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27 Feb, 2024
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भारत के प्रथम राष्ट्रपति एवं महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, कायस्थ कुल गौरव, भारत रत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी की पुण्यतिथि पर सादर श्रद्धा सुमन

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद (जयंती 3 दिसम्बर 1884 – पुण्यतिथि 28 फरवरी 1963) भारत रत्न, स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति एवं महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे। वे भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से थे और उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में प्रमुख भूमिका निभाई। उन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया था। राष्ट्रपति होने के अतिरिक्त उन्होंने भारत के पहले मंत्रिमंडल में 1946 एवं 1947 मेें कृषि और खाद्यमंत्री का दायित्व भी निभाया था। सम्मान से उन्हें प्रायः 'राजेन्द्र बाबू' कहकर पुकारा जाता है।

प्रारंभिक जीवन
राजेन्द्र बाबू का जन्म 3 दिसम्बर 1884 को बिहार के तत्कालीन सारण जिले (अब सीवान) के जीरादेई नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता महादेव सहाय संस्कृत एवं फारसी के विद्वान थे एवं उनकी माता कमलेश्वरी देवी एक धर्मपरायण महिला थीं।

राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वज मूलरूप से कुआँगाँव, अमोढ़ा (उत्तर प्रदेश) के निवासी थे। यह एक कायस्थ परिवार था। कुछ कायस्थ परिवार इस स्थान को छोड़ कर बलिया जा बसे थे। कुछ परिवारों को बलिया भी रास नहीं आया इसलिये वे वहाँ से बिहार के जिला सारण (अब सीवान) के एक गाँव जीरादेई में जा बसे। इन परिवारों में कुछ शिक्षित लोग भी थे। इन्हीं परिवारों में राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वजों का परिवार भी था। जीरादेई के पास ही एक छोटी सी रियासत थी - हथुआ। चूँकि राजेन्द्र बाबू के दादा पढ़े-लिखे थे, अतः उन्हें हथुआ रियासत की दीवानी मिल गई। पच्चीस-तीस सालों तक वे उस रियासत के दीवान रहे। उन्होंने स्वयं भी कुछ जमीन खरीद ली थी। राजेन्द्र बाबू के पिता महादेव सहाय इस जमींदारी की देखभाल करते थे। राजेन्द्र बाबू के चाचा जगदेव सहाय भी घर पर ही रहकर जमींदारी का काम देखते थे। अपने पाँच भाई-बहनों में वे सबसे छोटे थे इसलिए पूरे परिवार में सबके प्यारे थे।

उनके चाचा के चूँकि कोई संतान नहीं थी इसलिए वे राजेन्द्र प्रसाद को अपने पुत्र की भाँति ही समझते थे। दादा, पिता और चाचा के लाड़-प्यार में ही राजेन्द्र बाबू का पालन-पोषण हुआ। दादीऔर माँ का भी उन पर पूर्ण प्रेम बरसता था।

बचपन में राजेन्द्र बाबू जल्दी सो जाते थे और सुबह जल्दी उठ जाते थे। उठते ही माँ को भी जगा दिया करते और फिर उन्हें सोने ही नहीं देते थे। अतएव माँ भी उन्हें प्रभाती के साथ-साथ रामायण महाभारत की कहानियाँ और भजन कीर्तन आदि रोजाना सुनाती थीं।

पाँच वर्ष की उम्र में ही राजेन्द्र बाबू ने एक मौलवी साहब से फारसी में शिक्षा शुरू किया। उसके बाद वे अपनी प्रारंभिक शिक्षा के लिए छपरा के जिला स्कूल गए। राजेन्द्र बाबू का विवाह उस समय की परिपाटी के अनुसार बाल्यकाल में ही, लगभग 13 वर्ष की उम्र में, राजवंशी देवी से हो गया। विवाह के बाद भी उन्होंने पटना की टी० के० घोष अकादमी से अपनी पढाई जारी रखी। उनका वैवाहिक जीवन बहुत सुखी रहा और उससे उनके अध्ययन अथवा अन्य कार्यों में कोई रुकावट नहीं पड़ी।

लेकिन वे जल्द ही जिला स्कूल छपरा चले गये और वहीं से 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा दी। उस प्रवेश परीक्षा में उन्हें प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था। सन् 1902 में उन्होंने कोलकाता के प्रसिद्ध प्रेसिडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया। उनकी प्रतिभा ने गोपाल कृष्ण गोखले तथा बिहार-विभूति अनुग्रह नारायण सिन्हा जैसे विद्वानों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। 1915 में उन्होंने स्वर्ण पद के साथ विधि परास्नातक (एलएलएम) की परीक्षा पास की और बाद में लॉ के क्षेत्र में ही उन्होंने डॉक्ट्रेट की उपाधि भी हासिल की। राजेन्द्र बाबू कानून की अपनी पढाई का अभ्यास भागलपुर, बिहार में किया करते थे।

हिन्दी एवं भारतीय भाषा-प्रेम
यद्यपि राजेन्द्र बाबू की पढ़ाई फारसी और उर्दू से शुरू हुई थी तथापि बी० ए० में उन्होंने हिंदी ही ली। वे अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी व बंगाली भाषा और साहित्य से पूरी तरह परिचित थे तथा इन भाषाओं में सरलता से प्रभावकारी व्याख्यान भी दे सकते थे। गुजराती का व्यावहारिक ज्ञान भी उन्हें था। एम० एल० परीक्षा के लिए हिन्दू कानून का उन्होंने संस्कृत ग्रंथों से ही अध्ययन किया था। हिन्दी के प्रति उनका अगाध प्रेम था। हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं जैसे भारत मित्र, भारतोदय, कमला आदि में उनके लेख छपते थे। उनके निबन्ध सुरुचिपूर्ण तथा प्रभावकारी होते थे। 1912 ई. में जब अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन कलकत्ते में हुआ तब स्वागतकारिणी समिति के वे प्रधान मन्त्री थे। 1920 ई. में जब अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन का 10वाँ अधिवेशन पटना में हुआ तब भी वे प्रधान मन्त्री थे। 1923 ई. में जब सम्मेलन का अधिवेशन काकीनाडा में होने वाला था तब वे उसके अध्यक्ष मनोनीत हुए थे परन्तु रुग्णता (illness) के कारण वे उसमें उपस्थित न हो सके अतः उनका भाषण जमनालाल बजाज ने पढ़ा था। 1926 ई० में वे बिहार प्रदेशीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के और 1927 ई० में उत्तर प्रदेशीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति थे। हिन्दी में उनकी आत्मकथा बड़ी प्रसिद्ध पुस्तक है। अंग्रेजी में भी उन्होंने कुछ पुस्तकें लिखीं। उन्होंने हिन्दी के 'देश' और अंग्रेजी के 'पटना लॉ वीकली' समाचार पत्र का सम्पादन भी किया था।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उनका पदार्पण वक़ील के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत करते ही हो गया था। चम्पारण में गान्धीजी ने एक तथ्य अन्वेषण समूह भेजे जाते समय उनसे अपने स्वयं सेवकों के साथ आने का अनुरोध किया था। राजेन्द्र बाबू महात्मा गाँधी की निष्ठा, समर्पण एवं साहस से बहुत प्रभावित हुए और 1928 में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय के सीनेटर का पदत्याग कर दिया। गाँधीजी ने जब विदेशी संस्थाओं के बहिष्कार की अपील की थी तो उन्होंने अपने पुत्र मृत्युंजय प्रसाद, जो एक अत्यंत मेधावी छात्र थे, उन्हें कोलकाता विश्वविद्यालय से हटाकर बिहार विद्यापीठ में दाखिल करवाया था। उन्होंने 'सर्चलाईट' और 'देश' जैसी पत्रिकाओं में इस विषय पर बहुत से लेख लिखे थे और इन अखबारों के लिए अक्सर वे धन जुटाने का काम भी करते थे। 1914 में बिहार और बंगाल मे आई बाढ़ में उन्होंने काफी बढ़चढ़ कर सेवा-कार्य किया था। बिहार के 1934 के भूकंप के समय राजेन्द्र बाबू कारावास में थे। जेल से दो वर्ष में छूटने के पश्चात वे भूकम्प पीड़ितों के लिए धन जुटाने में तन-मन से जुट गये और उन्होंने वायसराय के जुटाये धन से कहीं अधिक अपने व्यक्तिगत प्रयासों से जमा किया। सिंध और क्वेटा के भूकम्प के समय भी उन्होंने कई राहत-शिविरों का इंतजाम अपने हाथों मे लिया था।

1934 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में अध्यक्ष चुने गये। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने पर कांग्रेस अध्यक्ष का पदभार उन्होंने एक बार पुन: 1939 में सँभाला था।

भारत के स्वतन्त्र होने के बाद संविधान लागू होने पर उन्होंने देश के पहले राष्ट्रपति का पदभार सँभाला। राष्ट्रपति के तौर पर उन्होंने कभी भी अपने संवैधानिक अधिकारों में प्रधानमंत्री या कांtग्रेस को दखलअंदाजी का मौका नहीं दिया और हमेशा स्वतन्त्र रूप से कार्य करते रहे। हिन्दू अधिनियम पारित करते समय उन्होंने काफी कड़ा रुख अपनाया था। राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने कई ऐसे दृष्टान्त छोड़े जो बाद में उनके परवर्तियों के लिए उदाहरण बन गए।

भारतीय संविधान के लागू होने से एक दिन पहले 25 जनवरी 1950 को उनकी बहन भगवती देवी का निधन हो गया, लेकिन वे भारतीय गणराज्य के स्थापना की रस्म के बाद ही दाह संस्कार में भाग लेने गये। 12 वर्षों तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने के पश्चात उन्होंने 1962 में अपने अवकाश की घोषणा की। अवकाश ले लेने के बाद ही उन्हें भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाज़ा गया।

सरलता
राजेन्द्र बाबू की वेशभूषा बड़ी सरल थी। उनके चेहरे मोहरे को देखकर पता ही नहीं लगता था कि वे इतने प्रतिभासम्पन्न और उच्च व्यक्तित्ववाले सज्जन हैं। देखने में वे सामान्य किसान जैसे लगते थे।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डाक्टर ऑफ ला की सम्मानित उपाधि प्रदान करते समय कहा गया था - "बाबू राजेंद्रप्रसाद ने अपने जीवन में सरल व नि:स्वार्थ सेवा का ज्वलन्त उदाहरण प्रस्तुत किया है। जब वकील के व्यवसाय में चरम उत्कर्ष की उपलब्धि दूर नहीं रह गई थी, इन्हें राष्ट्रीय कार्य के लिए आह्वान मिला और उन्होंने व्यक्तिगत भावी उन्नति की सभी संभावनाओं को त्यागकर गाँवों में गरीबों तथा दीन कृषकों के बीच काम करना स्वीकार किया।"

सरोजिनी नायडू ने उनके बारे में लिखा था - "उनकी असाधारण प्रतिभा, उनके स्वभाव का अनोखा माधुर्य, उनके चरित्र की विशालता और अति त्याग के गुण ने शायद उन्हें हमारे सभी नेताओं से अधिक व्यापक और व्यक्तिगत रूप से प्रिय बना दिया है। गाँधी जी के निकटतम शिष्यों में उनका वही स्थान है जो ईसा मसीह के निकट सेंट जॉन का था।"

विरासत
सितम्बर 1962 में अवकाश ग्रहण करते ही उनकी पत्नी राजवंशी देवी का निधन हो गया। मृत्यु के एक महीने पहले अपने पति को सम्बोधित पत्र में राजवंशी देवी ने लिखा था - "मुझे लगता है मेरा अन्त निकट है, कुछ करने की शक्ति का अन्त, सम्पूर्ण अस्तित्व का अन्त।" राम! राम!! शब्दों के उच्चारण के साथ उनका अन्त 28 फरवरी 1963 को पटना के सदाक़त आश्रम में हुआ।

उनकी वंशावली को जीवित रखने का कार्य उनके प्रपौत्र अशोक जाहन्वी प्रसाद कर रहे हैं। वे पेशे से एक अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति-प्राप्त वैज्ञानिक एवं मनोचिकित्सक हैं। उन्होंने बाई-पोलर डिसऑर्डर की चिकित्सा में लीथियम के सुरक्षित विकल्प के रूप में सोडियम वैलप्रोरेट की खोज की थी। अशोक जी प्रतिष्ठित अमेरिकन अकैडमी ऑफ आर्ट ऐण्ड साइंस के सदस्य भी हैं।

कृतियाँ
राजेन्द्र बाबू ने अपनी आत्मकथा (1946) के अतिरिक्त कई पुस्तकें भी लिखी जिनमें बापू के कदमों में बाबू (1954), इण्डिया डिवाइडेड (1946), सत्याग्रह ऐट चम्पारण (1922), गान्धीजी की देन, भारतीय संस्कृति व खादी का अर्थशास्त्र इत्यादि उल्लेखनीय हैं।

भारत रत्न
सन 1962 में अवकाश प्राप्त करने पर राष्ट्र ने उन्हें भारत रत्‍न की सर्वश्रेष्ठ उपाधि से सम्मानित किया। यह उस भूमिपुत्र के लिये कृतज्ञता का प्रतीक था जिसने अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर आधी शताब्दी तक अपनी मातृभूमि की सेवा की थी।

निधन
अपने जीवन के आख़िरी महीने बिताने के लिये उन्होंने पटना के निकट सदाकत आश्रम चुना। यहाँ पर 28 फ़रवरी 1963 में उनके जीवन की कहानी समाप्त हुई। [5] यह कहानी थी श्रेष्ठ भारतीय मूल्यों और परम्परा की चट्टान सदृश्य आदर्शों की। हम सभी को इन पर गर्व है और ये सदा राष्ट्र को प्रेरणा देते रहेंगे।

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26 Feb, 2024
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प्रसिद्ध उड़िया साहित्यकार, ओड़िशा और केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार व सरस्वती सम्मान प्राप्त, कुल गौरव, पद्मश्री मनोज दास जी की जयंती पर सादर श्रद्धा सुमन

मनोज दास (जयंती - 27 फ़रवरी, 1934, पुण्यतिथि - 27 अप्रैल, 2021) प्रसिद्ध उड़िया साहित्यकार। उनकी अधिकांश रचनाएँ उड़िया भाषा और अंग्रेज़ी में हैं। उन्हें उनकी साहित्यिक सेवा के लिये 'सरस्वती सम्मान' से सम्मानित किया गया थे। वर्ष 2001 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से नवाजा था।

जीवन परिचय
मनोज दास की पहली कहानी ‘समुद्रर क्षुधा’ 1947 में प्रकाशित हुई थी। हालाँकि शुरू के दिनों में उन्होंने कविता, भ्रमण कहानी तथा रम्य रचना लिखी हैं, पर उनकी साहित्य-साधना की प्रधान विधा है कहानी और कहानीकार के रूप में ही वे विशेष रूप से परिचित हैं। सन 1971 में प्रकाशित ‘मनोज दासंक कथा ओ. कहानी’ में उनकी तब तक लिखी कहानियाँ थीं और मनोज दास को ओड़िसा के एक अग्रणी कथाकार के रूप में स्वीकृति मिल चुकी थी। इसके बाद भी उनके कई अन्य संग्रह प्रकाशित हुए।

उड़िया तथा अंग्रेज़ी कहानीकार
मनोज दास उड़िया तथा अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं के कहानीकार हैं। एक अंग्रेज़ी लेखक के रूप में भी वे अखिल भारतीय स्तर पर स्वीकृत हैं और उनकी अंग्रेज़ी कहानियाँ काफ़ी प्रशंसित हुई हैं। प्रख्यात लेखक ग्राहम ग्रीन ने उन्हें आर. के. नारायण के साथ रखकर देखा है। किसी अन्य ने के. हार्डी, साकी तथा ओ. हेनरी के साथ उनकी तुलना की है। उनके अपने विचार में वे कुछ कहानी पहले उड़िया में लिखते हैं और कुछ पहले अंग्रेज़ी में। बाद में वे उस कहानी को फिर दूसरी भाषा में लिखते हैं। किस भाषा में वे सोचते हैं, इस प्रश्न पर मनोज दास का जवाब है कि वह सोचते हैं नीरव की भाषा में।

मनोज दास द्वारा अंग्रेज़ी में लिखते हुए भी उनके साहित्य सृजन का मूल स्रोत अंग्रेज़ी या विदेशी साहित्य नहीं है। उनकी कहानी में जिस परम्परा का विकास देखने को मिलता है, वह है संस्कृत तथा उड़िया की लोककथा, वेद, उपनिषद की भारतीय सांस्कृतिक धारा और आधुनिक उड़िया गद्य साहित्य के प्रवर्तक फ़क़ीर मोहन सेनापति। मनोज दास ने खुद भी अपने लेखन पर फ़क़ीर मोहन, सोमदेव, विष्णु शर्मा आदि का प्रभाव स्वीकार किया है।

साहित्य पुरस्कार
साहित्य के क्षेत्र में मनोज दास को काफ़ी सफलता भी मिली। उन्हें साहित्य के क्षेत्र में प्राप्त सम्मानों में से निम्न सम्मान मिले-
ओड़िशा साहित्य अकादमी पुरस्कार' (1965)
केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार' (1972)
सारला सम्मान' (1981)
विषुव सम्मान' (1987) हैं।

लेखन शैली
जिन गुणों के कारण उनकी कहानियाँ आलोचकों और पाठकों दोनों को प्रिय हैं, वे हैं सशक्त कथानक, मोहक तथा धाराप्रवाह वर्णन शैली रहस्यमय किंवदन्तीय वातावरण और अन्त में एक अव्यक्त मन्तव्य और नैतिक अर्थ। मनोज दास की प्रारम्भिक कहानियों से लेकर अब तक लिखी जाने वाली कहानियों में ये सारे गुण निश्चित रूप से देखे जा सकते हैं। और इन्ही सब कारणों से उनकी कहानी एक बार पढ़ने पर उसे भूल पाना सम्भव नहीं होता। उनकी कहानी का एक सशक्त आकर्षण है उसकी बौद्धिकता व भावुकता अथवा हृदय और मन का सन्तुलन। हालाँकि उनकी सारी कहानियाँ निर्मम बौद्धिकता में सराबोर हैं, पर वे बौद्धिकता, भावुकता और आवेग को दबाती नहीं।

कहानी के अन्त में नीति-शिक्षा का समाधान कहानी के पात्रों को उनकी प्रकृतिगत रोजमर्रा की दिनचर्या के बाहर नहीं खीच सकता। इसलिए ये सारे पात्र जीवन्त व सांसारिक हैं, साधारण सुख-दुःख के भागीदार हैं। केवल कथा कहने के ढँग के प्रधान होने के कारण नहीं, उनकी आभासधर्मी कहानियों में भी यह देखा जा सकता है इन पात्रों को रूप देने के लिए मनोज दास ने जिस तरह की शैली अपनायी है, वह भी उनकी निजी है।

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25 Feb, 2024
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ऐतिहासिक बांग्ला बाल साहित्य लेखिका, कायस्थ कुल गौरव लीला मजूमदार जी की जयंती पर सादर श्रद्धा सुमन

ऐतिहासिक बांग्ला बाल साहित्य लेखिका, कायस्थ कुल गौरव लीला मजूमदार जी की जयंती पर सादर श्रद्धा सुमन

बांग्ला बाल साहित्य लेखिका लीला मजूमदार (जयंती 26 फरवरी 1908 - पुण्यतिथि 5 अप्रैल 2007) एक भारतीय बंगाली भाषा की प्रसिद्ध लेखिका।

जीवन परिचय 
सुरमा देवी और प्रमदा रंजन रे के घर 26 फरवरी 1908 को बंगाली कायस्थ परिवार में जन्मी लीला ने अपना बचपन शिलांग में बिताया, जहाँ उन्होंने लोरेटो कॉन्वेंट में पढ़ाई की। 1919 में, उनके पिता का स्थानांतरण कलकत्ता हो गया, और वह सेंट जॉन्स डायोसेसन स्कूल में शामिल हो गईं, जहाँ से उन्होंने अपनी मैट्रिक की परीक्षा पूरी की। 1924 में मैट्रिक परीक्षा में वह लड़कियों में दूसरे स्थान पर रहीं। वह कलकत्ता विश्वविद्यालय में अपने ऑनर्स (स्नातक) और मास्टर ऑफ आर्ट्स परीक्षा दोनों में अंग्रेजी (साहित्य) में प्रथम स्थान पर रहीं । वह जिस परिवार से थीं, उसने बाल साहित्य में उल्लेखनीय योगदान दिया। सुनील गंगोपाध्याय कहते हैं कि जहां टैगोर परिवार ने नाटक, गीत और वयस्कों के लिए साहित्य से सभी को उत्साहित किया, वहीं उपेन्द्र किशोर रे चौधरी परिवार ने बंगाली में बच्चों के साहित्य की नींव रखने की जिम्मेदारी संभाली।

प्रारंभिक वर्ष 
वह 1931 में एक शिक्षिका के रूप में दार्जिलिंग के महारानी गर्ल्स स्कूल में शामिल हुईं। रवींद्रनाथ टैगोर के निमंत्रण पर वह शांतिनिकेतन के स्कूल में गईं और शामिल हुईं , लेकिन वह केवल एक वर्ष तक ही रहीं। वह कलकत्ता में आशुतोष कॉलेज के महिला वर्ग में शामिल हुईं लेकिन फिर लंबे समय तक वहां नहीं रहीं। इसके बाद, उन्होंने अपना अधिकांश समय एक लेखिका के रूप में बिताया। एक लेखिका के रूप में दो दशकों के बाद, वह एक निर्माता के रूप में ऑल इंडिया रेडियो से जुड़ीं और लगभग सात-आठ वर्षों तक काम किया।

उनकी पहली कहानी, लक्खी छेले , 1922 में संदेश में प्रकाशित हुई थी । इसका चित्रण भी उन्होंने ही किया था। बंगाली में बच्चों की पत्रिका की स्थापना उनके चाचा, उपेन्द्रकिशोर रे चौधरी ने 1913 में की थी और बाद में 1915 में उपेन्द्रकिशोर की मृत्यु के बाद कुछ समय के लिए उनके चचेरे भाई सुकुमार रे ने इसका संपादन किया था । अपने भतीजे सत्यजीत रे और अपने चचेरे भाई के साथ मिलकर नलिनी दास, उन्होंने अपने पूरे सक्रिय लेखन जीवन में संदेश के लिए संपादन और लेखन किया। 1994 तक उन्होंने पत्रिका के प्रकाशन में सक्रिय भूमिका निभाई।

रचनात्मक प्रयास 
एक अधूरी ग्रंथ सूची में 125 पुस्तकों की सूची है जिनमें लघु कथाओं का संग्रह, संयुक्त लेखन के तहत पांच पुस्तकें, 9 अनुवादित पुस्तकें और 19 संपादित पुस्तकें शामिल हैं।

उनकी पहली प्रकाशित पुस्तक बोड्डी नाथेर बारी (1939) थी, लेकिन उनके दूसरे संकलन दीन डुपुरे (1948) ने उन्हें काफी प्रसिद्धि दिलाई। 1950 के दशक से, उनके अतुलनीय बच्चों के क्लासिक्स का अनुसरण किया जाने लगा। हालाँकि हास्य उनकी विशेषता थी, उन्होंने जासूसी कहानियाँ, भूत कहानियाँ और कल्पनाएँ भी लिखीं।

उनका आत्मकथात्मक रेखाचित्र पकडंडी शिलांग में उनके बचपन के दिनों और शांतिनिकेतन और ऑल इंडिया रेडियो में उनके शुरुआती वर्षों के बारे में जानकारी प्रदान करता है।

बच्चों के साहित्य की अपनी शानदार श्रृंखला के अलावा, उन्होंने एक कुकबुक, वयस्कों के लिए उपन्यास ( श्रीमोती , चीना लैंथन ) और रवींद्रनाथ टैगोर की जीवनी लिखी। उन्होंने अबनिंद्रनाथ टैगोर पर व्याख्यान दिया और कला पर उनके लेखन का अंग्रेजी में अनुवाद किया। उन्होंने जोनाथन स्विफ्ट की गुलिवर्स ट्रेवल्स और अर्नेस्ट हेमिंग्वे की द ओल्ड मैन एंड द सी का बंगाली में अनुवाद किया।

सत्यजीत रे ने पाडी पिशिर बोरमी बक्शा का फिल्मांकन करने के बारे में सोचा था । अरुंधति देवी ने 1972 में इस पर फिल्म बनाई। छाया देवी ने युवा नायक, खोका की प्रसिद्ध चाची पदीपिशी की भूमिका निभाई।

ऑल-इंडिया रेडियो की एक विशेष महिला महल (महिला अनुभाग) श्रृंखला के लिए, एक सामान्य, मध्यमवर्गीय, बंगाली परिवार में पली-बढ़ी एक लड़की के रोजमर्रा के जीवन में "प्राकृतिक और सामान्य समस्याओं" से निपटने के लिए, उन्होंने मोनिमाला बनाई । एक "बहुत ही साधारण लड़की" की कहानी जिसकी दादी उसे तब लिखना शुरू करती है जब वह 12 साल की हो जाती है और उसके विवाह और मातृत्व तक जारी रहती है।

परिवार 
1933 में उन्होंने प्रसिद्ध दंत चिकित्सक डॉ. सुधीर कुमार मजूमदार से शादी की, जो हार्वर्ड डेंटल स्कूल से स्नातक थे। दो दशकों तक उन्होंने खुद को हाउसकीपिंग के लिए समर्पित कर दिया। उनके पति की 1984 में मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के समय उनके बेटे रंजन और बेटी कमला के अलावा, दो पोते, दो पोतियां और तीन परपोते थे।

पुरस्कार 
होल्डे पाखिर पलोक ने बच्चों के साहित्य के लिए राज्य पुरस्कार जीता, बाक बध पाला ने 1963 में भारत सरकार से संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार जीता , आर कोनोखाने ने 1969 में पश्चिम बंगाल सरकार से रवीन्द्र पुरस्कार जीता । उन्होंने सुरेश स्मृति पुरस्कार भी जीता था। , विद्यासागर पुरस्कार, आजीवन उपलब्धि के लिए भुवनेश्वरी पदक, [1] और आनंद पुरस्कार। [6] उन्हें विश्व भारती द्वारा देशिकोत्तम और मानद डी.लिट से सम्मानित किया गया है। बर्दवान, उत्तरी बंगाल और कलकत्ता विश्वविद्यालयों द्वारा। 

विरासत 
2019 में, लीला मजूमदार पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई गई है जिसका शीर्षक है "पेरिस्तान - द वर्ल्ड ऑफ लीला मजूमदार" ।

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23 Feb, 2024
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ऐतिहासिक उपन्यासकार एवं निबंधकार, कायस्थ कुल गौरव वृंदावनलाल वर्मा जी की पुण्यतिथि पर सादर श्रद्धा सुमन

ऐतिहासिक उपन्यासकार एवं निबंधकार थे वृंदावनलाल वर्मा
ऐतिहासिक उपन्यासकार एवं निबंधकार वृंदावनलाल वर्मा की आज पुण्यतिथि है। 9 जनवरी 1889 को मऊरानीपुर, झाँसी (उत्तर प्रदेश) में पैदा हुए वृंदावनलाल वर्मा की मृत्यु 23 फ़रवरी 1969 को हुई थी। इनके पिता का नाम अयोध्या प्रसाद था। वृंदावनलाल वर्मा के गुरु थे पण्डित विद्याधर दीक्षित।


जीवन परिचय
वृंदावनलाल वर्मा की पौराणिक तथा ऐतिहासिक कथाओं के प्रति बचपन से ही रुचि थी। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा भिन्न-भिन्न स्थानों पर हुई। बीए करने के पश्चात इन्होंने क़ानून की परीक्षा पास की और झाँसी में वकालत करने लगे। इनमें लेखन की प्रवृत्ति आरम्भ से ही रही है। जब नवीं कक्षा में थे, तभी इन्होंने तीन छोटे-छोटे नाटक लिखकर इण्डियन प्रेस, प्रयाग को भेजे और पुरस्कार स्वरूप 50 रुपये प्राप्त किये। 'महात्मा बुद्ध का जीवन-चरित' नामक मौलिक ग्रन्थ तथा शेक्सपीयर के 'टेम्पेस्ट' का अनुवाद भी इन्होंने प्रस्तुत किया था।


साहित्यिक जीवन
1909 ई. में वृंदावनलाल वर्मा जी का 'सेनापति ऊदल' नामक नाटक छपा, जिसे सरकार ने जब्त कर लिया। 1920 ई. तक यह छोटी-छोटी कहानियाँ लिखते रहे। इन्होंने 1921 से निबन्ध लिखना प्रारम्भ किया। स्काट के उपन्यासों का इन्होंने स्वेच्छापूर्वक अध्ययन किया और उससे ये प्रभावित हुए। ऐतिहासिक उपन्यास लिखने की प्रेरणा इन्हें स्काट से ही मिली। देशी-विदेशी अन्य उपन्यास-साहित्य का भी इन्होंने यथेष्ट अध्ययन किया।
वृंदावनलाल वर्मा ने सन् 1927 ई. में 'गढ़ कुण्डार' दो महीने में लिखा। उसी वर्ष 'लगन', 'संगम', 'प्रत्यागत', कुण्डली चक्र', 'प्रेम की भेंट' तथा 'हृदय की हिलोर' भी लिखा। 1930 ई. में 'विराट की पद्मिनी' लिखने के पश्चात कई वर्षों तक इनका लेखन स्थगित रहा। इन्होंने 1939 ई. में धीरे-धीरे व्यंग्य तथा 1942-44 ई. में 'कभी न कभी', 'मुसाहिब जू' उपन्यास लिखा। 1946 ई. में इनका प्रसिद्ध उपन्यास 'झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई' प्रकाशित हुआ। तब से इनकी कलम अवाध रूप से चलती रही। 'झाँसी की रानी' के बाद इन्होंने 'कचनार', 'मृगनयनी', 'टूटे काँटें', 'अहिल्याबाई', 'भुवन विक्रम', 'अचल मेरा कोई' आदि उपन्यासों और 'हंसमयूर', 'पूर्व की ओर', 'ललित विक्रम', 'राखी की लाज' आदि नाटकों का प्रणयन किया। 'दबे पाँव', 'शरणागत', 'कलाकार दण्ड' आदि कहानीसंग्रह भी इस बीच प्रकाशित हुए। 
पुरस्कार व उपाधि
वृंदावनलाल वर्मा जी भारत सरकार, राज्य सरकार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश राज्य के साहित्य पुरस्कार तथा डालमिया साहित्यकार संसद, हिन्दुस्तानी अकादमी, प्रयाग (उत्तर प्रदेश) और नागरी प्रचारिणी सभा, काशी के सर्वोत्तम पुरस्कारों से सम्मानित किये गये हैं। अपनी साहित्यिक सेवाओं के लिए वृंदावनलाल वर्मा जी आगरा विश्वविद्यालय द्वारा डी लिट की उपाधि से सम्मानित किये गये। इनकी अनेक रचनाओं को केन्द्रीय एवं प्रान्तीय राज्यों ने पुरस्कृत किया है।

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22 Feb, 2024
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महान शिक्षाविद, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, आर्यसमाज के श्रेष्ठ संत, गुरुकुल कांगड़ी के संस्थापक, कायस्थ कुल गौरव स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती जी की जयंती पर सादर श्रद्धा सुमन

स्वामी श्रद्धानन्द जीवन परिचय 

स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती (कायस्थ मुंशीराम विज ; जयंती 22 फरवरी, 1856 - पुन्यथिति 23 दिसम्बर, 1926) भारत के शिक्षाविद, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा आर्यसमाज के संन्यासी थे जिन्होंने स्वामी दयानन्द सरस्वती की शिक्षाओं का प्रसार किया। वे भारत के उन महान राष्ट्रभक्त सन्यासियों में अग्रणी थे, जिन्होंने अपना जीवन स्वाधीनता, स्वराज्य, शिक्षा तथा वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया था। उन्होंने गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय सहित अनेक शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की और हिन्दू समाज व भारत को संगठित करने तथा 1920 के दशक में शुद्धि आन्दोलन चलाने में महती भूमिका अदा की। डॉ भीमराव आम्बेडकर ने सन 1922 में कहा था कि स्वामी श्रद्धानन्द अछूतों के "महानतम और सबसे सच्चे हितैषी" हैं।

स्वामी श्रद्धानन्द (कायस्थ मुंशीराम विज) का जन्म 22 फरवरी सन् 1856 (फाल्गुन कृष्ण त्र्योदशी, विक्रम संवत् 1913) को पंजाब प्रान्त के जालन्धर जिले के तलवान ग्राम में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री नानकचन्द विज ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा शासित यूनाइटेड प्रोविन्स (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में पुलिस अधिकारी थे। उनके बचपन का नाम बृहस्पति विज और मुंशीराम विज था, किन्तु मुन्शीराम सरल होने के कारण अधिक प्रचलित हुआ।

पिता का स्थानान्तरण अलग-अलग स्थानों पर होने के कारण उनकी आरम्भिक शिक्षा अच्छी प्रकार नहीं हो सकी। लाहौर और जालंधर उनके मुख्य कार्यस्थल रहे। एक बार आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती वैदिक-धर्म के प्रचारार्थ बरेली पहुंचे। पुलिस अधिकारी नानकचन्द विज अपने पुत्र मुंशीराम विज को साथ लेकर स्वामी दयानन्द सरस्वती जी का प्रवचन सुनने पहुँचे। युवावस्था तक मुंशीराम विज ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते थे। लेकिन स्वामी दयानन्द जी के तर्कों और आशीर्वाद ने मुंशीराम विज को दृढ़ ईश्वर विश्वासी तथा वैदिक धर्म का अनन्य भक्त बना दिया।

स्वामी श्रद्धानन्द एक सफल वकील बने तथा काफी नाम और प्रसिद्धि प्राप्त की। वकालत के साथ आर्य समाज जालंधर के जिला-अध्यक्ष के पद से उनका सार्वजनिक जीवन प्रारम्भ हुआ। आर्य समाज में वे बहुत ही सक्रिय रहते थे। महर्षि दयानन्द के महाप्रयाण के बाद उन्होने स्वयं को स्व-देश, स्व-संस्कृति, स्व-समाज, स्व-भाषा, स्व-शिक्षा, नारी कल्याण, दलितोत्थान, स्वदेशी प्रचार, वेदोत्थान, पाखण्ड खण्डन, अन्धविश्‍वास-उन्मूलन और धर्मोत्थान के कार्यों को आगे बढ़ाने में पूर्णतः समर्पित कर दिया। गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना, अछूतोद्धार, शुद्धि, सद्धर्म प्रचार, पत्रिका द्वारा धर्म प्रचार, सत्य धर्म के आधार पर साहित्य रचना, वेद पढ़ने व पढ़ाने की व्यवस्था करना, धर्म के पथ पर अडिग रहना, आर्य भाषा के प्रचार तथा उसे जीवीकोपार्जन की भाषा बनाने का सफल प्रयास, आर्य जाति के उन्नति के लिए हर प्रकार से प्रयास करना आदि ऐसे कार्य हैं जिनके फलस्वरुप स्वामी श्रद्धानन्द अनन्त काल के लिए अमर हो गए।

उनका विवाह श्रीमती शिवा देवी के साथ हुआ था। जब आप 35 वर्ष के थे तभी शिवा देवी का स्वर्गवास हो गया। उस समय उनके दो पुत्र और दो पुत्रियां थीं। इन्द्र विद्यावाचस्पति उनके ही पुत्र थे। सन् 1917 में उन्होने सन्यास धारण कर लिया और स्वामी श्रद्धानन्द के नाम से विख्यात हुए।

गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना

अपने आरम्भिक जीवनकाल में स्वामी श्रद्धानन्द सन् 1901 में अंग्रेजों द्वारा जारी शिक्षा पद्धति के स्थान पर वैदिक धर्म तथा भारतीयता की शिक्षा देने वाले संस्थान "गुरुकुल" की स्थापना की। हरिद्वार के कांगड़ी गांव में गुरुकुल विद्यालय खोला गया। इस समय यह मानद विश्वविद्यालय है जिसका नाम गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय है। गांधी जी उन दिनों अफ्रीका में संघर्षरत थे। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने गुरुकुल के छात्रों से 1500 रुपए एकत्रित कर गांधी जी को भेजे। गांधी जी जब अफ्रीका से भारत लौटे तो वे गुरुकुल पहुंचे तथा महात्मा स्वामी श्रद्धानन्द तथा राष्ट्रभक्त छात्रों के समक्ष नतमस्तक हो उठे। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने ही गांधी जी को महात्मा की उपाधि से विभूषित किया और बहुत पहले यह भविष्यवाणी कर दी थी कि वे आगे चलकर बहुत महान बनेंगे।

पत्रकारिता एवं हिन्दी-सेवा

उन्होने पत्रकारिता में भी कदम रखा। वे उर्दू और हिन्दी भाषाओं में धार्मिक व सामाजिक विषयों पर लिखते थे। बाद में स्वामी दयानन्द सरस्वती का अनुसरण करते हुए उनने देवनागरी लिपि में लिखे हिन्दी को प्राथमिकता दी। उनका पत्र सद्धर्म प्रचारक पहले उर्दू में प्रकाशित होता था और बहुत लोकप्रिय हो गया था, किन्तु बाद में उनने इसको उर्दू के बजाय देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी में निकालना आरम्भ किया। इससे इनको आर्थिक नुकसान भी हुआ।[2] उन्होने दो पत्र भी प्रकाशित किये, हिन्दी में अर्जुन तथा उर्दू में तेज। जलियांवाला काण्ड के बाद अमृतसर में कांग्रेस का ३४वां अधिवेशन( दिस्म्बर 1919 ) हुआ[3]। स्वामी श्रद्धानन्द ने स्वागत समिति के अध्यक्ष के रूप में अपना भाषण हिन्दी में दिया और हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित किए जाने का मार्ग प्रशस्त किया।

स्वतन्त्रता आन्दोलन

उन्होने स्वतन्त्रता आन्दोलन में बढ-चढकर भाग लिया। गरीबों और दीन-दुखियों के उद्धार के लिये काम किया। स्त्री-शिक्षा का प्रचार किया। सन् 1919 में स्वामी जी ने दिल्ली में जामा मस्जिद क्षेत्र में आयोजित एक विशाल सभा में भारत की स्वाधीनता के लिए प्रत्येक नागरिक को पांथिक मतभेद भुलाकर एकजुट होने का आह्वान किया था।

 शुद्धि आंदोलन

स्वामी श्रद्धानन्द ने जब कांग्रेस के कुछ प्रमुख नेताओं को "मुस्लिम तुष्टीकरण की घातक नीति" अपनाते देखा तो उन्हें लगा कि यह नीति आगे चलकर राष्ट्र के लिए विघटनकारी सिद्ध होगी। इसके बाद कांग्रेस से उनका मोहभंग हो गया। दूसरी ओर कट्टरपंथी मुस्लिम तथा ईसाई हिन्दुओं का मतान्तरण कराने में लगे हुए थे। स्वामी जी ने असंख्य व्यक्तियों को आर्य समाज के माध्यम से पुनः वैदिक धर्म में दीक्षित कराया। उनने गैर-हिन्दुओं को पुनः अपने मूल धर्म में लाने के लिये शुद्धि नामक आन्दोलन चलाया और बहुत से लोगों को पुनः हिन्दू धर्म में दीक्षित किया। स्वामी श्रद्धानन्द पक्के आर्यसमाजी थे, किन्तु सनातन धर्म के प्रति दृढ़ आस्थावान पंडित मदनमोहन मालवीय तथा पुरी के शंकराचार्य स्वामी भारतीकृष्ण तीर्थ को गुरुकुल में आमंत्रित कर छात्रों के बीच उनका प्रवचन कराया था।

स्वामी श्रद्धानन्द ने स्वेछा एवं सहमति के पश्चात पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मलकान राजपूतों को शुद्धि कार्यक्रम के माध्यम से हिन्दू धर्म में वापसी कराई। शासन की तरफ से कोई रोक नहीं लगाई गई थी जबकि ब्रिटिश काल था।

स्वामी श्रद्धानन्द की हत्या

23 दिसम्बर 1926 को नया बाजार स्थित उनके निवास स्थान पर अब्दुल रशीद नामक एक उन्मादी धर्म-चर्चा के बहाने उनके कक्ष में प्रवेश करके गोली मारकर इस महान विभूति की हत्या कर दी। उसे बाद में फांसी की सजा हुई।

(कायस्थ समाज वेब पोर्टल टीम 22 फरवरी 2024)

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16 Feb, 2024
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व्हाट्सएप पर कायस्थ समाज चैनल को फॉलो करें और अपने परिचित, मित्रो, रिश्तेदारों  से फॉलो करायें l

नमस्कार कायस्थ बंधुओं, 
आपको जानकर ख़ुशी होगी की कायस्थ समाज के लाखो परिवारों को जोड़ने के लिए, कायस्थ समाज का व्हाट्सप्प चैनल शुरू किया गया है ल l आप सभी से अनुरोध है कि कायस्थ समाज के चैनल को फॉलो करे और अपने परिचित, मित्रो, रिश्तेदारों  से फॉलो करायें l चैनल की लिंक www.kayasthsamaj.in पर दी गई है l धन्यवाद l

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07 Feb, 2024
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अयोध्या के प्रसिद्द हनुमान गढ़ी मंदिर का जीर्णोद्धार करने वाले महापुरुष कायस्थ कुल गौरव राजा टिकैत राय "बहादुर "

अयोध्या के प्रसिद्द हनुमान गढ़ी मंदिर का जीर्णोद्धार करने वाले महापुरुष कायस्थ कुल गौरव राजा टिकैत राय "बहादुर " आसफ-उद-दौला के शासनकाल में 1791 - 1796 ई. तक अवध के दीवान थे । जो भारत के उत्तर भारतीय कायस्थ थे ।
नवाब आसिफ-उद-दौला ने अपने प्रधान मंत्री मिर्ज़ा हसन रज़ा खान और दीवान राजा टिकैत राय के साथ मिलकर एक धर्मार्थ संस्था (रिफ़ा-ए-आम) की स्थापना की, जिसने हजारों लोगों को राहत प्रदान की। 
उन्होंने पूरे राज्य में हनुमान गढ़ी मंदिर के आलावा भी कई मंदिर, पुल और तालाब खुदवाए, जिन्हें आज भी देखा जा सकता है। कानपुर में गंगा के तट पर लाल पत्थर से बनी एक बारादरी और स्नान घाट है, जिसे पत्थर घाट के नाम से जाना जाता है l जिसे राजा टिकैत राय ने बनवाया था।

राजा टिकैत को उनके दान के परिणामस्वरूप अयोध्या में हनुमान गढ़ी का शाही यजमान भी नामित किया गया था।

कायस्थ समाज के ऐसे कई महापुरुष है जिन पर कोई चर्चा नहीं करता परन्तु ऐसे प्रेरणा दायक महापुरुषों के योगदान को समय के साथ याद करना जरूरी हैं इससे आने वाली पीढ़ी भारत के निर्माण में कायस्थ समाज के योगदान को जान पाएंगी l

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04 Feb, 2024
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सार्वदेशिक कायस्थ युवा प्रतिनिधि संस्था की पहल: शुरू की संकल्प जन कल्याण कोष योजना, कायस्थ समाज- डिजिटल दान पात्र की राशि से करेगा छात्रों की मदद

कायस्थ समाज के जरूरतमंद विद्यार्थियों को पढ़ाई में मदद के लिए सार्वदेशिक कायस्थ युवा प्रतिनिधि संस्था ने 'कायस्थ समाज वेब पोर्टल' के सहयोग से शुरू किया कायस्थ समाज संकल्प जन कल्याण कोष । कायस्थ समाज ने गत वर्ष मंदिरों की तरह घरों में दान पात्र रखे थे। इन्हें, संकल्प दान पात्र का नाम दिया था, जिन्हें अब डिजिटल दान पात्र का रूप दिया जा रहा है। हालांकि जब तक लोग डिजिटल स्कीम से पूरी तरह नहीं जुड़ जाते, तब तक दान पात्र योजना जारी रहेगी।

डिजिटल दान पात्र के दानदाताओं द्वारा दी गई राशि कहां और किस पर खर्च की जा रही है। इसकी पूरी जानकारी कायस्थ समाज डॉट इन वेब पोर्टल पर देखी जा सकेगी। संस्था के प्रमुख वेद आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि समाज से दान राशि मिलने पर आवश्यकतानुसार छात्र-छात्राओं को किताब-कॉपी के अतिरिक्त यूनीफॉर्म और स्कूल की फीस के लिए भी राशि दी जाएगी। संस्था के अध्यक्ष शैलेंद्र निगम ने बताया कि समाज के 100 से अधिक लोंगों ने वेब पोर्टल कायस्थ समाज डॉट इन पर डिजिटल दान पात्र खाता खोल लिया है।

सोशल मीडिया पर दानदाताओं के लिए कायस्थ समाज का व्हाट्सप्प चैनल

तकनिकी संयोजक गौरव दलेला बताते हैं कि कायस्थ समाज के कुछ व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को भी इनमें शामिल किया है। यह कोई भी व्यक्ति प्रतिष्ठानों पर लगे क्यू आर कोड स्कैन कर सीधे डिजिटल दान पात्र में दान कर सकेंगे। दानदाताओं को जोड़ने के लिए सोशल मीडिया पर कायस्थ समाज का व्हाट्सप्प चैनल बनाया गया है l चैनल का लिंक नीचे दिया गया है l लिंक पर क्लिक कर चैनल को फॉलो करना है l कायस्थ समाज चैनल को फॉलो करने पर आपका मोबाइल नंबर पूरी तरह सुरक्षित रहेगा l 
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03 Feb, 2024
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कविता सहाय लखनऊ के आर्मी मेडिकल कॉलेज की कमान संभालने वाली पहली महिला लेफ्टिनेंट जनरल बनीं

लेफ्टिनेंट जनरल कविता सहाय गुरुवार को लखनऊ में आर्मी मेडिकल कोर सेंटर और कॉलेज की कमांडेंट के रूप में नियुक्त होने वाली पहली महिला बनीं
लेफ्टिनेंट जनरल सहाय पुणे में सशस्त्र बल मेडिकल कॉलेज के पूर्व छात्र हैं और उन्हें 1986 में सेना मेडिकल कोर में नियुक्त किया गया था।
उन्होंने 1994 में पैथोलॉजी में डॉक्टर ऑफ मेडिसिन की पढ़ाई पूरी की और 1997 में पुणे में एएफएमसी से पैथोलॉजी में नेशनल बोर्ड का डिप्लोमा पूरा किया।

अपनी 37 वर्षों की सेवा के दौरान, लेफ्टिनेंट जनरल ने विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है, जिनमें बेस हॉस्पिटल, दिल्ली कैंट में लैब मेडिसिन विभाग के प्रमुख, एएफएमसी में पैथोलॉजी विभाग में प्रोफेसर और आर्मी हॉस्पिटल (आर एंड आर) में लैब मेडिसिन विभाग के प्रमुख शामिल हैं।

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01 Feb, 2024
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कायस्थ समाज बना रहा डिजिटल दान पात्र, व्हाट्सप्प चैनल के माध्यम से जुड़ेंगे दानदाता 

कायस्थ समाज बना रहा डिजिटल दान पात्र...  व्हाट्सप्प चैनल के माध्यम से जुड़ेंगे दानदाता 
सार्वदेशिक कायस्थ युवा प्रतिनिधि संस्था ने कायस्थ समाज वेब पोर्टल के सहयोग से शुरू की जान उपयोगी योजना क्यूआर कोड स्केन कर बना सकेंगें अपना डिजिटल दान पात्र अकॉउंट 
सार्वदेशिक कायस्थ युवा प्रतिनिधि संस्था ने कायस्थ समाज वेब पोर्टल के सहयोग से सामाजिक सरोकार निभाते हुए कायस्थ समाज के जरूरतमंद विद्यार्थियों की पढ़ाई मदद के लिए । एक जन कल्याण कोष को शुरू किया जा रहा है।  कायस्थ समाज ने गतवर्ष मंदिरों की तरह घरों में दान पात्र रखे थे। इन्हें, संकल्प दान पात्र का नाम दिया था । जिन्हें अब डिजिटल दान पात्र बदला जा रहा है l इसका उद्देश्य घर-घर से जमा की गई राशि का उपयोग समाज के जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करना है।  डिजिटल दान पात्र के दानदाताओं की जानकारी कायस्थ समाज डॉट इन वेब पोर्टल देखी जा सकेगी कि उनके द्वारा दी गई राशि कहां और किस पर खर्च की जा रही है। इसके माध्यम से दानदाता सीधे जरूरतमंद की मदद कर सकेंगें l 
दान राशि अधिक मिलने पर किताब, यूनीफॉर्म और स्कूल की फीस के लिए उन्हें दिया जायेगा।  यह काम कायस्थ सार्वदेशिक प्रतिनिधि संस्था कर रही है। सार्वदेशिक कायस्थ युवा प्रतिनिधि संस्था के अधिष्ठाता वेद आशीष श्रीवास्तव और अध्यक्ष शैलेंद्र निगम ने बताया कि डिजिटल दान पात्र योजना के तहत क्यूआर कोड, युपीआई, वेबलिंक के माध्यम से दानदाता अपना डिजिटल दान पात्र खाता (अकॉउंट) बना सकेंगे जिसमें उन्हें जरूरतमंद लोगो की सूची दिखाई देगी जिससे वो अपनी इच्छानुसार मदद कर सकेंगे l मदद की राशि सीधे जरूरतमंद को पहुंचने की सुविधा भी दी गयी है l संस्था का  अध्यक्ष का कहना है कि कायस्थ समाज का कोई विद्यार्थी धन के अभाव में पढ़ाई से वंचित नहीं रहे और ना ही उसकी पढ़ाई बीच में छुटे। इसके जरिए समाज के ऐसे विद्यार्थियों की मदद करेगी, जिनकी पढ़ाई पर धन के अभाव में संकट खड़ा हो गया हो। कायस्थ समाज के 100 से अधिक चित्रांश बंधुओं ने अपने डिजिटल दान पात्र खाता बना लिया है l जो लोग इसमें राशि डालेंगे, उसकी जानकारी कायस्थ समाज वेव पोर्टल कायस्थ समाज डॉट इन पर देखी जा सकेगी । इनमें कायस्थ समाज के कुछ व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को भी शामिल किया है यह कोई भी व्यक्ति क्यूआर कोड  स्केन कर सीधे डिजिटल दान पात्र में दान कर सकेंगें । दानदाताओं को जोड़ने के लिए व्हाट्सप्प पर कायस्थ समज का चैनल बनाया गया है l इस चैनल पर जो भी सदस्य जुड़ता है उसकी जानकारी पूर्णता गुप्त रखी जाती है l जुड़ने वाले किसी भी सदस्य का मोबाइल नम्बर या अन्य जानकारी किसी भी अन्य सदस्य को दिखाई नहीं देगा और न ही कोई सदस्य इसमें व्यवस्थापक की अनुमति के बिना कोई वीडियो फोटो या सन्देश नहीं भेज सकता है l
 

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30 Jan, 2024
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हिंदी साहित्य के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक, प्रसिद्ध कवि, निबंधकार,उपन्यासकार महाकवि कायस्थ कुल गौरव जयशंकर प्रसाद की जयंती पर उन्हें शतशः नमन 

हिंदी साहित्य के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक, प्रसिद्ध कवि, निबंधकार,उपन्यासकार महाकवि कायस्थ कुल गौरव जयशंकर प्रसाद की जयंती पर उन्हें शतशः नमन 

30 जनवरी 1989 को उत्तर प्रदेश के काशी के गोवर्धनसराय में जन्में l कामायनी, आंसू, कानन-कुसुम, प्रेम पथिक, झरना, लहर आदि प्रमुख कृतियों के रचिता आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जयशंकर प्रसाद जी ने तितली, इरावती और कंकाल जैसे उपन्यास व मधुआ, आकाशदीप और पुरस्कार जैसी मशहूर कहानियां भी लिखी आज उनकी जयंती पर कायस्थ समाज वेब पोर्टल टीम और सार्वदेशिक कायस्थ युवा प्रतिनिधि संस्था की और से शत शत अभिनन्दन ...

जयशंकर प्रसाद की जीवनी 

जयशंकर प्रसाद ३० जनवरी १८८९ हिन्दी कवि, नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार तथा निबन्ध-लेखक थे। वे हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उन्होंने हिन्दी काव्य में एक तरह से छायावाद की स्थापना की जिसके द्वारा खड़ीबोली के काव्य में न केवल कामनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई, बल्कि जीवन के सूक्ष्म एवं व्यापक आयामों के चित्रण की शक्ति भी संचित हुई और कामायनी तक पहुँचकर वह काव्य प्रेरक शक्तिकाव्य के रूप में भी प्रतिष्ठित हो गया। बाद के, प्रगतिशील एवं नयी कविता दोनों धाराओं के, प्रमुख आलोचकों ने उसकी इस शक्तिमत्ता को स्वीकृति दी। इसका एक अतिरिक्त प्रभाव यह भी हुआ कि 'खड़ीबोली' हिन्दी काव्य की निर्विवाद सिद्ध भाषा बन गयी।

जयशंकर प्रसाद का जन्म माघ शुक्ल दशमी, संवत्‌ १९४६ वि॰ तदनुसार 30 जनवरी 1890 ई॰ दिन-गुरुवार) को काशी के गोवर्धनसराय में हुआ। इनके पितामह बाबू शिवरतन साहू दान देने में प्रसिद्ध थे और इनके पिता बाबू देवीप्रसाद जी भी दान देने के साथ-साथ कलाकारों का आदर करने के लिये विख्यात थे। इनका काशी में बड़ा सम्मान था और काशी की जनता काशीनरेश के बाद 'हर हर महादेव' से बाबू देवीप्रसाद का ही स्वागत करती थी।

प्रसाद जी की प्रारंभिक शिक्षा काशी में क्वींस कालेज में हुई थी, परंतु यह शिक्षा अल्पकालिक थी। छठे दर्जे में वहाँ शिक्षा आरंभ हुई थी और सातवें दर्जे तक ही वे वहाँ पढ़ पाये। उनकी शिक्षा का व्यापक प्रबंध घर पर ही किया गया, जहाँ हिन्दी और संस्कृत का अध्ययन इन्होंने किया। प्रसाद जी के प्रारंभिक शिक्षक श्री मोहिनीलाल गुप्त थे। वे कवि थे और उनका उपनाम 'रसमय सिद्ध' था। शिक्षक के रूप में वे बहुत प्रसिद्ध थे। चेतगंज के प्राचीन दलहट्टा मोहल्ले में उनकी अपनी छोटी सी बाल पाठशाला थी।[3] 'रसमय सिद्ध' जी ने प्रसाद जी को प्रारंभिक शिक्षा दी तथा हिंदी और संस्कृत में अच्छी प्रगति करा दी। प्रसाद जी ने संस्कृत की गहन शिक्षा प्राप्त की थी। उनके निकट संपर्क में रहने वाले तीन सुधी व्यक्तियों के द्वारा तीन संस्कृत अध्यापकों के नाम मिलते हैं। डॉ॰ राजेन्द्रनारायण शर्मा के अनुसार "चेतगंज के तेलियाने की पतली गली में इटावा के एक उद्भट विद्वान रहते थे। संस्कृत-साहित्य के उस दुर्धर्ष मनीषी का नाम था - गोपाल बाबा। प्रसाद जी को संस्कृत साहित्य पढ़ाने के लिए उन्हें ही चुना गया।" विनोदशंकर व्यास के अनुसार "श्री दीनबन्धु ब्रह्मचारी उन्हें संस्कृत और उपनिषद् पढ़ाते थे।" राय कृष्णदास के अनुसार रसमय सिद्ध से शिक्षा पाने के बाद "प्रसाद जी ने एक विद्वान् हरिहर महाराज से और संस्कृत पढ़ी। वे लहुराबीर मुहल्ले के आस-पास रहते थे। प्रसाद जी का संस्कृत प्रेम बढ़ता गया। उन्होंने स्वयमेव उसका बहुत अच्छा अभ्यास कर लिया था। बाद में वे स्वाध्याय से ही वैदिक संस्कृत में भी निष्णात हो गये थे।" बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत-अध्यापक महामहोपाध्याय पं॰ देवीप्रसाद शुक्ल कवि-चक्रवर्ती को प्रसाद जी का काव्यगुरु माना जाता है।

घर के वातावरण के कारण साहित्य और कला के प्रति उनमें प्रारंभ से ही रुचि थी और कहा जाता है कि नौ वर्ष की उम्र में ही उन्होंने 'कलाधर' के नाम से व्रजभाषा में एक सवैया लिखकर 'रसमय सिद्ध' को दिखाया था। उन्होंने वेद, इतिहास, पुराण तथा साहित्यशास्त्र का अत्यंत गंभीर अध्ययन किया था। वे बाग-बगीचे तथा भोजन बनाने के शौकीन थे और शतरंज के खिलाड़ी भी थे। वे नियमित व्यायाम करनेवाले, सात्विक खान-पान एवं गंभीर प्रकृति के व्यक्ति थे।[9] इनकी पहली कविता ‘सावक पंचक’ सन १९०६ में भारतेंदु पत्रिका में कलाधर नाम से ही प्रकाशित हुई थी। वे नियमित रूप से गीता-पाठ करते थे, परंतु वे संस्कृत में गीता के पाठ मात्र को पर्याप्त न मानकर गीता के आशय को जीवन में धारण करना आवश्यक मानते थे।

प्रसाद जी का पहला विवाह 1909 ई॰ में विंध्यवासिनी देवी के साथ हुआ था। उनकी पत्नी को क्षय रोग था। सन् 1916 ई॰ में विंध्यवासिनी देवी का निधन हो गया। उसी समय से उनके घर में क्षय रोग के कीटाणु प्रवेश कर गये थे। सन् 1917 ई॰ में सरस्वती देवी के साथ उनका दूसरा विवाह हुआ। दूसरा विवाह होने पर उनकी पहली पत्नी की साड़ियों आदि को उनकी द्वितीय पत्नी ने भी पहना और कुछ समय बाद उन्हें भी क्षय रोग हो गया और दो ही वर्ष बाद 1919 ई॰ में उनका देहांत भी प्रसूतावस्था में क्षय रोग से ही हुआ। इसके बाद पुनः घर बसाने की उनकी लालसा नहीं थी, परंतु अनेक लोगों के समझाने और सबसे अधिक अपनी भाभी के प्रतिदिन के शोकमय जीवन को सुलझाने के लिए उन्हें बाध्य होकर विवाह करना पड़ा। सन् १९१९ ई॰ में उनका तीसरा विवाह कमला देवी के साथ हुआ। उनका एकमात्र पुत्र रत्नशंकर प्रसाद तीसरी पत्नी की ही संतान थे, जिनका जन्म सन् १९२२ ई॰ में हुआ था। स्वयं प्रसाद जी भी जीवन के अंत में क्षय रोग से ग्रस्त हो गये थे और एलोपैथिक के अतिरिक्त लंबे समय तक होमियोपैथिक तथा कुछ समय आयुर्वेदिक चिकित्सा का सहारा लेने के बावजूद इस रोग से मुक्त न हो सके और अंततः इसी रोग से १५ नवम्बर १९३७ (दिन-सोमवार) को प्रातःकाल (उम्र ४७) उनका देहान्त काशी में हुआ। सुप्रसिद्ध युवा कवि गोलेन्द्र पटेल ने अपनी कविता ‘कठौती और करघा’ में काशी के संदर्भ में कहा है कि
“रैदास की कठौती और कबीर के करघे के बीच/ तुलसी का दुख एक सेतु की तरह है/ जिस पर से गुज़रने पर/ हमें प्रसाद, प्रेमचंद व धूमिल आदि के दर्शन होते हैं!

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28 May, 2023
Magazine

KAYASTHA QUIZ ? कायस्थ समाज प्रश्नोत्तरी श्रृंखला

क्या आप जानते है ?

1784-1785 में जागीरदार दूल्हे राय श्रीवास्तव द्वारा बनवाया गया 240 वर्ष पुरानी दुर्लभ प्रतिमा वाला श्री चित्रगुप्त मंदिर भारत में कहा स्थित है ?

जयपुर, राजस्थान

पटना, बिहार

कांचीपुरम, तमिलनाडू

हैदराबाद, तेलंगाना 

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23 May, 2023
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स्वामी विवेकानन्द का जीवन परिचय

स्वामी विवेकानन्द (जन्म: १२ जनवरी,१८६३ – मृत्यु: ४ जुलाई,१९०२) वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् १८९३ में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का वेदान्त अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुआत ” मेरे अमेरिकी भाइयों एवं बहनों ” के साथ करने के लिए जाना जाता है । उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था।

स्वामी विवेकानंद का जीवनवृत्त

 

स्वामी विवेकानन्द का जन्म १२ जनवरी सन्‌ १८६3 को कलकत्ता में हुआ था। इनका बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ था। इनके पिता श्री विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे। उनके पिता पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। वे अपने पुत्र नरेन्द्र को भी अँग्रेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढर्रे पर चलाना चाहते थे। इनकी माता श्रीमती भुवनेश्वरी देवीजी धार्मिक विचारों की महिला थीं। उनका अधिकांश समय भगवान् शिव की पूजा-अर्चना में व्यतीत होता था। नरेन्द्र की बुद्धि बचपन से बड़ी तीव्र थी और परमात्मा को पाने की लालसा भी प्रबल थी। इस हेतु वे पहले ‘ब्रह्म समाज’ में गये किन्तु वहाँ उनके चित्त को सन्तोष नहीं हुआ। वे वेदान्त और योग को पश्चिम संस्कृति में प्रचलित करने के लिए महत्वपूर्ण योगदान देना चाहते थे।

 

दैवयोग से विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई। घर का भार नरेन्द्र पर आ पड़ा। घर की दशा बहुत खराब थी। अत्यन्त दर्रिद्रता में भी नरेन्द्र बड़े अतिथि-सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते, स्वयं बाहर वर्षा में रात भर भीगते-ठिठुरते पड़े रहते और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते।

 

स्वामी विवेकानन्द अपना जीवन अपने गुरुदेव श्रीरामकृष्ण को समर्पित कर चुके थे। गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत की चिंता किये बिना, स्वयं के भोजन की चिंता किये बिना वे गुरु-सेवा में सतत संलग्न रहे। गुरुदेव का शरीर अत्यन्त रुग्ण हो गया था।

 

विवेकानंद बड़े स्‍वपन्‍द्रष्‍टा थे। उन्‍होंने एक नये समाज की कल्‍पना की थी, ऐसा समाज जिसमें धर्म या जाति के आधार पर मनुष्‍य-मनुष्‍य में कोई भेद नहीं रहे। उन्‍होंने वेदांत के सिद्धांतों को इसी रूप में रखा। अध्‍यात्‍मवाद बनाम भौतिकवाद के विवाद में पड़े बिना भी यह कहा जा सकता है कि समता के सिद्धांत की जो आधार विवेकानन्‍द ने दिया, उससे सबल बौदि्धक आधार शायद ही ढूंढा जा सके। विवेकानन्‍द को युवकों से बड़ी आशाएं थीं। आज के युवकों के लिए ही इस ओजस्‍वी संन्‍यासी का यह जीवन-वृत्‍त लेखक उनके समकालीन समाज एवं ऐतिहासिक पृ‍ष्‍ठभूमि के संदर्भ में उपस्थित करने का प्रयत्‍न किया है यह भी प्रयास रहा है कि इसमें विवेकानंद के सामाजिक दर्शन एव उनके मानवीय रूप का पूरा प्रकाश पड़े।

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23 May, 2023
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श्री लाल बहादुर शास्त्री

श्री लाल बहादुर शास्त्री

श्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी से सात मील दूर एक छोटे से रेलवे टाउन, मुगलसराय में हुआ था। उनके पिता एक स्कूल शिक्षक थे। जब लाल बहादुर शास्त्री केवल डेढ़ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। उनकी माँ अपने तीनों बच्चों के साथ अपने पिता के घर जाकर बस गईं।

उस छोटे-से शहर में लाल बहादुर की स्कूली शिक्षा कुछ खास नहीं रही लेकिन गरीबी की मार पड़ने के बावजूद उनका बचपन पर्याप्त रूप से खुशहाल बीता।

उन्हें वाराणसी में चाचा के साथ रहने के लिए भेज दिया गया था ताकि वे उच्च विद्यालय की शिक्षा प्राप्त कर सकें। घर पर सब उन्हें नन्हे के नाम से पुकारते थे। वे कई मील की दूरी नंगे पांव से ही तय कर विद्यालय जाते थे, यहाँ तक की भीषण गर्मी में जब सड़कें अत्यधिक गर्म हुआ करती थीं तब भी उन्हें ऐसे ही जाना पड़ता था।

बड़े होने के साथ-ही लाल बहादुर शास्त्री विदेशी दासता से आजादी के लिए देश के संघर्ष में अधिक रुचि रखने लगे। वे भारत में ब्रिटिश शासन का समर्थन कर रहे भारतीय राजाओं की महात्मा गांधी द्वारा की गई निंदा से अत्यंत प्रभावित हुए। लाल बहादुर शास्त्री जब केवल ग्यारह वर्ष के थे तब से ही उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कुछ करने का मन बना लिया था।

गांधी जी ने असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए अपने देशवासियों से आह्वान किया था, इस समय लाल बहादुर शास्त्री केवल सोलह वर्ष के थे। उन्होंने महात्मा गांधी के इस आह्वान पर अपनी पढ़ाई छोड़ देने का निर्णय कर लिया था। उनके इस निर्णय ने उनकी मां की उम्मीदें तोड़ दीं। उनके परिवार ने उनके इस निर्णय को गलत बताते हुए उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वे इसमें असफल रहे। लाल बहादुर ने अपना मन बना लिया था। उनके सभी करीबी लोगों को यह पता था कि एक बार मन बना लेने के बाद वे अपना निर्णय कभी नहीं बदलेंगें क्योंकि बाहर से विनम्र दिखने वाले लाल बहादुर अन्दर से चट्टान की तरह दृढ़ हैं।

लाल बहादुर शास्त्री ब्रिटिश शासन की अवज्ञा में स्थापित किये गए कई राष्ट्रीय संस्थानों में से एक वाराणसी के काशी विद्या पीठ में शामिल हुए। यहाँ वे महान विद्वानों एवं देश के राष्ट्रवादियों के प्रभाव में आए। विद्या पीठ द्वारा उन्हें प्रदत्त स्नातक की डिग्री का नाम ‘शास्त्री’ था लेकिन लोगों के दिमाग में यह उनके नाम के एक भाग के रूप में बस गया।

1927 में उनकी शादी हो गई। उनकी पत्नी ललिता देवी मिर्जापुर से थीं जो उनके अपने शहर के पास ही था। उनकी शादी सभी तरह से पारंपरिक थी। दहेज के नाम पर एक चरखा एवं हाथ से बुने हुए कुछ मीटर कपड़े थे। वे दहेज के रूप में इससे ज्यादा कुछ और नहीं चाहते थे।

1930 में महात्मा गांधी ने नमक कानून को तोड़ते हुए दांडी यात्रा की। इस प्रतीकात्मक सन्देश ने पूरे देश में एक तरह की क्रांति ला दी। लाल बहादुर शास्त्री विह्वल ऊर्जा के साथ स्वतंत्रता के इस संघर्ष में शामिल हो गए। उन्होंने कई विद्रोही अभियानों का नेतृत्व किया एवं कुल सात वर्षों तक ब्रिटिश जेलों में रहे। आजादी के इस संघर्ष ने उन्हें पूर्णतः परिपक्व बना दिया।

आजादी के बाद जब कांग्रेस सत्ता में आई, उससे पहले ही राष्ट्रीय संग्राम के नेता विनीत एवं नम्र लाल बहादुर शास्त्री के महत्व को समझ चुके थे। 1946 में जब कांग्रेस सरकार का गठन हुआ तो इस ‘छोटे से डायनमो’ को देश के शासन में रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए कहा गया। उन्हें अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश का संसदीय सचिव नियुक्त किया गया और जल्द ही वे गृह मंत्री के पद पर भी आसीन हुए। कड़ी मेहनत करने की उनकी क्षमता एवं उनकी दक्षता उत्तर प्रदेश में एक लोकोक्ति बन गई। वे 1951 में नई दिल्ली आ गए एवं केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई विभागों का प्रभार संभाला – रेल मंत्री; परिवहन एवं संचार मंत्री; वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री; गृह मंत्री एवं नेहरू जी की बीमारी के दौरान बिना विभाग के मंत्री रहे। उनकी प्रतिष्ठा लगातार बढ़ रही थी। एक रेल दुर्घटना, जिसमें कई लोग मारे गए थे, के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। देश एवं संसद ने उनके इस अभूतपूर्व पहल को काफी सराहा। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इस घटना पर संसद में बोलते हुए लाल बहादुर शास्त्री की ईमानदारी एवं उच्च आदर्शों की काफी तारीफ की। उन्होंने कहा कि उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया है कि जो कुछ हुआ वे इसके लिए जिम्मेदार हैं बल्कि इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी। रेल दुर्घटना पर लंबी बहस का जवाब देते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने कहा; “शायद मेरे लंबाई में छोटे होने एवं नम्र होने के कारण लोगों को लगता है कि मैं बहुत दृढ नहीं हो पा रहा हूँ। यद्यपि शारीरिक रूप से में मैं मजबूत नहीं है लेकिन मुझे लगता है कि मैं आंतरिक रूप से इतना कमजोर भी नहीं हूँ।”

अपने मंत्रालय के कामकाज के दौरान भी वे कांग्रेस पार्टी से संबंधित मामलों को देखते रहे एवं उसमें अपना भरपूर योगदान दिया। 1952, 1957 एवं 1962 के आम चुनावों में पार्टी की निर्णायक एवं जबर्दस्त सफलता में उनकी सांगठनिक प्रतिभा एवं चीजों को नजदीक से परखने की उनकी अद्भुत क्षमता का बड़ा योगदान था।

तीस से अधिक वर्षों तक अपनी समर्पित सेवा के दौरान लाल बहादुर शास्त्री अपनी उदात्त निष्ठा एवं क्षमता के लिए लोगों के बीच प्रसिद्ध हो गए। विनम्र, दृढ, सहिष्णु एवं जबर्दस्त आंतरिक शक्ति वाले शास्त्री जी लोगों के बीच ऐसे व्यक्ति बनकर उभरे जिन्होंने लोगों की भावनाओं को समझा। वे दूरदर्शी थे जो देश को प्रगति के मार्ग पर लेकर आये। लाल बहादुर शास्त्री महात्मा गांधी के राजनीतिक शिक्षाओं से अत्यंत प्रभावित थे। अपने गुरु महात्मा गाँधी के ही लहजे में एक बार उन्होंने कहा था – “मेहनत प्रार्थना करने के समान है।” महात्मा गांधी के समान विचार रखने वाले लाल बहादुर शास्त्री भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठ पहचान हैं।

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23 May, 2023
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KAYASTHA QUIZ ? कायस्थ समाज प्रश्नोत्तरी श्रृंखला

क्या आप जानते है ?

राजा किशन प्रसाद द्वारा बनाया गया मंदिर यहाँ दर्शन मात्र से अविवाहितों का विवाह जल्द हो जाता है श्री चित्रगुप्त देवालायम मंदिर भारत में कहा स्थित है ?

a जयपुर, राजस्थान

b पटना, बिहार

c कांचीपुरम, तमिलनाडू

d हैदराबाद, तेलंगाना 

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