मांडो तो रच्यो,
पणे मण तो मिल्योइ नी
आजादी के 47 बाद ऐसा क्या हुआ कि हमारी आजादी कानी कौड़ी हो गई और हम हन्टर वाली तानाशाही के सपनों में खोने लगे। गणतंत्र दिवस पर अपनी आजादी के रागात्मक रिश्तों में पड़ी दरार और उसके कारणों पर विचार । (26.1.1994)
"माडो तो रच्यो, पणे मण तो मिल्योइ नी", राजस्थान और मालवा के मिलन क्षेत्रों की यह कहावत शायद हमारे लोकतंत्र पर भी चरितार्थ होती है। आजादी से ब्याह तो हो गया मगर मन नहीं मिला। शायद यही कारण है कि विख्यात संस्था मार्ग द्वारा किये गये शहरी क्षेत्रों के सर्वेक्षण अधिकांश लोगों ने देश में सीमित तानाशाही की वकालत की। शासन पद्धतियों में लोकतंत्र से बेहतर और तानाशाही से बदतर कोई और पद्धति नहीं। लोकतंत्र जीवन है तो तानाशाही मृत्यु। क्या हम जीवन से इतने उकता गये है कि मृत्यु का वरण करना चाहते हैं? या यह क्षणिक वितृष्णा है और हम उस महिला की तरह हो गये हैं जिसका बेमेल विवाह किसी लठेंत गंवार से हो गया हो और जो जीने के समस्त आकर्षणों के बावजूद भगवान से उठा लेने की प्रार्थना करती हो और बावजूद सारी वितृष्णाओं के अपने पति को देवता मानते रहने का अभिनय और करवा चौथ या हरतालिका तीज़ का व्रत भी करती रहती हो। 1947 में आजाद होने के 47 साल बाद ही ऐसा क्या हुआ कि हमारी आजादी कानी कौड़ी हो गई और हम हन्टरवाली तानाशाही के सपनों में खोने लगे। इस गणतंत्र दिवस पर हमें अपने और अपनी आजादी के रागात्मक रिश्तों में पड़ी दरार और उसके कारणों पर विचार करना होगा।
संसार का नियम और मनुष्य का मनोविज्ञान ही कुछ ऐसा है कि जो चीज हमें मुफ्त में मिल जाती है उसका मूल्य ही हम नहीं जान पाते। अधिकांश को तो मुफ्त में ही स्वतंत्रता मिली। हवा या पानी या प्रकाश से मूल्यवान कुछ नहीं होता। क्योकि इन्हीं से प्राण हैं, किन्तु इनका मूल्य हमने जाना? नहीं! क्योंकि ये मुफ्त में मिले हैं। अब जब प्राणों पर बन आने की बारी आई तो हमें हवा को साफ और पानी को संरक्षित करने की सुधि आई। ईश्वर की सत्ता भी शायद इसीलिए बनी हुई है क्योंकि वह आज तक किसी को मिला नहीं ।मिल जाता तो वह भी किसी भूतपूर्व मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की तरह धक्के खाता। आजादी हमें ऐसे ही मिल गई जैसे यदा कदा ओले पड़ जाते हैं और सड़क उनसे भर जाती है, कुछ समय हम उनका आनन्द लेते हैं, ओले गलते हैं और हम उन्हें भूल जाते हैं। आजादी की उत्तेजना, उसका आनंद, उसका उत्साह सब ओलों की तरह गल गये, इन सैंतालीस सालों में किसी चीज का निरंतर होना ही उसे अनहोना कर देता है। आजादी के संघर्ष के चश्मदीद गवाह चुक गये और आजाद, भगत सिंह, बिस्मिल या सुभाष जैसे कुछ सपूतों की कथाओं को छोड़ दिया जाये तो रोम-रोम को खड़ा कर देने वाले खून से लिखे आजादी के किस्से भी हमारे पास नहीं रहे। जिस मुल्क में हम गुलाम थे, सेंतमेंत ही उस मुल्क के मालिक हो गये। वास्तव में क्या हम इस मुल्क के मालिक है? आजादी के कुछ दिनों तक तो लगा कि हम मुल्क के मालिक हैं। धीरे-धीरे संघर्ष करने वाले पिछड़ते गए और आजादी के पहले के धनपति, गणपति और भूमिपति पुनः लोकपति बन गये।
दरअसल हमारा लोकतंत्र एक भीड़तंत्र बनता जा रहा है। हर आदमी अपनी इच्छा और अपनी कुण्ठा भीड़ के माध्यम से पूरी कर रहा है क्योंकि भीड़ बुद्धि से नहीं उन्माद से चलती है और भीड़ का अपराध किसी एक व्यक्ति का अपराध नहीं होता अतः हम निष्कलंक चेहरा भी रख सकते हैं और कलंकित काम भी कर सकते हैं। भीड़ एक प्रतिक्रिया होती है, विचार नहीं होता। हमारे यहां प्रतिक्रियाएं ही होती हैं, विचार नहीं। हमारे यहां प्रतिक्रियाएं और प्रलोभन जीतते या हारते हैं, राष्ट्र और उसके भविष्य का चिंतन तो कभी मैदान में ही नहीं उतरता हमारे देश की सीमा चीन या पाकिस्तान या बंगलादेश या बर्मा से नहीं मिलती, बल्कि हमारे देश की सीमा होती है हमारे स्वार्थ, हमारे उन्माद की वह दीवार जो हमारे किसी विधर्मी पड़ौसी या किसी हितों के टकराने वाले सहधर्मी से मिलती है। ये दीवारें बाहर की नहीं भीतर की होती हैं और भीतर की दीवारें बाहर की दीवारों से ज्यादा खतरनाक होती है क्योंकि वे दिखाई नहीं देती, हम सतर्क नहीं होते और जब खाली मैदान में चलते हुए एक अदृश्य दीवार से हम टकराते हैं तो अपने सिर को फटा हुआ, नाक को चेहरे के भीतर और जबड़े को पांवों में पड़ा हुआ पाते हैं। अदृश्य दीवारें वे ही खड़ी करते हैं जो दृश्य और बाहर की दीवारों को गिराने की फिल्म बनाते हैं। हम हिन्दुस्तानी नहीं होते हिन्दू या मुसलमान, ब्राह्मण या हरिजन, सिख या ईसाई होते हैं। बाहर की दीवारों को गिराने के लिए भाई-भाई का नारा लगाते हैं। यदि हम केवल भारतीय हो तो भाई भाई के नारे की जरूरत नहीं पड़े। यह नारा बड़ा खतरनाक है जो द्वैष पैदा करता है और भाई-भाई में जब झगड़ा होता है तो मां-बाप का घर बंटता है, 1947 में एक बार हम इसे बांट चुके हैं। सिर्फ भारतीय बनकर ही हम भारत को एक रख सकते हैं। अयोध्या में मस्जिद का एक टांचा टूटा तो देश और विदेशों में मंदिरों के अनेक ढांचे तोड़ दिये गये इन धर्मपुरुषों से कोई यह सवाल क्यों नहीं पूछता कि जितने भी बड़े-बड़े धर्मस्थल बनते हैं वे किस पैसे से बनते हैं? अक्सर काला धन ही धर्मों के सभी बड़े कार्यक्रम चलाता और बड़े भवन बनाता है। काले धन की नींव पर खड़ा कोई भवन परमात्मा का निवास कैसे हो सकता है? वह भीड़ को भड़काने और लोकतंत्र को भाड़ में झोंकने का केन्द्र क्यों और कैसे बन जाता है? शहर के लोग शायद यह समझने लगे हैं और शायद इसीलिए सीमित तानाशाही चाहते हैं ताकि मृत ढांचों के लिए जीवित मनुष्य तो नहीं मारे जायें, काले धन से बने धवल धर्म स्थलों के माध्यम से छद्म प्रेरणाये तो अधर्म नहीं करवायें। हिंसा भी होनी है, अत्याचार भी होना है तो कम से कम सामने खड़ा एक जीवित तानाशाह तो करे और अपनी जिम्मेदारी तो ग्रहण करे। यह जो भाई भाई बताने वाले हैं, यही देश को बांटने के बीज बोने वाले हैं। हर नागरिक इस देश-देह का अंग हो कोई अपने दायें हाथ से अपना बायां हाथ नहीं काटता जब हम यह सीखेंगे तभी हम लोकतंत्र से एक रस हो सकेंगे।
कितनी अबौद्धिक बात है कि हम हर समस्या का हल राजनीतिज्ञ से चाहते हैं जबकि राजनीतिज्ञ केवल समस्यायें उत्पन्न करना जानता है। समस्या नहीं होगी तो राजनीति ही नहीं होगी और राजनीति नहीं होगी तो राजनीतिज्ञ कहा रहेगा? राजनीति ने लोक कल्याण के नाम पर हमारा आत्मवल, हमारा आत्मविश्वास और यहां तक कि हमारी अपने प्रति जिम्मेदारी की भावना भी छीन ली। हमने अपने ज्ञान और दुख-सुख भी सरकार के जिम्मे कर दिये। पढ़ाये तो सरकार, दवा करे तो सरकार, रोजगार दे तो सरकार और कुछ दिनों में शायद हम यह भी चाहेंगे कि बच्चे भी पाले तो सरकार ऐसा नहीं किया तो जैसे सड़क पर कचरा फेंक कर सफाई नहीं करने के लिए हम नगर निगम को गालियां देते हैं, वैसे ही बच्चे नहीं पालने पर हम सरकार को भी दे सकेंगे। राजनीतिज्ञ बड़ा चतुर होता है, उसने हमारे हाथ से हमारा सब कुछ लेकर हमें आलोचना करने और गालियां बकने का अधिकार दे दिया है। हमारा आलोचना पर अधिकार है, उनका सिंहासन पर लोकतंत्र ऐसे ही चल रहा है। हम वैसे ही खुश है जैसे स्टेशन पर खड़ी ट्रेन में बैठा यात्री बगल में चलने वाली ट्रेन को देखकर अपनी ट्रेन चलने का भ्रम पाल कर खुश होता है। जनता की ट्रेन खड़ी है और राजनीतिज्ञो की ट्रेन चल रही है और जनता भ्रम पाले है कि हमारी ट्रेन चल रही है। जनता का बड़ा वर्ग तो सिर्फ चलने के भ्रम में बैठा है। पद और धन की दौड़ में तो ये हैं जिनकी ट्रेन दौड़ रही है। वे चलती ट्रेन में भी एक-दूसरे से आगे निकलने और सबसे आगे की सीट पर जा बैठने के लिए गुत्थम-गुल्था हो रहे हैं। कहीं खड़ी ट्रेन में बैठे किसी यात्री का भ्रम नहीं टूट जाये और वह कूद कर हमारी ट्रेन में नहीं आ जाये इसलिए आरक्षण की टॉफियां फेकी जा रही है, कर्ज माफी के टुकड़े फेंके जा रहे हैं, जमीनों पर कब्जे करवाये जा रहे हैं और मुफ्त खोरी की आदते डाली जा रही है। एक समूह सम्पन्न हो रहा है और दूसरा बड़ा समूह आलसी, निकम्मा और टुकड़खोर होता जा रहा है। षड्यंत्र अंतर्राष्ट्रीय है, जैसे सम्पन्न और सबल राष्ट्र विपन्न और कमजोर राष्ट्रो का शोषण करते हैं, वैसे ही हमारे देश में शहर, गांवों का शोषण कर रहे हैं। बड़ी मछलियां छोटी मछलियों को निगले यह तो हमारे संविधान में नहीं लिखा है, प्रलोभन देकर और लोगों को मक्कार बनाकर सत्ता में बने रहने की जोड़-तोड़ तो लोकशाही नहीं होती। हमने लोकतंत्र के वेश में प्रलोभनतंत्र और लूट तंत्र को विकसित कर लिया है। ऐसे तंत्र में एक सीमा के बाद लोकतंत्र का मुखौटा भी फट जाता है।
जब देश ही नहीं बढ़ेगा तो लोकतंत्र कैसे चलेगा? देश बढ़ता है विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में मौलिक अन्वेषण और नवीनतम उत्पादनों के निर्यात से हमारे यहां तो वैज्ञानिक आत्महत्या करते या स्वयं ही निर्यात हो जाते और विदेशों में पुरस्कार पाते हैं। राजनेता, अफसर या उद्योगपति का अहं बुद्धिजीवी को पायजेव की तरह पहनना चाहता है। बुद्धि कोई सोना तो नहीं कि जिसकी पायल बन जाये, वह टूट जाती है या देश से ही दूर चली जाती है। हम वैज्ञानिक बुद्धि से रिक्त हो रहे हैं और अपनी स्वामियों को विदेशी तकनीक खरीद कर भर रहे हैं। हम अपनी प्राकृतिक सम्पदा बेचते और इलेक्ट्रानिक उपकरण खरीदते हैं। प्राकृतिक सम्पदा समाप्त होती है उपकरणों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है, बढ़ता जाता है। एक दिन हम प्रकृति से भी दरिद्र हो जायेंगे। क्या हमारा लोकतंत्र हमें आर्थिक गुलामी की ओर ले जा रहा है? वह तो हो ही रहा है। हम अपनी संस्कृति से भी दूर हो रहे हैं। विदेशी संचार माध्यमों के उत्तेजक मदमस्त करने वाले गीत और दृश्य आंधी की तरह हमारी मानसिक पतंग उड़ाये ले जा रहे हैं ऊंची और ऊंची। अभी तो संस्कृति की डोर बंधी है। जब यह टूटेगी, हमारी पतंग जाने किन हाथों में लुटेगी।
इस गणतंत्र दिवस पर अपनी पतंग को बचाने का यत्न शुरू होना चाहिए, खड़ी हुई ट्रेन में बैठकर चलने का भ्रम टूटना चाहिए, बुद्धि के सम्मुख राजा, मंत्री या कुबेर का सिर झुकना चाहिए, अवैज्ञानिक बुद्धि के कारण बनी अंधविश्वासों की भीतर की दीवारें टूटना चाहिए और वैज्ञानिक बुद्धि की स्वतंत्र दौड़ के लिए जिज्ञासा का असीमित मैदान बनना चाहिए। परमात्मा काले धन से बने धवल धर्मस्थल में, निरपराध के लहू या दरिद्रता में नहीं मिलता, वह मिलता है श्रम की निष्कलुष स्वेद बूंद में, झिलमिलाते राष्ट्र प्रेम के बिम्ब में यह लोकतंत्र मिट्टी को माधव बना देने के लिए मिला है, हम माधव को ही मिट्टी बनाने पर तुले हैं 47 साल बाद तो बेमेल विवाह वाले दम्पति भी बुढ़ापा सुख से काटने का सोचने लगते हैं। क्या हम लोकतंत्र के साथ जीना सीखेंगे ?
महेश श्रीवास्तव
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