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लालू प्रसाद यादव ने ठेठ तरीके की राजनीति की और ठेठ भाषा में अपनी राजनीति की व्याख्या। - महेश श्रीवास्तव की टिप्पणियां

27 Sep, 2021 | 503 views

लालू प्रसाद यादव ने ठेठ तरीके की राजनीति की और ठेठ भाषा में अपनी राजनीति की व्याख्या। - महेश श्रीवास्तव  की टिप्पणियां
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लालू का अंडासन ,पीडासन और सिंहासन 

लालू प्रसाद यादव ने ठेठ तरीके की राजनीति की और ठेठ भाषा में अपनी राजनीति की व्याख्या। अपनी इसी ठेठ शैली से उन्होंने बिहार की जनता को इतना प्रभावित किया कि आर्थिक दिवालियेपन और अराजकता की सीमा तक पहुंचे बिहार की जनता ने फिर उनके दल को बहुमत दिया और वे मुख्यमंत्री बने। उन्होंने सिंहासन तक पहुंचने के आसन बताये अंडासन, पींडासन और अंत में सिंहासन । (3.4..1995)

बिहार में सब कुछ अद्भुत हुआ। लंगड़ी खेलते हुए मतदान हुआ और कछुए की पीठ पर बैठकर चुनाव परिणाम आ रहे हैं। भैंस को दुहते या हाथ फेरते हुए फोटो खिंचवाने वाले मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने सिद्ध कर दिया है कि भैंस उसी की होती है, जिसकी लाठी होती है। पांच दिन पहले ही दिल्ली के एक अखबार में लालू प्रसाद यादव का एक जुमला छपा था "अंडासन ,पीडासन और सिंहासन", फिर समझने के लिए उन्हीं की व्याख्या पढ़ी। लालू ने बताया "अंडासन माने कि मैंने चुनाव अभियान चलाया, पीडासन माने कि बक्से में वोट पड़ गया, अब जब रिजल्ट होगा तो मुझे सिंहासन मिल जायेगा" शब्द कितने ही अटपटे हो और व्याख्या कितनी ही अद्भुत मगर सत्य यही है कि सिंहासन लालू प्रसाद यादव को ही मिल रहा है। चुनाव परिणाम के पहले ही आत्म विश्वास से भरे लालू प्रसाद ने घोषणा कर दी थी कि कांग्रेस और भाजपा को तीस-तीस सीटे मिल जाये तो बहुत होगा नीतीश तो हार के डर से ही दिल्ली भाग गया। समता दो चार पर सिमट जायेगी और कांशी-मुलायम की यह कोशिश कि बिहार में गरीबों का राज नहीं बने, फुक्कस हो जायेगी। तब लालू बड़बोले लगते थे मगर अब चढ़बोले लगते हैं। उनकी जीत की उन्हीं के शब्दों में व्याख्या की जाये तो वे कहते हैं में टेबुल टाक नहीं करता। मैं सोते जागते सिर्फ राजनीति करता हूँ। में सीधे जेनेरेटर से जुड़ा हुआ हूँ। (वे जनता को जेनेरेटर और खुद को बल्ब मानते हैं।)

          अब जब जनता दल और उनके वामपंथी सहयोगी पूर्ण बहुमत प्राप्त कर चुके है केवल लालू प्रसाद यादव के कथन ही सत्य और प्रामाणिक सिद्ध हुए हैं, शेष समर राजनीतिज्ञों, पत्रकारों और विश्लेषणकर्ताओं के अनुमान झूठे पड़ गये हैं। न बिहार विशंकु विधानसभा का शिकार हुआ और न ही लालू की लाली कम हुई। स्थापना के विरुद्ध जनमत होने का पूर्व विधानसभा चुनावों का सूत्र भी सिद्ध नहीं हुआ और जातीय प्रवाह के सहस्रधारा में परिवर्तित हो जाने का अनुमान भी खरा नहीं उतरा। इस चुनाव परिणाम का प्रारंभिक आकलन (हालांकि पूरा चित्र सामने आने में अभी समय शेष है) यही बताता है कि लालू प्रसाद यादव यदि अपने अनुमानों में आंशिक ही गलत सिद्ध हुए तो शेष सभी अपने अनुमानों में आंशिक ही सही निकले तो क्या बिहार में कोई चमत्कार घटा या चुनाव से पहले लालू प्रसाद यादव अपने जिन कुल देवता के सामने दण्डवत करने गये थे, उन्होंने कोई जादू कर दिखाया। दरअसल चुनाव में कभी कोई चमत्कार नहीं होता है, परिणाम हमे चमत्कारी लगते हैं, क्योंकि चुनावों में हम मतदाता के मन की थाह नहीं ले पाते हैं और जब वह थाह ही नहीं मिलती तो मतों के विभाजन के गणित को तो जान ही नहीं सकते। बिहार के 1991 के लोक सभा चुनाव को ही ले कम्युनिस्ट पार्टी आठ प्रतिशत वोट प्राप्त कर आठ सीटें जीत गई और कांग्रेस 24 प्रतिशत वोट प्राप्त करके भी एक सीट जीत पाई थी। भाजपा 16 प्रतिशत वोट पाकर 5 सीटें जीती थी, तो जनता दल 34 प्रतिशत वोट पाकर 31 सीटे जीता था। इस बार चुनाव में जितने स्थानीय दल थे, उन्होंने कांग्रेस और भाजपा दोनों को नुकसान पहुंचाया नुकसान उन्होंने जनता दल को भी पहुंचाया किंतु जो ज्यादा भारी था, उसका नुकसान कम भारी दलों का और वजन घट जाने से दिखा नहीं। जब मतों का प्रतिशत आयेगा तब हमें ज्ञात होगा कि खोया जनता दल ने भी है मगर दूसरों के खोने में उसका खोना खो गया और पाना बन गया। तब लोगों को यह अनुमान, आंशिक ही सही मगर सही सिद्ध होगा कि लालू प्रसाद यादव का प्रभाव घटा है। यह कहना भी एकदम ठीक नहीं कि यादव और मुसलमान पूरी तरह जद के साथ रहे। कुछ मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में कांग्रेस उम्मीदवारों के जीतने और जद के हारने के भी परिणाम हैं। हां यादवों के बारे में अनुमान लगाने का कोई ठोस तरीका सामने नहीं है। ऐसे में लालू प्रसाद यादव की यह व्याख्या ही अधिक तर्क संगत मानी जा सकती है कि प्रदेश के गरीबों ने उन्हें वोट दिया परिणाम इस बात के संकेत भी हैं कि बिहार की जातीय धाराएं और गहरी हुई हैं। सवर्णों की एकजुट लालू हराओ कोशिश भी शायद निम्न जातियों को पुनः एकजुट करने में सहायक बनी। सामान्यतः अपने-अपने स्वार्थो और अहंकारों के किलों में बैठे संपन्न सवर्णों का वैसे भी एकजुट होना कम संभव होता है और सवर्ण होकर भी विपन्न रहने वालों के लिये यह जरूरी भी नहीं कि वे संपन्न सवर्णों की इच्छाओं की डोली का कहार बने हीं। हां, एक सार्वदेशीय सूत्र यहां भी सिद्ध हुआ है कि अपना दल बदल कर दूसरे दलों में गये उम्मीदवार यहां भी थोक में दलदल में गये हैं। भावी मुख्यमंत्री होने का सपना देखने वाले नीतीश कुमार के स्वप्न मुंगेरीलाल के हसीन सपने सिद्ध हुए हैं और अगली सत्ता की सूत्रधार दिखने वाली समता पार्टी का शिखर समतल हो गया है।

          परिणामों के प्रभाव ने कुछ गहरे घाव भी छोड़े हैं। कर्नाटक, गुजरात और महाराष्ट्र में अच्छी सफलता प्राप्त कर मूंछे मरोड़ने वाली भाजपा को बिहार में मालूम हुआ होगा कि अनुशासनहीनता की बरसात मूंछों को किस प्रकार झुका देती है और एक के बाद दूसरे खड्ड में गिरती जा रही कांग्रेस को यह सोचने को मजबूर होना पड़ेगा कि टूटी कमर लेकर आगामी लोकसभा चुनाव का महा खड्ड कैसे पार किया जाये? बिहार के चुनाव यह विचार करने को भी मजबूर करते हैं कि भीषण आर्थिक बदहाली, कानून व्यवस्था की घोर दुरावस्था और सामाजिक अन्याय की पराकाष्ठा के बावजूद यदि कोई सत्तारूढ़ दल पुनः जीतता है तो उसके कारण क्या हो सकते हैं? क्या सरकारों के कार्य के मूल्यांकन से बड़ी जातीय भावना है अथवा आम गरीब में यह भावना उत्पन्न हुई है कि उनकी आर्थिक हालत सुधरी हो अथवा नहीं राजनीतिक शक्ति निचले स्तर तक पहुंची है। यदि यह अहसास उपजाने में लालू सफल रहे हैं तो यह कोई छोटी सफलता नहीं है, क्योंकि अन्य दल तो मुजरा करते रहते हैं और गरीबों के दिल में यह अहसास नहीं उतार पाते। अंडासन और पीडासन के बाद लालू प्रसाद यादव सिंहासन पर तो पहुंच रहे हैं मगर यह ध्यान रखें कि उनके सिंहासन के नीचे गुण्डासन नहीं पलने लगे और राज्यभर में डंडासन ही डंडासन नहीं दिखे, जैसा कि आज दिखता है।

 

महेश श्रीवास्तव

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