास्ता भूलते हैं और न ही भूकम्प आने से पहले चूहे अपना बिल छोड़ते हैं। जब तक सत्ता का विद्युत प्रवाह है बल्ब जलेगा, दीया उसकी जरूरत नहीं। मगर लोकसभा चुनाव में जब ब्रेकडाउन होगा तब दीया भी जरूरी हो सकता है। पत्ते अपने को वृक्ष से महत्वपूर्ण समझने लगे तो उन्हें जीवन रस कौन देगा और बिना पत्तों के पेड़ सूर्य से अपना भोजन कैसे ग्रहण करेगा। पत्ते टूटेंगे तो वृक्ष उपवास करके नये पत्तों को जन्म दे देगा मगर वृक्ष ही गया तो पत्ते अपनी जड़ें कहां जमायेंगे। सत्ता की विद्युत अबाध हो तो दीयों की जरूरत नहीं रहती और वृक्ष की शिराओं में शक्ति हो तो पत्तों के पतन की चिंता नहीं रहती। पार्टी टूटी भी तो दीयों की बारात सत्ता के लाख वाट के बल्ब के सामने फीकी ही रहेगी और पत्तों की भीड़ वृक्ष कैसे बनेगी ? जो इस तथ्य को समझे उसका भी भला, जो ना समझे उसका भी भला।
महेश श्रीवास्तव
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