शब्द अल्लाह की गाय नहीं
और भीमसेन की भैंस नहीं
उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी की मुलायम सिंह सरकार में हुए अत्याचारों की आलोचना करने वाले समाचार पत्रों पर पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा हमला बोला गया स्वयं मुलायम सिंह ने इसकी प्रेरणा दी। “हल्ला- बोल" के विरुद्ध यह चेतावनी कि न तो शब्दों का दमन किया जा सकता है और न शक्ति से उन्हें मनमाने ढंग से हांका जा सकता है। (25.10.1994)
उत्तर प्रदेश में समाजवाद की जयजयकार हो रही है क्योंकि समाजवादी पार्टी और उसकी सरकार के मारे जनता में हाहाकार मच रहा है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की इज्जत की आरती उतारी जा चुकी है और उन अधिवक्ताओं के, जो विरोधी थे, आधे दांत दरवाजे के बाहर और आधे अन्दर किये जा चुके हैं। मुजफ्फरनगर में पहाड़ों पर रहने वालों को मार मार कर दड़ा बना कर जमीदोज किया जा चुका है और इसी नगर के आसपास पहाड़ों की ठंड से उतरी लदी-कदी महिलाओं को यह जताने के लिये कि जमीन कितनी गर्म होती है, निर्वसन किया जा चुका है और यह बताने के लिए कि पुलिस कितनी बेशर्म होती है उन पहाड़ी महिलाओं के साथ बलात्कार किया जा चुका है। जिन घटनाओं पर शर्म से सिर झुकना चाहिए उन पर बेशर्मी से मूछें मरोड़ी जा रही हैं। मरोड़ी भी क्यों न जायें सैया भये कोतवाल तो अब डर काहे का ? सिपहिया पूरी कठोरता से स्वतंत्र है पुरुषों के सिर खोल कर अपनी मांग के प्रति मुलायमियत बरतने का पाठ घुसेड़ने के लिए और महिलाओं के वस्त्र हरण कर यह बताने के लिए कि यह संसार सिर्फ माया है, इसमें इज्जत वगैरह जैसी बातें झूठी हैं, इनकी क्यों फिक्र करती हो। यह माया का खेल है, माया का बड़े सूरमा बनते थे अखबार और अखबार वाले लोकतंत्र, संविधान और मानव अधिकारों की माला जपते और आलोचना करते थे, सो अब हल्ला उन्हीं पर बोला गया है। अब समाजवादी पार्टी के पहलवान यह समझा कर ही दम लेंगे कि सरकार और सरकारी पार्टी जो करती है वही संविधान होता है, जिस तरह से आपको रहने को कहती है वही लोकतांत्रिक प्रणाली होती है और जिस सीमा में रहने की रेखा खींचती है वहीं तक आपका मानव अधिकार होता है। अब अखबारों की होली जले तो हिरण्यकश्यप को खुश होना ही चाहिए। हॉकर चलती ट्रेन से फेंक दिये जाये और जिन हाथों से पत्रकार खबरें और लेख लिखते हैं उन्हें मरोड़ दिया जाये तो न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। फिर अखबारों से निपटने और हल्ला बोलने का आह्वान जब स्वयं मुख्यमंत्री कर रहा हो तो गुण्डों को सरकारी पार्टी में शामिल होकर गिरेबान पकड़ कर गला दबाने और गालियां बकने का लायसेन्स मिल जाता है। कानून के रक्षक पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के बारे में तो सपा कार्यकर्ता कह ही चुके है कि ये तो हमारे अल्सेशियन है जो हमारे आदेशों को मानेंगे, हमारे सामने दुम हिलायेंगे और जिसकी ओर हम इशारा करेंगे उस पर भौकेंगे और जरूरत पड़ने पर उसका कलेजा फाड़ कर खा जायेंगे। जो बड़े सूरमा बनते थे और कलम को हवा में तलवार की तरह लहराते थे अब हम उनकी कलम ही म्यान में रखवा देंगे।
मगर इतना आसान नहीं होगा शायद, मुलायम और उनकी पार्टी के लिए विचारों को कफन उदा कर सुला देना शब्द न तो अल्लाह की गाय है कि जो चाहे अपने खूंटे से बांध ले और जब चाहे दूध निकाल ले और न ही शब्द भीमसेन की भैंस है कि समाज में पीड़ा की बीन बजती रहे और वह पगराती रहे। यह देश जब आज़ाद हुआ था तब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आधारभूत अधिकार देने की कसम खाई गई थी। इस देश में विचारों का गला घोंटने की परंपरा भी कभी नहीं रही है। वैदिक दर्शन में आस्था रखने वाले राम या कृष्ण यदि अवतार माने गये हैं तो वैदिक दर्शन का विरोध और खण्डन करने वाले बुद्ध भी दशावतार में शामिल है। संसार को माया मानकर पलायनवाद की आदि परंपरा यदि इस देश में रही है तो चार्वाक परंपरा के लोगों के मुंह में भोगवाद की बात कहने पर किसी ने कपड़ा नहीं ठूंसा है यहां शंकर और मण्डन मिश्र के शास्त्रार्थ होते थे विचार के लिए, शस्त्र से मुण्ड नहीं उतारे जाते थे। यह स्टालिन का देश नहीं है। यहां कबीर जैसे फक्कड़ों की भी पूजा हुई है जिसने हिन्दू और मुसलमान दोनों की मूढ़ परंपराओं पर इतना सीधा और इतना तीखा प्रहार किया है कि आज भी कोई उतना साहस नहीं कर सकता। न तब कोई मुसलमान उन्हें ज़िवह करने पहुंचा न कोई हिन्दू उनका शिरच्छेद करने मगर आज आप विचारों को अभिव्यक्त होने से रोकने के लिए, जिस लोकतंत्र ने आपको सत्ता दी है, उसी के माध्यम से संविधान की मर्यादा और लोकतंत्र के बंधन तोड़कर, जिस कानून की रक्षा की शपथ आपने ली, उसी का शीलभंग करना चाहते हैं। यदि सत्ता का शिखर ही पुलिस बल को कानून का गला घोंटने का आदेश देगा तो उ.प्र. के ही उच्च न्यायालय के तत्कालीन जस्टिस मुल्ला का यह कथन कि पुलिस कानूनी संरक्षण प्राप्त डाकुओं का संगठित गिरोह है, अक्षरशः सत्य सिद्ध हो जायेगा। जो नहीं होना चाहिए, आप वही करने जा रहे हैं। विचार पुलिस की लाठी, गुण्डे के छुरे या सेना की बन्दूक से कभी नहीं मरता विचार तो चेतन का प्रतीक है और चेतन कभी मरता नहीं, दबता नहीं मरता तो वह शरीर है जो चेतन नहीं हो तो मरा हुआ ही है। मरे को कोई मूर्ख ही मारता है। यदि कोई अखबार आपके विचारों का विरोध करता है तो आप इतना सशक्त विचार प्रस्तुत कीजिये कि अखबार का विचार दो कोड़ी का हो जाये। समाज की सामान्य इच्छा से जुड़े अखवार को ही लोग खरीदेंगे और पढ़ेगे, समाज विरोधी विचारवाला अखबार तो अपनी मौत खुद भर जायेगा। यही बात राजनेता पर भी लागू होती है। समाज की सामान्य इच्छा पर व्यक्तिगत इच्छा थोपने वाला राजनेता भी समाज द्वारा विस्मृति के कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है। जातीय विद्वेष और घृणा के क्षणिक आवेश पर सवार होकर वह भले ही स्वयं को नियन्ता मान बैठे, काल का निर्णय उनकी अकाल समाप्ति की घोषणा कर देता है। हिटलर या नेपोलियन, मुसोलिनी या स्टालिन सभी की एक नियति रही है। सत्ता के मद में अन्याय करने वाले इतिहास के भंवर में फंस कर रसातल में पहुंच जाते हैं किन्तु शब्द के साधक और विचार के तपस्वी शतदल कमल की तरह काल प्रवाह पर, प्रवाह से मुक्त, उसी के भाल पर सदैव दमकते रहते हैं। जिसके साम्राज्य में सूर्यास्त नहीं होता था, इंग्लैण्ड की उस महारानी को आज कोई याद नहीं करता, और उसी देश का शेक्सपियर विश्व चेतना का अंग है, सम्राट अकबर महान था इसलिए आदर का पात्र है किन्तु चित्रकूट के घाट पर चन्दन घिसने और झोपड़ी में रहने वाले फकीर तुलसीदास का मानस, मानस में उतर कर आज भी जन-जन के मानस के पूजागृह में वन्दनीय सिंहासन पर विराजमान है। धन या पद का मद, ज्ञान या विचार को रौंदने का क्षणिक अहंकार भर पाल सकता है, उन्हें रोंद नहीं सकता।
अहंकार होता ही अबौद्धिक है। वह यही नहीं जानता कि धन या पद रोदे जा सकते हैं, ज्ञान या विचार तो अमर्त्य है। यूनान का पितामह दार्शनिक यथार्थ बोलता था तो राजा और राज सत्ता परेशान रहती थी। सुकरात पर मुकदमा चला और मूढ़जनों ने कहा तुम ये बातें करना बन्द कर दो जिनसे सिंहासन खतरे में आता है अन्यथा तुम्हें जहर का प्याला पीना पड़ेगा। सुकरात ने कहा जहर का प्याला ही पी लेता हूं, सत्य जो मुझे लगता है वह नहीं बोलू तो मेरे जीने का ही क्या अर्थ? और सुकरात जहर का प्याला पी गया। उस तानाशाह राजा और मूढ़ जजों को आज कोई इस योग्य भी नहीं समझता कि उन्हें धिक्कारने के लिए भी याद किया जाए मगर सुकरात है कि हजारों साल हो गये मानव मन की सीप में ज्ञान के मोती की तरह धरा है, विश्व के प्रज्ञा आकाश में वृहस्पति की तरह दमकता हुआ शूमेकर जैसे पुच्छल तारे यह राजा और वे न्यायाधीश टकरा कर कब के नष्ट हो चुके हैं।
सपा कार्यकर्ताओं का यह आरोप बिल्कुल बेबुनियाद नहीं कि आज पत्रकारिता का भी पतन हुआ है। अखबार दबाव के शक्ति केन्द्र बनते जा रहे हैं और पत्रकार शराब में नहा कर स्वर्ण कलम से लिखने में ऐश्वर्य का अनुभव करते हैं। सत्य के स्थान पर स्वार्थ और प्रतिबद्धता मुख्य होती जा रही है। मगर विष कन्याये जन्म से पैदा नहीं होतीं। राजनीति पहले उन्हें विष खिलाती है और फिर अपने विरोधियों की अंकशायिनी बना कर प्रणय सुख में मरणदुख उत्पन्न करती है। विष कन्या आपकी अंकशायिनी होती है तो आप उसी अपनी पाली पोसी सुन्दर मृत्यु को मृत्यु दण्ड देना चाहते हैं। मृत्यु को भी कोई मृत्यु दण्ड दे सका है? फिर जो आपके विचारों से असहमत वह पत्रकार शराब में नहाता है और जो आपकी जय-जयकार करता है क्या वह रोज गंगा में नहाता है ? पत्रकारों से आप साधु होने की अपेक्षा करते हैं और जो जीवन भर जेलों में, अंगरेजों के बूटों और बटों की ठोकरे खाता लंगोटी लगा कर देश की आजादी के लिए जिया और एकता के लिए मर गया, स्वतंत्र राष्ट्र के उस पितृ पुरुष को आपके सहयोगी (बसपा वाले) शैतान की औलाद बताते हैं और आप उन्हीं की गोद को सिंहासन बना कर सत्ता के रसगुल्लों को चूसते हैं तो आपके मानदण्डों की नैतिकता नग्न स्वतः हो जाती है। कोई भी समाज प्रेम के फूलों से महकता है। घृणा के कांटे आप मार्ग में इसलिये बिछा रहे हैं कि आपके सिंहासन तक कोई पहुंच नहीं पाये। मगर इतिहास से कुछ सलाह लीजिये तो वह बतायेगा कि जब कोई नंगधड़ग गांधी लाठी टेकता आगे बढ़ता है तो तोपों और बमों से लेस अजेय ब्रिटिश सेना पीछे हट जाती है, जब कोई वनवासी राम अन्याय के विरुद्ध युद्ध का संकल्प करता है तो त्रैलोक्यजयी रावण की इच्छा के विरुद्ध समुद्र पर पुल बंध जाता है तो आपके ये घृणा के कांटे तो प्रकृति और समय की मार से ही सूख कर मिट्टी में मिल जाने वाले हैं।
महेश श्रीवास्तव
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