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माँ कीं कद्र : लघुकथा, लेखक - डॉ. मनोज श्रीवास्तव
माँ की कद्र : लंबे सफर के बाद वह रात के एक बजे घर पहुंचा तो देखा उसकी बीवी बच्चे गहरी नींद में सो रहे थे।
उसे जोरों की भूख लगी थी वह रसोई में गया और थाली में खाना डाल ही रहा था कि पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा!!
उसने बिना पीछे देखे ही सिर्फ़ स्पर्श से पहचान लिया कि वो मां थी।
माँ बोली " बेटे ठंडा खाना क्यों निकाल रहा है , तू कुछ देर इंतजार कर मैं गर्म कर देती हूं।"
वह बोला " सब सो रहे हैं मां... तू क्यों जाग रही है?"
मां बोली " सोना मेरे बस में नहीं है। रोज़ ही जब तक तू घर नहीं आ जाता मुझे नींद नहीं आती।"
मां ऐसी ही होती है।
जिस घर में माँ की दुआ होती है, वहाँ मुश्किलें भी अपना रास्ता बदल देतीं हैं ।
अगर माँ है आपके घर में तो उनकी कद्र कीजिए ।
अगर आपको ये कहानी अच्छी लगी तो कृपया पेज को फालो करें ।
कायस्थों की चाय चौपाल : युवा संवाद से समाज निर्माण की ओर
कायस्थों की चाय चौपाल एक संगठित सामाजिक पहल है जिसका उद्देश्य कायस्थ समाज के युवाओं को एक साझा मंच प्रदान करना है। यह मंच उन्हें आपस में जोड़ने, संवाद स्थापित करने और अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का अवसर देता है। इस पहल के माध्यम से युवाओं की सोच, उनकी आकांक्षाओं और उनकी क्षमताओं को पहचानकर उन्हें सही दिशा देने का प्रयास किया जाता है।
उद्देश्य
इस पहल का प्रमुख उद्देश्य समाज के युवाओं के बीच आपसी परिचय और सहयोग की भावना को बढ़ाना है। इसके साथ ही यह प्रयास किया जाता है कि युवा अपने विचारों को खुलकर व्यक्त करें और समाज के विकास में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करें। चाय चौपाल युवाओं को यह समझने का अवसर देती है कि वे क्या करना चाहते हैं, उनके पास कौन-कौन सी क्षमताएँ हैं और वे समाज से क्या अपेक्षा रखते हैं।
क्या है चाय चौपाल
यह प्रत्येक जिले में प्रतिमाह आयोजित की जाने वाली एक नियमित बैठक है, जिसमें स्थानीय कायस्थ युवा एक स्थान पर एकत्रित होते हैं। यह बैठक अनौपचारिक वातावरण में आयोजित की जाती है ताकि सभी प्रतिभागी सहजता से अपने विचार रख सकें। यहाँ पर किसी प्रकार का औपचारिक दबाव नहीं होता, बल्कि संवाद और सहभागिता को प्राथमिकता दी जाती है।
चाय चौपाल की कार्यप्रणाली
बैठक के दौरान सभी युवा अपने-अपने अनुभव, विचार और योजनाएँ साझा करते हैं। वे यह बताते हैं कि वे किस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, उनकी रुचियाँ क्या हैं और वे आगे क्या करना चाहते हैं। इसके साथ ही समाज से उनकी अपेक्षाओं और समाज के प्रति उनके कर्तव्यों पर भी चर्चा की जाती है। इस प्रक्रिया से एक ऐसा वातावरण बनता है जिसमें विचारों का आदान-प्रदान स्वाभाविक रूप से होता है।
विचारों का संकलन और आगे की प्रक्रिया
चाय चौपाल में उठने वाले सभी महत्वपूर्ण विचारों, प्रश्नों और आवश्यकताओं को व्यवस्थित रूप से संकलित किया जाता है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर एक जिम्मेदार टीम कार्य करती है। यह टीम इन सभी बिंदुओं को आगे जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर की कार्यकारिणी तक पहुँचाती है, ताकि उन पर गंभीरता से विचार किया जा सके और आवश्यक निर्णय लिए जा सकें।
संगठनात्मक संरचना
इस पहल को प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए एक सुव्यवस्थित संरचना का निर्माण किया जाता है। स्थानीय कार्यकर्ता, पदाधिकारी और संचालक मिलकर इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हैं। इसके अतिरिक्त एक विशेष कोर टीम का गठन किया जाता है, जो यह सुनिश्चित करती है कि प्रत्येक सुझाव और विचार उचित स्तर तक पहुँचे और उस पर कार्यवाही हो।
युवाओं के लिए अवसर
चाय चौपाल केवल संवाद का मंच नहीं है, बल्कि यह युवाओं के लिए अवसरों का द्वार भी खोलती है। इसके माध्यम से युवा एक-दूसरे को जानने और समझने का अवसर प्राप्त करते हैं। इससे नेटवर्किंग मजबूत होती है और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएँ बढ़ती हैं। युवा अपने कौशल के अनुसार मार्गदर्शन और सहयोग प्राप्त कर सकते हैं।
समाज के लिए महत्व
यह पहल समाज को एक नई दिशा देने का कार्य करती है। इससे समाज के भीतर एकता, सहयोग और जागरूकता का विकास होता है। युवाओं के विचारों को महत्व देने से समाज में सकारात्मक परिवर्तन की संभावना बढ़ती है। यह पहल भविष्य के नेतृत्व को तैयार करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।
कायस्थों की चाय चौपाल एक ऐसी पहल है जो समाज के युवाओं को सशक्त बनाने, उन्हें जोड़ने और उनके माध्यम से समाज को आगे बढ़ाने का कार्य करती है। यह संवाद, सहयोग और संगठन के माध्यम से एक मजबूत और जागरूक समाज के निर्माण की दिशा में एक सार्थक प्रयास है।
घर वापसी : लघुकथा, लेखक - डॉ. मनोज श्रीवास्तव
आदर्श नगर कालोनी के उस घर में रहती थी मीना देवी । ये घर उनके पति ने रिटायरमेंट पर मिले भविष्य निधि और ग्रेच्युटी के पैसों से बनवाया था । हालाँकि उन्हें इस घर में बहुत दिनों तक रहने का सौभाग्य नहीं मिल सका और रिटायर होने के तीन वर्ष बाद ही बीमारी से उनकी मृत्यु हो गई ।
मीना देवी की उम्र भी साठ वर्ष के क़रीब हो चुकी थी । घुटनों के दर्द और आँखों की कमजोरी की वजह से अब वो ठीक से चल भी नहीं पाती थीं।
उनका एक ही बेटा था रजत । उसकी शादी निशा के साथ हुई । शुरू में सब ठीक था। पर धीरे-धीरे निशा को सास की बीमारी और उनकी दवाओं का खर्चा बोझ लगने लगा।
एक दिन निशा ने रजत से कहा , "माँ जी से अब घर का कोई काम भी नहीं होता। ऊपर से दिन भर दवाइयां... हमारा बजट बिगड़ रहा है" -
रजत ने भी कंधे उचका दिए। "क्या करें निशा, ऑफिस का काम और emi... तुम ही देख लो।"
धीरे-धीरे बातें बढ़ीं। ताने शुरू हुए। खाना टाइम पर नहीं मिलता, दवाई भूल जाते।
5 साल का पोता आरव दादी से बहुत प्यार करता था।
वो रोज पूछता, "दादी, आप मेरे साथ लूडो क्यों नहीं खेलतीं?"
एक दिन हद हो गई। निशा चीखी, "इस घर में या तो हम रहेंगे या आपकी माँ!"
रजत पत्नी के रोज़ रोज़ के चिक चिक से तंग आ चुका था ।
रजत ने उस रात फैसला सुना दिया। "माँ, शहर में एक अच्छा वृद्धा आश्रम है। वहाँ डॉक्टर, खाना, सब सुविधा है। आप 2-4 महीने वहीं रह लो।"
मीना देवी की आँखें भर आईं। उन्होंने कहा कुछ नहीं । सिर्फ अपने पुराने सूटकेस में 2 जोड़ी कपड़े और भगवान की तस्वीर रखी।
जाते समय पोते आरव ने कसकर गले लगा लिया, "दादी, जल्दी आना।"
वृद्धा आश्रम में सब था... पर अपनेपन की कमी थी।
मीना देवी रोज दरवाजे की तरफ देखतीं। आरव की फोटो सीने से लगाकर सोतीं।
इसी बीच महीने बाद आरव का जन्मदिन था । रजत और निशा ने बड़ी पार्टी रखी। केक काटते समय आरव अचानक बोला, "पापा, केक दादी के बिना फीका है। दादी को ले आओ ना।" रजत और निशा एक दूसरे का चेहरा देखने लगे । पार्टी में आये मेहमान चौक पडे । जैसे तैसे पार्टी ख़त्म हुई ।
उस रात आरव को तेज बुखार आ गया। निशा घबरा गई। दवाइयां दीं लेकिन बुख़ार उतर नहीं रहा था । आरव अर्ध निद्रा में था , बार बार एक ही नाम ले रहा था - "दादी... दादी को बुलाओ।"
उस रात रजत को नींद नहीं आई। उसे याद आ रहा था कि माँ ने कैसे कैसे पाल-पोस कर उसे बड़ा किया, कैसे रात-रात भर जागी थीं। उसे स्वयं आत्मग्लानि हो रही थी ।
अगली सुबह रजत सीधा वृद्धा आश्रम पहुँचा। मीना देवी बरामदे में बैठी माला जप रही थीं। बेटे को देखते ही वो उठने लगीं। रजत उनके पैरों में गिर पड़ा।
"माँ... मुझे माफ कर दो। मैं बहुत गलत था। आरव तुम्हें याद कर रहा है माँ, घर चलो।"
मीना देवी ने बेटे का सिर सहलाया, "बेटा, माँ कभी लाचार नहीं होती। वो तो बस इंतजार करती है।"
उस दिन माँ की घर वापसी हुई। आरव दादी को देखकर दौड़कर गले लग गया।
निशा भी शर्म से पानी-पानी थी। उसने माँ के पैर छुए और कहा, "माँ जी, अब से घर और रसोई दोनों आपकी।"
आज मीना देवी फिर उसी घर में हैं। घुटनों में दर्द है, पर चेहरे पर सुकून है। क्योंकि उन्हें पता चल गया - रिश्ते वृद्धा आश्रम में नहीं, दिलों में पलते हैं।
कितनी सच्ची बात है, माँ-बाप बूढ़े नहीं होते, हम उन्हें बूढ़ा कर देते हैं और जब वो घर लौटते हैं, तो घर फिर से "घर" बन जाता है।
- डॉ. मनोज श्रीवास्तव
रिश्ते - खून से ही नहीं, दिल से भी बनते हैं
एक बूढ़ी माँ कई दिनों से अस्पताल में भर्ती थी। हर सुबह वे दरवाज़े की ओर देखतीं और मुस्कुराकर कहतीं, "आज मेरा बेटा ज़रूर आएगा।" दिन बीतते गए, लेकिन कोई नहीं आया।
एक रात लगभग 2 बजे अस्पताल का दरवाज़ा खुला। एक युवक घबराया हुआ अंदर आया और सीधा उस माँ के बिस्तर के पास पहुँच गया। माँ ने उसका हाथ पकड़कर पूछा, "बेटा... इतनी देर क्यों कर दी?"
युवक की आँखें भर आईं। उसने धीरे से कहा, "माँ, मैं आपका बेटा नहीं हूँ... लेकिन बाहर आपको अकेले रोते देखा था। लगा, आज रात आपको किसी अपने की ज़रूरत है।"
यह सुनकर माँ फूट-फूटकर रो पड़ीं। डॉक्टर और नर्सें भी भावुक हो गईं।
सुबह जब माँ को छुट्टी मिली, तो उन्होंने उस युवक से कहा, "रिश्ते खून से नहीं, दिल से बनते हैं। आज से तुम मेरे बेटे हो।"
उस दिन अस्पताल में मौजूद हर व्यक्ति ने महसूस किया कि दुनिया में इंसानियत अभी भी ज़िंदा है।
अगर कहानी अच्छी लगी तो हमे follow ज़रूर करें।
कायस्थ समाज के युवाओं के लिए सुनहरा अवसर : जानें, कैसे आयोजित करें कायस्थों की चाय चौपाल
क्या है चाय चौपाल? यह एक मासिक मिलन कार्यक्रम है। यह किसी फाइव-स्टार होटल में नहीं, बल्कि किसी कैफे या किसी चाय की दुकान (जिसे आप 'चौपाल' का नाम देंगे) पर होगी, ताकि युवा खुलकर बात कर सकें।
क्यों आवश्यक है "कायस्थों की चाय चौपाल"?
आज का युवा प्रतिभाशाली है, ऊर्जावान है, सपने देखता है और उन्हें पूरा करने का साहस भी रखता है। लेकिन अनेक बार सही मार्गदर्शन, अवसर, नेटवर्क और सहयोग के अभाव में उसकी प्रतिभा सीमित होकर रह जाती है।
कायस्थ समाज सदैव शिक्षा, प्रशासन, साहित्य, कला, पत्रकारिता, राजनीति, उद्योग और राष्ट्र निर्माण में अग्रणी रहा है। आवश्यकता है कि समाज की इस गौरवशाली परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ा जाए और युवाओं को एक ऐसा मंच दिया जाए जहाँ वे खुलकर अपनी बात रख सकें।
इसी उद्देश्य से "कायस्थों की चाय चौपाल" की परिकल्पना की गई है।
यह केवल एक बैठक नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन है, जिसका उद्देश्य है: -
- युवाओं को जोड़ना
- प्रतिभाओं की पहचान करना
- भविष्य के नेतृत्व का निर्माण करना
- शिक्षा एवं रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना
- समाज के सफल व्यक्तित्वों से युवाओं को जोड़ना
- सामाजिक एकता और सहयोग की भावना विकसित करना
कायस्थों की चाय चौपाल क्या है?
कायस्थों की चाय चौपाल एक मासिक युवा संवाद कार्यक्रम है जिसमें किसी शहर, कस्बे या क्षेत्र के कायस्थ युवा एक स्थान पर एकत्रित होकर अपने विचार, सपने, योजनाएँ और चुनौतियाँ साझा करते हैं।
यह कार्यक्रम अत्यंत सरल है।
न कोई औपचारिक मंच,
न कोई राजनीतिक भाषण,
न कोई दिखावा।
सिर्फ चाय की चुस्कियों के साथ सकारात्मक चर्चा।
कायस्थों की चाय चौपाल में क्या होगा?
- परिचय सत्र
- करियर चर्चा
- शिक्षा एवं रोजगार मार्गदर्शन
- स्टार्टअप एवं व्यवसाय संवाद
- सामाजिक नेतृत्व निर्माण
- युवाओं की समस्याओं पर चर्चा
- समाज के लिए नई योजनाओं पर विचार
- राष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़ाव
चाय चौपाल के उद्देश्य
1. युवा नेटवर्क तैयार करना
प्रत्येक शहर में कायस्थ युवाओं का सक्रिय नेटवर्क तैयार करना।
2. प्रतिभाओं की पहचान
समाज के ऐसे युवा जो
- प्रशासनिक सेवाओं में जाना चाहते हैं
- डॉक्टर बनना चाहते हैं
- इंजीनियर बनना चाहते हैं
- उद्योगपति बनना चाहते हैं
- खिलाड़ी बनना चाहते हैं
- कलाकार बनना चाहते हैं
- फिल्म जगत में जाना चाहते हैं
- राजनीति में नेतृत्व करना चाहते हैं
उनकी पहचान कर उन्हें उचित मार्गदर्शन देना।
3. युवा नेतृत्व तैयार करना
हर शहर में भविष्य के सामाजिक नेतृत्व का निर्माण।
4. राष्ट्रीय स्तर पर अवसर उपलब्ध कराना
राष्ट्रीय टीम युवाओं को
- मार्गदर्शक
- विशेषज्ञ
- प्रशिक्षक
- उद्योगपति
- प्रशासक
- शिक्षाविद
से जोड़ने का कार्य करेगी।
5. समाज में सहयोग संस्कृति विकसित करना
"एक कायस्थ दूसरे कायस्थ का सहयोगी बने।"
चाय चौपाल कैसे आयोजित करें?
चरण 1 - स्थान का चयन
निम्न स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किया जा सकता है:-
- घर
- सामुदायिक भवन
- पुस्तकालय
- कैफे
- कार्यालय
- पार्क
- समाज भवन
चरण 2 - युवाओं को आमंत्रित करें
कम से कम 15 से 50 युवाओं को आमंत्रित करें।
चरण 3 - बैठक की अवधि
90 मिनट से 2 घंटे
चरण 4 - आवश्यक सामग्री
- रजिस्ट्रेशन फॉर्म
- नोटबुक
- पेन
- मोबाइल कैमरा
- चाय एवं अल्पाहार
चरण 5 - कार्यक्रम संचालक
- जिला अध्यक्ष
- युवा संयोजक
- समाज का सक्रिय सदस्य
कार्यक्रम का संचालन कर सकता है।
चौपाल का कार्यक्रम प्रारूप
1. स्वागत (10 मिनट)
सभी प्रतिभागियों का स्वागत।
2. परिचय सत्र (30 मिनट)
प्रत्येक युवा बताए:-
- नाम
- शिक्षा
- व्यवसाय
- भविष्य का लक्ष्य
3. खुला संवाद (30 मिनट)
चर्चा के विषय:-
- शिक्षा
- रोजगार
- प्रतियोगी परीक्षाएँ
- व्यवसाय
- स्टार्टअप
- राजनीति
- समाज सेवा
4. संकल्प सत्र (15 मिनट)
सभी युवा मिलकर संकल्प लें: -
"हम एक-दूसरे का सहयोग करेंगे और समाज को मजबूत बनाएंगे।"
5. रिपोर्ट तैयार करना (15 मिनट)
बैठक का सार तैयार किया जाए।
प्रत्येक प्रतिभागी से ली जाने वाली जानकारी
व्यक्तिगत विवरण
- नाम
- मोबाइल नंबर
- शहर
- शिक्षा
भविष्य का लक्ष्य
मैं बनना चाहता हूँ:-
- ias
- ips
- ifs
- डॉक्टर
- इंजीनियर
- चार्टर्ड अकाउंटेंट
- वकील
- उद्यमी
- खिलाड़ी
- कलाकार
- राजनेता
- पत्रकार
- लेखक
- फिल्म निर्माता
सहयोग की आवश्यकता
- मार्गदर्शन
- आर्थिक सहायता
- कोचिंग
- नौकरी
- इंटर्नशिप
- व्यवसाय परामर्श
मैं समाज को क्या दे सकता हूँ?
यह प्रश्न अवश्य पूछा जाए।
रूबरू – एक मुलाकात
राष्ट्रीय ऑनलाइन संवाद
चाय चौपाल का सबसे महत्वपूर्ण भाग।
प्रत्येक माह राष्ट्रीय स्तर पर ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित होगा।
अतिथि
- श्री नितिन नवीन – राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता पार्टी
- जगद्गुरु सनातन सम्राट स्वामी चक्रपाणि जी महाराज – अध्यक्ष, श्री चित्रगुप्त अखाडा
- श्री राजकुमार संतोषी – प्रख्यात फिल्म निर्देशक और निर्माता
- डॉ. अनूप श्रीवास्तव आईआरएस, राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय कायस्थ महासभा
- श्री अमन वर्मा – सुप्रसिद्ध अभिनेता एवं टीवी एंकर
- श्री अतुल श्रीवास्तव – लोकप्रिय अभिनेता (फिल्म एवं थिएटर)
- श्री मनोज श्रीवास्तव (ias) – आयुक्त, राज्य निर्वाचन, म.प्र.
- श्री अजातशत्रु (ias) – विशेष कर्त्तव्यस्थ अधिकारी, मुख्यमंत्री, म.प्र.
- श्री अनुपम श्रीवास्तव – पूर्व अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक (cmd), bsnl
- श्री ऋतुराज सिन्हा – प्रतिष्ठित व्यवसायी एवं राष्ट्रीय मंत्री, भाजपा
- श्री आलोक संजर – पूर्व सांसद, लोकसभा
...एवं समाज की कई अन्य बहुचर्चित और प्रेरणादायक विभूतियाँ!
जो साझा करेंगे :-
अपने संघर्ष और सफलता की कहानी
करियर से जुड़ी महत्वपूर्ण सलाह
जीवन में आगे बढ़ने के मंत्र
यदि आप भी समाज के इन गौरवशाली स्तंभों से रूबरू होना चाहते हैं, तो इस प्रेरणादायक यात्रा का हिस्सा ज़रूर बनें।
आइए, जुड़िए… सीखिए… और आगे बढ़िए!
रूबरू – एक मुलाकात कार्यक्रम में क्या होगा?
- परिचय
- प्रेरक अनुभव
- प्रश्नोत्तर
- करियर मार्गदर्शन
- नेतृत्व विकास
लाभ
युवाओं को सीधे सफल व्यक्तित्वों से सीखने का अवसर मिलेगा।
राष्ट्रीय सहायता एवं मेंटरशिप मिशन
राष्ट्रीय टीम का उद्देश्य केवल बैठक करना नहीं है।
बल्कि युवाओं के सपनों को वास्तविकता तक पहुँचाना है।
सहायता के क्षेत्र
शिक्षा
- छात्रवृत्ति
- पुस्तक सहायता
- प्रतियोगी परीक्षा मार्गदर्शन
रोजगार
- रिज्यूमे निर्माण
- इंटरव्यू प्रशिक्षण
- नौकरी संदर्भ
व्यवसाय
- स्टार्टअप मार्गदर्शन
- निवेशक संपर्क
- व्यापार नेटवर्क
प्रशासनिक सेवाएँ
- ias/ips मार्गदर्शन
- मेंटर नेटवर्क
कला एवं फिल्म
- अभिनय
- लेखन
- निर्देशन
- मीडिया
खेल
- प्रशिक्षण
- मार्गदर्शन
- अवसर
अतिरिक्त नवाचार एवं विशेष कार्यक्रम
1. कायस्थ टैलेंट बैंक
देशभर के प्रतिभाशाली युवाओं का डिजिटल डेटाबेस।
2. कायस्थ मेंटर बैंक
समाज के सफल व्यक्तियों को मेंटर के रूप में जोड़ना।
3. युवा रोजगार हेल्पडेस्क
रोजगार अवसरों की जानकारी।
4. स्टार्टअप क्लब
व्यवसाय प्रारंभ करने वाले युवाओं के लिए मंच।
5. पुस्तक मित्र अभियान
पुस्तक दान और अध्ययन सहयोग।
6. एक युवा - एक कौशल
हर युवा एक नया कौशल सीखे।
7. वार्षिक युवा महाकुंभ
देशभर की चाय चौपालों का राष्ट्रीय सम्मेलन।
8. कायस्थ युवा सम्मान
उत्कृष्ट युवाओं को सम्मानित किया जाए।
9. डिजिटल चौपाल
ऑनलाइन मासिक बैठक।
10. युवा सहायता कोष
जरूरतमंद प्रतिभाशाली छात्रों की सहायता।
हमारा संकल्प - हमारा भविष्य
कायस्थों की चाय चौपाल केवल एक कार्यक्रम नहीं है।
यह आने वाले वर्षों में समाज की नई दिशा तय करने वाला जन-अभियान है।
जब हर शहर में युवा मिलेंगे,
जब हर युवा अपने सपने बताएगा,
जब समाज उसकी ताकत बनेगा,
तब एक नया कायस्थ समाज खड़ा होगा
अधिक संगठित,
अधिक शिक्षित,
अधिक सक्षम,
अधिक आत्मनिर्भर।
हमारा नारा
"मिलेंगे कायस्थ - बढ़ेंगे कायस्थ"
"युवा जुड़ेंगे - समाज बढ़ेगा"
"हर शहर चाय चौपाल, हर युवा बनेगा कमाल"
"सपनों से सफलता तक - समाज रहेगा आपके साथ"
आह्वान
क्या आपके शहर में भी हो रही है कायस्थों की चाय चौपाल?
यदि नहीं, तो आज ही शुरुआत कीजिए।
10 -20 युवाओं को चाय पर बुलाइए।
उनकी बातें सुनिए।
उनके सपनों को जानिए।
और उन्हें राष्ट्रीय मंच से जोड़िए।
क्योंकि एक छोटी सी चौपाल ही कल के बड़े नेतृत्व को जन्म देती है।
आइए, मिलकर कायस्थ समाज के युवाओं के उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करें।
अखिल भारतीय कायस्थ महासभा
युवा जोड़ो अभियान
"एक पहल - जो बदल सकती है आने वाला कल".
ईश्वर की अनुपम रचना नारी - डॉ.अंजु सक्सेना
नारी तुम ईश्वर की अनुपम रचना हो।
सुकुमार काया में
ईश्वरीय गुण करुणा, दया, प्रेम,
सौम्यता, क्षमा,त्याग अपने भीतर समेटे हो।
सौंदर्य की मूरत ही नहीं,तुम ममता से भरी
संस्कारों को सिंचित करने वाली
संस्कृति की पोषक हो।
भवन की कांति हो,
जीवन की सुख शांति हो,
दुनियादारी की प्रेरणा स्तंभ तुम ही हो,
जीवन का उल्लास तुम हो,
जीवन का मधुर राग तुम हो।
तुम ही अन्नपूर्णा, तुम ही सरस्वती
तुम ही लक्ष्मी, तुम ही शक्ति स्वरूपा हो।
तुम वस्तु नहीं, तुम भोग्या नहीं।
पहचानो अपने आत्मबल को
तुम पुरुष से कही भी कमतर नहीं।
पर पुरुष के बराबरी की चाह में
अपने नैसर्गिक गुण ना भूलों।
तुम स्वयंसिद्धा हो, शतरूपा हो
स्वमूल्य ऊँचा बताने की धुन में
मूल्यों को कतई ना छोड़ो।
रूप की दहक में शील न बहकने दो,
शिक्षित बनो,आत्मनिर्भर बनो।
पर सशक्तिकरण के फेर में पड़
खुद को गुमराह न होने दो।
तुम्हारे गुमराह होने से
समाज दिशाहीन हो जाएगा,
संस्कृति दूषित हो जाएगी,
देश की पहचान खो जाएगी।
मत भूलो...
तुम आधार हो परिवार का !
समाज का !
समूचे भारत देश का !
और सारी सृष्टि का !
डॉ.अंजु सक्सेना
वैश्विक मंच पर भारतीय साहित्य की दमदार आवाज: अमिताभ घोष का गौरवशाली रचनात्मक सफर
अंग्रेज़ी भाषा के प्रतिष्ठित साहित्यकार अमिताभ घोष आज अपने जन्मदिन के अवसर पर साहित्य जगत में एक विशिष्ट पहचान के रूप में याद किए जा रहे हैं। 11 जुलाई 1956 को कोलकाता, पश्चिम बंगाल में जन्मे अमिताभ घोष ने अपनी लेखनी के माध्यम से न केवल भारतीय समाज, इतिहास और संस्कृति को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया, बल्कि उपनिवेशवाद, पर्यावरण और मानव जीवन के जटिल संबंधों को भी गहराई से उजागर किया।
अमिताभ घोष की प्रारंभिक शिक्षा दून स्कूल में हुई, जहां उनके साथ विक्रम सेठ और रामचंद्र गुहा जैसे प्रमुख लेखक भी अध्ययनरत थे। इसके बाद उन्होंने सेंट स्टीफेंस कॉलेज और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से डीफिल की उपाधि हासिल की। आगे चलकर क्वीन्स कॉलेज, न्यूयॉर्क और सोर्बोन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया।
अपने साहित्यिक करियर में अमिताभ घोष ने कई चर्चित और प्रभावशाली कृतियाँ दीं, जिनमें ‘द शैडो लाइन्स’, ‘दी सर्किल ऑफ रीज़न’, ‘इन एन एंटीक लैंड’, ‘दी कलकत्ता क्रोमोजोम’, ‘दी ग्लास पैलेस’, ‘दी हंग्री टाइड’ और ‘इबिस ट्राइलॉजी’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उनकी रचनाओं में इतिहास, राजनीति, प्रवास और पर्यावरण जैसे विषयों का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है।
उनकी चर्चित पुस्तक ‘द नटमेग्स कर्स: पैरेबल्स फॉर ए प्लैनेट इन क्राइसिस’ में उन्होंने जायफल की कहानी के माध्यम से उपनिवेशवाद और पर्यावरण शोषण के ऐतिहासिक और वर्तमान प्रभावों को उजागर किया है। यह कृति आज के वैश्विक पर्यावरण संकट को समझने में महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करती है।
अमिताभ घोष को उनके उत्कृष्ट साहित्यिक योगदान के लिए अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। वर्ष 1989 में उनके उपन्यास ‘द शैडो लाइन्स’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। वर्ष 2007 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया और वर्ष 2018 में उन्हें 54वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया, जिससे वे इस सम्मान को प्राप्त करने वाले अंग्रेज़ी के पहले लेखक बने।
अमिताभ घोष का साहित्य न केवल पाठकों को विचार करने के लिए प्रेरित करता है, बल्कि समाज, इतिहास और प्रकृति के प्रति नई दृष्टि भी प्रदान करता है। उनका लेखन आज भी समकालीन साहित्य में प्रासंगिक और प्रेरणादायक बना हुआ है।
जन्मदिन पर बधाई :
कायस्थ गौरव अमिताभ घोष को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ। अखिल भारतीय कायस्थ महासभा परिवार की ओर से आपके उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु एवं निरंतर साहित्यिक उन्नति की मंगलकामनाएँ।
गृह मंत्री अमित शाह ने किया “जयप्रकाश नारायण सार्वजनिक पुस्तकालय” का उद्घाटन
नई दिल्ली, 11 जुलाई। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आज ज्ञान और आधुनिकता का एक नया केंद्र स्थापित हुआ, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जयप्रकाश नारायण सार्वजनिक पुस्तकालय का उद्घाटन किया। यह भव्य पुस्तकालय नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (एनडीएमसी) द्वारा विकसित किया गया है और इसे राजधानी के प्रमुख अध्ययन केंद्रों में शामिल किए जाने की उम्मीद है।
उद्यान मार्ग स्थित यह अत्याधुनिक पुस्तकालय तीन मंजिला इमारत में निर्मित है, जिसे आधुनिक पाठकों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए डिज़ाइन किया गया है। पुस्तकालय में एक समय में लगभग 200 लोगों के बैठकर अध्ययन करने की सुविधा उपलब्ध है, जिससे यह विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और आम पाठकों के लिए एक आदर्श स्थान बन गया है।
एनडीएमसी के अधिकारियों के अनुसार, इस पुस्तकालय में 30,000 से अधिक पुस्तकों का समृद्ध संग्रह उपलब्ध है, जिसमें विभिन्न विषयों की पुस्तकें शामिल हैं। इसके साथ ही, पुस्तकालय को डिजिटल और मल्टीमीडिया सुविधाओं से भी सुसज्जित किया गया है, जिससे यह पारंपरिक और आधुनिक दोनों प्रकार के अध्ययन का संगम प्रस्तुत करता है।
इस पुस्तकालय की विशेषता इसका ई-पुस्तकालय खंड है, जिसके माध्यम से उपयोगकर्ताओं को पाँच लाख से अधिक ई-पुस्तकों और डिजिटल कैटलॉग तक पहुंच प्राप्त होगी। ऑनलाइन पुस्तकालय सेवाओं की सदस्यता के जरिए पाठक कहीं से भी अध्ययन सामग्री का लाभ उठा सकेंगे। यह पहल डिजिटल इंडिया के लक्ष्य को भी मजबूती प्रदान करती है।
संरचना की दृष्टि से यह भवन भूतल सहित दो मुख्य मंजिलों में विकसित किया गया है। भूतल पर एक बहुउद्देशीय हॉल बनाया गया है, जहां विभिन्न शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा सकेंगे। वहीं, पहली और दूसरी मंजिल पर विशाल और शांत पुस्तकालय हॉल बनाए गए हैं, जो अध्ययन के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करते हैं। इसके अलावा, भवन में लिफ्ट की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है, जिससे सभी वर्गों के लोगों के लिए यह सुलभ बनता है।
एनडीएमसी का उद्देश्य इस पुस्तकालय के माध्यम से नागरिकों को एक ही स्थान पर भौतिक और डिजिटल दोनों प्रकार की अध्ययन सुविधाएं उपलब्ध कराना है। यह पुस्तकालय न केवल पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देगा, बल्कि युवाओं को ज्ञान और नवाचार की दिशा में भी प्रेरित करेगा।
इस अवसर पर उपस्थित अधिकारियों ने इसे राजधानी के बौद्धिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया और आशा व्यक्त की कि यह पुस्तकालय आने वाले समय में विद्यार्थियों और ज्ञान प्रेमियों का प्रमुख केंद्र बनेगा।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के स्थापना दिवस (राष्ट्रीय छात्र दिवस) पर हार्दिक शुभकामनाएं!
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बाल्यकाल से योगी, विश्व-चेतना के मार्गदर्शक तपस्वी: कायस्थ गौरव स्वामी निरंजनानंद सरस्वती
भारत की सनातन आध्यात्मिक ज्ञान परंपरा के आकाश में समय-समय पर ऐसे देदीप्यमान नक्षत्रों का उदय हुआ है, जिन्होंने अपनी आत्म साधना के आलोक से न केवल स्वयं को सिद्ध किया, अपितु संपूर्ण मानवता को भी सन्मार्ग दिखाया। इस गौरवमयी संत परंपरा की आधुनिक कड़ियों में एक अत्यंत दैदीप्यमान और विलक्षण नाम है स्वामी निरंजनानंद सरस्वती। वे मात्र एक योग साधक नहीं, बल्कि त्याग, अनवरत तपस्या, लोक कल्याण और अष्टांग योग के साक्षात विग्रह हैं। उनका संपूर्ण जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि कैसे एक आत्मा बाल्यकाल से ही सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर समष्टि के उत्थान के लिए समर्पित हो सकती है।
जन्मांतरी संस्कार: बाल्यकाल से ही योग पथ पर अग्रसर
इस युगांतरकारी चेतना का प्राकट्य 14 फरवरी 1960 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव की पावन धरा पर एक कुलीन कायस्थ परिवार में हुआ। उनके अनुयायी और समकालीन मनीषी उन्हें जन्मजात योगी के रूप में स्मरण करते हैं, क्योंकि उनके भीतर बचपन से ही अलौकिक आध्यात्मिक संस्कार परिलक्षित होने लगे थे।
उनकी इस अंतर्निहित निर्मलता को उनके महान गुरु, योग शिरोमणि स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने पहचाना और उन्हें नाम दिया निरंजन। निरंजन अर्थात् जो मल और कलंक से परे हो, जो पूर्णतः शुद्ध और निष्पाप हो।
जहाँ अन्य बालक संसार की क्रीड़ाओं में लिप्त रहते हैं, वहीं मात्र चार वर्ष की अल्पायु में इस अलौकिक बालक ने बिहार स्कूल ऑफ योग की छत्रछाया में कदम रख दिया था। वहाँ उन्होंने योग निद्रा जैसी सूक्ष्म और उच्च मानसिक विधाओं तथा गहन यौगिक क्रियाओं का अभ्यास प्रारंभ कर दिया। यह कोई साधारण घटना नहीं थी; यह आने वाले समय में विश्व मंच पर छा जाने वाले एक महान आध्यात्मिक सूर्य का अरुणोदय था।
परिव्राजक रूप: वैश्विक क्षितिज पर भारतीय प्रज्ञा का उद्घोष
मात्र दस वर्ष की कोमल आयु में, जब बालक संसार को समझने का प्रयास करते हैं, स्वामी निरंजनानंद ने संन्यास की दीक्षा ग्रहण कर ली। वे गृहस्थ जीवन की सीमाओं को लांघकर संपूर्ण विश्व को अपना कुटुंब बनाने निकल पड़े। इसके पश्चात, उनके जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यापक अध्याय प्रारंभ हुआ जिसे वैश्विक भ्रमण कहा जाता है।
उन्होंने लगभग ग्यारह वर्षों तक विदेशी भूमि पर निवास किया। वर्ष 1971 से उन्होंने यूरोप, उत्तर अमेरिका और दक्षिण अमेरिका महाद्वीपों की व्यापक यात्राएं कीं। इन यात्राओं का उद्देश्य मात्र पर्यटन नहीं, बल्कि पाश्चात्य जगत के भौतिकवाद से त्रस्त मानस को भारतीय योग विज्ञान की शीतलता प्रदान करना था।
इस दीर्घकालीन अंतरराष्ट्रीय अनुभव ने उन्हें केवल योग का प्रचारक ही नहीं बनाया, बल्कि पूर्व के आध्यात्मिक दर्शन और पश्चिम के तार्किक व वैज्ञानिक दृष्टिकोण के मध्य एक सुदृढ़ सेतु के रूप में स्थापित कर दिया। वे पाश्चात्य मानस की भाषा और मनोविज्ञान में भारतीय दर्शन को संप्रेषित करने में पारंगत हो गए।
संस्थागत क्रांति: योग को बनाया जीवन पद्धति
वर्ष 1983 में जब वे भारत लौटे, तो गुरु आदेशानुसार उन्हें बिहार स्कूल ऑफ योग के नेतृत्व का गुरुतर दायित्व सौंपा गया। यहाँ से उनकी संगठनात्मक और मार्गदर्शिका प्रतिभा का एक नया आयाम संसार के सामने आया। उन्होंने योग को कंदराओं और मठों से निकालकर जन सामान्य की दिनचर्या का हिस्सा बनाने का भगीरथ प्रयास किया।
उन्होंने गंगा दर्शन, शिवानंद मठ और योग अनुसंधान फाउंडेशन के माध्यम से योग के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक पक्षों में समन्वय स्थापित किया। उनके इस पुरुषार्थ के मील के पत्थर निम्नलिखित हैं:
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आध्यात्मिक उत्तराधिकार (1993): स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से उन्हें अपना योग्य आध्यात्मिक उत्तराधिकारी चुना।
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बिहार योग भारती की स्थापना (1994): यह विश्व का ऐसा अनूठा संस्थान बना, जहाँ योग को एक पूर्ण शैक्षणिक और वैज्ञानिक विधा के रूप में मान्यता मिली। यहाँ योग को मात्र शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि चेतना के विज्ञान के रूप में पढ़ाया जाने लगा।
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योग प्रकाशन ट्रस्ट की स्थापना (2000): इसके माध्यम से उन्होंने यौगिक ज्ञान के साहित्य को अत्यंत सुलभ और प्रामाणिक रूप में वैश्विक स्तर पर प्रसारित किया।
इन समस्त प्रयासों के मूल में उनका एक ही ध्येय था कि योग केवल एक साधना पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक उत्कृष्ट, अनुशासित और स्वस्थ शैली है।
त्याग और वैराग्य की पराकाष्ठा: पद से परे, पूर्णत्व की ओर
स्वामी निरंजनानंद सरस्वती का जीवन हमें सिखाता है कि सन्यास का अर्थ केवल दायित्वों से भागना नहीं, बल्कि दायित्वों को पूर्ण करके अनासक्त हो जाना है। वर्ष 2009 में, जब वे सफलता और प्रतिष्ठा के शिखर पर थे, उन्होंने अपने गुरु के एक सूक्ष्म आदेश को शिरोधार्य करते हुए समस्त प्रशासनिक पदों, संस्थागत ऐश्वर्य और अधिकारों का तत्क्षण परित्याग कर दिया। यह आधुनिक युग में त्याग का एक विरल उदाहरण था।
एक स्वतंत्र, निर्लिप्त संन्यासी के रूप में उन्होंने स्वयं को पुनः पूर्णतः आंतरिक साधना के हवाले कर दिया। वर्ष 2013 से वे निरंतर पंचाग्नि तपस्या और उपनिषदों में वर्णित अत्यंत गूढ़, कठिन वैदिक अनुष्ठानों में लीन हैं। तीव्र ग्रीष्मकाल में चारों ओर अग्नि जलाकर और ऊपर सूर्य के प्रचंड ताप के बीच की जाने वाली यह तपस्या शरीर और मन को तपाकर कंचन बनाने की पराकाष्ठा है। आज वे मौन, अंतर्मुखता और आत्मिक शुद्धि के उस महासागर में गोते लगा रहे हैं, जहाँ केवल ब्रह्म चेतना का वास है।
राष्ट्र और वैश्विक समाज द्वारा वंदन
योग के लोक कल्याणकारी विस्तार और मानवता के प्रति उनकी इस अनथक, निष्काम सेवा को रेखांकित करते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2017 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक पद्म भूषण से अलंकृत किया। यह सम्मान वास्तव में उस आदि योगी की परंपरा का सम्मान था, जिसे स्वामी जी आधुनिक युग में जी रहे हैं।
शाश्वत प्रेरणा: स्वामी जी के जीवन का संदेश
स्वामी निरंजनानंद सरस्वती का तपस्वी जीवन संपूर्ण मानव जाति के लिए कुछ अमूल्य और कालजयी संदेश छोड़ता है:
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साधना की कोई आयु नहीं होती: यदि आत्मा में तड़प और संकल्प हो, तो बाल्यकाल भी आत्मसाक्षात्कार का माध्यम बन सकता है।
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ज्ञान और अनुशासन का समन्वय: सच्ची आत्म उन्नति और वैश्विक नेतृत्व केवल कोरी बातों से नहीं, बल्कि कठोर आत्म अनुशासन और प्रामाणिक ज्ञान से ही संभव है।
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अनासक्ति ही अंतिम सत्य है: पद, प्रतिष्ठा और संस्थाएं केवल साधन हैं, साध्य नहीं। समय आने पर इन सबका सहर्ष त्याग कर देना ही एक सच्चे संन्यासी की पहचान है।
कायस्थ गौरव गाथा की श्रृंखला के अंतर्गत स्वामी निरंजनानंद सरस्वती जी एक ऐसे जाज्वल्यमान प्रकाश स्तंभ हैं, जिनकी कीर्ति कौमुदी किसी जाति, समाज या राष्ट्र की सीमाओं में आबद्ध नहीं है। यद्यपि कायस्थ समाज उनके कुल गौरव के रूप में गौरवान्वित है, परंतु सत्य यह है कि वे संपूर्ण वसुधा के कल्याण के लिए अवतरित एक वैश्विक चेतना हैं। उनका जीवन इस शाश्वत सत्य का उद्घोष करता है कि यदि मनुष्य का संकल्प अडिग हो और गुरु कृपा सहगामी हो, तो एक अकेला साधक भी अपनी तपस्या के बल पर संपूर्ण विश्व को अध्यात्म और शांति का मार्ग दिखा सकता है।
कायस्थ समाज के लिए बड़ी पहल: “श्री चित्रगुप्त तीर्थ दिव्य दर्शन सेवा केंद्र” का शुभारंभ
अखिल भारतीय कायस्थ महासभा का एक समर्पित सेवा-संकल्प
कायस्थ समाज के श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण और सराहनीय पहल करते हुए, अखिल भारतीय कायस्थ महासभा द्वारा “श्री चित्रगुप्त तीर्थ दिव्य दर्शन सेवा केंद्र” प्रकल्प की शुरुआत की गई है। इस योजना का उद्देश्य के-कार्ड (k-card) धारक कायस्थ श्रद्धालुओं को देश के प्रमुख तीर्थ स्थलों पर सुलभ, सुव्यवस्थित और सहज दर्शन की सुविधा उपलब्ध कराना है।
इस सेवा-प्रकल्प का संचालन माननीय राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनूप श्रीवास्तव जी के कुशल मार्गदर्शन एवं दिशा-निर्देशन में किया जा रहा है। उनके नेतृत्व में गुजरात की समर्पित टीम देश के विभिन्न धार्मिक स्थलों एवं तीर्थ क्षेत्रों में “श्री चित्रगुप्त तीर्थ दिव्य दर्शन सेवा केंद्र” की स्थापना कर सक्रिय रूप से सहायता कार्य कर रही है।
इस पहल के अंतर्गत, विश्व के किसी भी कोने में निवास करने वाले कायस्थ श्रद्धालु एक सरल ऑनलाइन फॉर्म के माध्यम से अपने तीर्थ आगमन की पूर्व सूचना दे सकते हैं। इसके उपरांत, सेवा केंद्र की टीम द्वारा उन्हें—
सुलभ एवं व्यवस्थित दर्शन व्यवस्था
स्थानीय मार्गदर्शन एवं आवश्यक सहायता
यात्रा को सरल, सुरक्षित एवं सुविधाजनक बनाने में सहयोग
वर्तमान समय में यह सुविधा कुछ प्रमुख तीर्थ स्थलों पर प्रारंभ कर दी गई है, और निकट भविष्य में इसे देश के अन्य प्रसिद्ध तीर्थों तक विस्तार देने की योजना है।
समन्वय टीम (संपर्क हेतु):
कृष्ण कुमार श्रीवास्तव – 97251 27020
विजय सक्सेना – 84692 86357
प्रदीप श्रीवास्तव – 97129 74577
संजय श्रीवास्तव – 92271 56961
अमित सक्सेना – 9099666693
महासभा का संकल्प है कि सेवा, श्रद्धा और समर्पण के भाव के साथ प्रत्येक कायस्थ श्रद्धालु तक तीर्थ सुविधाओं को पहुँचाया जाए, ताकि उनकी यात्रा अधिक सुगम, पवित्र और यादगार बन सके।
जन्मदिन विशेष: आप भी भेजिए राजकुमार संतोषी को अपनी शुभकामनाएँ
भारतीय सिनेमा जगत के प्रख्यात निर्माता-निर्देशक, अखिल भारतीय कायस्थ महासभा युवा प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय संरक्षक एवं समाज के गौरव राजकुमार संतोषी जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ।
वे न केवल सिनेमा के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं, बल्कि सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहकर समाज को नई दिशा देने का कार्य भी कर रहे हैं। राष्ट्रीय युवा अध्यक्ष वेद आशीष श्रीवास्तव के साथ उन्होंने चर्चित फिल्म “गाँधी गोडसे: एक युद्ध” का निर्माण किया और अब वे अपने आगामी प्रोजेक्ट “चित्रगुप्त की सभा” एवं “आतंक का अंत” जैसे विषयों पर कार्य कर रहे हैं।
इस वर्ष 14 अगस्त 2026 को उनकी बहुचर्चित फिल्म “बटवारा 1947” परदे पर आने जा रही है।
आइए जानें कायस्थ समाज के इस गौरव की प्रेरक जीवन गाथा
राजकुमार संतोषी भारतीय हिंदी फिल्म जगत के उन चुनिंदा निर्देशकों में से हैं, जिन्होंने अपने दमदार निर्देशन, सशक्त लेखन और सामाजिक संदेशों से सिनेमा को एक नई ऊँचाई दी है। वे प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक पी.एल. संतोषी के पुत्र हैं, जिनकी विरासत को उन्होंने और अधिक गौरवशाली बनाया।
जन्म और शिक्षा
राजकुमार संतोषी का जन्म 5 जुलाई 1956 को चेन्नई में हुआ। बचपन में ही वे जबलपुर और फिर मुंबई आ गए। उन्होंने केवल 10वीं तक ही शिक्षा प्राप्त की और 11वीं कक्षा बीच में ही छोड़ दी। लेकिन उनका सपना बड़ा था l फिल्म निर्देशन में कुछ अलग और बड़ा करने का।
उनके परिवार में उनकी पत्नी मनीला, बेटा राम और बेटी तनिषा हैं। उनके पिता पी.एल. संतोषी एक प्रतिष्ठित फिल्म निर्माता-निर्देशक थे, जिनका प्रभाव राजकुमार संतोषी के जीवन और करियर पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
संघर्षों से सफलता तक का सफर
जब संतोषी मात्र 5 वर्ष के थे, तब उनका परिवार मुंबई आ गया। लेकिन यहां उनके पिता को अपेक्षित काम नहीं मिला और परिवार को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। साल 1978 में पिता के निधन के बाद परिवार की सारी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई।
इन्हीं कठिन परिस्थितियों ने उन्हें मजबूत बनाया। उन्होंने पढ़ाई छोड़कर फिल्म जगत में संघर्ष करना शुरू किया और अपने सपनों को साकार करने की दिशा में आगे बढ़े।
करियर की शुरुआत
राजकुमार संतोषी ने अपने करियर की शुरुआत विधु विनोद चोपड़ा के साथ काम करके की। इसके बाद उन्होंने निर्देशक गोविंद निहलानी के साथ रहकर निर्देशन की बारीकियां सीखीं। वे निहलानी जी को अपना गुरु मानते हैं।
शानदार फिल्मी सफर
1990 में आई उनकी पहली फिल्म “घायल” ने उन्हें रातोंरात प्रसिद्धि दिलाई। इसके बाद उन्होंने कई सुपरहिट और यादगार फिल्में दीं:
- घायल (1990)
- दामिनी (1993)
- अंदाज़ अपना अपना (1994)
- बरसात (1995)
- घातक (1996)
- चाइना गेट (1998)
- पुकार (2000)
- लज्जा (2001)
- द लेजेंड ऑफ भगत सिंह (2002)
- खाकी (2004)
- अजब प्रेम की गजब कहानी (2009)
- फटा पोस्टर निकला हीरो (2013)
- गांधी गोडसे: एक युद्ध (2023)
- बटवारा 1947 (2026)
पुरस्कार और उपलब्धियाँ
- फिल्म “घायल” के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्मफेयर पुरस्कार
- फिल्म “दामिनी” के लिए भी सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्मफेयर अवॉर्ड
- फिल्म “द लेजेंड ऑफ भगत सिंह” को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
अन्य योगदान
- अर्द्ध सत्य (1982) – सहायक निर्देशक
- विनाशक (1998) – पटकथा
- जानम समझा करो (1999) – पटकथा एवं सह-निर्माता
- दिल है तुम्हारा (2002) – पटकथा
आगामी प्रोजेक्ट
- चित्रगुप्त की सभा (सीरीज़)
- घायल 2
- अदा अपनी अपनी
राजकुमार संतोषी का जीवन हमें यह सिखाता है कि कठिन परिस्थितियाँ भी हमें आगे बढ़ने से रोक नहीं सकतीं, यदि हमारे पास दृढ़ संकल्प और मेहनत करने का जज्बा हो।
आप भी इस महान फिल्मकार को उनके जन्मदिन पर अपनी शुभकामनाएँ भेजें और उनके उज्जवल भविष्य की कामना करें।
कायस्थ समाज का यह गौरव आने वाले समय में और भी नई ऊँचाइयों को छुए यही हमारी शुभकामना है।
राजकुमार संतोषी जी को जन्मदिन की शुभकामनाएँ भेजें
आप भी अपने प्रेरणास्रोत, प्रसिद्ध फिल्म निर्माता-निर्देशक राजकुमार संतोषी जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ भेज सकते हैं
यह एक विशेष अवसर है उनसे सीधे जुड़ने का
आइए, अपने शब्दों से उन्हें सम्मान और स्नेह दें
आपकी शुभकामनाओं को स्वयं राजकुमार संतोषी जी पढ़ेंगे और उन पर अपनी प्रतिक्रिया भी देंगे।
नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपनी शुभकामनाएँ लिखें
क्यों अखंड भारत की नींव रखने के लिए चंद्रगुप्त को लेना पड़ा कायस्थ मेधा का सहारा!
भारतीय इतिहास के पन्नों में केवल रक्त-रंजित युद्धों और तलवारों की खनक ही दर्ज नहीं है, बल्कि इसमें कूटनीति, दूरदर्शिता और राष्ट्र-निर्माण के वे स्वर्णिम अध्याय भी समाहित हैं, जो युगों-युगों तक मानवता का मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे। ऐसा ही एक अलौकिक और विस्मयकारी प्रसंग अखंड भारत के निर्माता सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य, उनके युगद्रष्टा गुरु आचार्य चाणक्य और नंद वंश के परम निष्ठावान प्रधानमंत्री अमात्य राक्षस (मुद्राराक्षस) से जुड़ा है।
चाटुकारिता नहीं, केवल योग्यता की कसौटी: चंद्रगुप्त की महाविजय के बाद शुरू हुआ अखंड भारत की प्रशासनिक परीक्षा का नया अध्याय
जब चाणक्य की कूटनीति और चंद्रगुप्त के पराक्रम ने अत्याचारी धनानंद के साम्राज्य का समूल नाश कर मगध की पावन धरती पर विजय पताका फहराई, तब चारों ओर जयकार गूंज रही थी। किंतु इतिहास गवाह है कि सत्ता परिवर्तन जितना कठिन होता है, उससे कहीं अधिक दुष्कर होता है नई व्यवस्था का सुचारू संचालन। विजय के इस उल्लास के बीच मौर्य साम्राज्य के सम्मुख सबसे यक्ष प्रश्न यह था कि इस विशाल और नवजात साम्राज्य की प्रशासनिक बागडोर किसके हाथों में सौंपी जाए?
समान्यतः विजेता अपनी सत्ता के शीर्ष पदों पर अपने चाटुकारों या परम सहयोगियों को आसीन करते हैं, किंतु मगध की धरती एक ऐतिहासिक महानाट्य की साक्षी बनने जा रही थी।
आत्मघाती निर्णय या अचूक कूटनीति? अमात्य राक्षस की प्रखर मेधा और चाणक्य की दूरगामी दृष्टि का वह अमर प्रसंग
आचार्य चाणक्य, जो प्रतिशोध से ऊपर उठकर केवल 'राष्ट्रहित' का चिंतन करते थे, उन्होंने एक ऐसा अप्रत्याशित निर्णय लिया जिसने तत्कालीन राजनीतिज्ञों को स्तब्ध कर दिया। उन्होंने चंद्रगुप्त को परामर्श दिया कि नंद वंश के सबसे कट्टर समर्थक और पूर्व प्रधानमंत्री अमात्य राक्षस (जिन्हें इतिहास में मुद्राराक्षस के नाम से भी जाना जाता है) को ही पुनः मगध का प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाए।
पहली दृष्टि में यह निर्णय आत्मघाती प्रतीत होता था। एक पराजित शत्रु के सिपहसालार को सत्ता का सर्वोच्च पद क्यों? परंतु चाणक्य की दूरगामी दृष्टि सामान्य मनुष्यों जैसी नहीं थी। वे जानते थे कि अमात्य राक्षस केवल एक पद का नाम नहीं, बल्कि निष्ठा, अटूट प्रशासनिक समझ और प्रखर मेधा के प्रतिमान हैं। उनका विरोध चंद्रगुप्त से नहीं, बल्कि शासन की नीतियों से था।
अमात्य राक्षस के रूप में प्रकट हुआ कायस्थ मनीषियों का दिव्य राष्ट्रधर्म
अमात्य राक्षस कायस्थ समाज के उस गौरवशाली स्तंभ के प्रतीक थे, जिसने सदैव अपनी बुद्धिमत्ता, अद्वितीय प्रशासनिक कौशल और मसि-जीवी (लेखनी के धनी) स्वभाव से राष्ट्र की सेवा की है। इतिहास साक्षी है कि कायस्थ समाज के मनीषियों ने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और कर्तव्यपरायणता के बल पर युगों-युगों से बड़े-बड़े साम्राज्यों को स्थिरता और दिशा प्रदान की है। उनका विवेक कभी किसी व्यक्ति विशेष की गुलामी नहीं करता, बल्कि राज्य और प्रजा के कल्याण के प्रति समर्पित रहता है। अमात्य राक्षस के रूप में कायस्थ मेधा का यही दिव्य रूप प्रकट हुआ, जो पराजय के बाद भी अपनी प्रशासनिक अपरिहार्यता के कारण नव-साम्राज्य की रीढ़ बनने जा रहा था।
मसि-जीवी स्वभाव और तीक्ष्ण बुद्धि का दिव्य रूप: क्यों पराजय के बाद भी नव-साम्राज्य के लिए अपरिहार्य बन गए अमात्य राक्षस!
चाणक्य का दृढ़ मत था कि यदि ऐसे योग्य, नीतिवान और राजभक्त महापुरुष को साम्राज्य का सारथी बनाया जाए, तो मौर्य वंश न केवल सुदृढ़ होगा, बल्कि पराजित प्रजा के मन में भी नए शासक के प्रति अगाध विश्वास का संचार होगा। चंद्रगुप्त ने अपने गुरु के इस तार्किक और राष्ट्रहित से ओत-प्रोत परामर्श को शिरोधार्य किया। अमात्य राक्षस को जब यह आभास हुआ कि चाणक्य और चंद्रगुप्त का ध्येय व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं, बल्कि एक अखंड और समृद्ध भारत का निर्माण है, तो उन्होंने भी अपनी समस्त योग्यता नए साम्राज्य के चरणों में समर्पित कर दी।
राजधर्म सर्वोपरि, मातृभूमि को समर्पण: प्राचीन काल से 'राष्ट्र प्रथम' के महामंत्र को जीता आया है कायस्थ समाज
इतिहास साक्षी है कि कायस्थ समाज प्राचीन काल से ही राष्ट्र की निःस्वार्थ सेवा करता आया है और उसने सदैव 'राष्ट्र प्रथम' के महामंत्र को अपने जीवन में आत्मसात किया है। अमात्य राक्षस (मुद्राराक्षस) का चरित्र इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। उनका जीवन यह सिद्ध करता है कि एक कायस्थ के लिए कोई व्यक्ति या शासक बड़ा नहीं होता, बल्कि उसके लिए उसकी मातृभूमि और राजधर्म सबसे ऊपर होते हैं।
वेद आशीष श्रीवास्तव
राष्ट्रीय युवा अध्यक्ष - अखिल भारतीय कायस्थ महासभा
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आइए, मिलकर ज्ञान, संस्कार और इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुँचाएँ।
वेद आशीष श्रीवास्तव का जीवन परिचय
अखिल भारतीय कायस्थ महासभा ने वेद आशीष श्रीवास्तव को अपनी युवा शाखा का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया है। महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनुप श्रीवास्तव (आईआरएस, सेवानिवृत्त) ने इस नियुक्ति की घोषणा करते हुए कहा कि वेद आशीष का समाज के प्रति समर्पण और उनकी नेतृत्व क्षमता महासभा की युवा शाखा को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी।
वेद आशीष श्रीवास्तव की इस नियुक्ति पर वरिष्ठ संपादक महेश श्रीवास्तव, सेवानिवृत्त आईएएस मनोज श्रीवास्तव, पूर्व सांसद डॉ. आर.के. सिन्हा, पूर्व सांसद आलोक संजर, स्वामी चक्रपाणि महाराज, फिल्म निर्देशक राजकुमार संतोषी और अभिनेता अतुल श्रीवास्तव ने उन्हें अपने आशीर्वाद और शुभकामनाएं दी हैं।
महासभा को विश्वास है कि वेद आशीष श्रीवास्तव के नेतृत्व में कायस्थ समाज नई ऊंचाइयों को छुएगा और युवाओं के बीच एकता और जागरूकता बढ़ेगी।
वेद आशीष श्रीवास्तव का जीवन परिचय
वेद आशीष श्रीवास्तव, एक युवा समाजसेवी, उद्यमी, और कायस्थ समाज के सम्मानित प्रतिनिधि हैं। वे अपनी उम्र के छोटे से दौर में ही समाज की सेवा में गहरी छाप छोड़ चुके हैं। उनका जीवन समाज के प्रति समर्पण और कार्य के प्रति निष्ठा का प्रतीक है।
वेद आशीष का जन्म भोपाल, मध्यप्रदेश में हुआ। वे अपने घर में "रानू" के नाम से प्रसिद्ध हैं। उनके पिता जीवनदानी आर्य समाजी थे, जिन्होंने समाजसेवा के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए। उनके दादा, स्वर्गीय श्री रज्जूलाल श्रीवास्तव, जिन्हें दीवान साहब के नाम से जाना जाता था, एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। उनका परिवार पुराने भोपाल के मारवाड़ी रोड स्थित एक निजी कोठी में रहता था, जिसे दादा ने लालवानी प्रेस को बेच दिया था, और वह अब लालवानी प्रेस रोड के नाम से जाना जाता है।
वेद आशीष ने अपनी सामाजिक यात्रा 17 वर्ष की आयु में शुरू की। उन्होंने 1991 से विभिन्न सामाजिक संस्थाओं में सक्रिय योगदान देना शुरू किया। 1996 से वे सक्रिय रूप से सामाजिक कार्यों में भाग ले रहे हैं और विभिन्न संस्थाओं के दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं। उन्होंने स्वयं सेवी संगठन आसरा लोक कल्याण संस्था की स्थापना की, जिसके माध्यम से उन्होंने कई सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों का आयोजन किया। वे आलोकसभा का आनंद उत्सव और पुरानी किताबों का अपना घर किताब घर के प्रेणता भी हैं। इसके अलावा, उन्होंने कायस्थ समाज के लिए एक बहुउपयोगी वेब पोर्टल का निर्माण किया है।
वेद आशीष श्रीवास्तव का सामाजिक योगदान विशेष रूप से कायस्थ समाज को डिजिटल रूप में एकजुट करने में महत्वपूर्ण रहा है। उन्होंने कायस्थसमाज.इन, कायस्थन्यूज.इन, और कायस्थसमाजशादी.कॉम जैसे डिजिटल प्लेटफार्म स्थापित किए हैं, जो समाज के लोगों को संगठित करने और संसाधनों को साझा करने में सहायक साबित हुए हैं।
वे एक उद्यमी और फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। उनके समाजसेवा के प्रति समर्पण का एक उदाहरण यह है कि वे अपनी आय का 10% हिस्सा समाज की भलाई के लिए दान करते हैं। उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप, अब तक 1 लाख से अधिक कायस्थ परिवारों को एकजुट किया जा चुका है, जिनमें प्रशासन, कला और फिल्म उद्योग से जुड़ी कई प्रतिष्ठित हस्तियां शामिल हैं।
वेद आशीष श्रीवास्तव के वर्तमान और पूर्व पद:
- संस्थापक – अधिष्ठाता, सार्वदेशिक कायस्थ युवा प्रतिनिधि संस्था, मध्य प्रदेश
- निर्माणकर्ता – कायस्थ समाज वेब पोर्टल (www.kayasthasamaj.in, www.kayasthasamajshaadi.com, www.kayasthanews.in)
- अध्यक्ष – प्रबधसंचालक, आसरा लोक कल्याण को-ऑपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी लिमिटेड
- व्यवस्थापक – श्री चित्रगुप्त मंदिर 1100 आवास गृह, भोपाल
- अध्यक्ष – आसरा लोक कल्याण क्रय-विक्रय सहकारी समिति मर्यादित
- मुख्यालय आयुक्त – भारत स्काउट्स एवं गाइड्स, मध्य प्रदेश
- संभाग प्रमुख – विचार मंडल, स्वदेशी जागरण मंच, मध्य प्रदेश
- प्रदेश अध्यक्ष – कायस्थ महापंचायत, मध्य प्रदेश
- अध्यक्ष – म.प्र. युवा कायस्थ संगठन
- सचिव – भोपाल जिला चित्रगुप्त कल्याण मंडल
- संचालक – आर्य वीर दल, मध्य प्रदेश और विदर्भ
- प्रतिनिधि – मध्य भारतीय आर्य प्रतिनिधि सभा
- सभासद – आर्य समाज महावीर नगर, भोपाल
- प्रदेश सहसंयोजक – भारतीय जनता पार्टी, सांस्कृतिक प्रकोष्ठ
- संयोजक – विवेकानंद विचार मंडल, मध्य प्रदेश
- सांसद प्रतिनिधि – संसद सदस्य, 16वीं लोकसभा, भोपाल-19
- निदेशक – कात्यायनी टेलीकाॅम सर्विसेज प्र. लि.
- वित्तीय सलहाकार – संतोषी फिल्म एंड प्रोडक्शन एलएलपी
- निदेशक – एऍमजी, इवेंट एंड इंटरटेनमेंट


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