हे अमृत के पुत्रों ! अंधकार को पहचानो
दीपावली के अवसर पर खग्रास सूर्यग्रहण! प्रकृति में अंधकार और प्रकाश के संघर्ष के संदर्भ में मानव जीवन और समाज में इस संघर्ष और इससे संबंधित मूल्यों की मीमांसा (3.11.1994)
यह संयोग ही है कि इस बार अमावस की उस काली रात्रि को, जिसे हम प्रकाशित करने के लिए सदियों से दीप जला रहे हैं, खग्रास सूर्यग्रहण ने और स्याह तथा अंधकार को और घटाटोप बना दिया है। संतोष कर सकते हैं हम कि ग्रहण हमें नहीं दिखेगा अंधेरा कहीं और अपना ताण्डव दिखायेगा। हम तो अपनी फुलझड़ियों के प्रकाश में जगमगाते रहेंगे और दीपावली मनाते रहेंगे। यही एक भ्रम है-आंतरिक भ्रम जो हम सदियों से पाल रहे हैं कि अधकार में कोई और है, हम तो प्रकाशमान हैं। क्या हम वास्तव में प्रकाशमान है? जिसे अंधकार की सघनता का अहसास नहीं होता उसके लिए प्रकाश भी अंधकार बन जाता है। भौतिक जगत में परमात्मा ने ऐसे भी प्राणी बनाये है जो अंधकार को ही प्रकाश मानते हैं, उनका इन्द्रिय ज्ञान इसी प्रकार का है। जब तक हम अंधकार को पहचानते नहीं, उसे परिभाषित नहीं करते तब तक प्रकाश हमारे लिए मात्र एक इन्द्रिय ज्ञान है। वेपर लेम्प में रहकर भी हम अंधकार में हो सकते हैं और अंधेरी बन्द गुफा में बैठकर भी दिव्य प्रकाश से आप्तावित। इसलिये जरूरी है कि हम अंधकार को पहचाने अमावस की रात जब खग्रास सूर्यग्रहण के साथ प्रारंभ होती है तो हमें अंधकार को पहचानने की चुनौती देती है।
क्या हम अंधेरे को पहचान सके या परिभाषित कर सके है। शायद नहीं क्योंकि अंधकार तो केवल प्रकाश का न होना है। प्रकाश उपस्थित है तो अंधकार अनुपस्थित प्रकाश की अनुपस्थिति ही अंधकार है। आप दिया जलाकर या बल्ब जला कर रात में प्रकाश कर सकते हैं, किन्तु दिन में आपसे कोई कहे कि पांच गज या पच्चीस गज तक अंधकार उत्पन्न कर दो आप उत्पन्न नहीं कर सकते। क्योंकि जो स्वयं कुछ है ही नहीं, जो मात्र प्रकाश की अनुपस्थिति है उसे आप उत्पन्न कैसे करेंगे? एक क्षीणतम किरण भी गहनतम अंधेरे को काट सकती है, किरण जहा जहां जायेगी अंधेरा कटता जायेगा, मगर यह नहीं हो सकता कि अधेरा जहां-जहां जाये प्रकाश समाप्त होता जाये। इसीलिए हम प्रकाश को सत्य और अंधकार को मिथ्या मानते है। ब्रह्म को सत्य और जगत को मिथ्या मानने वाले ऋषियों की बात भी हम मान लें तो भी पहले हमें जगत को पहचानना होगा कि वह मिथ्या है तभी हम सत्य की पहचान के रूप में ब्राह्म को पायेंगे जगत को मिथ्या को अंधकार को पहचानना तो तब भी पहली शर्त होगी और जिन्होंने पहली ही सीढ़ी नहीं चढ़ी,वे सत्य को ब्रह्म को प्रकाश को पहचानने की दूसरी सीढ़ी कैसे चढ़ेगे?
वास्तव में जिसे हम प्रकाश और अंधकार कहते हैं वह तो प्रकृति के प्राण तत्व की सक्रिय और विश्राम अवस्थायें भर हैं। जब एक ओर जीवन विश्राम कर रहा होता है,अंधकार होता है तो कहीं दूसरे छोर पर प्रकाश होता है, जीवन सक्रिय होता है। प्रकाश और अंधकार तो चेतना के आरोह अवरोह है। एक ही शक्ति के दो छोर इसीलिए इससे युद्ध नहीं, इसकी समझ चाहिये। समझ हमे चयन के योग्य बनाती है। चूंकि हम अंधकार को समझते नहीं और प्रकाश को मात्र इन्द्रिय ज्ञान मानने लगे हैं, इसीलिए प्रेम के त्याग के संस्कार के सभी दिये टिमटिमा रहे या बुझते जा रहे हैं। फिल्में और दूरदर्शन हमे नंगा किये जा रहे है। काम के इन्द्रिय सुख ने ज्ञान के आनंद को कूड़ेदान में डाल दिया है। चकाचौंध भी अंततः अंधकार ही हो जाती है। प्रकाश भी जिस वेवलेंथ से चलता है उससे गति बढ़े तो अंधकार बन जाता है। धन की चकाचौंध ने प्राप्ति के उपायों की वेवलेंथ ही नष्ट कर दी है। हमारे बच्चों के आदर्श भगतसिंह या चंद्रशेखर या कबीर या जगदीश चन्द्र बसु नहीं इमरान खान या माधुरी दीक्षित बनते जा रहे हैं। हमारी संस्कृति अर्थ और काम को भी चार पुरुषार्थो में से दो मानती है, किन्तु यह धर्म नामक पुरुषार्थ के नियंत्रण में और सत्य के प्रकाश में होना चाहिये, तभी गोश का पुरुषार्थ उपलब्ध होता है मगर हम ऐसे जुटे हैं कि जैसे इस जीवन में ही हमें समस्त काम, समस्त अर्थ बटोर लेना है। धर्म में भी हमने अंधेरे रास्ते खोज लिये सात दिन गुनाह किया और फिर किसी रविवार अवकाश के दिन प्रभु के पुत्र के सामने कन्फेशन कर लिया गुनाह कबूल किया, माफी मागी और फिर गुनाह के अंधकार में डूब गये, अगला कन्फेशन करने के लिए! कन्फेशन नहीं होगा तो धर्म कैसे बचेगा। हमारे धर्म के केन्द्रों को भी हमने रोज-रोज छोड़े गये अंधकार से भर दिया। हजारों साल पहले ऋषियों ने बता दिया था कि अर्थ को प्राप्त करो, काम को भोगो, किन्तु इसे हवस मत बनने दो। तुम्हारा यही जीवन एक मात्र जीवन नहीं है। इसीलिये श्वेताश्वेतारोपनिषद् का ऋषि समस्त पृथ्वीवासियों को संबोधित करता है- "हे अमृत के पुत्रों! सुनो! अमृत के पुत्रों की मृत्यु कैसी ? जब मृत्यु ही नहीं है और जीवन चेतना की लहर का एक आयाम भर है तो हवस क्यों ? और यदि हमने इसी जीवन को अंतिम मान लिया है, तो भी हवस क्यों ? दोनों दिशाओं से हम एक ही बिन्दु पर पहुंचते हैं, किन्तु काम और अर्थ के संतुलित प्रकाश को प्राप्त करने के बजाय उसे उस वेवलेंथ पर प्राप्त करने की हवस पालते हैं जहां वह अंधकार में परिवर्तित हो जाता है और हम अंधकार को ही प्रकाश मानने लगते हैं। अंधकार को प्रकाश मान लेना सुविधाजनक है। प्रकाश पैदा करने के लिए जलना पड़ता है, चुकना पड़ता है, स्वयं को आग के हवाले करना पड़ता है। अंधेरे में रहकर हम अक्षुण्ण बने रहने का भ्रम पालते हैं, भ्रम के अंधेरे को गहरा करते हुए चुकते हैं और चले जाते हैं।
इसीलिये बुद्ध ने कहा था कि अपने दीपक आप बनो! हमारी संस्कृति काम और अर्थ को भी पुरुषार्थ मानती है, वह उसका विरोध नहीं नियमन करती है। वह बताती है कि काम और अर्थ ही जीवन का पर्याय नहीं और यह आप पहचानते हैं तब जब आप स्वयं अपने दीपक बन जाते हैं। तभी उस परमात्मा का प्रकाश अनुभव होता है। कठोपनिषद् उसी महा प्रकाश का वर्णन करते हुए कहता है सूर्य उस परमात्मा को प्रकाशित नहीं कर सकता, न चन्द्रमा, न तारागण ही, वह विद्युत्प्रभा भी परमेश्वर को उद्भासित नहीं कर सकती, तब इस सामान्य अग्नि की बात ही क्या? ये सभी उस परमेश्वर के कारण प्रकाशित हो रहे हैं। " पैगम्बर को जो इलहाम होता है वह परमात्मा का प्रकाश होता है, कृष्ण मे जो विराट स्वरूप प्रकट होता है तब वह भी परमात्मा का प्रकाश होता है और आइंस्टीन को जब सापेक्षता के सिद्धांत का अभिज्ञान होता है वह भी परमात्मा का प्रकाश होता है। अंधकार को पहचानना भर है, फिर जैसा बायबल कहती है- “परमात्मा ने कहा प्रकाश हो और प्रकाश हो गया" सब कुछ प्रकाशित हो जाता है। पहली शर्त है अंधकार को पहचानना। इस दीपावली पर हम अंधकार को पहचानें और परमात्मा के प्रकाश से प्रकाशित हो, यही कामना।
महेश श्रीवास्तव
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