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फिल्म समीक्षा: Batwara 1947 — दर्द, उम्मीद और इंसानियत की एक अमर दास्तान
फिल्म समीक्षा: batwara 1947 — दर्द, उम्मीद और इंसानियत की एक अमर दास्तान
भारत की आज़ादी को भले ही 79 साल बीत चुके हों, लेकिन 14 अगस्त 1947 की वो काली तारीख आज भी इतिहास के पन्नों में नहीं, बल्कि करोड़ों दिलों में एक नासूर बनकर ज़िंदा है। बंटवारे का वो खौफनाक दौर… जहाँ रातों-रात सरहदें खींच दी गईं, घर-आंगन छूट गए और न जाने कितने परिवार नफरत की आग में झुलसकर बिखर गए। लेकिन उस भीषण अंधकार और हिंसा के बीच भी इंसानियत के कुछ ऐसे दीये जले, जिन्होंने धर्म की दीवारों को ध्वस्त कर दिया।
राजकुमार संतोषी की ‘batwara 1947’ (असगर वजाहत के प्रसिद्ध नाटक ‘जिस लाहौर नई देख्या, ओ जम्याई नई’ से प्रेरित) हमें उसी दौर की एक ऐसी हवेली में ले जाती है, जहाँ बाहर पूरा शहर जल रहा है, और अंदर इंसानियत तथा नफरत के बीच एक खामोश जंग छिड़ी है।
कहानी का ताना-बाना
लाहौर पहुँचा विस्थापित मुस्लिम परिवार, सिकंदर मिर्ज़ा (सनी देओल), उसकी पत्नी हामिदा (प्रीति ज़िंटा) और उनका परिवार एक बड़ी हवेली में अपना नया आशियाना तलाशता है। लेकिन उस हवेली में पहले से मौजूद है एक बूढ़ी हिंदू महिला… दुर्गावती किशनपाल देवी यानी ‘माई’।
बंटवारे की आग में अपना परिवार खो चुकी माई उस हवेली को छोड़ने से साफ इंकार कर देती है। उसे आज भी यकीन है कि उसका बिछड़ा बेटा रतन एक दिन ज़रूर लौटेगा।
यहीं से शुरू होता है फिल्म का असली वैचारिक और भावनात्मक संघर्ष। एक तरफ अपना अतीत खो चुका विस्थापित परिवार है, तो दूसरी तरफ अपने आखिरी सहारे और यादों को सीने से लगाए बैठी एक बेबस माँ।
इस कहानी में मोड़ तब आता है जब अभिमन्यु सिंह (याकूब पहलवान) की एंट्री होती है। याकूब सिर्फ एक विलेन नहीं, बल्कि उस कटरपंथी मानसिकता का प्रतीक है जो धर्म और डर का इस्तेमाल अपने स्वार्थ के लिए करती है। उसकी गिद्ध दृष्टि उस हवेली पर है और वह माई को वहां से बेदखल करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। अब सिकंदर के सामने सबसे बड़ा धर्मसंकट है क्या वह सिर्फ अपने परिवार को बचाए, या उस गैर-धर्मी बूढ़ी माँ का ढाल बने?
अभिनय और किरदार: दिल छू लेने वाला प्रदर्शन
सनी देओल (सिकंदर मिर्ज़ा): अगर आप 'गदर' वाले एक्शन की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो यह फिल्म आपको हैरान कर देगी। यहाँ सनी देओल का सबसे बड़ा हथियार उनका 'ढाई किलो का हाथ' नहीं, बल्कि उनका संवेदनशील दिल है। उनका किरदार संयम, गरिमा और इंसानियत की मिसाल पेश करता है।
शबाना आज़मी (माई): शबाना जी इस फिल्म की आत्मा हैं। उनकी आँखों में तैरता बेटे का इंतज़ार, आवाज़ की बेबसी और चेहरे पर अटूट विश्वास... कुछ दृश्यों में तो उनकी खामोशी ही सबसे बड़ा संवाद बन जाती है। अंत तक आते-आते माई का दर्द दर्शक के दिल में गहराई तक उतर जाता है।
प्रीति ज़िंटा (हामिदा): लंबे समय बाद बड़े पर्दे पर वापसी कर रहीं प्रीति ज़िंटा ने हामिदा के किरदार में बेहतरीन भावनात्मक गहराई भरी है। सिकंदर के साथ उनकी केमिस्ट्री और बिखरते परिवार को संभालने का उनका अभिनय सराहनीय है।
अभिमन्यु सिंह (याकूब): उन्होंने पर्दे पर खौफ और नफरत के रंग को बेहद शिद्दत से उभारा है। उनका अभिनय कटरपंथ के वीभत्स चेहरे को बखूबी दिखाता है।
अली फ़ज़ल (हबीब अनवर): एक शायर और शरणार्थी के रूप में सीमित स्क्रीन टाइम के बावजूद अली फ़ज़ल अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं। हालाँकि, इस बेहतरीन किरदार को थोड़ा और स्पेस दिया जा सकता था।
करण देओल (जावेद): सिकंदर के बेटे के रूप में करण का किरदार महत्वपूर्ण है, लेकिन अभिनय और भावनात्मक अभिव्यक्ति के स्तर पर उनमें अभी काफी सुधार की गुंजाइश दिखती है।
तकनीकी पक्ष और निर्देशन
सिनेमैटोग्राफी: संतोष सिवन का कैमरा 1947 के दौर, तंग गलियों और हवेली के एकांत को बेहद प्रामाणिक और जीवंत रूप में पर्दे पर उतारता है।
संगीत: ए.आर. रहमान का बैकग्राउंड स्कोर दृश्यों के भाव को उभारता है, यद्यपि फिल्म का संगीत शायद इसकी सबसे मजबूत कड़ी नहीं बन पाया।
कमी: फिल्म की गति कहीं-कहीं थोड़ी धीमी महसूस होती है और कुछ पार्श्व किरदारों को थोड़ा और विस्तार दिया जा सकता था।
तमाम छोटी-मोटी कमियों के बावजूद, 'batwara 1947' अपने मुख्य संदेश को पूरी मजबूती से पहुँचाने में सफल रहती है। यह फिल्म किसी एक धर्म को कटघरे में खड़ा नहीं करती, बल्कि एक सीधा और स्पष्ट संदेश देती है "कोई धर्म बुरा नहीं होता, इंसान बुरे या अच्छे होते हैं।"
1947 में एक सीमा ज़मीन पर खींची गई थी... लेकिन यह फिल्म हमसे सवाल पूछती है कि क्या वह सीमा अब हमारे दिलों में भी खिंच चुकी है?
जब आप थिएटर से बाहर निकलते हैं, तो आपके दिमाग में कोई एक्शन सीन नहीं, बल्कि 'माई' का वो निश्छल चेहरा रह जाता है जिसने सब कुछ खोकर भी इंसानियत पर से अपना भरोसा नहीं खोया।
यह सिर्फ बंटवारे का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि इंसान को फिर से 'इंसान' की नज़र से देखने की एक गंभीर और खूबसूरत कोशिश है।
मेरी रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐☆ (4/5)
समीक्षक:
वेद आशीष श्रीवास्तव
(राष्ट्रीय युवा अध्यक्ष - अखिल भारतीय कायस्थ महासभा)
स्वतंत्र भारत, अधूरा संकल्प: क्या हम सचमुच आज़ाद हैं?
79 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भी एक यक्ष प्रश्न देश के हर चेतनाशील नागरिक के सामने खड़ा है, क्या हम सचमुच आज़ाद हो चुके हैं?
अंग्रेज़ों की हुकूमत तो ख़त्म हो गई, लेकिन सामाजिक भेदभाव, भ्रष्टाचार, बेकारी और खोखली व्यवस्था की बेड़ियाँ आज भी हमारे पैरों में जकड़ी हुई हैं।
15 अगस्त 1947 को भारत ने स्वाधीनता का एक नया सूर्य देखा। इन सात दशकों से अधिक की यात्रा में हमने विज्ञान, अंतरिक्ष तकनीक, रक्षा, शिक्षा और अर्थव्यवस्था के मंच पर वैश्विक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। परंतु, "स्वतंत्रता" केवल एक विदेशी हुकूमत के चले जाने या झंडा फहरा देने का नाम नहीं है।
सच्ची आज़ादी उस दिन सिद्ध होगी, जब देश के अंतिम छोर पर खड़े नागरिक को भी समान अवसर, सम्मान, न्याय और निष्पक्ष अधिकार का प्रत्यक्ष अनुभव होगा।
आज हमारी लड़ाई किसी व्यक्ति, वर्ग या समुदाय के विरुद्ध नहीं है—हमारी लड़ाई उस समूची व्यवस्था के ख़िलाफ़ है जो योग्यता, कठोर परिश्रम और अवसरों के बीच दीवार बनकर खड़ी है।
हमें किससे चाहिए वास्तविक आज़ादी?
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जाति और धर्म के संकीर्ण दायरों से आज़ादी:
किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी जाति या धर्म से नहीं, बल्कि उसके कर्म, चरित्र, योग्यता और सामर्थ्य के आधार पर होना चाहिए।
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अवसरों की असमानता और पक्षपात से आज़ादी:
वंचितों और पिछड़ों को संबल देने वाली नीतियाँ अत्यंत आवश्यक हैं, लेकिन इन नीतियों का क्रियान्वयन पूर्णतः पारदर्शी, तर्कसंगत और वास्तविक ज़रूरतों पर आधारित होना चाहिए।
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दोहरी और अस्पष्ट नीतियों के जाल से आज़ादी:
कानून का शासन सबके लिए एक समान हो। किसी भी नीतिगत निर्णय में नागरिक की सर्वोच्च पहचान केवल और केवल 'भारतीय' होनी चाहिए।
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दीमक की तरह चाटते भ्रष्टाचार से आज़ादी:
जब तक सिफ़ारिश, रिश्वतखोरी और लालफीताशाही का बोलबाला रहेगा, तब तक एक साधारण और ईमानदार नागरिक अपने मूलभूत अधिकारों के लिए घिसटता रहेगा।
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योग्य युवाओं की बेरोज़गारी से आज़ादी:
देश के युवा हाथों में केवल कागज़ी डिग्रियाँ नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाले सम्मानजनक रोज़गार के अवसर होने चाहिए।
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आर्थिक विषमता और लाचारी से आज़ादी:
आज़ादी का वास्तविक अर्थ तब सार्थक होगा, जब किसी भी निर्धन परिवार के प्रतिभावान बच्चे को केवल आर्थिक तंगी के कारण अपने सपनों की बलि न देनी पड़े।
आरक्षण पर नारों से परे, एक तथ्यपूर्ण राष्ट्र-मंथन
आरक्षण भारत के सामाजिक इतिहास, न्याय और संवैधानिक चेतना से जुड़ा एक अत्यंत संवेदनशील एवं गंभीर विषय है। इसलिए इस पर सतही राजनीति और नारेबाजी के बजाय तथ्यों, सामाजिक-आर्थिक धरातल, वास्तविक वंचना और योग्यता के सम्मान के सिद्धांतों पर एक राष्ट्रव्यापी सार्थक बहस होनी चाहिए।
हमारा उद्देश्य किसी का अधिकार छीनना नहीं, बल्कि एक ऐसी निष्पक्ष व्यवस्था का निर्माण करना है जहाँ हर पात्र, योग्य और ज़रूरतमंद व्यक्ति को बिना किसी बाधा के आगे बढ़ने का समान अवसर मिले।
स्वाधीनता की अगली क्रांति: हमारा संकल्प
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हमने गोरों को देश से बाहर निकाला,
अब हमें भ्रष्टाचार को व्यवस्था से बाहर फेंकना है!
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हमने राजनीतिक स्वाधीनता हासिल की,
अब हमें सामाजिक न्याय, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोज़गार की वास्तविक स्वतंत्रता अर्जित करनी है!
आइए, इस स्वतंत्रता दिवस पर यह पावन संकल्प लें, हम किसी जाति या धर्म के विरोध में नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होंगे। हम किसी के अधिकारों के विरोधी नहीं, बल्कि हर भारतीय के समान अवसरों के मुखर समर्थक बनेंगे।
क्योंकि तिरंगे की शान तभी अक्षुण्ण रहेगी, जब उसके साए में खड़ा हर भारतीय खुद को पूर्णतः सुरक्षित, समान और गौरवान्वित महसूस करेगा।
जय हिंद! | वंदे मातरम्!
कायस्थ गौरव, अमर शहीद खुदीराम बोस के शहादत दिवस पर कोटि-कोटि नमन
11 अगस्त भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का वह दिन है, जब भारत माता के एक नन्हे सपूत ने अपने प्राणों की आहुति देकर देशभक्ति, साहस और बलिदान की ऐसी अमिट गाथा लिखी, जिसे आने वाली पीढ़ियां सदैव स्मरण करती रहेंगी।
अमर शहीद खुदीराम बोस का नाम भारतीय इतिहास में अदम्य साहस, निर्भीकता और राष्ट्रप्रेम का प्रतीक है। मात्र 18 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने जिस साहस के साथ अंग्रेजी हुकूमत का सामना किया और हंसते-हंसते फांसी के फंदे को अपने गले लगाया, वह संसार के इतिहास में विरल उदाहरण है।
3 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के बहुवैनी गांव में जन्मे खुदीराम बोस ने बचपन से ही देश की गुलामी की पीड़ा को महसूस किया। किशोरावस्था में ही उनके मन में राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना इतनी प्रबल हो गई कि उन्होंने अपना जीवन भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया। वे क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने लगे।
वर्ष 1908 में अंग्रेजी शासन के अत्याचारी अधिकारी और जज डगलस किंग्सफोर्ड को दंडित करने का दायित्व खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी को सौंपा गया। 30 अप्रैल 1908 को मुजफ्फरपुर में किंग्सफोर्ड की गाड़ी समझकर एक गाड़ी पर बम फेंका गया। दुर्भाग्यवश उस गाड़ी में किंग्सफोर्ड नहीं थे और दो ब्रिटिश महिलाओं की मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद अंग्रेजी शासन ने खुदीराम बोस की तलाश तेज कर दी।
वैनी रेलवे स्टेशन के निकट उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उस समय उनकी आयु इतनी कम थी कि आज की पीढ़ी के लिए यह कल्पना करना भी कठिन है कि इतनी छोटी उम्र का एक युवक मृत्यु के सामने भी किस प्रकार अडिग रह सकता है। मुकदमे के दौरान उनके चेहरे पर भय नहीं, बल्कि मातृभूमि के प्रति अटूट विश्वास और आत्मविश्वास दिखाई देता था।
11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में खुदीराम बोस को फांसी दी गई। कहा जाता है कि वे अपने अंतिम समय में भी निर्भीक रहे और भारत माता की स्वतंत्रता के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया।
खुदीराम बोस का बलिदान केवल इतिहास की एक घटना नहीं है। यह उस युवा चेतना का प्रतीक है, जो अपने देश, समाज और मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने का साहस रखती है।
आज जब हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, तब हमारा दायित्व है कि हम उन वीरों को केवल जयंती और शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि देकर न भूलें। हमें उनके जीवन, संघर्ष, विचार और बलिदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना होगा। आज के युवाओं को यह बताना होगा कि स्वतंत्रता हमें सहज रूप से प्राप्त नहीं हुई थी, बल्कि इसके पीछे अनगिनत वीरों का त्याग, संघर्ष और रक्त समाहित है।
खुदीराम बोस कायस्थ समाज के गौरव और भारत माता के अमर सपूत हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि देशभक्ति केवल शब्दों में नहीं, बल्कि त्याग, साहस, कर्तव्य और राष्ट्र के प्रति समर्पण में दिखाई देती है।
आइए, आज 11 अगस्त को हम केवल शहीद खुदीराम बोस को श्रद्धांजलि ही न दें, बल्कि उनके जीवन की गाथा को स्वयं पढ़ें, उनके बारे में जानकारी प्राप्त करें और अपने परिवार, मित्रों तथा समाज के युवाओं तक पहुंचाएं।
आज के डिजिटल युग में हमारी एक छोटी सी पहल भी लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। आइए, हम सभी google और विश्वसनीय ऐतिहासिक स्रोतों से शहीद खुदीराम बोस के जीवन और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान के प्रसंग खोजें, उन्हें पढ़ें, समझें और सोशल मीडिया के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं।
हमारी आने वाली पीढ़ी अपने वीरों को जाने, उनके बलिदान पर गर्व करे और यह समझे कि देश की स्वतंत्रता की कीमत क्या थी, यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
आइए संकल्प लें कि शहीदों की गाथाएं केवल इतिहास की पुस्तकों तक सीमित नहीं रहेंगी। हम उन्हें जन-जन तक पहुंचाएंगे, युवाओं को उनके संघर्ष से परिचित कराएंगे और राष्ट्रभक्ति की उस चेतना को जीवित रखेंगे, जिसके लिए खुदीराम बोस जैसे वीरों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
अमर शहीद खुदीराम बोस के अदम्य साहस, अटूट देशभक्ति और महान बलिदान को शत-शत नमन।
भारत माता के अमर सपूत कोटि-कोटि नमन।
वंदे मातरम्।
कर्म, आत्मा और चित्रगुप्त जी के आंकलन का गूढ़ रहस्य
वेद आशीष श्रीवास्तव l सृष्टि का यह गूढ़ नियम है कि जीव के इस धाराधाम पर अवतरित होने से पूर्व ही उसकी नियति का एक सूक्ष्म प्रारूप रच दिया जाता है। जिस क्षण कोई आत्मा नवजात देह को धारण करती है, उस समय आकाशगंगा में ग्रहों और नक्षत्रों की जो विशेष स्थिति होती है, वही उसके प्रारब्ध और भाग्य की रेखाओं का निर्धारण करती है। यह प्रारब्ध मानो वह कोरा पृष्ठ है जिस पर विधाता की अदृश्य कलम द्वारा जीवन की मूलभूत संभावनाओं का आलेख अंकित कर दिया जाता है।
किंतु, मनुष्य का जीवन केवल प्रारब्ध की कठपुतली बनकर बह जाने का नाम नहीं है। विधाता ने जहाँ प्रारब्ध की सीमाएँ तय की हैं, वहीं मनुष्य को ‘कर्म’ की महती स्वाधीनता भी सौंपी है। प्रारब्ध यदि जीवन का मानचित्र है, तो कर्म उस पर तय की जाने वाली यात्रा। मनुष्य अपने पुरुषार्थ, विवेक और आचरण से उस जन्मजात भाग्य की रेखाओं को परिवर्तित करने की अद्वितीय क्षमता रखता है। यही कारण है कि सत्कर्मों से व्यक्ति अपने दुष्प्राप्य भाग्य को भी सौभाग्य में बदल लेता है, जबकि कुकर्मों के निष्फल भार से निर्मित हुआ भाग्य भी धूमिल हो जाता है।
इस संपूर्ण जीवन-चक्र और कर्म-यात्रा का सूक्ष्म अति सूक्ष्म लेखा-जोखा रखने का महादायित्व भगवान चित्रगुप्त के हाथों में निहित है। वे काल के अनंत पन्नों पर मनुष्य की प्रत्येक भावना, विचार और कार्य को निष्पक्षता से अंकित करते हैं। जब आत्मा अपनी भौतिक यात्रा पूर्ण कर, नश्वर शरीर का त्याग करती है और अपने अगले पड़ाव की ओर प्रस्थान करती है, तब भगवान चित्रगुप्त के समक्ष उसके कर्मों का न्यायोचित आकलन होता है।
चित्रगुप्त जी का यह आकलन केवल दंड या पुरस्कार का विधान नहीं, अपितु आत्मा के क्रमिक विकास का एक परम नियम है। कर्मों का यही संचित पुंज यह तय करता है कि आत्मा को अपने भावी भोग के लिए कैसा नया शरीर और वातावरण प्राप्त होगा।
अतः जीवन वास्तव में पूर्व जन्म के प्रारब्ध और वर्तमान के कर्म का एक सुंदर समन्वय है। विधाता की कलम यदि भाग्य लिखती है, तो मनुष्य का कर्म उस भाग्य में नवीन प्राण फूँककर उसका पुनर्लेखन करता है। यही कर्म-सिद्धांत की महानता है, जो मनुष्य को अपने ही भविष्य का वास्तविक शिल्पी बनाती है।
वेद आशीष श्रीवास्तव
राष्ट्रीय युवा अध्यक्ष, अखिल भारतीय कायस्थ महासभा
सरलता, संवेदना और साहित्य-साधना के प्रतीक आचार्य शिवपूजन सहाय: जयंती पर विशेष
आचार्य शिवपूजन सहाय हिन्दी साहित्य के उन अमूल्य स्तंभों में से हैं, जिन्होंने एक कथाकार, औपन्यासिक, निबंधकार, संपादक और पत्रकार के रूप में हिन्दी भाषा और साहित्य की सेवा में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। उनका जन्म 9 अगस्त 1893 को बिहार के शाहाबाद ज़िले (वर्तमान बक्सर) के उनवास गाँव में हुआ था। वर्ष 1912 में आरा नगर के एक हाईस्कूल से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने अपने सामाजिक जीवन का शुभारंभ एक हिन्दी शिक्षक के रूप में किया और यहीं से पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से साहित्यिक जगत में कदम रखा। उनके शुरुआती लेख और कहानियाँ 'शिक्षा', 'लक्ष्मी', 'मनोरंजन' तथा 'पाटलीपुत्र' जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे।
शिवपूजन सहाय जी का योगदान हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में अत्यंत अतुलनीय एवं ऐतिहासिक रहा है। उन्होंने वर्ष 1921-1922 के आसपास आरा से निकलने वाली 'मारवाड़ी सुधार' मासिक पत्रिका के संपादन का दायित्व संभाला। इसके बाद 1923 में वे कोलकाता के प्रसिद्ध 'मतवाला मंडल' से जुड़े तथा 'आदर्श', 'उपन्यास तरंग' और 'समन्वय' जैसे पत्रों का संपादन कार्य किया। 1925 में उन्होंने कुछ समय के लिए 'माधुरी' के संपादकीय विभाग में सेवाएँ दीं और 1930 में सुल्तानगंज-भागलपुर से प्रकाशित 'गंगा' पत्रिका के संपादक मंडल से जुड़े। इसके उपरांत काशी प्रवास के दौरान उन्होंने साहित्यिक पाक्षिक 'जागरण' का संपादन किया। 1934 में उन्होंने लहेरियासराय (दरभंगा) जाकर 'बालक' नामक मासिक पत्र का संपादन संभाला। स्वतंत्रता के बाद वे 'बिहार राष्ट्रभाषा परिषद' के संचालक बने तथा 'बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन' की शोध-समीक्षाप्रधान त्रैमासिक पत्रिका 'साहित्य' के संपादक के रूप में अपनी सेवाएँ प्रदान कीं।
साहित्यिक रचनाओं के क्षेत्र में आचार्य शिवपूजन सहाय की कृतियाँ विषय और विधा दोनों दृष्टि से वैविध्यपूर्ण हैं। उनकी रचना 'बिहार का बिहार' राज्य के भौगोलिक एवं ऐतिहासिक स्वरूप को दर्शाती है, जबकि 'विभूति' उनके द्वारा रचित कहानियों का संग्रह है। वर्ष 1926 में प्रकाशित 'देहाती दुनियाँ' उनकी एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रयोगात्मक चरित्र-प्रधान औपन्यासिक कृति है। इस उपन्यास की पहली पांडुलिपि लखनऊ के दंगे में नष्ट हो गई थी, जिसका उन्हें जीवनभर गहरा दुख रहा। बाद में उन्होंने इसे पुनः लिखा, यद्यपि वे हमेशा मानते थे कि पहली बार लिखी गई बात का प्रभाव कुछ और ही था। इसके अतिरिक्त ग्रामोद्धार से संबंधित विषयों पर उनके लेख 'ग्राम सुधार' तथा 'अन्नपूर्णा के मन्दिर में' पुस्तकों में संग्रहीत हैं। उन्होंने 'दो पड़ी' जैसी हास्यरसात्मक रचना, 'माँ के सपूत' जैसी बालोपयोगी पुस्तक तथा महाभारत के पात्रों पर आधारित 'अर्जुन' और 'भीष्म' जैसी जीवनियाँ भी रचीं। संपादन के क्षेत्र में उनका 'राजेन्द्र अभिनंदन ग्रंथ' विशेष रूप से उल्लेखनीय है। पटना की 'बिहार राष्ट्रभाषा परिषद' ने उनकी समस्त कृतियों को 'शिवपूजन रचनावली' नाम से चार खंडों में प्रकाशित किया है।
हिन्दी गद्य साहित्य में आचार्य शिवपूजन सहाय का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। उनकी भाषा सहज, ओजपूर्ण और लोकरुचि को छूने वाली थी, जिसमें उन्होंने प्रचलित मुहावरों और उर्दू शब्दों का निसंकोच एवं संतुलित प्रयोग किया। कहीं-कहीं वे अलंकारिक एवं अनुप्रासयुक्त भाषा का प्रयोग कर गद्य में पद्य की छटा उत्पन्न कर देते थे, फिर भी उनके गद्य की गंभीरता सदैव बनी रही। 1910 से 1960 तक वे 'आज', 'सन्मार्ग', 'आर्यावर्त' और 'हिमालय' जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में गंभीर एवं विचारोत्तेजक लेख लिखते रहे। वे दैनिक समाचार पत्रों को केवल राजनीतिक चेतना का माध्यम न मानकर साहित्य और भाषा के प्रसार का सशक्त साधन मानते थे। उन्होंने निर्भीकता से संपादकों के अधिकारों की रक्षा और भाषा की शुद्धता का समर्थन किया।
आचार्य शिवपूजन सहाय का संपूर्ण जीवन हिन्दी भाषा की उन्नति और प्रचार-प्रसार की एक अनवरत गाथा है। 'बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन' और 'बिहार राष्ट्रभाषा परिषद' जैसी संस्थाएँ उनकी अक्षय कीर्ति के जीवंत स्मारक हैं। साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान को रेखांकित करते हुए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1960 में 'पद्म भूषण' की उपाधि से सम्मानित किया। हिन्दी साहित्य का यह महान साधक और मूर्धन्य पत्रकार 21 जनवरी 1963 को पटना में इस संसार से विदा हो गया, किंतु अपनी कालजयी रचनाओं और कृतित्व के माध्यम से वे हिन्दी जगत में सदैव अमर रहेंगे।
अंतर्राष्ट्रीय कायस्थ काव्य मंच की संयोजिका, बहुमुखी प्रतिभा की धनी हमारी आदरणीया दीदी डॉ. प्रीती प्रवीण खरे जी को जन्मदिन की अनंत हार्दिक शुभकामनाएं
अंतर्राष्ट्रीय कायस्थ काव्य मंच की संयोजिका, बहुमुखी प्रतिभा की धनी, सहज, सरल, मिलनसार कायस्थ समाज की प्रतिष्ठित लेखिका, साहित्यकार, रेडियो,दूरदर्शन, मंच की ऑडिशन पास (approved anchor) उद्घोषिका,समाजिक कार्यकर्ता एवं प्रवीण ऑप्टिकल्स की प्रॉपराइटर के रूप में उद्यमी महिला हमारी आदरणीया दीदी डॉ. प्रीती प्रवीण खरे जी को अंतर्राष्ट्रीय कायस्थ काव्य मंच, सार्वदेशिक कायस्थ युवा प्रतिनिधि संस्था महिला प्रकोष्ठ एवं कायस्थ समाज वेब पोर्टल की पूरी टीम की ओर से जन्मदिन की अनंत हार्दिक शुभकामनाएं और बहुत-बहुत बधाई
जीवन परिचय : डॉ.प्रीति प्रवीण खरे
डॉ.प्रीति प्रवीण खरे एक साहित्यकार, रेडियो,दूरदर्शन, मंच की ऑडिशन पास (approved anchor) उद्घोषिका,समाजिक कार्यकर्ता एवं प्रवीण ऑप्टिकल्स की प्रॉपराइटर के रूप में उद्यमी महिला (business women) है l इनका जन्म 10 अगस्त 1969, रायपुर छत्तीसगढ़ में हुआ। ये सुप्रसिद्ध रंगकर्मी श्री अवधेश श्रीवास्तव तथा शिक्षिका मंजू श्रीवास्तव की बड़ी बेटी है, इनको बचपन से गृहकार्य में रुचि थी। समय पर ज़िम्मेदारी से कार्य करने का गुण प्रीति को माँ मंजू श्रीवास्तव से मिला। बाल्यावस्था में ही घर परिवार से पठन-पाठन में रुचि जागृत हुई। माँ श्रीमती मंजू श्रीवास्तव शिक्षिका थीं और पिता अवधेश श्रीवास्तव आकाशवाणी, दूरदर्शन के अप्रूव्ड आर्टिस्ट के साथ ही रंगमंच के वरिष्ठ कलाकार थे। साहित्य का बीज बचपन से अंकुरित होना शुरू हुआ। पिता के नक़्शे क़दम पर चलते हुए इन्हें भी अभिनय का शौक़ जगा।अभिनय के साथ ही ये रेडियो पर सजीव उद्घोषणा करने लगी।

‘प्रारंभिक जीवन और शिक्षा’
कला संकाय से स्कूल की पढ़ाई संपूर्ण करने के पश्चात प्रीति ने बैचलर्स डिग्री के एडमिशन के लिए रीजनल कॉलेज ऑफ़ एजूकेशन श्यामला हिल्स भोपाल में रिटन टेस्ट और इंटरव्यू दिया। क़िस्मत से उनका चयन हो गया। चार वर्षीय बी.ए.बी.एड कोर्स वाला यह इस कॉलेज भारत में चार था। केंद्र सरकार के इस कॉलेज में बी.ए. ऑनर्स के साथ बी.एड की डिग्री की पढ़ाई का इंट्रीग्रेटेड कोर्स होता था। हिंदी साहित्य,अंग्रेज़ी साहित्य,इंग्लिश लेंग्वेज,सोशल साइंस,के साथ एजूकेशन विषय भी साथ में पढ़ाया जाता था। हिंदी साहित्य शिक्षक के रूप में सुप्रसिद्ध कवि भगवत रावत जी से पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ। यहाँ से हिंदी विषय में रुझान पैदा हुआ। बी.एड की ट्रेनिंग के दौरान दो महीने नवीन शासकीय हाई स्कूल में ट्रेनिंग करते हुए शिक्षिका बनने का विचार आया। कोर्स कम्प्लीट करने के पश्चात एम.ए हिंदी साहित्य में मास्टर्स करने के लिए दाख़िला लिया। वहाँ सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ.धनंजय वर्मा,प्रभाकर श्रोत्रिय,प्रेम नारायण त्यागी जैसे देश के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों से विद्या अर्जन का सौभाग्य मिला।

‘रेडियो का सफ़र’
हिंदी साहित्य में एम.ए करते हुए,रेडियो से जुड़े कई मित्रों के सहपाठी बनने का सुअवसर मिला। इसी दौरान आकाशवाणी भोपाल में युववाणी कार्यक्रम में कंपीयर हेतु ऑडीशन के लिए आवेदन दिया। सन 1990 में युववाणी कंपीयर हेतु चयन हुआ। यह सजीव प्रसारण का कार्यक्रम है। उस दौरान स्वयं की स्क्रिप्ट लिखते हुए लेखन का बीजारोपण होने लगा। मैं आकाशवाणी के युववाणी में कार्यक्रमों की लाइव प्रस्तुति देने लगी। हिंदी साहित्य में एम.ए करते हुए वरिष्ठ शिक्षकों के सानिध्य में बीज पुष्पित और पल्लवित होने लगा। सन 1992-93 से मैं दूरदर्शन से जुड़ी और वहाँ कार्यक्रमों का संचालन करने लगी।
इस प्रकार प्रीति को साहित्य सृजन और लेखन को गति मिली। और ये बड़ों के लिए कविता लिखने लगी। इसी बीच इन्हें दूरदर्शन भोपाल से बच्चों के कार्यक्रम “उजास” में एंकरिंग का सुअवसर मिला।
‘वैवाहिक जीवन’
सन 1991 में भोपाल के प्रतिष्ठित बिजनेसमैन डॉ.प्रवीण खरे के साथ विवाह हुआ। जिनका उस समय ऑप्टिकल्स का बिजनेस चल रहा था जो आज भी अनवरत चल रहा है । इस दौरान युववाणी कंपेयरिंग का सिलसिला जारी रहा। सन 1992 में बड़े बेटे का जन्म हुआ। बेटे के लालन-पालन के साथ गृहस्थ जीवन चलता रहा। सन 2002 में छोटे बेटे का जन्म हुआ।वर्ष 1992 में दूरदर्शन भोपाल केंद्र की स्थापना भी हुई। प्रीति को कार्यक्रम हेतु आमंत्रित किया गया। इस प्रकार दूरदर्शन भोपाल केंद्र के कार्यक्रमों में एंकरिंग का सिलसिला चल पड़ा।

‘साहित्यिक सफ़र’
युववाणी के साथ ही साहित्यिक सफ़र की शुरुआत हो चुकी थी। दूरदर्शन में बच्चों के कार्यक्रम ‘उजास’ करते हुए बच्चों को कविता,कहानी एवं गीत-संगीत सुनाते-सिखाते मेरा रुझान बालसाहित्य के प्रति हुआ। शुरूआत में छोटी कविता,कहानी लिखी। धीरे-धीरे लेखन ने गति पकड़ी।सन 2002 में छोटे बेटे के जन्म के उपरांत लोरी लिखने के प्रति आकृष्ट हुई।मन में दबी पीएच.डी करने की इच्छा बलवती हुई। पीएच.डी करते हुए मेरा लेखन परवान चढ़ने लगा।
यूँ तो साहित्यिक बीजारोपण बचपन में ही हो चुका था। पिता के नक़्शे क़दम पर चलते हुए मुझे भी अभिनय का शौक़ जगा। मैंने अपने पिता और बहन के साथ नाटक में भी काम किया। हिंदी साहित्य में एम.ए करते हुए वरिष्ठ शिक्षकों के सानिध्य में बीज पुष्पित और पल्लवित होने लगा। मैं बड़ों के लिए भी कविता,कहानी,नाटक शोध आलेख लिखने लगी। मैं कविता,कहानी लिखकर डायरी में रख लेती थी। 2011 में मेरे प्रथम कविता संग्रह “खेल-खेल में” का प्रकाशन हुआ। साहित्य जगत में इसका हृदय से स्वागत हुआ। मेरा हौसला बड़ा। इस बढ़े हुए हौसले के साथ मैं पूरी तरह से साहित्य सृजन की ओर अग्रसर हुई। अब तक बाल साहित्य की 10 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। मैं रेडियो और दूरदर्शन के साहित्यिक कार्यक्रमों में बतौर एंकर प्रस्तुति दे रही हूँ। नाटकों में लोरी और गीत लेखन भी लम्बे समय से करती आ रही हूँ। सन 2017 में प्रकाशित बाल काव्य संग्रह “निंदिया को पंख लगे” मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के “ज़हूर बक्श” कृति पुरस्कार 2018 के लिए चुने जाने के बाद वर्ष 2020 में मुझे म.प्र साहित्य अकादमी के पुरस्कार से अलंकृत किया गया।

‘कार्यानुभव’
क्षेत्रीय शिक्षा संस्था श्यामला हिल्स भोपाल में बी.एड कोर्स में एजुकेशन तथा बैचलर्स डिग्री कोर्स में हिंदी साहित्य पढ़ाने का अनुभव।
द संस्कार वैली आइ.सी.एस.सी स्कूल में हिंदी शिक्षिका के रूप में कार्यरत रही।
‘उपलब्धियाँ’
दूरदर्शन भोपाल केंद्र हेतु शिक्षाप्रद शॉर्ट फ़िल्मों का निर्माण।डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मों का निर्माण एवं स्वर संयोजन। महिला बाल विकास म.प्र शासन द्वारा चेयर पर्सन के रूप में मनोनीत तथा तीन वर्ष का कार्यानुभव। स्कूलों में स्टोरी टेलर के रूप में आमंत्रित।कई संस्थाओं की साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की संयोजिका के रूप में कार्यानुभव।
केंद्र सरकार की ज़ोनल संस्था सांस्कृतिक सम्बंध परिषद भोपाल की उद्घोषिका के रूप में कई कार्यक्रमों का अनुभव।
निर्णायक की भूमिका :-
मैंने विभिन्न राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय साहित्यिक तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों में निर्णायक की भूमिका का बखूबी निर्वहन किया है। इनमें राष्ट्रीय बाल श्री अवार्ड हेतु राज्य स्तरीय चयन, राष्ट्रीय बाल रंग, राष्ट्र भाषा प्रचार समिति द्वारा आयोजित प्रतिभा प्रोत्साहन प्रतियोगिता के अलावा विभिन्न स्थानीय प्रतियोगिताएं,स्कूलों की प्रतियोगितायें उल्लेखनीय हैं।

प्रकाशित पुस्तकें :-
बाल साहित्य -
1-खेल खेल में-प्रकाशन वर्ष-2011
2-चश्मा दीदी का-प्रकाशन वर्ष-2011
3-बच्चों की नज़र-प्रकाशन वर्ष-2012
4 -निंदिया को पंख लगे-प्रकाशन वर्ष-2017
5 -रोचक बाल एकांकी-प्रकाशन वर्ष-2018
6 -सुनें गुनें,बापू को(बाल नाटक संग्रह)-2019
अन्य साहित्य :-
1 -मध्यप्रदेश के दर्शनीय स्थल-प्रकाशन वर्ष-2013
2 -ये भारत रत्न-प्रकाशन वर्ष-2015
3 -पर्व दिवस एवं जयंतियाँ-प्रकाशन वर्ष-2015
4 -त्रिलोचन (विवेचनात्मक 2019
‘सम्मान'
1 भारतीय बाल कल्याण संस्थान (उ.प्र.) द्वारा ’बाल साहित्य साधना सम्मान-2011’
2 म.प्र. राष्ट्र भाषा प्रचार समीति, भोपाल द्वारा ’श्रीमती सतीश बालकृष्ण ओबेराय महिला सम्मान-2011’
3 इण्डो-नेपाल महिला बाल साहित्यकार सम्मेलन एवं सम्मान समारोह खटिमा, उत्तराखण्ड द्वारा ’महिला बाल साहित्य रत्न-2011’
4 हिन्दी लेखिका संघ, भोपाल द्वारा ’रुक्मणि देवी चैधरी स्मृति पुरस्कार-2011’
5 साहित्य क्रांति एवं संस्कार सारथी दिल्ली द्वारा ’अक्षर शिल्पी सम्मान-2013’
6 बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केन्द्र, भोपाल द्वारा ’श्री हरिकृष्ण-वीरनांवाली स्मृति बाल साहित्य सम्मान-2013’
7 हिन्दी लेखिका संघ, भोपाल द्वारा ’सूचनात्मक साहित्य सम्मान-2014’
8 ’राजकुमार जैन राजन फाउण्डेशन’, आकोला चित्तौडगढ़ (राज.) द्वारा ’श्रीमती इंदिरा देवी हींगड़ बाल साहित्य सम्मान-2014’
8 जे.एम.डी पब्लिकेशन, दिल्ली द्वारा साहित्यिक एवं रचनात्मक कार्यों के लिए ’नारी गौरव सम्मान-2015’
9 भारतीय साहित्य संगम, गुडगांव (हरियाणा) द्वारा ’राष्ट्रीय सितारा सम्मान-2016’
10 सामाजिक, साहित्यिक, अध्यात्मिक संस्था ’दृष्टि’, गुना (म.प्र.) द्वारा ’शब्द शिल्पी सम्मान-2016’
11 सीमापुरी टाइम्स,नई दिल्ली द्वारा ’इंडिया एक्सीलेंस अवार्ड्स-2016’
12 सलिला सलुम्बर राजस्थान द्वारा ’बाल साहित्यकार सम्मान-2016’
13 जे.एम.डी पब्लिकेशन, दिल्ली द्वारा ’भारत के प्रतिभाशाली सम्मान-2016’
14 दुष्यंत कुमार पाण्डुलिपि संग्रहालय, भोपाल द्वारा ’डॉ. कन्हैयालाल नंदन सम्मान-2016’
15 अंतर्राष्ट्र्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में सामाजिक एवं साहित्यिक संस्था ’तूलिका’ द्वारा ’नायिका सम्मान-2017’ से सम्मानित
16 अंतर्राष्ट्र्रीय महिला दिवस के अवसर पर सार्वदेशिक कायस्थ प्रतिनिधि संस्था महिला प्रकोष्ठ द्वारा सम्मानित
17 मासिक पत्रिका ’साहित्य समीर दस्तक’, भोपाल द्वारा ’साहित्य गौरव सम्मान’
18 म.प्र. तुलसी साहित्य अकादमी, भोपाल द्वारा ’तुलसी शिखर सम्मान-2017’
19 राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था मंजिल ग्रुप दिल्ली द्वारा ’शतकवीर सम्मान-2017’
20 अखिल भारतीय भाषा साहित्य, भोपाल द्वारा ’समन्वय श्री सम्मान-2017’
21 नागरिक कल्याण समिति, भोपाल द्वारा ’बाल साहित्यकार-कवयित्री सम्मान-2017’
22 ऑल इण्डिया वीमेन क्लब, भोपाल द्वारा ’शाइनिंग स्टार अवाॅर्ड-2017’
23 ’बाल साहित्य’ की काव्य कृति के लिए मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा प्रादेशिक ’जहूर बख़्श पुरस्कार-2017’
24 हिन्दी लेखिका संघ, भोपाल द्वारा ’सुश्री प्रभा बरतरिया सारस्वत पुरस्कार-2018’।
25 महिला काव्य मंच,दिल्ली द्वारा अंतरराष्ट्रीय वार्षिकोत्सव कवयित्री सम्मेलन एवं सम्मान समारोह 2019 में सम्मानित।
26 ‘कला मंदिर’, भोपाल द्वारा ‘योगेन्द्र पवैया स्मृति बालसाहित्य कला रत्न सम्मान-2019’
27 ’साहित्य मण्डल’, श्रीनाथद्वारा, राज. द्वारा ’श्री भगवती प्रसाद देवपुरा बाल साहित्य भूषण सम्मान-2020’
'उपलब्धियाँ'
1 . 14 नवंबर 2013 को राष्ट्रपति भवन में आमंत्रित बाल साहित्यकारों में षामिल।
2 . बाल भवन एवं बाल रंग भोपाल के राष्ट्रीय बाल श्री अवाॅर्ड में निर्णायक मनोनीत।
3 . आनंद पाठ, हिन्दी भाषा भारती, कोलकाता, (पश्चित बंगाल) भाग 4 में बाल कविता ‘पेड़’ सन 2011 के पाठ्यक्रम में शामिल।
4 . स्वलिखित ‘पेड़ पंचायत’ नाटक का सी.बी.एस.इ कक्षा पाँच के हिंदी भाषा पाठ्यक्रम में चयन।
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डॉ. प्रीति प्रवीण खरे
19, सुरुचि नगर, कोटरा सुल्तानाबाद,
भोपाल-462042 (म. प्र.)
पिन-462003
मो.-9424013719
पूनम श्रीवास्तव : सपनों को आकार देने वाली एक प्रेरणादायक उद्यमी
यह कहानी केवल एक सफल उद्यमी की नहीं, बल्कि कायस्थ समाज की उन सभी मातृशक्तियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है, जो अपने भीतर छिपी प्रतिभा को पहचानकर उसे समाज और राष्ट्र निर्माण में लगाना चाहती हैं। यह परिचय है एक ऐसी प्रतिभा का, जिसने अपने हुनर को पहचान बनाकर उसे एक सशक्त संस्था का रूप दिया।
हम बात कर रहे हैं प्रख्यात इंटीरियर डिज़ाइनर पूनम श्रीवास्तव की, जो आज डिज़ाइन क्लाउड इंटीरियर्स की संस्थापक के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं।
पूनम श्रीवास्तव ने यह सिद्ध कर दिखाया कि सीमित संसाधन कभी भी बड़े सपनों की राह नहीं रोक सकते। सीमित बजट में भी उत्कृष्ट, रचनात्मक और प्रभावशाली डिज़ाइन तैयार करना उनकी विशेषता है। मध्यप्रदेश और आसपास के प्रदेशों में वे अग्रणी इंटीरियर डिज़ाइनर्स के रूप में जानी जाती हैं।
गार्डन डिज़ाइन से लेकर रेस्टोरेंट और कमर्शियल स्पेस तक, उनके द्वारा तैयार किए गए अनेक प्रोजेक्ट्स को न केवल सराहना मिली, बल्कि वे पुरस्कार-प्राप्त भी रहे। इंटीरियर डिज़ाइनिंग के प्रति अपने जुनून को दिशा देते हुए उन्होंने insd से डिप्लोमा प्राप्त किया। कोर्स पूर्ण होने से पहले ही उन्हें लाइफस्टाइल इंटीरियर्स जैसी प्रतिष्ठित संस्था में कार्य करने का अवसर मिला।
एक ट्रेनी के रूप में शुरू हुआ उनका सफर जल्द ही इंटीरियर लीड और फिर प्रोजेक्ट मैनेजमेंट तक पहुँचा। मात्र तीन वर्षों में उन्होंने अपनी मेहनत, अनुशासन और प्रतिभा के बल पर कई प्रतिष्ठित सम्मान अर्जित किए, जिनमें प्रमुख हैं
जबलपुर चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री सम्मान
नारी सशक्तिकरण सम्मान
डिज़ाइन क्लाउड इंटीरियर्स :
वर्ष 2017 में, अपने सपनों को उड़ान देते हुए पूनम श्रीवास्तव ने “डिज़ाइन क्लाउड इंटीरियर्स” की स्थापना की। जबलपुर से शुरू हुई यह यात्रा आज एक कुशल, रचनात्मक और समर्पित टीम के रूप में विकसित हो चुकी है। यह संस्था रचनात्मकता, गुणवत्ता और ग्राहक संतुष्टि का प्रतीक बन चुकी है।
नई उड़ान – लिटिल फर्न प्रोजेक्ट :
वर्ष 2024 में पूनम श्रीवास्तव ने अपनी एक और msme फर्म “littlefurn project” की शुरुआत की, जो विशेष रूप से बच्चों के लिए कस्टमाइज़्ड फर्नीचर तैयार करती है। इस पहल के माध्यम से उन्होंने बच्चों की जरूरतों और आराम को ध्यान में रखते हुए अभिनव और सुरक्षित डिज़ाइन प्रस्तुत किए हैं।
अब तक वे कई स्कूलों सहित कई बच्चों के लिए विशेष फर्नीचर तैयार कर चुकी हैं। वर्तमान में उनके प्रोजेक्ट्स जबलपुर, इंदौर, गोवा और रायपुर जैसे शहरों में सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं।
आज डिज़ाइन क्लाउड इंटीरियर्स जबलपुर और इंदौर के साथ-साथ भोपाल में भी अपने कार्य का विस्तार करने जा रही है। यह न केवल पूनम श्रीवास्तव की सफलता का प्रमाण है, बल्कि यह हम सभी के सहयोग से समाज की सामूहिक प्रगति का एक सशक्त उदाहरण भी है।
पूनम श्रीवास्तव की यह यात्रा हर उस महिला के लिए प्रेरणा है, जो अपने सपनों को साकार करना चाहती है। यह कहानी बताती है कि यदि जुनून, मेहनत और आत्मविश्वास हो, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता।
पूनम श्रीवास्तव के बारे में अधिक जानने के लिए आप उनके सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़ सकते है l पेज की लिंक नीचे दी गई है
अखिल भारतीय कायस्थ महासभा का महाअभियान देश के हर बूथ पर बनायेंगें 'कायस्थ दूत', समाज को एकजुट करने और अभियानों को घर-घर पहुंचाने की तैयारी
नई दिल्ली। अखिल भारतीय कायस्थ महासभा संगठन को बूथ स्तर तक सशक्त बनाने तथा समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक महत्वाकांक्षी राष्ट्रव्यापी अभियान प्रारंभ कर रही है । अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के राष्ट्रीय युवा अध्यक्ष वेद आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि इस पहल के अंतर्गत देश के प्रत्येक मतदान केंद्र (बूथ) पर एक "कायस्थ दूत" नियुक्त किया जाएगा। इस योजना को "हर बूथ - एक कायस्थ दूत अभियान" नाम दिया गया है।
वेद आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि प्रत्येक कायस्थ दूत अपने बूथ क्षेत्र के सभी कायस्थ परिवारों से संपर्क स्थापित कर उन्हें कायस्थ समाज की गतिविधियों और अभियानों से जोड़ने का कार्य करेगा। इस अभियान का उद्देश्य समाज की वास्तविक जनसांख्यिकीय स्थिति का आकलन करना, युवाओं और वरिष्ठजनों को एक मंच पर लाना तथा सामाजिक, शैक्षणिक एवं सेवा संबंधी कार्यक्रमों को जमीनी स्तर तक पहुँचाना है।
इन अभियान के अंतर्गत समाज उत्थान से जुड़े विभिन्न अभियानों को सम्मिलित किया है जिसमे
जनगणना में जाति के कॉलम में केवल "कायस्थ" लिखो अभियान
कायस्थ दूत अपने क्षेत्र के प्रत्येक परिवार तक पहुँचकर उन्हें आगामी जनगणना में जाति के कॉलम में केवल "कायस्थ" दर्ज कराने के प्रति जागरूक करेंगे, जिससे समाज की वास्तविक संख्या और भागीदारी राष्ट्रीय स्तर पर दर्ज हो सके।
कायस्थ के-कार्ड अभियान
अखिल भारतीय कायस्थ महासभा द्वारा जारी कायस्थ के-कार्ड एक डिजिटल पहचान पत्र है, जिसमें सदस्य एवं उनके परिवार की मूल सामाजिक, शैक्षणिक और व्यावसायिक जानकारी दर्ज होगी। कायस्थ दूत अधिक से अधिक परिवारों को इस अभियान से जोड़ेंगे।
कायस्थों की चाय चौपाल
समाज में संवाद और आत्मीयता बढ़ाने के लिए प्रत्येक जिला स्तर पर नियमित रूप से "कायस्थों की चाय चौपाल" आयोजित की जाएगी। इस मंच पर समाज के लोग स्थानीय समस्याओं, सामाजिक गतिविधियों और विकास संबंधी विषयों पर खुलकर चर्चा करेंगे।
युवा जोड़ो अभियान
युवाओं को संगठन से जोड़ने और नेतृत्व विकसित करने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है। इसके तहत युवाओं को सोशल मीडिया, तकनीकी प्रबंधन, करियर मार्गदर्शन, रोजगार, स्टार्टअप और सामाजिक कार्यक्रमों के संचालन में सक्रिय भूमिका दी जाएगी।
एक पेड़ भगवान् श्री चित्रगुप्त के नाम
पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक चेतना के समन्वय हेतु प्रत्येक कायस्थ परिवार को भगवान श्री चित्रगुप्त के नाम पर कम से कम एक पौधा लगाने और उसके संरक्षण का संकल्प दिलाया जाएगा।
सहायता एवं सेवा अभियान
आपातकालीन परिस्थितियों में समाज के लोगों को त्वरित सहायता उपलब्ध कराने हेतु रक्तदाताओं, चिकित्सकीय सहयोगकर्ताओं तथा युवा स्वयंसेवकों का एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया जाएगा। इससे जरूरतमंद परिवारों, रोगियों और वरिष्ठ नागरिकों को समय पर सहायता मिल सकेगी।
घर-घर जाकर होगा सामाजिक सर्वेक्षण
राष्ट्रीय युवा अध्यक्ष वेद आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि कायस्थ दूत अपने क्षेत्र की मतदाता सूची के आधार पर कायस्थ परिवारों की पहचान करेंगे। इसके बाद घर-घर संपर्क कर एक विस्तृत सामाजिक सर्वेक्षण फॉर्म भरवाया जाएगा, जिसमें संपर्क विवरण, शैक्षणिक योग्यता, व्यवसाय, रक्त समूह, युवाओं की जानकारी, वरिष्ठ नागरिकों की आवश्यकताएँ तथा सामाजिक सहभागिता से संबंधित विवरण संकलित किए जाएंगे।
संगठनात्मक सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम - डॉ. अनूप श्रीवास्तव
अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनूप श्रीवास्तव (irs) का मानना है कि "हर बूथ - एक कायस्थ दूत" योजना समाज में संगठनात्मक एकता, परस्पर सहयोग और सामाजिक जागरूकता का नया अध्याय लिखेगी। उन्होंने देशभर के प्रबुद्धजनों, युवाओं, महिलाओं और समाजसेवियों से इस अभियान में सक्रिय सहभागिता का आह्वान किया है।
महासभा का विश्वास है कि यह अभियान न केवल समाज को संगठित करेगा, बल्कि शिक्षा, रोजगार, सेवा, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सहयोग के क्षेत्रों में भी नई ऊर्जा प्रदान करेगा।
समाज कल्याण एवं संगठन विस्तार हेतु व्यापक कार्ययोजना का शुभारंभ
यह योजना आप सभी प्रबुद्ध सदस्यों के गहन विचार-विमर्श और प्राप्त प्राथमिक सुझावों के आधार पर तैयार की गई है। जैसे-जैसे इस अभियान के दौरान समाज के अन्य गुणी सदस्यों, प्रबुद्ध जनों और कार्यकर्ताओं से नए सुझाव, विचार और मार्गदर्शन प्राप्त होंगे, उन्हें भी प्राथमिकता के साथ इस योजना में समाहित (add) किया जाएगा।
समाज के समग्र उत्थान, संगठन विस्तार एवं आने वाली पीढ़ी को सशक्त बनाने के उद्देश्य से एक विस्तृत एवं दूरदर्शी कार्ययोजना का शुभारंभ किया गया है। इस योजना में शिक्षा, युवा शक्ति, सामाजिक समन्वय, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राजनीतिक भागीदारी जैसे महत्वपूर्ण आयामों को समाहित किया गया है।
यह कार्य योजना अंतिम नहीं, बल्कि एक प्रगतिशील शुरुआत है।
बाल ज्ञान संस्कार मार्गदर्शन मिशन से होगी नई शुरुआत
इस कार्ययोजना के प्रथम चरण में “बाल ज्ञान संस्कार मार्गदर्शन मिशन” प्रारंभ किया जाएगा, जिसके अंतर्गत चयनित 100 बच्चों को उत्तम शिक्षा, नैतिक मूल्यों, धार्मिक संस्कार और सामाजिक जागरूकता से जोड़ा जाएगा। इस पहल का उद्देश्य बच्चों को प्रारंभिक स्तर से ही सही दिशा और जीवन मूल्यों की शिक्षा प्रदान करना है, जिससे वे भविष्य में समाज के सशक्त स्तंभ बन सकें।
युवा जोड़ो अभियान को मिलेगा नया विस्तार
समाज की युवा शक्ति को एक मंच पर लाने के लिए पूर्व से संचालित “युवा जोड़ो अभियान” को निरंतर और प्रभावी रूप से आगे बढ़ाया जाएगा। इस अभियान के माध्यम से युवाओं को संगठित कर उन्हें सामाजिक, शैक्षणिक एवं राष्ट्रीय गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाने हेतु प्रेरित किया जाएगा।
“हर बूथ - एक कायस्थ दूत” से बढ़ेगी राजनीतिक भागीदारी
राजनीतिक सशक्तीकरण को ध्यान में रखते हुए “हर बूथ - एक कायस्थ दूत” अभियान चलाया जाएगा। इसके तहत प्रत्येक मतदान केंद्र पर एक प्रतिनिधि नियुक्त किया जाएगा, जो मतदाताओं से सीधा संवाद स्थापित कर समाज की भागीदारी को मजबूत करेगा। यह पहल समाज को स्थानीय निकायों एवं राजनीति में प्रभावी उपस्थिति दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगी।
वैवाहिक परिचय मंच से बनेगा पारदर्शी तंत्र
विवाह योग्य युवक-युवतियों के लिए एक सुलभ एवं पारदर्शी “वैवाहिक परिचय मंच” तैयार किया जाएगा। यह मंच ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से संचालित होगा, जिससे समाज के परिवारों को एक विश्वसनीय और संगठित व्यवस्था प्राप्त होगी।
“कायस्थों की चाय चौपाल” बनेगी संवाद का सशक्त माध्यम
स्थानीय स्तर पर संवाद और समस्याओं के समाधान हेतु प्रत्येक माह “कायस्थों की चाय चौपाल” का आयोजन किया जाएगा। इस मंच पर सदस्य अपने विचार, सुझाव और समस्याएं साझा करेंगे। स्थानीय स्तर से प्राप्त सुझावों को राष्ट्रीय कार्यकारिणी तक पहुंचाकर उनके समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।
धार्मिक एवं सांस्कृतिक पुनर्जागरण अभियान को मिलेगा बल
“घर-घर चित्रगुप्त, हर घर चित्रगुप्त | मन मंदिर में चित्रगुप्त, हर मंदिर में चित्रगुप्त” इस प्रेरणादायक सूत्रवाक्य के साथ धार्मिक और सांस्कृतिक जागरण अभियान चलाया जाएगा। इसके अंतर्गत “श्री चित्रगुप्त कथा” एवं भव्य “श्री चित्रगुप्त पुराण” जैसे आयोजनों का आयोजन किया जाएगा। साथ ही बच्चों में भगवान चित्रगुप्त जी के प्रतीक कलम, दवात और लेखनी के महत्व का संस्कार विकसित किया जाएगा।
देशव्यापी जनजागृति अभियान से बढ़ेगी जागरूकता
समाज के अधिकारों, आर्थिक सशक्तीकरण और राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर जनजागृति अभियान चलाया जाएगा। आरक्षण, रोजगार, व्यापार और राजनीति के क्षेत्र में ठोस रणनीतियां बनाकर समाज को जागरूक और सशक्त बनाने का प्रयास किया जाएगा।
10 प्रमुख शहरों से होगी जमीनी स्तर पर शुरुआत
इस योजना का प्रथम चरण देश के 10 प्रमुख शहरों से प्रारंभ किया जा रहा है, जिनमें मध्य प्रदेश के भोपाल, विदिशा, कटनी; उत्तर प्रदेश के लखनऊ, प्रयागराज, कानपुर; गुजरात के अहमदाबाद, वडोदरा; राजस्थान के जयपुर तथा तेलंगाना के हैदराबाद शामिल हैं। यदि अन्य शहरों से भी सदस्य जिम्मेदारी लेने के लिए आगे आते हैं, तो उन्हें भी इस अभियान में तत्काल शामिल किया जाएगा।
डिजिटल प्लेटफॉर्म से मिलेगा राष्ट्रीय विस्तार
जमीनी गतिविधियों के साथ-साथ यह अभियान डिजिटल माध्यमों, सोशल मीडिया नेटवर्क और आधिकारिक वेब पोर्टल के जरिए देशभर में सक्रिय रहेगा, जिससे अधिक से अधिक लोगों तक इसकी पहुंच सुनिश्चित हो सके।
अंत में, यह कार्ययोजना समाज की जड़ों को मजबूत करने और आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण का एक सामूहिक प्रयास है। समाज के सभी सदस्यों से आह्वान किया गया है कि वे अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए इस मिशन को सफल बनाने में सक्रिय भागीदारी निभाएं।
कायस्थों की चाय चौपाल' का एकमात्र उद्देश्य सकारात्मकता, सहयोग और समाज का सर्वांगीण विकास है। आइए, हम सब मिलकर इस योजना को मूर्त रूप दें और अपने समाज के उत्थान में अपना योगदान दें।
आप सभी से निवेदन है कि इस प्रस्तावित कार्ययोजना पर अपने अंतिम विचार/सुझाव अवश्य साझा करें।
26 July 2026 कायस्थों की चाय चौपाल: एक सवाल - एक समाधान के संकल्प के साथ सामाजिक उत्थान पर मंथन
“कायस्थों की चाय चौपाल” में समाज के प्रबुद्धजनों ने हिस्सा लिया और समाज के सर्वांगीण विकास, विवाह संबंधी चुनौतियों, युवाओं के मार्गदर्शन तथा राजनीतिक व आर्थिक सशक्तीकरण पर गंभीर चर्चा की। चौपाल का मुख्य ध्येय "एक चौपाल - एक सवाल - एक समाधान" तय किया गया, ताकि हर बैठक में समस्याओं के ठोस और व्यावहारिक समाधान निकाले जा सकें।
बैठक में मुख्य रूप से बच्चों और युवाओं के सर्वांगीण विकास पर ज़ोर दिया गया। इसके तहत “एक बच्चा–एक हुनर”, “ज्ञान बैंक”, “कायस्थ बाल प्रतिभा संसद” और “संस्कार संवाद” जैसी दूरगामी पहलों का सुझाव दिया गया, जिससे बच्चों में कला, शिक्षा और नैतिक मूल्यों का विकास हो सके। साथ ही, जरूरतमंद बच्चों के लिए निःशुल्क अध्ययन सामग्री बैंक और करियर मार्गदर्शन/स्वरोजगार हेतु मेंटरशिप टीम बनाने पर सहमति जताई गई।
समाज में विवाह योग्य युवाओं के रिश्तों की समस्या पर भी चिंता व्यक्त की गई। इस पर विचार रखते हुए समाज के स्तर पर वैवाहिक परिचय मंच, परामर्श (काउंसलिंग) और अभिभावकों की सोच में सकारात्मक बदलाव लाने की आवश्यकता पर बल दिया गया। इसके अतिरिक्त, चित्रगुप्त मंदिरों में धार्मिक एवं पारिवारिक आयोजन करने की परंपरा को पुनर्जीवित करने का आह्वान किया गया ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों और संस्कृति से जुड़ी रहे।
राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी के मुद्दे पर 'विज़न 2030' के तहत त्रिस्तरीय निकायों से लेकर विधानसभाओं में समाज की भागीदारी बढ़ाने, शत-प्रतिशत मतदान जागरूकता, और युवाओं तथा महिलाओं को नेतृत्व के अवसर प्रदान करने की बात कही गई। इसके साथ ही संकट के समय समाज को संगठित होकर एक-दूसरे के सहयोग के लिए खड़े होने का संकल्प भी दोहराया गया।आपसी मतभेदों और व्यर्थ की चर्चाओं से दूर रहकर हर सदस्य को समाज-हित में अपना निष्ठावान और सकारात्मक योगदान देना चाहिए।
“कायस्थों की चाय चौपाल” में आए सभी सदस्यों के विचारों और सुझावों का नामवार बिन्दुवार सार:
1. शैलजा सिन्हा
कायस्थों की चाय चौपाल की कार्यप्रणाली: हर बैठक की शुरुआत समाज के एक वास्तविक प्रश्न से हो और अंत में कम-से-कम एक व्यावहारिक समाधान तय किया जाए। हर चौपाल में एक सदस्य को “समाज की आवाज़” बनाकर उसकी समस्या/सुझाव सुना जाए तथा अगली बैठक तक उस पर हुई प्रगति साझा की जाए।
बच्चों के लिए शिक्षा, संस्कार एवं प्रतिभा विकास की पहल:
“एक बच्चा-एक हुनर” अभियान: हर बच्चे की रुचि पहचानकर उसे कला, कौशल, खेल या तकनीक में आगे बढ़ाने का अवसर।
“संस्कार संवाद” कार्यक्रम: महीने में एक दिन बच्चों का बुजुर्गों, विद्वानों व सफल व्यक्तियों से संवाद।
“मेरी पहचान-मेरी प्रतिभा” मंच: प्रतिभा प्रदर्शन हेतु खुला मंच और हर महीने उत्कृष्ट प्रतिभा का सम्मान।
“ज्ञान बैंक” की स्थापना: सक्षम लोगों द्वारा जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई, किताबों, डिजिटल शिक्षा व प्रतियोगिता की तैयारी में मदद।
“एक परिवार–एक मार्गदर्शक” पहल: शिक्षित व अनुभवी लोगों द्वारा बच्चों को मेंटरशिप/मार्गदर्शन।
“संस्कार से सेवा तक” अभियान: बच्चों को छोटी उम्र से सामाजिक जिम्मेदारी, पर्यावरण संरक्षण व सेवा भाव से जोड़ना।
“प्रतिभा डायरी”: हर बच्चे की रुचि और उपलब्धि का रिकॉर्ड रखना।
“पीढ़ियों का मिलन”: बच्चों को समाज का इतिहास, परंपराएं व महापुरुषों की कहानियां सुनाना।
“कायस्थ बाल प्रतिभा संसद” (विशेष सुझाव): बच्चों का अपना मंच जहाँ वे अपनी समस्याएं, विचार व सुझाव रखें और सर्वश्रेष्ठ विचारों को लागू किया जाए।
चौपाल को केवल विचारों तक सीमित न रखकर 'विचार से समाधान' का माध्यम बनाया जाए। युवाओं व बच्चों में शिक्षा, संस्कार, हुनर और नेतृत्व क्षमता विकसित करने के लिए संरचनात्मक अभियान चलाए जाएं।
2. सत्यशील सहाय
आगामी चुनावों और सामाजिक विकास को ध्यान में रखते हुए समाज को जागरूक करना और रचनात्मक संवाद बनाना।
10 मुख्य मुद्दे
राजनीतिक भागीदारी: त्रिस्तरीय निकायों से लेकर विधानसभा/विधान परिषद में सहभागिता तथा युवाओं/महिलाओं को नेतृत्व।
शिक्षा और कौशल विकास: प्रतियोगी परीक्षाएं, डिजिटल स्किल्स और ai में युवाओं को आगे बढ़ाना।
रोजगार और उद्यमिता: सरकारी/निजी अवसर, स्टार्टअप्स, msme व स्वरोजगार प्रोत्साहन।
स्थानीय विकास: सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, कानून-व्यवस्था व क्षेत्रवार समस्याओं की सूची।
समाज की एकता: उपजातियों व संगठनों में समन्वय।
मतदाता जागरूकता: शत-प्रतिशत मतदान और उम्मीदवारों का निष्पक्ष मूल्यांकन।
नीति संवाद: विभिन्न राजनीतिक दलों की नीतियों की तुलना व साझा मांग-पत्र (ज्ञापन)।
महिलाओं की भूमिका: सुरक्षा, शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण व निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी।
युवा नेतृत्व मंच: 18–35 वर्ष के युवाओं को तैयार करना व जिम्मेदार सोशल मीडिया उपयोग।
विज़न 2030: अगले 5 वर्षों के लिए सामाजिक सेवा, शिक्षा व रोजगार के स्पष्ट लक्ष्य।
समाज को राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने के लिए विज़न-2030 के साथ 10 प्रमुख क्षेत्रों में संगठित प्रयास किए जाएं।
3. पंकज श्रीवास्तव
समाज के लड़कों के विवाह में आ रही कठिनाइयों और अन्य जातियों में विवाह करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताई।
विवाह योग्य युवाओं के रिश्ते अपने ही समाज के भीतर तय कराने के लिए समाज स्तर पर सक्रिय प्रयास किए जाएं।
4. करण सिन्हा
विवाह योग्य युवक-युवतियों और उनके परिवारों को आपस में परिचित कराने हेतु सामाजिक मंच/प्रयास तैयार किए जाएं।
समाज के युवाओं को उचित जीवनसाथी चुनने में सुविधा देने हेतु परिचयात्मक/वैवाहिक सहयोग व्यवस्था बनाई जाए।
5. चित्रगुप्ताचार्य गौरवदास जी महाराज
विवाह, जन्मदिन, सेवानिवृत्ति आदि धार्मिक/सामाजिक आयोजनों को प्राथमिकता से चित्रगुप्त मंदिर प्रांगणों में आयोजित किया जाए।
मंदिर प्रांगणों में सामाजिक कार्यक्रम करने से बच्चों और परिवारों में समाज के प्रति जुड़ाव, आस्था और एकजुटता की भावना बढ़ेगी।
6. संजय श्रीवास्तव (वडोदरा)
पिछले दो वर्षों से वैवाहिक ग्रुप और काउंसलिंग ग्रुप चलाने का अनुभव साझा किया।
बताया कि 1982 से 1995 के बीच जन्मे युवाओं के विवाह की समस्या सबसे गंभीर है।
अभिभावकों की यह मानसिकता कि "हमारा बच्चा बेस्ट है, बाकी बेकार" रिश्ते बनने में बाधा है।
विवाह की समस्या के समाधान हेतु अभिभावकों को अपनी मानसिकता बदलकर दूसरों के बच्चों को भी सहृदयता से अपनाना होगा।
7. 8209118210 (सदस्य)
हरिद्वार (मनसा देवी मंदिर) में आठ चिरंजीवियों की सूची में भगवान चित्रगुप्त जी का नाम न होने पर विषय उठाया और समाज द्वारा आपत्ति दर्ज कराने का सुझाव दिया।
उत्तर/स्पष्टीकरण: पुराणों के अनुसार आठ चिरंजीवी सांसारिक प्रक्रिया के तहत जन्मे हैं, जिन्हें कर्मों के आधार पर अमरत्व मिला है। जबकि भगवान श्री चित्रगुप्त जी अनादि, अनंत, अजन्मा, ब्रह्मा जी के मानस पुत्र और कर्मों के नियंता/न्यायकर्ता हैं। आठ चिरंजीवियों को अमरत्व का विधान भी उन्हीं के अधीन है।
भगवान चित्रगुप्त जी को केवल "चिरंजीवी" की सीमित सूची में बांधना उचित नहीं है; वे सर्वव्यापी और शाश्वत सत्ता हैं। यह विरोध से अधिक समाज की नई पीढ़ी को सही पौराणिक व शास्त्रीय ज्ञान देने का विषय है।
8. शैलेन्द्र
एक ऐसा बैंक (निःशुल्क अध्ययन सामग्री बैंक) खोलने का प्रस्ताव, जो पैसे का लेन-देन न करके अनाथ, अत्यंत गरीब या असमर्थ बच्चों को कॉपी, पेंसिल, स्लेट आदि पाठ्य सामग्री निःशुल्क उपलब्ध कराए।
जरूरतमंद बच्चों के पठन-पाठन हेतु अध्ययन सामग्री बैंक की स्थापना का व्यावहारिक प्रस्ताव।
9. सी. पी. श्रीवास्तव
चौपाल में आ रहे सुंदर विचारों की सराहना की तथा सभी सदस्यों को शुभकामनाएँ और प्रणाम प्रेषित किया।
चौपाल के मंच और विचारों के प्रति आभार व्यक्त किया।
10. विश्वेन्द्र श्रीवास्तव
एक मार्गदर्शन टीम बनाने का सुझाव जो विद्यार्थियों को करियर काउंसलिंग, निःशुल्क प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और व्यवसाय (बिजनेस) स्थापित करने में मदद करे।
व्यवसाय हेतु कम ब्याज दर पर ऋण (लोन) दिलाने में सहायता की जाए।
युवाओं के करियर, प्रतियोगिता परीक्षा और स्वरोजगार/व्यवसाय हेतु मार्गदर्शन व वित्तीय सहायता की व्यवस्था बनाई जाए।
11. आनंद कुमार श्रीवास्तव
समाज में एकता और शक्ति का प्रदर्शन आवश्यक है। जब भी समाज के किसी व्यक्ति के साथ कोई घटना या अन्याय हो, तो तुरंत 20 से 50 लोग एकजुट होकर उसका पुरजोर विरोध और प्रतिवाद करें।
सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर समाज के हितों की आवाज़ को मजबूती से उठाया जाए।
विपत्ति या अन्याय के समय संगठित होकर त्वरित सहयोग और सामूहिक प्रतिवाद करने की शक्ति विकसित की जाए।
12. रवि राजन
दूसरों की आलोचना या निरर्थक बातों में न पड़कर इस बात पर ध्यान केंद्रित किया जाए कि हम स्वयं अपने चित्रांश समाज के लिए क्या सकारात्मक कर सकते हैं।
व्यर्थ के विवादों से दूर रहकर समाज-हित में स्वयं के योगदान और रचनात्मक कार्यों पर ध्यान दिया जाए।
बच्चों से बुजुर्गों तक - हर वर्ग के लिए समर्पित संगठन, कायस्थ समाज के लिए सुनियोजित संरचना
“कायस्थों की चाय चौपाल” आपसी संवाद, सहभागिता और सकारात्मक चिंतन का एक खुला मंच है, जहाँ हम सभी कायस्थ बंधु मिलकर अपने विचार, सुझाव और अनुभव साझा कर रहे हैं। यह केवल चर्चा का मंच नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित और दीर्घकालिक सामाजिक निर्माण की दिशा में उठाया गया एक संगठित प्रयास है।
वर्तमान में एक व्यापक कार्ययोजना पर आपके बहुमूल्य विचारों और सुझावों के आधार पर कार्य प्रगति पर है। इसी क्रम में, प्रारंभिक स्तर पर एक मुख्य कार्यप्रणाली निर्धारित की गई है, जिसके अंतर्गत कायस्थ समाज को अधिक प्रभावी, संगठित और सहायक स्वरूप देने के लिए इसे पाँच प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया है:-
- बच्चों के लिए
- युवाओं के लिए
- महिलाओं के लिए
- पुरुषों के लिए
- बुजुर्गों के लिए
इन पाँचों वर्गों के माध्यम से कार्य को एक व्यवस्थित विभागीय स्वरूप दिया जाएगा, जिससे प्रत्येक वर्ग की आवश्यकताओं, चुनौतियों और संभावनाओं के अनुरूप योजनाएँ तैयार की जा सकें। इससे न केवल कार्य की गति और प्रभावशीलता बढ़ेगी, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग तक सहायता, सहयोग और अवसर भी अधिक सहजता से पहुँच सकेंगे।
प्रत्येक वर्ग के अंतर्गत सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं को उनके उद्देश्य के अनुसार समाहित किया जाएगा, जिससे योजनाएँ अधिक व्यावहारिक और परिणामकारी बन सकें। यह संपूर्ण प्रक्रिया का प्रथम चरण है। आप सभी के सुझावों और मार्गदर्शन के पश्चात इसे अगले चरणों में और अधिक विस्तृत एवं क्रियान्वित स्वरूप दिया जाएगा।
आप सभी से निवेदन है कि इस प्रारंभिक संरचना पर अपने विचार, सुझाव एवं सुधार अवश्य साझा करें, ताकि यह पहल वास्तव में समाज के हर वर्ग के लिए उपयोगी और प्रभावशाली सिद्ध हो सके।
सादर,
कायस्थों की चाय चौपाल
आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है
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कायस्थों की चाय चौपाल के सभी सम्मानित चित्रांश बंधुओं एवं मातृशक्ति के लिए महत्वपूर्ण सूचना
कायस्थों की चाय चौपाल के माध्यम से पिछले कुछ समय से समाज के विभिन्न वर्गों, युवाओं, वरिष्ठजनों, शिक्षाविदों, पत्रकारों, उद्यमियों, समाजसेवियों, महिलाओं एवं विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत चित्रांश बंधुओं के विचार, सुझाव एवं अपेक्षाएँ जानने का प्रयास किया जा रहा है।
हम सभी सदस्यों को यह स्पष्ट रूप से बताना चाहते हैं कि "कायस्थों की चाय चौपाल" केवल चर्चा का मंच नहीं है। इसके पीछे समाजहित में एक व्यापक, दीर्घकालिक और परिणाममुखी कार्ययोजना का प्रारूप पहले से तैयार किया गया है। किन्तु हमारा मानना है कि किसी भी योजना को लागू करने से पहले उस पर समाज के अधिक से अधिक लोगों की राय अवश्य ली जानी चाहिए, ताकि वह योजना किसी एक व्यक्ति या समूह की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण कायस्थ समाज की सामूहिक सोच और आकांक्षाओं का प्रतिबिंब बन सके।
इसी उद्देश्य से वर्तमान में विभिन्न विषयों पर खुलकर चर्चा की जा रही है। हम समाज के प्रत्येक वर्ग की आवश्यकताओं, समस्याओं, अपेक्षाओं और सुझावों को सुन रहे हैं। चाहे विषय शिक्षा का हो, रोजगार का हो, व्यवसाय का हो, महिला सशक्तिकरण का हो, युवा नेतृत्व का हो, सामाजिक सहयोग का हो, सांस्कृतिक संरक्षण का हो, भगवान चित्रगुप्त की महिमा के प्रचार-प्रसार का हो अथवा समाज संगठन का हर सुझाव हमारे लिए महत्वपूर्ण है।
हम यह भी मानते हैं कि समाज के विकास का कोई एक सूत्र नहीं हो सकता। प्रत्येक क्षेत्र, प्रत्येक आयु वर्ग और प्रत्येक परिवार की अपनी अलग आवश्यकताएँ होती हैं। इसलिए हम किसी पूर्व निर्धारित निष्कर्ष को समाज पर थोपने के बजाय, समाज के बीच जाकर समाज की आवाज़ को सुनने और समझने का प्रयास कर रहे हैं।
अब तक प्राप्त सभी सुझावों को व्यवस्थित रूप से संकलित किया जा रहा है। प्रत्येक सुझाव का गंभीरता, निष्पक्षता और दूरदर्शिता के साथ अध्ययन किया जाएगा। जिन सुझावों से समाज के अधिकतम लोगों को लाभ पहुँच सकता है, उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी। समान विचारों को एक साथ जोड़कर तथा विभिन्न सुझावों के श्रेष्ठ बिंदुओं को समाहित करके एक व्यापक एवं व्यवहारिक रूपरेखा तैयार की जाएगी।
यह प्रस्तावित रूपरेखा केवल कागज़ी योजना नहीं होगी, बल्कि "कायस्थों की चाय चौपाल" के भविष्य के कार्यों की आधारशिला बनेगी। यही रूपरेखा आगे चलकर चौपाल के मुख्य उद्देश्य, कार्यक्षेत्र, प्राथमिकताएँ और कार्यक्रम निर्धारित करेगी। भविष्य में चौपाल के माध्यम से जो भी गतिविधियाँ, अभियान, योजनाएँ या सामाजिक प्रयास संचालित किए जाएंगे, वे इसी सामूहिक रूप से तैयार की गई कार्ययोजना के अनुरूप होंगे।
हमारा प्रयास है कि यह मंच किसी व्यक्ति, पद, संगठन या विचारधारा विशेष का मंच न बनकर सम्पूर्ण कायस्थ समाज का साझा मंच बने। यहाँ प्रत्येक सदस्य का विचार सम्मानित है, प्रत्येक सुझाव मूल्यवान है और प्रत्येक सहभागी समाज निर्माण की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण भाग है।
विशेष रूप से यह भी स्पष्ट किया जाता है कि इस पहल से जुड़ने के लिए किसी प्रकार की सदस्यता शुल्क, आर्थिक बाध्यता अथवा किसी संस्था विशेष से जुड़ाव की आवश्यकता नहीं है। यह पूर्णतः स्वैच्छिक, स्वतंत्र और समाजहित आधारित पहल है। जो भी चित्रांश समाज के उत्थान, सहयोग, संगठन और सांस्कृतिक जागरण की भावना से जुड़ना चाहते हैं, उनका स्वागत है।
अतः सभी सम्मानित सदस्यों से विनम्र अनुरोध है कि वे अपने विचार, सुझाव, अनुभव और अपेक्षाएँ खुलकर साझा करें। आज दिया गया आपका एक सुझाव आने वाले समय में हजारों चित्रांश परिवारों के लिए उपयोगी योजना का आधार बन सकता है।
हम सब मिलकर ऐसा मंच बनाना चाहते हैं जहाँ चर्चा केवल शब्दों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के लिए ठोस और सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बने।
आपके विचार ही हमारी दिशा निर्धारित करेंगे और आपकी सहभागिता ही इस अभियान की सबसे बड़ी शक्ति होगी।
"कायस्थों की चाय चौपाल" के लिए प्रस्तावित कार्ययोजना पर आपके विचार हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हमारा प्रयास है कि यह पहल सम्पूर्ण कायस्थ समाज की सामूहिक सोच, अनुभव और अपेक्षाओं पर आधारित हो।
आप इस विषय पर अपने सुझाव, विचार, प्राथमिकताएँ एवं अपेक्षाएँ (add comment) कमेंट बॉक्स में अवश्य साझा करें। आपका एक सार्थक सुझाव आने वाले समय में समाजहित की किसी महत्वपूर्ण योजना का आधार बन सकता है।
आइए, हम सब मिलकर ऐसी कार्ययोजना तैयार करें जो समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए उपयोगी, व्यवहारिक और प्रेरणादायक सिद्ध हो।
आपके सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी।
जय चित्रांश।
25- 07 - 2026 कायस्थों की चाय चौपाल – सार्थक चर्चा एवं आगामी कार्ययोजना का सार
आप सभी के विचार, सुझाव और चिंताएँ यह दर्शाती हैं कि हमारे समाज में सकारात्मक बदलाव और एकजुटता की गहरी तड़प है। 'कायस्थों की चाय चौपाल' का मुख्य उद्देश्य समाज को गुटबाज़ी और विवादों से दूर रखकर धरातल पर वास्तविक, सामाजिक और व्यावहारिक प्रगति की ओर ले जाना है।
आप सभी के बहुमूल्य विचारों का बिंदुवार अवलोकन और उस पर सार्थक चर्चा एवं आगामी कार्ययोजना का सार प्रस्तुत है:
1. विचारों एवं सुझावों का बिंदुवार अवलोकन
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श्री राकेश सिन्हा जी: विवादों से परे हटकर समाज हित में एकसाथ काम करने और आपसी खींचतान समाप्त करने का आह्वान।
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श्रीमती शैलजा सिन्हा जी: समाज हित के लिए 10 व्यावहारिक सूत्र (सहायता कोष, करियर गाइडेंस, रोजगार नेटवर्क, छात्रवृत्ति, महिला स्वावलंबन, हेल्पलाइन, स्वास्थ्य/रक्तदान, वरिष्ठजन सहयोग, बच्चों में संस्कार, और कानूनी सहायता) तथा "एक कायस्थ, एक जिम्मेदारी" व "एक परिवार, एक सहयोग" का प्रभावी विचार।
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श्री सचिन श्रीवास्तव जी एवं श्री अनुराग श्रीवास्तव जी: 10 सूत्रीय कार्यक्रम का पूर्ण समर्थन और इसके साथ ही समाज में भगवान श्री चित्रगुप्त जी की महिमा के प्रचार- प्रसार को मुख्य उद्देश्य में जोड़ने का सुझाव।
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श्री शैलेश कुमार जी एवं श्री आशीष श्रीवास्तव जी: नवसंचार, ऑनलाइन पोर्टल और पत्रिकाओं के माध्यम से समाज को जोड़ने व सूचनाएँ प्रसारित करने की पहल।
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राजीव सिन्हा जी: अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनूप श्रीवास्तव जी एवं नीरज सिन्हा जी द्वारा बांकीपुर में बैठक की जानकारी।
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करण सिन्हा जी एवं अर्पित श्रीवास्तव जी: समाज निर्माण में युवाओं की सहभागिता पर विचार।
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श्री शैलेंद्र जी: चौपाल की दिशा पर निष्पक्ष चिंता, ताकि यह केवल सोशल मीडिया/प्रचार का माध्यम न बनकर व्यावहारिक कार्यक्षेत्र बने।
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नितिन श्रीवास्तव जी: कानपुर में जिलाध्यक्ष श्री उत्कर्ष निगम जी द्वारा 25 तारीख को आयोजित 'चाय चौपाल' की जानकारी।
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चित्रगुप्तचार्य श्री गौरव दास जी महाराज : पारस्परिक अभिवादन में 'जय चित्रांश' का उपयोग, घर के मंदिर में कलम-दवात की स्थापना व पूजन तथा प्रभु चित्रगुप्त की महिमा का प्रचार।
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राजेश सिन्हा जी: सभी सकारात्मक सुझावों पर बिंदुवार व्यापक चर्चा करके ठोस कार्ययोजना बनाने का आग्रह।
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उत्कर्ष कुलश्रेष्ठ जी: राजनीति, रोजगार और मांगलिक/वैवाहिक कार्यक्रमों जैसे सभी महत्वपूर्ण मुद्दों को समाहित करने का सुझाव।
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युवाश्री कार्तिक आर जी: युवाओं के लिए ऑनलाइन जॉब्स और रोजगार के अवसरों की जानकारी।
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राय अमित जी एवं सौरभ सिन्हा जी (गुड़गांव): समाचार पत्र संपादन के अनुभव के साथ परिचय तथा लखनऊ में भी 'चाय चौपाल' आयोजित करने का सुझाव।
2. प्रस्तावित व्यापक कार्ययोजना सार
आप सभी के विचारों को मिलाकर एक सर्वसमावेशी एवं व्यावहारिक रूपरेखा तैयार की जा रही है, जिसे सभी की सहमति के पश्चात लागू किया जाएगा:
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धार्मिक एवं सांस्कृतिक जागृति:
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आपस में 'जय चित्रांश' संबोधन की परंपरा शुरू करना।
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हर घर के मंदिर में 'कलम-दवात' की स्थापना और भगवान चित्रगुप्त जी की महिमा का प्रचार।
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शिक्षा, करियर एवं रोजगार (युवा कल्याण):
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ias, pcs, कॉर्पोरेट व अन्य क्षेत्रों के लिए मेंटरशिप और करियर गाइडेंस।
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ऑनलाइन जॉब्स, व्यवसाय नेटवर्क और मेधावी बच्चों के लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था।
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सामाजिक सुरक्षा एवं स्वावलंबन:
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'कायस्थ सहायता कोष' और आकस्मिक संकट में आर्थिक सहयोग।
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'कानूनी व सामाजिक हेल्पलाइन', रक्तदान शिविर और वरिष्ठजनों के अनुभव का उपयोग।
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महिलाओं को स्वरोजगार व कौशल विकास से जोड़ना।
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"एक कायस्थ, एक जिम्मेदारी" अभियान:
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सक्षम सदस्यों द्वारा कम से कम एक जरूरतमंद परिवार या छात्र की मदद का संकल्प।
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वैवाहिक एवं राजनीतिक/सामाजिक चेतना:
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समाज के विवाह योग्य युवाओं के लिए समन्वय और सामाजिक-राजनीतिक उत्थान पर चर्चा।
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पारदर्शिता एवं धरातली कार्य:
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चौपाल को केवल ऑनलाइन चर्चा तक सीमित न रखकर वास्तविक सामाजिक कार्यों में बदलना।
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3. 'चाय चौपाल' की मुख्य विशेषताएँ एवं स्वतंत्रता
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पूर्णतः स्वतंत्र मंच: यह चौपाल किसी भी एक संस्था, व्यक्ति, बैनर या राजनीतिक दल से बंधी हुई नहीं है। यह पूरी तरह से स्वतंत्र और निष्पक्ष है।
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कोई सदस्यता शुल्क नहीं: इस पहल से जुड़ने या सहयोग करने के लिए कोई शुल्क या फीस नहीं है।
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सामूहिक निर्णय: इस योजना को अंतिम रूप देने से पहले सभी सदस्यों के विचार और सुझाव लिए जा रहे हैं। सभी के 'एकमत' होने पर ही इसे पूरी निष्ठा के साथ शुरू किया जाएगा।
कायस्थों की चाय चौपाल' का एकमात्र उद्देश्य सकारात्मकता, सहयोग और समाज का सर्वांगीण विकास है। आइए, हम सब मिलकर इस योजना को मूर्त रूप दें और अपने समाज के उत्थान में अपना योगदान दें।
आप सभी से निवेदन है कि इस प्रस्तावित कार्ययोजना पर अपने अंतिम विचार/सुझाव अवश्य साझा करें।
श्री चित्रगुप्त भगवान जी की प्रेरणादायक कहानी
श्री चित्रगुप्त भगवान जी की कथा
ज्ञान लेखनी और न्याय के आराध्य देव
सनातन धर्म की महान परंपरा में भगवान श्री चित्रगुप्त जी का विशेष स्थान है। वे न्याय के देवता कर्मों के लेखाधिकारी तथा ज्ञान और लेखनी के आराध्य माने जाते हैं। कायस्थ समाज के लिए श्री चित्रगुप्त भगवान केवल आराध्य देव ही नहीं बल्कि सत्य न्याय ज्ञान कर्तव्य और समाजसेवा के प्रेरणास्रोत भी हैं।
सृष्टि के आरंभ की कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब सृष्टि का विस्तार हुआ और मनुष्यों की संख्या बढ़ने लगी तब भगवान ब्रह्मा जी के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न उपस्थित हुआ कि मनुष्य अपने जीवन में अनेक प्रकार के कर्म करेगा कोई पुण्य करेगा तो कोई पाप इन सभी कर्मों का निष्पक्ष लेखा जोखा कौन रखेगा।
मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा जी ने इस कार्य के लिए एक ऐसे दिव्य पुरुष की रचना करने का संकल्प लिया जो मनुष्य के प्रत्येक कर्म का सूक्ष्म और निष्पक्ष लेखा रख सके तथा समय आने पर उसके कर्मों के आधार पर न्याय कर सके।
कहा जाता है कि भगवान ब्रह्मा जी ध्यान में लीन हो गए। उनके ध्यान और चिंतन से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए। वे हाथ में कलम और दवात धारण किए हुए थे। उनके हाथ में लेखनी थी और उनके पास कर्मों का लेखा रखने का दायित्व था।
भगवान ब्रह्मा जी ने उन्हें देखकर कहा तुम मेरे मन और चिंतन से उत्पन्न हुए हो इसलिए तुम्हारा नाम चित्रगुप्त होगा। तुम संसार के प्रत्येक जीव के कर्मों का लेखा रखोगे और न्याय के समय उन कर्मों का सत्य विवरण प्रस्तुत करोगे।
इस प्रकार श्री चित्रगुप्त भगवान को मनुष्यों के कर्मों का लेखा जोखा रखने का दायित्व प्राप्त हुआ।
कर्मों का निष्पक्ष लेखा
मान्यता है कि श्री चित्रगुप्त भगवान मनुष्य के केवल बाहरी कर्मों को ही नहीं बल्कि उसके विचार वचन और आचरण को भी महत्व देते हैं।
मनुष्य अपने जीवन में जो भी कर्म करता है उसका प्रभाव उसके जीवन पर पड़ता है। अच्छे कर्मों का फल शुभ होता है और बुरे कर्मों का परिणाम भी उसी के अनुरूप होता है।
श्री चित्रगुप्त भगवान का संदेश यही है कि मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति सदैव सजग रहना चाहिए क्योंकि संसार में चाहे कोई उसके कर्मों को देखे या न देखे लेकिन कर्म का लेखा अवश्य रहता है।
यही कारण है कि श्री चित्रगुप्त भगवान को न्याय और सत्य का प्रतीक माना जाता है। उनके हाथ में कलम इस बात का संदेश देती है कि ज्ञान और लेखनी का उपयोग सत्य न्याय और लोककल्याण के लिए होना चाहिए।
कायस्थ समाज और श्री चित्रगुप्त भगवान
कायस्थ समाज की पहचान सदियों से ज्ञान शिक्षा प्रशासन लेखन न्याय और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ी रही है। समाज के आराध्य देव श्री चित्रगुप्त भगवान के हाथ में कलम और दवात हमें यह प्रेरणा देते हैं कि हम ज्ञान को अपना जीवन साधन ही नहीं बल्कि समाज निर्माण का माध्यम भी बनाएं।
कायस्थ समाज के लिए कलम केवल रोजगार का साधन नहीं है। यह सत्य की आवाज न्याय का माध्यम और समाज को दिशा देने की शक्ति है।
आज के समय में श्री चित्रगुप्त भगवान की शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारना और भी आवश्यक है। हमें अपने बच्चों और युवाओं को शिक्षा के साथ संस्कार ईमानदारी अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी का महत्व समझाना चाहिए।
हमें अपनी लेखनी और ज्ञान का उपयोग समाज को जोड़ने जरूरतमंदों की सहायता करने युवाओं को आगे बढ़ाने और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने के लिए करना चाहिए।
आज के समाज के लिए संदेश
श्री चित्रगुप्त भगवान की कथा हमें यह सिखाती है कि मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके पद धन या प्रतिष्ठा से नहीं बल्कि उसके कर्मों से होती है।
इसलिए हमें अपने जीवन में तीन बातों को सदैव याद रखना चाहिए
सत्य बोलें
न्याय का साथ दें
और अच्छे कर्म करें
कायस्थ समाज को चाहिए कि वह अपनी गौरवशाली परंपरा और संस्कारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाए। बच्चों को श्री चित्रगुप्त भगवान की महिमा और उनके संदेश से परिचित कराए तथा उन्हें यह समझाए कि ज्ञान और कलम की शक्ति का उपयोग केवल अपने लिए नहीं बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए भी किया जाना चाहिए।
हमारा संकल्प
आइए श्री चित्रगुप्त भगवान को अपना आराध्य मानकर हम सब यह संकल्प लें
हमारी कलम सत्य के लिए चलेगी
हमारा ज्ञान समाज के लिए होगा
हमारे कर्म मानवता के लिए होंगे
और हमारा जीवन न्याय सेवा एवं संस्कारों को समर्पित होगा
हम श्री चित्रगुप्त भगवान के वंशज हैं
हमारी पहचान हमारी कलम ज्ञान संस्कार और कर्म से हो
आइए हम सब मिलकर अपने समाज को शिक्षित संगठित संस्कारित और सशक्त बनाएं तथा अपनी गौरवशाली परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं
जहाँ ज्ञान है वहाँ प्रकाश है
जहाँ सत्य है वहाँ न्याय है
जहाँ अच्छे कर्म हैं वहीं सच्चा सम्मान है
जय श्री चित्रगुप्त भगवान जय कायस्थ समाज
24 July 2026 कायस्थों की चाय चौपाल एवं समाज हित चर्चा : बिंदुवार सारांश
"कायस्थों की चाय चौपाल" एवं समाज हित चर्चा: विस्तृत बिंदुवार सारांश
1. आध्यात्मिक चेतना और संस्कार जागरण अभियान (चित्रगुप्ताचार्य श्री गौरव दास जी महाराज एवं श्रीमती शैलजा जी)
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सामूहिक ध्यान एवं प्रार्थना: चौपाल की शुरुआत कुछ मिनट के सामूहिक ध्यान, प्रार्थना या सकारात्मक चिंतन से हो, जिससे वातावरण में पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो।
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संस्कृति व आदर्शों से जुड़ाव: बच्चों और युवाओं को भारतीय संस्कृति, भगवान श्री चित्रगुप्त जी के आदर्शों, सदाचार, अनुशासन और निष्काम सेवा भाव से जोड़ा जाए।
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मूल संकल्प: "आध्यात्मिकता से सेवा, सेवा से समाज उत्थान" के संकल्प के साथ जरूरतमंदों की मदद और समाज हित के कार्य किए जाएँ।
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आंतरिक जागृति: महाराज जी का विश्वास है कि जब व्यक्ति भीतर से जागृत होगा, तभी समाज में वास्तविक और स्थायी परिवर्तन आएगा।
2. विवाह सहायता, समयबद्धता एवं बायोडाटा व्यवस्था (श्री पंकज श्रीवास्तव, संत कबीर नगर)
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सक्रिय विवाह सहयोग: समाज में जिन युवाओं के विवाह में विलंब या कठिनाई हो रही है, उनका विवाह कराने में समाज के लोग आगे आकर सक्रिय पहल करें।
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आयु के प्रति जागरूकता: लोगों में यह समझ बढ़ाई जाए कि विवाह की एक उपयुक्त आयु होती है और सही समय पर विवाह संपन्न कर लेना चाहिए।
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बायोडाटा साझा करना: समूह (group) के माध्यम से विवाह हेतु बायोडाटा साझा करने का प्रावधान हो, जिससे योग्य वर-वधू का चयन सुगम और पारदर्शी हो सके।
3. युवा सशक्तिकरण और गौरवशाली इतिहास का प्रसार (श्रीमती शैलजा जी एवं सुश्री आंचल निगम जी)
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इतिहास और पहचान: समाज के प्रत्येक युवा तक कायस्थ समाज के गौरवशाली इतिहास, समृद्ध संस्कृति और महान पहचान को पहुँचाया जाए।
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सामाजिक जागरूकता: सुश्री आंचल निगम जी द्वारा प्रस्तुत सामाजिक जागरूकता और इतिहास संरक्षण के विषय की सभी सदस्यों ने सराहना की।
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एकता व सशक्तिकरण: युवाओं को संगठित कर समाज में एकजुटता बढ़ाने और कायस्थ समाज को प्रगति की नई ऊँचाइयों तक ले जाने पर विशेष बल दिया गया।
4. संगठनात्मक ढाँचा और क्षेत्रीय प्रबंधन (श्री मुरली मनोहर प्रसाद, वडोदरा)
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20,000 की आबादी पर इकाई विभाजन: पूरे प्रदेश या जिले को प्रति 20,000 कायस्थ आबादी के आधार पर छोटे-छोटे क्षेत्रों में विभाजित किया जाए।
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क्षेत्रीय कार्यालय एवं प्रभारी: प्रत्येक क्षेत्र में एक कार्यालय हो और एक प्रभारी नियुक्त किया जाए, जिससे संगठनात्मक कार्य सुचारू रूप से चल सकें और परिवारों का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित हो सके।
5. मासिक बैठक एवं सामाजिक जुड़ाव (श्रीमती मंजरी श्रीवास्तव, भोपाल)
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मासिक बैठकों का आयोजन: समाज के सदस्यों में आपसी परिचय, आत्मीयता और जुड़ाव बढ़ाने के लिए महीने में कम से कम एक बार नियमित बैठक आयोजित की जाए।
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प्रस्ताव समर्थन: श्री मुरली मनोहर जी के 20,000 की आबादी पर प्रतिनिधि और कार्यालय बनाने के सुझाव का पूर्ण समर्थन किया गया।
6. व्यावसायिक सहयोग एवं प्रचार की अनुमति
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शुरुआती चर्चा व आपत्ति: श्री अभिषेक जी द्वारा व्यावसायिक जानकारी और पोस्टर साझा करने पर एक सदस्य ने आपत्ति जताई थी कि समूह में व्यावसायिक संदेश न भेजे जाएँ।
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व्यापक आम सहमति: इस विषय पर गहराई से चर्चा की गई। सभी सदस्यों का यह मानना था कि जब तक सदस्य एक-दूसरे के व्यवसाय/कार्य के बारे में नहीं जानेंगे, तब तक एक-दूसरे को व्यावसायिक दृष्टि से सहयोग देना संभव नहीं होगा।
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अंतिम निर्णय: यह सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि सभी सदस्य समूह में अपने कार्य और व्यवसाय का प्रचार-प्रसार कर सकते हैं, ताकि समाज के भीतर ही एक-दूसरे को व्यावसायिक और आर्थिक सहयोग दिया जा सके।
7. 'चाय चौपाल' की अनूठी अवधारणा एवं मंच
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चौपाल का स्थान: एक सदस्य के सवाल पर स्पष्ट किया गया कि 'चाय चौपाल' किसी एक निश्चित स्थान तक सीमित नहीं है—जहाँ भी चार कायस्थ सदस्य आपस में एकत्र हो जाएँ, वही 'चाय चौपाल' का मंच बन जाता है।
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विचारों का राष्ट्रीय साझाकरण: चौपाल में साथ बैठकर आपस में विचारों का आदान-प्रदान किया जाए और उन महत्त्वपूर्ण विचारों को राष्ट्रीय मंच पर साझा किया जाए।
8. ओपन चैट प्लेटफॉर्म पर सदस्यों की सहभागिता
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निरंतर संवाद: समूह के 'ओपन चैट प्लेटफॉर्म' पर भी अनेक सदस्यों ने उत्साहपूर्वक अपने विचार और सुझाव साझा किए हैं, जिससे समाज में स्वस्थ और निरंतर संवाद को बढ़ावा मिल रहा है।
9. कायस्थ धर्मशाला (21 कुंज-गली, खटखड़ी, हरिद्वार) की जानकारी व अनुभव
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उपलब्ध सुविधाएँ: हरिद्वार स्थित कायस्थ धर्मशाला में ठहरने के लिए सभी प्रकार की आवश्यक और उत्तम सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
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कायस्थों को प्राथमिकता: धर्मशाला में ठहरने एवं बुकिंग के दौरान कायस्थ समाज के सदस्यों/बंधुओं को विशेष प्राथमिकता दी जाती है।
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सदस्यों के अनुभव: पूर्व में इस धर्मशाला में रुक चुके सदस्यों ने अपने सकारात्मक अनुभव साझा करते हुए समूह के अन्य सदस्यों को इसकी पूरी जानकारी दी















