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22 Oct, 2021

ध्येय पथ पर अडिग कैलाश जी सारंग

ध्येय पथ पर अडिग कैलाश जी सारंग - जयकृष्ण गौड़

 ' सारंग ' परिवार से मेरा परिचय कैलाश जी सारंग के छोटे भाई गोविंद सारंग के माध्यम से हुआ । गोविंदजी इंदौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे, उन्होंने संघ के मंडल कार्यवाह का दायित्व दिया और उनके ही निर्देशों से विद्यार्थी परिषद में विभाग संगठनमंत्री के नाते कार्य किया । संघ के प्रचारक के नाते उनका घर पर आना - जाना लगा रहता था । आपातकाल में सुदर्शनजी , पं . रामनारायण जी शास्त्री के साथ गोविंदजी को भी गिरफ्तार किया गया । इंदौर जिला जेल में संघ और भाजपा के प्रमुख पदाधिकारी एवं नेता थे गोविंदजी दिनभर के कार्यक्रमों की रचना करते थे ध्वज के साथ नियमित शाखा लगती थी । स्वदेश परिवार के संपादक एवं संचालक मंडल को भी गिरफ्तार कर लिया गया था , उस समय मैं स्वदेश का संवाददाता था , इसलिए मुझे भी मीसा में बंद किया गया । गोविंद जी को निकट से जानने समझने का मुझे जेल में अवसर मिला।

      एक बार चर्चा में मैंने पूछा कि ' गोविंद जी आपके परिवार के लोग जेल में मिलने आते है कि नहीं । ' गोविंद जी ने कहा कि मेरे बड़े भाई और भाभीजी का अपार स्नेह मुझ पर है , भाभी जी मिलने आई थी । यह कहने के बाद वे किसी विचार में खो गये । सारंग परिवार उसी ध्येय पथ पर अग्रसर होता रहा जिसके लिए संघ और भाजपा है । एक भाई संघ का प्रचारक और बड़े भाई जनसंघ से लेकर भाजपा की यात्रा में प्रमुख भागीदारी करते रहे । अब इसी परिवार की नई पौध में है , विश्वास सारंग जो विधायक एवं म.प्र . युवा मोर्चा के प्रमुख हैं।

       जनसंघ के समय भी मध्यप्रदेश में जिन आधार स्तम्भों के नाम लिये जाते थे , उनमें कैलाश जी सारंग प्रमुख थे । जनसंघ की पहचान इसी कर्मनिष्ठ और ध्येय निष्ठ नेतृत्व के कारण नहीं , बाद में जब भाजपा की यात्रा प्रारंभ हुई तो उसमें भी सारंग परिवार अग्रिम पंक्ति में दिखाई दिया । संगठन के फैलाव एवं ध्येय निष्ठ कार्यकर्ता निर्माण करने में मोक भैया गद्रे , ठाकरे जी , प्यारेलालजी , कैलाशजी जोशी , कैलाशजी सारंग , पटवाजी , नारायण प्रसाद गुप्ता का महत्वपूर्ण योगदान रहा । ऐसे कर्मठ व्यक्ति की जीवन यात्रा का विवरण किसी बड़े ग्रंथ में भी समेटना कठिन है।

       राजनीति की रपटीली राहों में बिना फिसले , बिना डिगे अपने ध्येय पथ पर आगे बढ़ते रहना काफी कठिन है । वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में बड़े नेता भी अपने निहित स्वार्थ के लिए डगमगा जाते हैं , अनुशासन की मर्यादा का उल्लंघन करने में भी उन्हें तनिक संकोच नहीं होता । लेकिन कैलाश जी सारंग जैसे नेता आपातकाल के तूफान में भी न केवल अडिग रहे बल्कि कार्यकर्ताओं को भी सिद्धांतों पर डटे रहने की प्रेरणा देते रहे।

        कैलाश जी सारंग ने राजनीति के उतार चढ़ाव देखे हैं , संविद सरकार , बाद में जनता पार्टी की सरकार और अब भाजपा की सरकारों के खट्टे मीठे अनुभवों का स्वाद चखा है। राजनीति में विवादों की चर्चा होती है।हर बात को राजनीति से प्रेरित माना जाता है।कैलाश जी सारंग,पटवा जी,सखलेचा जी,प्यारेलाल जी के बारे में राजनीतिक गलियारों में चर्चा होती रही। इस संदर्भ में कैलाशजी सारंग ने प्यारेलालजी की श्रद्धांजलि सभा में जो कहा , उसका संदर्भ देना उचित होगा । उन्होंने कहा कि भाजपा के संगठन और राजनीति की दो धाराएं थीं । ठाकरेजी की कार्य दिशा सीधी सपाट थी , प्यारेलालजी में राजनैतिक चतुराई थी । सबके सहयोग से ही भाजपा का भव्य स्वरूप बन सका । मध्यप्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की कार्य दिशा में थोड़ा बहुत अंतर दिखाई दे , लेकिन सभी ने राष्ट्रवादी सिद्धांतों पर अटल रहते हुए हमेशा अपने लक्ष्य की ओर ध्यान केन्द्रित किया।

          कैलाश जी सारंग का शासन - प्रशासन में भी सतत् सम्पर्क रहता है । जनसंपर्क एवं संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव मनोज श्रीवास्तव का एक दुर्घटना में कंधे की हड्डी में फेक्चर हो गया , जब मैं उनसे मिलने चार इमली स्थित निवास पर गया तो वहां कैलाश जी बैठे हुए थे । उनकी मनोज जी से उसी तरह चर्चा हो रही थी , मानों दोनों एक ही परिवार के हों । कैलाशजी ने चर्चा में कह दिया कि मनोज जैसे आई.ए.एस. अधिकारी बहुत कम हैं । इस प्रकार वरिष्ठ अधिकारियों से भी कैलाश जी का व्यापक सम्पर्क रहता है । उनके जीवन पर जो ग्रंथ प्रकाशित हो रहा है , उसमें भी उनके ध्येय निष्ठ और सिद्धांतों के प्रति समर्पित व्यक्तित्व को पूरी तरह समेटना कठिन है । मैं तो जब भी उनसे मिला , तब उन्होंने बड़े नेह से मुस्कराते हुए चर्चा की।

            मूल्यों , सादगी , मितव्ययिता की चर्चा हवाई उड़ानों को लेकर चल रही है । भारतीय संस्कृति में सादगी जीवन मूल्यों का अटूट हिस्सा है , संघ और भाजपा में ऐसे प्रचारक और नेता हैं , जिनका जीवन सादगी और उच्च विचारों के अनुरूप है । मूल्यों एवं सिद्धांतों की राजनीति करने वाले कैलाशजी को नमन करते हुए ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उनको स्वस्थ रखे , जिससे वे गतिशील रहते हुए लम्बे समय तक हमारा मार्गदर्शन करते रहें । अटलजी के काव्य अंश के साथ अपने विचार प्रवाह को विराम देना उचित होगा।

 उजियारे में , अंधियारे में , कल कछार में बीच धार में
 घोर घृणा में , पूत प्यार में , क्षणिक जीत में
 दीर्घ हार में जीवन के शाश्वत आकर्षक ,
 अरमानों को रचना होगा कदम मिलाकर चलना होगा ...। 

                                                                                       ( लेखक : - स्वदेश के पूर्वप्रधान संपादक एवं चरैवेति के सम्पादक हैं )

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22 Oct, 2021

मध्यप्रदेश में भाजपा के विस्तार के मूल में हैं श्री कैलाश ना . सारंग

मध्यप्रदेश में भाजपा के विस्तार के मूल में हैं श्री कैलाश ना . सारंग - रामभुवन सिंह कुशवाह

 भारतीय जनसंघ के वे प्रारम्भिक दिन कैसे भुलाये जा सकते हैं , जब वह शैशवकाल में ही था । उस समय की तुलना कुछ कुछ द्वापर में भगवान श्री कृष्ण के साथ की जा सकती है । कृष्ण को समाप्त करने के लिए उसके मामा कंस ने क्या - क्या नहीं किया ? उन्हें मरवाने के लिए कभी पूतना तो कभी बकासुर तो कभी वृत्तासुर को भेजा क्योंकि उसे बताया गया था कि यह बालक उसकी मौत का कारण बनेगा । श्री कृष्ण की तरह भारतीय जनसंघ का जन्म भी जेल में ही हुआ । एक सर्वथा झूठे आरोप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाकर उसके अधिकांश कार्यकर्ता जेल में डाल दिये गये । उस समय की लोकसभा एक तरह से कंन्स का राजदरबार ही बन गई थी । कोई एक व्यक्ति भी इस अन्याय के विरुद्ध बोलने को तैयार नहीं हुआ । तब पिता वासुदेव और माता देवकी ने मन ही मन संकल्प किया होगा कि अब कृष्ण को पैदा करना ही होगा । यद्यपि संघ राजनीति में नहीं जाना चाहता था वह राजनीति को कीचड़ समझता था तथापि राष्ट्र की ' चिति ’ को यही मंजूर था । देश की राजनीति को कंन्स के ' काकस ' से निकालकर आम लोगों के बीच लाने के लिए कृष्ण को लाना आवश्यक जो हो गया था । उस समय की मीडिया चाहे नारद हो या आकाशवाणी , आज जैसी ही थी उस ने कंस को यह अहसास करा ही दिया कि उसको मारने वाला पैदा हो गया है।

           जेल से बचने के लिए वासुदेव और देवकी ने कंस को वादा किया था कि वे अपनी आठवीं संतान को उसे सौंप देंगे पर कंस कहां मानने वाला था ? वह तो सभी पुत्रों को मारने में अपनी खैरियत समझ रहा था । द्वापर की यह कथा सबको मालूम है । भारतीय जनसंघ की उत्पति का इतिहास भी किसी से छुपा नहीं है । कंस को मारने के लिए , लोकतंत्र की भाषा में उसका मानमर्दन करने के लिए श्री कृष्ण तो जेल में ही पैदा हो गये थे । बाद में वह आम लोगों , चरवाहों , किसानों मध्यमवर्गीय व्यवसायियों में सक्रिय होकर , गाय - बैलों को चराकर चरवाहों के संगठन कार्य में जुट गये । हमारे समय में ऐसा ही एक कृशकाय कृष्णवर्गीय युवक ग्राम डूमर जिला रायसेन में पैदा हुआ । प्रतिभा पारखी पुरुष कुशाभाऊ ठाकरे ने उसे पहचान कर अपने पास बुला लिया । स्वामी रामकृष्ण ने जिस तरह ' नरेंद्र ' को पहचाना था । उसकी सुप्त प्रतिभा को उभार कर उसे ‘ विवेकानन्द ' बनाया । ठाकरेजी ने भी कैलाश को कैलाश ना . सारंग बना दिया । यूं तो ठाकरे जी ने मध्यप्रदेश में कई कृष्ण तैयार किये पर इस ' कैलाश ' पर उनका विशेष प्यार था । ठाकरे जी और संघ के विचारों से प्रभावित होकर कैलाश जी ने जातिबोध के संबोधन को भी त्याग दिया और अपने नाम के साथ ' सारंग ' जोड़ लिया ( हालांकि आजकल वे कायस्थ महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं ), कुछ ही समय में वे भारतीय जनसंघ के मध्यप्रदेश में एक तरह से पर्याय बन गये ।

           बाद में वे बच्चों को लेकर सोमवारा के एक छोटे से मकान में आकर रहने लगे। उसी मकान में ठाकरे जी रहते थे और उसी में जनसंघ का प्रादेशिक कार्यालय चलता था , जहां प्रदेश भर से संगठन मंत्री और कार्यकर्ता आते थे सारंग जी सभी कार्यकर्ताओं की चिंता भी किया करते थे । उस समय भारतीय जनसंघ अभाव और उपेक्षा की भयंकर चपेट में था किंतु सारंग जी ने अपने कार्यकर्ताओं और संगठनमंत्रिओं की जिस तन्यता से चिंता की उसका उदाहरण आजकल दुर्लभ ही है । 

             मैं तो उस समय भिण्ड में ही था । सीधा सादा सरल विद्यार्थी , पूरा परिवार कांग्रेसी पर स्व. माणिक चन्द्र वाजपेयी ' मामा जी ' ने कब विद्यार्थी परिषद का कार्यकर्ता बना दिया पता ही नहीं चला । विद्यार्थी जीवन राजनीति से अलिप्त था इसलिये यह भी नहीं समझ पा रहा था कि बड़े मेरे भाई क्यों विद्यार्थी परिषद में मुझे नहीं जाने देना चाहते । राजमाता विजया राजे सिंधिया जब जनसंघ में आई तो उनके साथ यशवंत सिंह कुशवाह जैसे कांग्रेसी भी चले आये । मेरे बड़े भाई से उनके निकटस्थ सम्बन्ध थे । तब पूरे परिवार को लगा कि मेरा जनसंघ में जाना उतना गलत नहीं था । उस समय भारतीय जनसंघ में भी दो धारायें थी एक कांग्रेस से आये राजमाता समर्थक लोगों की तो दूसरी भारतीय जनसंघ के संगठन मंत्री द्वारा जोड़े गये कार्यकर्ताओं की। मुझे यशवंत सिंह कुशवाह से ज्यादा नरेश जौहरी आकर्षित कर रहे थे । सच पूछिये तो नरेश जौहरी ने ही मुझे वकालत के व्यवसाय से छुड़वाकर जनसंघ का पूर्णकालिक कार्यकर्ता और एक छात्र से नेता बनाया। 

          यह संयोग ही था कि मिसरौद की एक बैठक में कैलाश ना.सारंग और मेरी एक साथ संगठन मंत्री की घोषणा हुई पर उनके और मेरे दर्जे में जमीन आसमान का अंतर था । मेरे लिए तब सचमुच में सारंगजी आसमान ही थे । मैं एक छोटे से जिला भिण्ड का संगठन मंत्री और सारंगजी एक बड़े राज्य के उभरते हुए संगठन के कार्यालय मंत्री । सारंग जी केवल कार्यालय मंत्री ही नहीं थे तो उस समय भारतीय जनसंघ के सब कुछ ही थे। मैं तो उनका एक समर्थक भक्त ही था। 

           सारंग जी के नेतृत्व में संचालित भारतीय जनसंघ का कार्यालय न केवल आदर्श कार्यालय था बल्कि समूचे संगठन की गतिविधियों का आधार स्तम्भ भी था । सुदूर जिलों से आये कार्यकर्ताओं की चिंता संगठन के व्यय की योजना और कांग्रेस के खिलाफ आंदोलनों की रूपरेखा वहीं से बनती थी । सर्वश्री ठाकरे जी , प्यारेलाल खण्डेलवाल , नानाजी ( नारायण प्रसाद गुप्ता ) मेघराज जी और न जाने कितने जी लोकतंत्र को पटरी पर लाने और देश में शुचिता की राजनीति संचालित करने के लिए पूर्ण तन्मयता से लगे रहते थे । तब सारंग जी मध्यप्रदेश में भारतीय जनसंघ के मुख्य केन्द्र बिन्दु थे । ठाकरे जी का असीम प्रेम , दिलखोल समर्थन और अपार विश्वास उनसे बहुत कुछ करवा लेता था । उस समय भारतीय जनसंघ का कार्यालय एक आदर्श कार्यालय था । उस समय के राजनीतिक प्रस्ताव , कार्यकर्ताओं से पत्र व्यवहार और कार्यालय का संचालन आज भी किसी पार्टी के लिए अनुकरणीय हो सकते हैं । मैदानी कार्यकर्ताओं के साथ सारंग जी के आत्मीय सम्बन्धों ने कई बड़े नेताओं को आकर्षित किया । तब आज जैसी मारा - मारी और एक दूसरे को नीचा दिखाने की स्थिति नहीं थी और यदि होती तो आज भाजपा की इतनी सुदृढ़ स्थिति ही न होती । 

            सारंग जी अपने कार्यकर्ताओं और विशेष कर संगठनमंत्रियों पर कितना विश्वास करते थे इसके एक दो उदाहरण देने से ही समझा जा सकता है कि कार्यकर्ता कैसे बनते हैं और कार्य कैसे खड़ा होता है । उस समय संगठन मंत्रियों को प्रदेश कार्यालय से दौरा आदि के लिए कुछ मानदेय मिलता था । हम लोगों को प्रदेश कार्यालय से कुछ छपे फार्म मिलते थे जिसमें संगठन मंत्रियों को पूरे महीने का व्यय विवरण लिखना होता था । सारंग जी का अपने कार्यालय को निर्देश रहता था कि उस व्यय विवरण पर किसी भी प्रकार की नुक्ताचीनी न करें । गोविंद श्रीवास्तव शायद उस समय हिसाब के आखरी जोड़ पर चेक बनाकर भेज दिया करते थे । कभी कभी तो संगठन मंत्रियों के हिसाब का जोड़ ही गलत होता परंतु उस पर किसी ने आपत्ति नहीं की और चेक उतने का ही जारी होता था जितने कि हिसाब के जोड़ का उल्लेख होता था । हिसाब के लिए न रसीद की जरूरत , न प्रमाण की । हिसाब का विवरण भी नहीं देखा जाता था । मैं तो युवा था एक दो बार सिनेमा देखने और किसी उपन्यास खरीदने का उल्लेख भी हुआ तो भी किसी ने आपत्ति नहीं की और न कभी किसी अन्य से जिक्र किया गया । कहने को यह साधारण सी बात है पर इसके कारण विश्वास का भाव जाग्रत होता है । सारंग जी का यह व्यवहार कार्यकर्ताओं को कितनी प्रेरणा दे रहा था यह तो अब कल्पनातीत ही है । 

          एक और प्रसंग , मैंने भिण्ड में जनसंघ का कार्य प्रारंभ किया उस समय जनसंघ और संघ का काम एक तरह से मिला जुला ही था । स्व . सुधर सिंह कुशवाह संगठन मंत्री बने और मुझे कार्यालय का दायित्व दिया गया । उस समय जनसंघ भिण्ड , मेहगांव , गोहद , रौन या लहार जैसे शहर या कस्बों की ही पार्टी हुआ करती थी । भिण्ड के प्रमुख कार्यकर्ता मामाजी के परम भक्त थे परंतु उनकी रुचि गांव में जनसंघ का काम पहुंचे उसमें कम ही थी । उसी समय राजमाता विजयाराजे सिंधिया का जनसंघ में आना हुआ तो ग्रामीणों का रुझान भी बढ़ा । ठाकरे जी और प्यारेलाल जी के दौरे शुरू हुए । मैं भी कार्यालय का काम सम्हालते हुए दौरे करने लगा । संगठन के चुनाव हुए तो ग्रामीण कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ने से अध्यक्ष , महामंत्री और अन्य पदाधिकारी बदल गये । भिण्ड के स्थापित नेताओं को यह अच्छा नहीं लगा । वे मामाजी से हमारी शिकायत करने लगे । मामाजी एक दो माह में इंदौर से भिण्ड आते , उन सबकी बैठकें लेते , उनकी सुनते और उन्हें समझाते पर मुझसे कुछ नहीं कहते । पुराने कार्यकर्ताओं को लगता कि भोपाल में भले ही भारतीय जनसंघ की सरकार बनी हो भिण्ड में तो उनकी उपेक्षा हो रही है । मैं उनके आक्रमणों का प्रमुख शिकार होता , वे सब मिलकर भोपाल भी शिकायतें भिजवाते , पर उनका अधिक असर नहीं हो रहा था ।

         एक बार इन्ही सब लोगों ने जिला महामंत्री स्व . शिवस्वरुप श्रीवास्तव के नेतृत्व में एक ' शिकायत मंडली ' भोपाल भिजवाई । सारंग जी कार्यस्थ हैं इसलिए कार्यस्थ कार्यकर्ता की अधिक सुनेंगे यह सोचकर शिवस्वरूप श्रीवास्तव को आगे किया गया । वे वकील भी थे । मामले को बेहतर ढंग से रख सकते थे । सभी सारंग जी के पास पहुंचे । तमाम मनगढंत आरोप लगाये गये । पहले तो सारंग जी ने उन्हें धैर्य से सुना पर जब असह्य हो गया तो उन्होंने फटकारना शुरू कर दिया । पर भिण्ड से गये हुए लोग इससे कहां संतुष्ट होने वाले थे । वे दूसरे दिन ठाकरे जी से मिले । ठाकरे जी ने उनका जो हाल किया वह कम से कम मेरे लिए तो अविस्मरणीय और प्रेरणादायक था । ठाकरे जी ने कहा कि वे तुरंत कार्यालय से चले जायें । उन्हें ऐसे कार्यकर्ताओं की कतई आवश्यकता नहीं जो संगठन मंत्री पर आरोप लगाते हों । ठाकरे जी ने कहा कि कोई आग से लाल तवे पर बैठकर भी रामभुवन सिंह पर आरोप लगा रहा हो तो भी वे यह मानने को तैयार नहीं है कि रामभुवन सिंह किसी प्रकार के दोष से ग्रसित हैं । 

            प्रतिनिधि मंडल वापस भिण्ड लौट आया । उनमें से किसी एक ने मुझे पूरा हाल बताया । उसके बाद मुझे अपनी पार्टी और अपने नेताओं पर इतनी आस्था पैदा हुई जो आज भी कायम है । भारतीय जनसंघ हो या भारतीय जनता पार्टी आज इस स्थिति तक पहुंची है तो इसका कारण यही है कि यहां प्रारंभ से परस्पर प्रेम , विश्वास और पारिवारिक वातावरण के संस्कारों को अन्य दूसरी चीजों से ज्यादा महत्व दिया गया । भारतीय जनसंघ और जनता पार्टी केवल भाषणों , नारों , आंदोलनों से आगे नहीं बढ़ी बल्कि ठाकरे जी जैसे असंख्य कार्यकर्ताओं के समर्पण और सारंग जी जैसे तमाम नेताओं के सदासयी व्यवहार से आगे बढ़ती रही है । भोपाल में आकर मेरा व्यक्तिगत नुकसान हुआ है तो यही है कि मैंने इस जनाधार और केडरबेस पार्टी के तमाम नेताओं और मंत्रियों को अत्यंत नजदीक से आकर देखना शुरू किया , तो अब मेरा आस्थाभाव चुकने लगा है । मैं अपने उस पुराने दिनों को याद करता हूं और चाहता हूं कि फिर वहीं लौट जाऊं , जहां की क ख ग ......... से काम शुरू किया था । पर अब न वह सामर्थ्य है और न अब वैसा वातावरण बचा है । तब साधन नहीं थे साधना थी , पैसा नहीं था कार्यकर्ताओं से मिलने और इन्हें जोड़े मनवाने की प्यास थी । तब पदों से लोग भागते थे अब पदों की ओर भागते हैं जबकि सब जानते है व्यक्ति के आदर का कारण पद नहीं हुआ करते । आज परिदृश्य बदला है जिसे कुछ लोग समय की मांग कह दिया करते हैं कुछ मजबूरी बताते हैं पर सत्य यह है कि यह सब भटकाव है । अपनों को छलने से कोई महान नहीं बनता । अपनों को अपनाने से भलें ही महान बना जा सकता हो सम आत्मिक सुख तो मिलना ही है । मैं अपने आदरणीय नेता कैलाश ना . सारंग के अमृत महोत्सव के अवसर पर उनका हार्दिक अभिनंदन करना चाहता हूं । वे दीर्घजीवी , स्वस्थ और प्रमाण चित्त रहें । वे हमारे जैसे असंख्य जनों के मार्गदर्शक और प्रकाश स्तम्भ हैं । इस अथाह मागर में कितने भी तूफान आयें , समय के थपेड़ों के साथ कितना भी भटकाव आये पर दूर टिमटिमाता प्रकाश स्तंभ हमारी दृष्टि से ओझल न ले यही प्रभु से प्रार्थना है।

                                                                                     

                                                                                                                                                      -लेखक वरिष्ठ पत्रकार

          

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22 Oct, 2021

गरल पीकर अमृत कुण्ड में स्नान

गरल पीकर अमृत कुण्ड में स्नान - कैलाशचंद्र पंत

एक ऐसे मित्र के संबंध में लिखना दुविधापूर्ण होता है जिससे आत्मीयतापूर्ण रिश्ते रहे हों । यह दुविधा तब और अधिक बढ़ जाती है , जब व्यक्ति ने निरंतर छलांग लगाकर राजनीति में नेता की हैसियत प्राप्त कर ली हो । तब भय लगता है कि कहीं पुरानी यादों को ताजा करने के फेर में उस व्यक्ति की अर्जित प्रतिष्ठा को धक्का न पहुँचे । तब सोचता हूं कि उस लेखन का अर्थ ही क्या रह जायेगा , जो स्व निर्मित सीमाओं में बंधकर लिखा जायेगा । फिर याद आता है कि जिस अवसर के लिये लिख रहा हूं वह अमृत छलकाने का क्षण है । पर अमृत से पहले समुद्र मंथन में विष ही तो निकला था । इससे कुछ फर्क नहीं पड़ेगा । विष को धारण करने वाले शंकर का निवास कैलाश पर्वत पर ही तो है । आश्वस्त होता हूं कि जिस मित्र के संबंध में लिख रहा हूं उनका नाम कैलाश सारंग ही है ।

       यह संयोग ही है कि हम दोनों की नाम राशि समान है । किंवदन्ती प्रचलित है कि ऐसे संयोगों के बीच पटती भी प्रगाढ़ता के साथ है और विरोध भी धारदार होते हैं । सारंग जी से मेरे संबंधों का ग्राफ कुछ इसी तरह उतरता चढ़ता रहा । वे पारिवारिक रिश्तों की सीमाएं पहिचानते हैं । बखूबी निभाते हैं । रिश्तों की यह डोर कभी टूटी नहीं ।

           भोपाल आते ही मेरा परिचय सारंग जी से हो गया था । यह सन् 1963 के आसपास की बात है । पैंतालीस वर्षों के अंतराल की अनेक घटनाएं घूम जाती हैं । हमारे संबंधों में प्रगाढ़ता खण्डेलवाल परिवार के कारण आई । प्यारेलाल जी खण्डेलवाल उन दिनों प्रमुख नेता थे । यद्यपि प्यारेलाल जी को महू से ही जानता था जब वे संघ के तहसील प्रचारक होकर आए थे लेकिन मेरी मित्रता उनके अग्रज स्व . जगन्नाथ गुप्ता से इंदौर के दिनों से थी । प्यारेलाल जी और सारंग जी संगठन में तो साथ काम करते ही थे , वैसे भी अभिन्न मित्र थे । बाद में प्यारेलाल जी के अग्रज श्री गुलाबचंद खण्डेलवाल के साथ मैंने जब मुद्रण मंदिर प्रारंभ किया तो सारंग जी से औपचारिक संबंध नितांत आत्मीय होते चले गए और धीरे धीरे पारिवारिकता में परिणित हो गये । इन संबंधों की निरंतरता आज भी बरकरार है । 25 जून 1975 को जब आपातकाल की घोषणा हुई थी , मैं सपरिवार दिल्ली में था और मेरे निवास पर महू के कुछ मित्र ठहरे हुए थे । जनसंघ का कार्यालय मेरे निवास के निकट ही था । संभावित खतरा समझते हुए सारंगजी अपने निवास से हटकर मेरे घर चले आये । हमें अनुपस्थित पाकर उनकी प्रतिक्रिया क्या हुई यह तो पता नहीं चला । लेकिन ठहरे हुए अतिथि मित्रों में से दो को सारंग जी से मेरी मित्रता का अनुमान था । राजनीतिक रूप से जागरूक मित्रों ने इस समय स्थिति की गंभीरता को समझते हुए भी , सारंग जी की सम्यक व्यवस्था कर दी । मेरी पत्नी और बच्चे दिल्ली से पहले लौट आये । मुझे कार्यवश दिल्ली रूकना पड़ा । पत्नी के लौट आने के बावजूद सारंग जी ठहरे रहे ।दो दिन बाद श्री रामनाथ गुप्ता ने उनकी अन्यत्र व्यवस्था कर दी । यद्यपि इस स्थान परिवर्तन के कुछ दिन बाद ही श्री त्रिभुवनदास मेहता के साथ वे गिरफ्तार कर लिये गये । यह संस्मरण बताता है कि सारंगजी पारिवारिक रिश्ते बनाते ही नहीं , उन्हें जीते भी हैं । कहीं न कहीं उन्हें विश्वास रहा होगा कि संकट की उस घड़ी में उन्हें निराश नहीं होना पड़ेगा । 

          यह कहना तो सत्य का अतिक्रमण होगा कि सारंगजी के साथ मेरे अनुभव मीठे ही रहे और उनमें खटास पैदा ही नहीं हुई हो । लेकिन उस खटास के बावजूद कटुता नहीं उपजी - मतभेद जरूर सतह पर आ गये । फिर भी मन के किसी कोने में मिठास बरकरार रही । माना जा सकता है कि इसके पीछे राजनीतिज्ञ की व्यावहारिक बुद्धि ने काम किया हो । लेकिन मुझे लगता रहा कि पारिवारिक संबंधों का निर्वाह वे बहुत दूर तक करते हैं । यह अवश्य है कि एक कुशल राजनेता की तरह वे अनुयायी बनाना ज्यादा पसंद करते हैं और मुझमें स्वाभिमान के प्रति विशेष सजगता रही है । शायद हमारे टकराव का यही बिन्दु था ।

          मुझे याद आता है 1986 का वह समय जब भोपाल में हिन्दू एकता मंच का गठन किया गया । इसकी शुरुआत सिर्फ तेरह व्यक्तियों की एक बैठक में की गई । उपस्थित लोगों में से किसी का भी किसी राजनीतिक दल से प्रत्यक्ष संबंध नहीं था । उन सभी को सामान्य नागरिक कहना ही ज्यादा मुनासिब होगा । श्री ओम मेहता को उसका संयोजक मनोनीत किया गया । भाई जी श्री उद्धवदास मेहता भोपाल के वास्तविक जननेता थे । उनके त्याग और तपस्या से , नवाबी शासन में उनके संघर्ष से हिन्दू जनता उन्हें दिल से प्यार करती तथा सम्मान देती थी । श्री ओम मेहता को उनके उत्तराधिकारी के रूप में हिन्दू एकता मंच का संयोजक बनाने का विचार सबने पसंद किया । मंच ने तीन सफल प्रदर्शन किये और उसका दीर्घकालीन प्रभाव हिन्दू समाज में नई चेतना का संचार करने वाला कारक तत्व रहा । एक राजनेता की भांति सारंग जी ने शायद उसे सामानांतर सत्ता केन्द्र माना । मुझे उनके इस दृष्टिकोण से सख्त एतराज था । मुझे लगा कि मंच के पीछे अन्तर्निहित मूल भावना को सारंगजी जैसे व्यक्ति ने समझने की गलती कैसे कर दी । शायद उनकी पार्टी निष्ठा उन पर हावी थी । पर मैं उस घटना को उनकी ऐतिहासिक भूल करार देता हूं । यह गाँठ समय के साथ ढीली जरूर हो गई है ।

         इस घटना के कुछ वर्ष पूर्व ही सारंगजी एक उपचुनाव में खड़े हुए थे । मैंने सक्रिय राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने से परहेज ही किया है । लेकिन श्री सारंग का चुनाव जीतना आवश्यक मानता था । इसलिये मैंने व्यक्तिगत स्तर पर उनके समर्थन में काम किया । मेरी गतिविधियाँ पार्टी कार्यकर्ताओं से निरपेक्ष चल रही थीं । मुझे न तो किसी के समक्ष अपनी सक्रियता का दिखावा करना था और न पार्टी में कोई हैसियत हासिल करनी थी । दुर्भाग्य से सारंग जी पराजित हो गये । पूरे चुनाव अभियान में मेरी भेंट उनसे नहीं हुई । शायद वे मानते रहे कि मैं चुनाव में उनकी खिलाफत करता रहा । यह भी संभव है कि हमारे संबंधों से ईर्ष्या रखने वाले कुछ व्यक्तियों ने सारंगजी को गलत जानकारी दी हो । मेरे स्वाभिमान ने इस बात की इजाजत नहीं दी कि अपनी स्थिति स्पष्ट करूँ । मैंने उनके पक्ष में जो काम किया था उससे मैं संतुष्ट था उसके पीछे न तो किसी प्रकार का लाभ लेने की इच्छा थी और न ही किसी प्रकार का अहसान जताने की ।

        एक बात तो स्वयंसिद्ध है की स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे ने उन्हें जब अपना विश्वत सेनापति बनाया था तो निःसंदेह यह उनकी विशेषताओं को पहिचान कर ही लिया था क्यों की व्यक्ति की परख में ठाकरे जी की दृष्टि एक जौहरी की थी । उनके समक्ष पार्टी के प्रति निष्ठा सर्वोपरि कसौटी थी । यह निष्ठा सारंग जी में पूरी तरह विद्यमान रही । सारंग जी की वैचारिक निष्ठा परीक्षा की घड़ी में भी विचलित नहीं हुई । सारंग जी की जीवन यात्रा स्पष्टतः उनके परिश्रमशील जीवन की कहानी स्वयं कहती है । भाजपा जैसे संगठन के सूत्रों का राजनीतिक उपयोग करने का कौशल भी उनके पास है और रूठे हुए कार्यकर्ताओं को बहलाने की क्षमता भी उनमें है ।

          जो राजनीति में काम करता है उसे आलोचना के प्रहार भी झेलने पड़ते हैं । सारंग जी को वह सब कुछ झेलना पड़ा है । लेकिन उन्होंने धैर्यपूर्वक सभी कुछ सहा और सही वक्त का इंतजार किया । मौका पाते ही प्रत्याक्रमण करने का कौशल भी उन्होंने दिखाया । इसीलिये लोग उनसे आतंकित भी रहते हैं और वे भी बखूबी यह समझते हैं कि उनके निकट आने वाले अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिये ही उन्हें घेरते हैं । ऐसे व्यक्तियों या भीड़ से वे घिरते नहीं , प्रत्युत उनका उपयोग कर लेते हैं । पराजित लोग उनकी आलोचना करते हैं , तो उनका क्या दोष ? 

            सारंग जी के संबंध में बात तब तक अधूरी रहेगी जब तक उनकी साहित्यिक अभिरूचि की चर्चा न कर ली जाय । वे कविता और शायरी में समान रूप से रस लेते हैं । रस ग्रहण की यह क्षमता उन्हें रसिक बनाती है । जो रसिक होता है उसमें मानवीय संवेदना भी कुछ गहरी होती है । राजनीति के मरुस्थल में साहित्यिक अभिरूचि एक रजतद्वीप है । यही कारण है कि वे साहित्य पढ़ते हैं और विषय की व्याख्या में बौद्धिकता का समावेश करते हैं । नवलोक भारत का प्रकाशन और समय - समय पर वैचारिक संगोष्ठियों का आयोजन सारंगजी के व्यक्तित्व के उजले पक्ष हैं । अनेक पत्रकार और लेखक उनकी संवेदना से उपकृत होते रहे हैं । कुछ लोगों को गाढ़े समय में उन्होंने सहारा प्रदान किया यद्यपि वे समाज की इस रीति से परिचित हैं कि उपकारों को भुला देना दुनिया का दस्तूर है । 

       जीवन के 75 वर्ष पूरे करने पर सारंगजी उस शिखर पर खड़े हैं , जहां खोने के लिये अब कुछ नहीं है । वे अनुभवों का समृद्ध कोष संजोए हैं और यह मौका है कि वे आत्माभिमुख ठोकर अमृत का पान करें और गर्व से कहें ' हम विषपायी जनम के ' । स्वयं नीलकंठ बनकर अपने अनुभवों का अमृत कुण्ड नई पीढ़ी को बाँटे । वे समाज को रचनात्मक राजनीति की नई दिशा दें । यह नया भाव - बोध सारंगजी के भीतर बैठे उस मनुष्य का दर्शन करायेगा जिसे अक्सर अनदेखा किया गया था जो उपेक्षित रह गया । मंगलमय भगवान उन्हें संकल्प के नये सोपान पर चढ़ने की शक्ति और सामर्थ्य प्रदान करें । 

                                                                                                                                            ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार है )

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21 Oct, 2021

कैलाश ना . सारंग - एक मुकम्मल शख्सियत

कैलाश ना . सारंग - एक मुकम्मल शख्सियत - राजीव श्रीवास्तव

अमृत जयंती वर्ष पर शत् शत् प्रणाम ? अभिनंदन !
जनाब कैलाश सारंग जैसी बहुमुखी शख्सियत को कौन नहीं जानता । यह नाम ऐसा है जो किसी परिचय का मोहताज नहीं है । मध्यप्रदेश की जनता तो सारंगजी से भली भांति परिचित है ही मगर साथ ही हिन्दुस्तान के तमाम प्रदेशों में बड़ी संख्या में इन्हें जानने और चाहने वाले भरे पड़े हैं । 

     सामाजिक और राजनीतिक तौर पर प्रांतीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर कैलाश बाबू द्वारा जनहित में किये गये कार्यों की लम्बी फेहरिस्त है । मैंने इनका नाम , इनकी प्रसिद्धि वर्षों से सुन रखी थी । मेरे मिलने जुलने वालों में कई लोग ऐसे हैं जिनका सारंगजी से और उनके परिवार से निकट का संबंध रहा है । मुझे व्यक्तिगत रूप से श्री कैलाश सारंग से मिलने का सौभाग्य तकरीबन दो - ढाई साल पहले मिला था । अब तक उनके बारे में जो कुछ मैंने सुना था और जाना था , उससे कहीं ज्यादा मैं तब प्रभावित हुआ जब पहली बार में उनके घर पर उनसे रू - ब - रू हुआ । सादगी भरा व्यक्तित्व , धोती - कुर्ता पहने , चेहरे पर ओज , होठों पर मुस्कान , मीठी जुबान और गर्मजोशी का जज़्बा लिये एक ऐसा शख्स मेरे सामने था जिसे देखकर में क्या , कोई भी अभिभूत हो जाता । इस तरह का चुम्बकीय व्यक्तित्व कम ही देखने को मिलता है । मेरा मानना है कि सादगी में जो आकर्षण है वह बनाव - श्रृंगार में नहीं है । 

      सारंग साहब के साथ मेरी यह पहली मुलाकात तय समय से काफी ज्यादा चली । मैंने यह सारंग साहब के साथ मेरी यह पहली मुलाकात तय समय से काफी ज्यादा चली । मैंने यह महसूस किया कि बातचीत के दरम्यान वो इतने सहज और मित्रवत् हो गये कि ऐसा लगा मानों हम एक दूसरे को वर्षों से जानते हैं । कैलाश जी का होमवर्क कितना दुरुस्त होता था इसका आभास मुझे तब हुआ जब उन्होंने मेरी लिखी दो महत्वपूर्ण पुस्तकों और उस पर मुझे राष्ट्रीय स्तर पर मिले पुरस्कारों का जिक्र किया । यह मेरे लिये एक सुखद आश्चर्य था । हर विषय और देश दुनिया के तमाम मसलों पर हमारी खूब बातें हुई । उन्हीं दिनों भोपाल में ' वर्ल्ड हेरिटेज वीक ' के लिये आयोजित विशेष कार्यक्रम के लिये मैंने पाकिस्तान के मशहूर सूफी गायक उस्ताद शफाकत अली खाँ का गायन अपने बैनर आर.एस. वीजनल पैनोरमा , नयी दिल्ली के अन्तर्गत करवाया था जिसकी तारीफ उन तक भी पहुंची थी और साथ ही उन्हें दिल्ली , मुंबई तथा दूसरे तमाम शहरों में आयोजित होने वाले मेरे कई मेगा इवेंट्स की भी खबर थी । इस संबंध में जब बातें हुई तो उन्होंने मुझे विशेष रूप से अपने उस प्रोजेक्ट की बात बतायी जिसके तहत वह भोपाल में एक वृहद संगीतमय कार्यक्रम करवाना चाह रहे थे । मैंने उन्हें आश्वस्त किया था कि जब भी उन्हें इस प्रकार के किसी भी आयोजन में मेरी आवश्यकता होगी , में उन्हें निराश नहीं करूंगा । 

        हमारी इसी मुलाकात में उन्होंने अपने बेटे विश्वास सारंग का जिक्र किया । उस दिन वो शहर में नहीं थे लिहाजा वो उनसे मेरी मुलाकात नहीं करवा सके पर उन्होंने मुझसे यह जरूर कहा कि अपनी अगली भोपाल यात्रा में आप उनसे जरूर मिलें और कला , साहित्य , संगीत , सिनेमा , संस्कृति के अपने विस्तृत अनुभवों को विश्वास के साथ बांटें । अपनी विरासत को अगली पीढ़ी के हाथों सुपुर्द करके एक पिता , एक गुरु , मार्गदर्शक और संरक्षक किस हद तक संतोष का अनुभव करता है यह मैंने उस दिन कैलाश बाबू के चेहरे पर उभरे भावों को पढ़कर महसूस किया । 

        मैं अपने आपको उन गिने - चुने लोगों में पाकर फक्र महसूस करता हूं जिनकी पारिवारिक निकटता देश के दो महान साहित्यकार परिवारों से रही है । कथाकार कमलेश्वर और हिन्दी के प्रथम गजलकार दुष्यंत कुमार एवं उनका परिवार मेरे लिये हमेशा अपने घर के ही सदस्यों सा रहा है । पिछले दिनों 27 सितम्बर को भोपाल में ही भारत सरकार द्वारा महान कवि दुष्यंत कुमार की स्मृति में विशेष डाक टिकिट जारी किया गया जिसका मुख्य प्रस्तावक होने का मुझे गौरव हासिल हुआ । मैं इस दिशा में पिछले तीन सालों से अनवरत लगा हुआ था जिसमें मुझे तमाम लोगों के साथ - साथ इन दोनों परिवारों का सहयोग एवं मार्गदर्शन मिलता रहा है । आज मैं इसलिये और भी ज्यादा खुश हूं कि दुष्यंत कुमार परिवार में ही बाबू कैलाश सारंग की बेटी उपासना का विवाह हुआ है । दुष्यंत जी के छोटे भाई श्री प्रेमनारायण त्यागी के बेटे अमित से उपासना की शादी हुई है । अब में स्वयं को भी सारंग परिवार का सदस्य कहलाने की एक और वजह पा गया हूं । इस पूरे कुनबे का सदस्य होने पर मैं गौरवान्वित हूं । 

           मैं पुनः आदरणीय कैलाश सारंग जी को उनके अमृत जयंती वर्ष पर प्रणाम करता हूं , अभिनंदन करता हूं और ईश्वर से उनके स्वस्थ शतायु की प्रार्थना करता हूं । 

                                                                                    ( लेखक वरिष्ठ लेखक , स्तम्भकार , सिनेमा एवं संगीत समीक्षक है । )

 

 

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21 Oct, 2021

नई पीढ़ी की नई मिसाल हैं सारंग

नई पीढ़ी की नई मिसाल हैं सारंग - बद वास्ती 

भोपाल की सियासी माहौल की थोड़ी मालुमात रखने वाले के लिये भी मोहतरम कैलाश सारंग साहब का नाम अंजान नहीं होगा और इसी बिना पर मैं भी सारंग साहब को जानता हूं लेकिन वो दूसरे सियासी लीडरों से अलग इसलिये नजर आते हैं कि वो उर्दू जबान को जानते और मानते भी हैं । इसलिये वो सिर्फ सियासी जलसों में ही नहीं बल्कि अदबी महफिलों में भी नजर आते हैं और मैं ऐसी कई महफिलों का गवाह भी हूं जिसमें सारंग साहब की उर्दू की तकरीरें भी सुनी हैं वो भले ही ऐसी सियासी पार्टी से जुड़े हों जिसका एजेंडा कुछ और हो , मगर जाती तौर पर वो भोपाल की गंगा जमुनी तहजीब की एक जीती जागती मिसाल हैं । 

     उर्दू खादिम होने के नाते एक बात में हमेशा महसूस करता रहा हूं कि हम जब हिन्दी उर्दू की दोस्ती की बातें बहुत करते हैं जब मिसाल देने की बात आती है तो हम चकबस्त , फ़िराक , प्रेमचंद्र , बेदी , कृष्णचंद की ही मिसालें देते हैं , जो एक गुजरा हुआ दौर था , बल्कि आज हिन्दी में जो उर्दू लिट्रेचर का अनुवाद मिलेगा , वो भी इस दौर का ही है , आज के दौर में उर्दू में क्या लिखा जा रहा है , इससे हिन्दी वाले अंजान हैं , यही कुछ हालात उर्दू में मौजूद हिन्दी साहित्य का है , यह सब कहते हैं कि उर्दू मुसलमानों की जबान नहीं है और यह सच भी है जिसे आज गोपीचंद नारंग और कैलाश सारंग जैसी मिसालें साबित भी करती हैं , जिन्होंने उर्दू को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया है जो प्रेमचंद , बेदी , रघुपति सहाय , की कड़ी को आगे बढ़ाती है । 

       जिंदगी का हिस्सा बना लिया है जो प्रेमचंद , बेदी , रघुपति सहाय , की कड़ी को आगे बढ़ाती है । कहा जाता है कि किसी की तहजीब को समझना हो तो उसकी जुबान को समझना जरूरी होता है और इसी फलसफे को अपनाकर मोहतरम कैलाश सारंग साहब ने भोपाल की अवाम में अपनी पहचान बनाई है , उनकी मेगजीन में उर्दू शायरी के पेज के सिलसिले में एक दो मुलाकातें भी हुई थीं । एक शायर के कलाम को लेकर एक सिलसिला शुरू किया गया था , जो बाद में किसी वजह से बंद कर दिया गया है , इस मुलाकात के दौरान ही उनकी उर्दू शायरी से मोहब्बत मालूम हुई , फिर अपने बड़ों से साप्ताहिक “ अयाज ” की बातें सुनीं , जो आज के उर्दू हल्के में यादगार दिनों की याद दिलाती है और एक तमन्ना जागती है काश वो अयाज के दिन दोबारा लौटें और सारंग साहब को वो जोश हमारी पीढ़ी को भी देखने को मिले जो उन्होंने उर्दू हिन्दी को एक करने के लिये उठाया था । जिसकी आज के हालात में जरूरत भी है । यही नेक ख़्वाहिशात के साथ मैं उनकी 75 वीं सालगिरह पर दिली मुबारक बाद देता हूं । 

                                                                                                                                        ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार है ) 
 

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21 Oct, 2021

एक साथ हैं पार्टी की नींव और शिखर सारंग जी

 एक साथ हैं पार्टी की नींव और शिखर सारंग जी - ज्ञानेन्द्र नाथ बरतरिया

ये कोई बीस - बाइस वर्ष पहले की बात है । एक एम्बेसेडर कार , जो शक्ल से थर्ड हैंड या फोर्थ हैंड नजर आती थी , भोपाल में भारतीय जनता पार्टी की पहचान जैसी हैसियत रखती थी । यह एम्बेसेडर कार जहां नजर जाती थी , भारतीय जनता पार्टी का कोई कार्यक्रम आसपास ही चल रहा होता था ।

         वह कार सचमुच बहुमुखी या सर्वतोमुखी प्रतिभा वाली थी । नेताओं और कार्यकर्ताओं को लाना ले जाना उसका नियमित काम था । झंडे बैनर ढोने हों तो भी वही कार उपलब्ध होती थी । और जरूरत पड़ने पर टेंट , कनात और दरियां तक उस कार में लद जाते थे । उसकी छत पर माइक स्पीकर तो ऐसे फिट होते थे कि दोनों को एक दूसरे की आदत हो चुकी थी । उस दौर में पुराने भोपाल का शायद ही कोई ऐसा शख्स होगा , जो उस कार को ना पहचानता हो । 

   आज की अधेड़ होती पीढ़ी के लिए बीस- बाइस वर्ष पहले का वह दौर लड़कपन का दौर था । मध्यप्रदेश की राजनीति भी लड़कपन से ही गुजर रही थी । हालांकि राजनीति उसी उम्र में अटक कर चिरयुवा हो गई , लेकिन पीढ़ी आगे बढ़ गई । बहरहाल उस दौर में , कम सके कम भोपाल में , भारतीय जनता पार्टी विद्यार्थी परिषद , युवा मोर्चा और हमीदिया कॉलेज और पॉलिटेक्निक के लड़के सब एक ही होते थे । जब ये लड़के कॉलेज में होते थे , छात्र होते थे , न्यू मार्केट में होते थे तो युवा मोर्चा बन जाता था और वही लड़के जब इमामी गेट या उससे आगे निकल जाते थे , उसी जत्थे को भारतीय जनता पार्टी कहा जाता था । भारतीय जनता पार्टी , विद्यार्थी परिषद और युवा मोर्चा में लोग और भी थे , लेकिन इन संगठनों में नई जान इसी लड़कपन ब्रिगेड ने डाली थी । 

     उस फटी पुरानी एम्बेसेडर कार का इस लड़कपन ब्रिगेड से गहरा अपनापन था । हर कार्यक्रम उसी ब्रिगेड के होते थे और हुल्लड़बाजी को छोड़कर , आरे कार्यक्रमों में उस एम्बेसेडर कार की कोई ना कोई भूमिका जरूर रही होती थी । इसके अलावा इन दोनों में कई और बातें भी एक जैसी थीं । जैसे- दोनों सड़कछाप थे , उन दिनों कार में एयरकंडीशनर या पावर स्टीरिंग की बात कई लोग जानते भी नहीं थे और उसी तरह ये लड़कपन ब्रिगेड भी नहीं जानती थी कि एयरकंडीशनर होता क्या है , पावर क्या होती है और उसकी स्टीरिंग कैसे संभाली जानती है । सबसे अहम और सबसे गहरी साझी बात ये थी कि दोनों भारतीय जनता पार्टी की पहचान होते थे , उसके लिए पूरी तरह समर्पित थे । 

  लड़कपन ब्रिगेड कॉलेजों में पढ़ भी रही थी और किशोर औत्सुक्यवश लड़के तमाम अजीबों गरीब विषयों में हाथ पैर चला कर देख लेते थे । इस ब्रिगेड के सदस्य एक लड़के की रूचि ज्योतिष में थी और एक दिन उसकी नजर इस एम्बेसेडर कार की नंबर प्लेट पर पड़ी। नंबर था - 
       ये तो विवादों का नंबर है- उस उदीयमान शौकिया अंक ज्योतिषी ने कहा । 
       ये विवादों के केन्द्र का नंबर है- एक वरिष्ठ युवा नेता ने जवाब दिया ।

            कैलाश सारंग का परिचय ये कार और ये लड़के थे । ये कार कैलाश सारंग की थी । बुजुर्ग सारंग युवा मोर्चा के पसंदीदा नेता होते थे । नेता ही नहीं , संरक्षक , अभिभावक , आदर्श- सभी कुछ । इस कार की तरह वह भी बहुमुखी या सर्वतोमुखी प्रतिभा के धनी थे । सारंग जी संगठन की बारीकियों पर नजर रखने और पार्टी के कार्यालयों का संचालन संभालने से लेकर टिकट बांटने , मीटिंग करने , जनसभाएं करने और पार्टी के लिए नीतियों के संकलन से लेकर वैचारिक प्रकाशनों की जिम्मेदारी संभालने तक के सारे काम कर लेते थे । कोई कार्यकर्ता नाराज हो तो सारंग जी और कोई कार्यकर्ता बहुत खुश हो , तो भी सारंग जी भारतीय जनता पार्टी के जिला और प्रदेश कार्यालय के सारे रास्ते सारंग जी के दरवाजे से ही होकर जाते थे ।

     और यह भी सारंग जी की सर्वतोमुखी प्रतिभा का एक हिस्सा था कि विवादों के केन्द्र भी वही होते थे और इसकी वजह भी ठीक वही कार और वही लड़के थे । दरअसल हमेशा से विपक्ष में रहने की आदी हो चुकी भारतीय जनता पार्टी या जनसंघ की पुरानी पीढ़ी शांत मुद्रा में आती जा रही थी । प्रवास और बैठकों की तुलना में विश्राम का अनुपात धीरे- धीरे बढ़ने लगा था । आक्रामकता थकती जा रही थी । वैचारिक कारणों से , या विशुद्ध शौक में ही सही , भारतीय जनता पार्टी से जुड़ने वाली नई पीढ़ी इससे ठीक उलट थी । लेकिन पार्टी से जुड़ाव के लिए उसे कोई आधार चाहिए था । सारंग जी वह आधार बने । विवादास्पद विषयों से दूर भागना , भीरुता का पहला लक्षण होता है । सारंग जी सिर्फ धर्मभीरू थे । बेशक टिकट काटते भी वही थे । लेकिन अगर फैसला करने से सभी लोग हाथ खींच लेंगे , तो फैसले कौन करेगा । लिहाजा वह विवादों के केन्द्र थे, बुजुर्ग होकर भी युवा नेता थे और भारतीय जनता पार्टी की इमारत की नींव और शिखर एक साथ थे । पीढ़ियों के बदलाव का ये ऐसा अनूठा रास्ता था , जो टकराव की चढ़ाई चढ़ने के बजाए सहयोग की ढलान पर आगे बढ़ा था । कम्युनिस्ट होते , तो इसे क्रांति कहते । सारंग जी ने कभी कुछ नहीं कहा । तब भी नहीं , जब कभी कभार इसके लिए परोक्ष- अपरोक्ष टिप्पणियां हो जाती थीं । वह सिर्फ एक मौके पर बोलते थे । जब अपने कार्यकर्ता के पक्ष में , उसके बचाव में , उसके हित में बोलना होता था । अनुशासन के साथ चुप रहते हुए क्रांति कैसे की जाती है , यह सारंग जी जानते थे ।

         सारंग जी को एक बार जरूर कहना होगा । अनुशासन और सदभाव के साए में भी तेजी से कार्यकर्ता आधार कैसे बढ़ाया जाता है- यह सीखने की जरूरत भारतीय जनता पार्टी को पूरे देश में है । यह सीख सारंग जी दे सकते हैं । एम्बेसेडर का जमाना अब जरूर लद चुका है । अब भारतीय जनता पार्टी पावर और स्टीयरिंग दोनों का अर्थ जानती है । लेकिन ये एम्बेसेडर और उसका रास्ता दिखाने वाली ये स्टीयरिंग हमेशा हमारे साथ रहे- यही कामना है ।

                                                                                                                 

                                                                                                                      - ( लेखक दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार हैं ) 

 


 

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21 Oct, 2021

भाजपा की धड़कन हैं सारंग जी

भाजपा की धड़कन हैं सारंग जी  - रमेश तिवारी 

भारतीय जनता पार्टी की पत्रिका चरैवेति , मूवआन और अयाज के वर्षों संपादक रहे श्री कैलाश सारंग के संघर्षपूर्ण जीवन के बारे में लिखना कतई आसान काम नहीं स्वयं अपने पैरों पर खड़े होकर वर्तमान मुकाम तक स्थापित होने वाले श्री सारंग स्वयं में एक संस्था है । वे ऐसे मोबाइल नेता हैं जिनके जीवन में विश्राम नहीं है । उनके साथ काम करने वाले लोग | उनकी क्षमता का लोहा मानते रहे हैं । 

   उनकी अपार क्षमताओं और चातुर्य का परिणाम ही है कि वे ईष्या का शिकार बने तथा उन बहुत से अक्षम नेताओं से पीछे रहे जो उनकी धूल भी नहीं छू सकते थे । मैंने एक बार उन पर किसी का एक शेर पढ़ा था " हूँ जो कारवां से पीछे , कोई मसलेहत है वरना , 
" मेरी गर्द भी न पाते मेरे साथ चलने वाले ॥ ” 
     राजनीति में सीधे रास्ते से चलकर कम ही लोगों को सफलता मिलती है । कई नेता आंतरिक भय , ईर्ष्या , अकर्मण्यता और व्यसनों के शिकार होकर अनुचित तरीके या शार्टकट अपना लेते हैं । उन्होंने शार्टकर्ट नहीं अपनाया । श्री सारंग ने जीवन भर संघर्ष किया । पार्टी के प्रति घनघोर अनुशासन , वफादरी , ईमानदारी और समर्पण का भाव रखा । शायद यह गुण उनके खून में समाहित है । परिणामतः इन्हीं गुणों ने उन्हें 1992 तक इतना सशक्त बना दिया कि दूसरों की दृष्टि में वे खटकने लगे । 

      सारंग जी से मेरे परिवार का परिचय 50-55 वर्ष पुराना है जब वे सांची में शासकीय शिक्षक  थे । मेरा पैतृक गांव नौनाखेड़ी समीप ही है । वे मेरे बड़े भाई श्री उमाशंकर तिवारी के शिक्षक है । अतः हमारे गांव भी आते थे । मैं जब भोपाल आया और पत्रकारिता में संलग्र हुआ तब सारंग जी के सम्पर्क में आया । तब से आज तक उनका प्रशंसक भी हूं और विभिन्न रूपों में कृपापात्र भी । वैसे पहले उनसे आदर का एक फासला था किंतु उनके अनन्य प्रेम और आत्मीयता ने मुझे मित्र मान लिया और मेरे बारे में उनका हंसी - मजाक का सिलसिला प्रारंभ हो गया । 

     सारंग जी में जोड़ने के गुण हैं । वे एक बार मिलते हैं तो अपना बना लेते हैं । 1990 में पटवा सरकार में वे शेडो चीफ मिनिस्टिर कहलाते थे । उनका व्यक्तित्व इतना विशाल हो गया था कि लोग उनसे भयभीत हो गए । उनके ही दल के लोग उनकी कहानियां बनाने लगे । उनकी आलोचना किसी दूसरे दल ने कभी नहीं की । केवल उनके प्रतिद्वंदी नेता ही उनका सजरा बताते नहीं थकते थे ।

     सारंग जी में अपार क्षमतायें हैं । वे जब 1986 में टी.टी. नगर भोपाल से विधानसभा का उपचुनाव लड़े तब उनके खिलाफ भाजपा के ही पूर्व विधायक श्री हसनात सिद्धीकी कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में खड़े थे । मैंने नजदीक से देखा कि किस प्रकार से अपनों को अपने ही चुनाव करवाते हैं । सारंग जी को हरवाने में भाजपा के स्थापित नेताओं ने रातदिन एक कर दिए थे । मैं जननेताओं को भलीभांति जानता हूं । उन्होंने प्रण कर रखा था कि सारंग जी को विधानसभा का नहीं देखने देंगे । वे सफल भी हुए । बाद में सारंग जी राज्यसभा में चले गए । यह 1990 की बात है ।

       सारंग जी में जमीन से जुड़े मर्द नेताओं की तरह एक कमी रही । वे कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखते । 1990 में वे इतने पावरफुल थे कि दिन रात लोगों के काम करते रहते । किसी भी दल , किसी भी वर्ग अथवा किसी भी मजहब का व्यक्ति आता वे तत्काल उसकी मदद करने का प्रयास करते । सारंग जी पर कई आरोप भी लगे जिसकी वजह से उन्हें काफी नुकसान हुआ । किन्तु उन्होंने हिम्मत नहीं हारी । समय मिला तो वे कायस्थ समाज को संगठित करने में लग गए और सफल रहे ।

         सारंग साहब वर्तमान भाजपा के स्तम्भ रहे हैं यद्यपि नींव के पत्थरों को लोग नहीं जानना चाहते । वे 24 घंटे के वर्कर रहे । दिन हो या रात उनका घर हमेशा आगन्तुओं के लिए खुला रहता है । उन्होंने कभी किसी को न नहीं किया । मैं जब 1987 में भास्कर से अलग हुआ तब उन्होंने मेरे साथ खड़े होने में संकोच नहीं किया । वे मेरे हर कदम में साथ रहे । यद्यपि भास्कर की शक्ति के आगे लोग भयभीत हो सकते थे किन्तु सारंग जी विधानसभा के सामने आयोजित मेरे धरने तक में बैठे । उनका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ रहा । 

          अब वे काफी बदल गए हैं । थोड़ा बहुत हंसी मजाक भी कर लेते हैं । यह उनका बड़प्पन है कि मैं उनसे कई बार अपनी बात करते वक्त अड़ भी जाता हूँ । वे मान जाते हैं । मैंने 1988 में ' फिर नई राह ' का प्रकाशन प्रारंभ किया और राज्यसभा सदस्य मनोनीत होने पर उनका अभिनंदन किया । मेरे आग्रह पर वे श्री पटवा जी को मुख्यमंत्री के नाते कार्यक्रम में लेकर आए । हालांकि लोगों ने बहुत विरोध किया यहां तक कि गुटबंदी के चलते मुझको मित्र मानने वाले कई मंत्री और नेता उसमें नहीं आए । 

       कुल मिलाकर वे सृजनात्मक नेता हैं । सृजन में आस्था रखते हैं । संहार में उनकी रुचि नहीं है । वे लोगों को आगे बढ़ाते रहे । खुद को तो प्रतिद्वंदियों ने नहीं बढ़ने दिया लेकिन वर्षों उपेक्षित रहे अनेक नेताओं को उन्होंने स्थापित करवाया । में उन नेताओं को जानता हूँ । उनकी सिफारिश और मध्यस्थता मैंने ही की थी ।

      सारंग जी पर मैं पूरी किताब लिखना चाहता हूं किन्तु संभव नहीं हो पाता । उनकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है । समय के साथ व्यक्ति में बदलाव स्वभाविक है उनमें भी अनेक बदलाव आए हैं । लेकिन वे जायज लगते हैं - उन पर एक शैर है -
 जिन पत्थरों को हमने अता की थीं धड़कनें । 
जब बोलने लगे तो हमीं पर बरस पड़े । 

     सारंग जी के जीवन में ऐसा हुआ । उन्होंने अनेक पत्थरों में जान डाली । किन्तु नतीजा वही हुआ जो आज की अहसान फरामोश दुनिया में होता आया है । 
      सारंग जी विशाल हृदय हैं । भोपाल की नब्ज हैं । हर दिल अजीज हैं भाजपा की धड़कन रहे हैं । उन्होंने कई लोगों से जख्म खाए हैं । वे जख्मी जरूर हैं , किन्तु टूटे नहीं हैं । उनकी जिंदादिली के अनेक किस्से हैं , वे अच्छे लेखक , उर्दू के जानकार और बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं । ईश्वर उनको शतायु करे । वे हम जैसे लोगों का मार्गदर्शन करते रहें । 

                                                                                                                                ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )  

 

 

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21 Oct, 2021

जितने ऊपर उतने अंदर सारंग जी

जितने ऊपर उतने अंदर सारंग जी - चन्द्रहास शुक्ल 

जब आस्था के विशाल जहाज भंवर में फंसे हों और महलों की नींव से पत्थर ऊपर आने को बेताब हों , उस वक्त में एक ऐसे व्यक्ति से बावस्ता हूं जो न खुशी में ज्यादा उछलता है न गम में गहरा डूबता है । मैं उन्हीं सारंगजी ( भाई सा . ) की चंद यादें कागज पर उतारना चाहता हूं । इस जगह यह कहना अनुचित नहीं होगा कि मेरे लिखने से उनकी छवि में चार चांद नहीं लगने वाले , लेकिन इससे मुझे जरूर लाभ होगा । 

     इंदौर में पूर्व परिचित संघ के विभाग प्रचारक मा . गोविंद जी सारंग के मितभाषी स्वभाव के कारण मेरी धारणा यह थी कि इनके बड़े भैया तो और कम बोलते होंगे । लेकिन यह विचार तभी तक रह पाया जब तक मैं मा . कैलाश जी के संपर्क में नहीं आया । मा . सुदर्शनजी ने कहा और में भोपाल आ गया , सरस्वती शिशु मंदिर में , शाहजहाँनाबाद के शिशु मंदिर में इनके सभी बच्चे ( विश्वास को छोड़कर ) पढ़े हैं । पीरगेट पर भारतीय जनसंघ का कार्यालय था और वहीं भाई सा . सपरिवार रहते थे । 

    उनके कामकाज और परिचय क्षेत्र को देखकर अज्ञात प्रेरणा होती थी कितना काम करते हैं , भाई सा.? लेकिन यह भी देखता था कि जन - सामान्य पर इसका विशेष प्रभाव नहीं होता । यहां तक कि भाई सा . की भेजी गई विज्ञप्तियाँ भी अखबारों में नहीं छप पाती । कभी छपती भी थीं तो चन्द्र सेंटी मीटर में फिर भी उत्साह में कोई कमी नहीं दिखती । निरंतर पानी पीटने जैसा परिश्रम । राजनीति के हंगामेदार माहौल में चटपटी खबरें निर्मित करना वैसे भी संघ की रचनात्मक पृष्ठभूमि से आए कार्यकर्ता के स्वभाव में आसानी से शामिल नहीं हो पाती थीं । वामपंथी - कांग्रेसी सोच हावी था । भाई सा . ने इस किले में सेंध लगाई यह तो कोई निश्चित तौर पर नहीं कह सकता । मगर यह तयशुदा हकीकत है कि उन्होंने निरंतर प्रयास और शीरी जुबान के जरिये यह सफलता पाई थी।
    
      मैं  बहुत अच्छी तरह जानता हूं कि साम्प्रदायिकता की तोहमतों का भारी बोझ लेकर भी उन्होंने अनेक ऐसी शख्सियतों को भी अपने साथ जोड़ लिया था जो आने वाले समय के लिए भी उदाहरण हैं 
   एक - एक कार्यकर्ता से व्यक्तिगत परिचय यह उनकी अपनी विशेषता है । इतना ही नहीं वे यह भी जानते हैं कि कौन व्यक्ति क्या - क्या कर सकता है । इसी के साथ यह लिखना भी जरूरी है कि वे मात्र किसी का उपयोग करना ही नहीं जानते अपितु उसके लिए क्या करना है यह भी जानते हैं और करते हैं । आपातकाल में मैंने प्रदेश स्तर पर यूथ फॉर डेमोक्रेसी बनाकर अभिव्यक्ति की आजादी का अभियान छेड़ दिया था । जनता पार्टी की सरकार बनी तत्पश्चात विधानसभा चुनाव में जनता पार्टी की विजय हुई । मेरी गतिविधियों और स्वभाव से भाई सा . भलीभांति परिचित थे । शायद इसीलिए जब मैंने राजनीति में निरंतर रहना चाहा तो उन्होंने पसंद नहीं किया । मैं भी वापस अपने काम में लग गया । 

भोपाल लोकसभा क्षेत्र उस समय जनसंघ या भाजपा का गढ़ नहीं कहा जा सकता था किन्तु जीत सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने जो योजनाएँ क्रियान्वित करा दीं वे मील का पत्थर साबित हुई । ये योजनाएं क्या थीं ? इन्हें नींव में ही रखा जाए यही उचित है । हाँ परिणाम प्रत्यक्ष है भोपाल लोकसभा क्षेत्र भाजपा का गढ़ है। 

      एक बात और वे चाहते तो बहते हुए पानी में हाथ ही नहीं धो लेते बल्कि स्नान भी कर लेते किन्तु वे सत्ता की दौड़ में शामिल नहीं हुए । ऐसे व्यक्तित्व किंग - मेकर होते हैं , किंग नहीं । तभी तो वे एक बार विधानसभा चुनाव लड़े और हरा दिये गए । व्यक्ति के पारखी और योजनाओं को जमीन पर उतार देने की समर्थ भूमिका निभाने वाले भाई सा . काफी कुछ कर सकते हैं और करेंगे ऐसी मुझे आशा है ।

                                                                                                                                            ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार है )

 

 

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20 Oct, 2021

एक ऐसा व्यक्तित्व जिसे शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल ........

एक ऐसा व्यक्तित्व जिसे शब्दों में व्यक्त  करना मुश्किल ....

-   भूपेन्द्र निगम

यह बात सत्य है कि किसी भी व्यक्ति में दृढ़ इच्छाशक्ति , परिश्रम करने की क्षमता और कार्य के प्रति निष्ठा की भावना निहित हो तो वह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता अर्जित करता है और दूसरों के लिए मार्गदर्शक , पथ प्रदर्शक व अनुकरणीय बन जाता है । कैलाश सारंग जी , में यह सभी गुण मौजूद हैं इसीलिए वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी माने जाते हैं । उनके व्यक्तित्व , दीर्घ अनुभव और बड़प्पन की तुलना किसी से नहीं की जा सकती । वे सबसे अलग व्यक्तित्व के धनी हैं । 

         वर्ष 1977 में जब मैं दैनिक भास्कर भोपाल में कार्यरत था तब आदरणीय सारंग जी से मेरा परिचय हुआ था । पत्रकार होने के नाते कई बार कई विषयों पर उनसे चर्चा करने के लिए मुझे उनसे मिलना पड़ता था । उस समय वे सोमवारा स्थित पार्टी के कार्यालय में बैठा करते थे और वहीं एक कमरे में उनका निवास भी था । उस वक्त भारतीय जनता पार्टी का जन्म नहीं हुआ था प्रदेश में जनता पार्टी की मिली जुली सरकार थी । उस दौर में यह बात बहुत साफ थी कि जनसंघ को मध्य प्रदेश में पूरी ताकत से खड़ा करने और उसके बाद 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना में पार्टी के करीब आधा दर्जन नेताओं के नाम हर जुबान पर होते थे उनमें सर्वश्री कुशाभाऊ ठाकरे , सुंदरलाल पटवा , कैलाश जोशी , प्यारेलाल खंडेलवाल , नारायण प्रसाद गुप्ता , कैलाश सारंग और बाबूलाल गौर के नाम शामिल थे । इनमें संगठनात्मक रूप से पार्टी को मजबूती देने में सर्वश्री  कुशाभाऊ ठाकरे , सुंदरलाल पटवा कैलाश जोशी , प्यारेलाल खंडेलवाल , नारायण प्रसाद गुप्ता और कैलाश सारंग प्रमुख तौर पर आधार स्तंभों में माने जाते थे । 

      पार्टी कार्यालय का प्रभार महामंत्री के रूप में लंबे समय तक सारंगजी के पास रहा और इस दौरान उन्होंने प्रदेश के अनेक जिलों , कस्बों और गांवों तक सतत दौरे किए थे । जहां तक मुझे याद है इन दौरों में कार्यकर्ताओं से वे जीवंत संपर्क बनाए रखते थे यही वजह है कि पार्टी के . अधिकांश कार्यकर्ताओं को वे नाम लेकर बुलाते थे और सैकड़ों लोगों के नाम उनकी जुबान पर तब भी थे और आज भी उसी तरह कायम हैं जैसे वे उनके बीच बरसों रहे हों या उनके परिवार के सदस्य हों । उनकी इस विशेषता को पार्टी के कई वरिष्ठ नेता आज भी मानते हैं । कार्यकर्ता के प्रति अपार सम्मान , विनम्र व्यवहार और उनकी भावना को जानकर उसके अनुरूप कार्य करने की अद्भुत कला सारंग जी में शुरू से रही है । यही कारण है कि चाहे राजनीति हो या अन्य कोई क्षेत्र , जब कोई व्यक्ति अधिक लोकप्रिय हो जाता है और ऊंचाईयों को छूने लगता है तो कुछ लोग उसकी सफलता के विरोधियों के रूप में भी पैदा हो जाते हैं । राजनीति का क्षेत्र हो या समाज का कोई अन्य क्षेत्र वहां विरोधियों का होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है । ऐसा ही सारंग जी के साथ उनके कार्यक्षेत्र में भी हुआ उन पर आर्थिक अनियमितता के आरोप भी लगे पर उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से कोई बयानबाजी नहीं की और न ही कभी प्रेस के समक्ष कोई बात की । वे कभी विचलित नहीं हुए । पत्रकार होने के नाते कई बार मैंने उन्हें कुरेदने की कोशिश की लेकिन सार्वजनिक तौर पर वे कुछ भी कहने से बचते रहे । वे अपनी व्यथा जरूर सुनाते रहे लेकिन व्यक्तिगत रूप से।वैसे भी मैंने उनके मुख से कभी किसी की कड़ी आलोचना नहीं सुनी वे सतत अपने एवं पार्टी के कार्य में लगे रहे । उन्हें पार्टी के वरिष्ठ नेताओं अटल जी , आडवाणी जी , राजमाता जी और ठाकरे जी का आशीर्वाद और अपार स्नेह भी मिला जिसकी वजह से वे वरिष्ठ नेताओं की भावना के अनुरूप संगठन के कामकाज को गति देते रहे । फिर सार्वजनिक राज में एक दौर ऐसा भी आया कि उनके विरोधियों ने राजमाता जी एवं ठाकरे जी के निधन के बाद अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया ऐसी स्थिति में भी सारंग जी ने विरोधियों को मात देने के बारे में कभी नहीं सोचा बल्कि अपने भाग्य को दोष दिया कि शायद मेरा प्रतिकूल समय होने के कारण मुझे इस स्थिति का सामना करना पड़ रहा है । 

         उन्होंने हिम्मत नहीं हारी इस दौर में उन्होंने अपने को राजनीति से कुछ उदासीन कर लिया और तटस्थ रहे । वे जानते थे कि सच्चाई की डगर एक दिन फिर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ेगी और वह अवसर भी लंबे समय बाद आ गया । ये उनके धैर्य का ही नतीजा था । यह सारंग जी का बड़प्पन ही था कि उन्होंने अपने विरोधियों को शिकस्त देने के बारे में न तो कभी सोचा और ना ही ऐसा कोई प्रयास किया । 

         मुझे 1981 से 1984 तक पं . दीनदयाल विचार प्रकाशन की पत्रिका ' चरैवेति ' में कार्य करने का अवसर भी मिला तब में उनके काफी नजदीक रहा और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ उनकी राजनैतिक यात्राओं को देखने समझने का अवसर भी मिला । मैंने देखा वे परिवार की चिंता करने के बदले पार्टी के कार्य को अधिक महत्व देते थे सुबह से लेकर देर रात तक पार्टी कार्यालय में बैठना और लिखना - पढ़ना पार्टी कार्यकर्ताओं को पत्र लिखकर संपर्क बनाए रखना उनकी दिनचर्या में शामिल रहा और जो अभी है । मुझे भी उनसे बहुत कुछ सीखने का मौका मिला । हमेशा अपने छोटे भाई की तरह उनका स्नेह और आशीर्वाद मिलता रहा है । वे मेरे लिए मार्गदर्शक है । उनके दीर्घ राजनैतिक अनुभव के कारण उन्हें ' किंग मेकर ' की संज्ञा भी मिली । प्रदेश में भाजपा की पहली सरकार बनने पर उन्हें इसी रूप में जाना जाता था । मैंने उन्हें जिन रूपों में देखा उनमें एक अच्छे राजनेता , कुशल संगठक , प्रखर वक्ता बेहतरीन शायर और कवि , समाजसेवी एक सफल लेखक व पत्रकार के गुण उनमें मौजूद हैं जिसकी वजह से वे बहुमु प्रतिभा के धनी माने जाते हैं । 

          आदरणीय सारंग जी के बारे में मुझ अदने से व्यक्ति द्वारा कुछ लिखना सूरज को रोशनी दिखाने जैसा कार्य है । उनके जीवन के पिचहत्तर बसंत पूर्ण करने पर उन्हें शुभकामना है , वे दीर्घायु हो और हम सबको सदैव उनका मार्गदर्शन मिलता रहे यही हमारी कामना है और अंत में इन दो पंक्तियों के साथ अपनी बात समाप्त करता हूं -
 " सारंग जी पर बहुत मुश्किल है , शब्द वाणी लिखना 
   जैसे बहते हुए पानी पर है , पानी लिखना ”   

                                                                                                                 ( लेखक प्रतिष्ठित पत्रकार हैं )

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20 Oct, 2021

बहुमुखी प्रतिभा के धनी है सारंग जी

बहुमुखी प्रतिभा के धनी है सारंग जी - नवीन शर्मा 

 मुझे लगभग पांच वर्ष पहले श्री कैलाश ना . सारंग जी से जुड़ने का | अवसर मिला जब सारंग जी ने मुझे उनके द्वारा निकाली जा रही पाक्षिक पत्रिका “ नवलोक भारत ” से जुड़ने का मौका दिया , जो मैं आज भी जुड़ा हुआ हूं । तबसे ही मैं उन्हें देख रहा हूं , और उनसे बहुत कुछ सीख रहा हूँ । | इससे पहले मैंने सिर्फ उनका नाम सुना था । चूंकि सारंग जी भी बरेली ( म.प्र . ) क्षेत्र के हैं और में भी उसी क्षेत्र का हूं । आज सारंग जी की उम्र 75 वर्ष से अधिक हो गई है लेकिन इतनी उम्र में भी उनकी कार्यों के प्रति एकाग्रता , प्रबंधन में पकड़ बरकरार है । इस सबके बावजूद माह में 15-20 दिन का टूर भी करते है । श्री सारंग जी में एक हुनर बहुत खूब है कि काम को कैसे करें और कैसे कराया जाए इसकी शैली अद्भुत है । वह कार्यों को बिना रुके , बिना थके अंजाम तक पहुंचाकर रुकते हैं । उनका व्यकित्व प्रभावशाली है । उनका स्वभाव शालीन , मृदुभाषी एवं मिलनसार है । बड़ों का आदर और छोटों को बहुत सारा स्नेह यह उनकी खूबियां हैं । पारिवारिक सदस्यों के जैसा ही उनका कार्यालय के लोगों के साथ व्यवहार रहता है ।  

            ऐसा कहा जाता है कि यह गुण सारंग जी में शुरू से ही है । उन्होंने कभी भी कामों में  लापरवाही नहीं की और न ही लापरवाही बर्दाश्त की । उनके राजनैतिक जीवन की कार्यशैली उस समय के लोगों के मुँह जुबानी सुनी है । छोटे से छोटे और बड़े से बड़ा काम कैसे किया जाए इसकी काबिलियत उनमें विद्यमान है । अपने जीवन में उन्होंने कई बड़े से बड़े कार्यों का बखूबी अंजाम दिया हैं वह चाहे राजनैतिक स्तर के हो या सामाजिक स्तर के एक बेहतर प्रबंधक में कितने गुण होने चाहिए , वह उनमें कूट - कूट कर भरे हुए हैं । वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी है । सारंग जी का राजनैतिक कैरियर जनसंघ से शुरू हुआ था । जब देश में व प्रदेश में जनसंघ का जनाधार कम ही था । 

        बचपन से सारंग जी संघ से जुड़े हुए हैं । अपने अथक प्रयासों से उन्होंने पार्टी को मजबूत किया है । उनके बारे में बताया जाता है कि जब सारंग जी कार्यालय में हुआ करते थे तब उन्होंने घण्टों - घण्टों काम किया है और वन मेन की तरह कार्य संभाला है । ऐसी अद्भुत ऊर्जा बिरले को ही मिलती है । आज वह जब उम्र के इस पड़ाव में पहुंच गए हैं तब भी उनकी कार्यों के प्रति रुचि और कुछ न कुछ करने का जुनून सवार रहता है । मैंने कभी भी उन्हें खाली बैठे नहीं देखा है । खाली समय में भी उनके दिमाग में कुछ न कुछ चलता रहता है । वह एक सफल राजनेता के अलावा एक अच्छे पत्रकार एक समाजसेवी , कुशल वक्ता और शायर भी हैं । यह सब जानते हैं कि वह भाजपा के एक कुशल संगठक , कुशल कार्यकर्ता और सफल राजनेता हैं । इसके अलावा भी  उन्होंने आज कायस्थ समाज के लिए अपना योगदान दिया है उसे कभी नहीं भूला जा सकता है । देश के करोड़ों कायस्थों को एक डोर में पिरोकर इतना बड़ा संगठन खड़ा किया है । वह समाज के लिए मिसाल है । देश के हर प्रांत , हर जिले में कायस्थों का डंका पिटवाया है । कायस्थ समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते उन्होंने इस संगठन को खड़ा कर दिया है । देश के किसी भी कोने में समाज के आयोजन करवाएं , इसका पूरा श्रेय श्री सारंग जी को ही जाता है । समाज के कार्यो के लिए वह कई दिनों तक प्रदेश के दौरों पर भी रहते हैं और जब घर पर रहते हैं तो फोन के जरिए समाज की तमाम गतिविधियों पर नजर रखते हैं । मैं आज भी उनके सम्पर्क में हूं और उनकी पत्रिका से जुड़ा हुआ हूँ । मैं देखता हूं कि इस उम्र में भी एक एक गतिविधि पर नजर रखना , परामर्श देना तथा व्यवस्था बनाए रखना उनकी दिनचर्या में शामिल है । एक चीज श्री सारंग जी में है कि वह समय के बहुत पाबंद है वह चाहे अपने लिए हो या दूसरों के लिए आज भी उनकी निजी दिनचर्या में सुबह पांच बजे उठना , टहलना , समय पर अपने ऑफिस में बैठना आदि शामिल हैं । मैंने उन्हें कभी भी काम को टालते हुए नहीं देखा है । जो कुछ भी करना है तत्काल करते हैं । आज भी दर्जनों उनके शुभ चिंतक उनसे प्रतिदिन मिलने आते हैं और कुछ कामों के लिए भी आते हैं तो जो मदद उनसे बनती है उसे वह तत्काल कराने की कोशिश करते हैं यदि नहीं होता है तो मना कर देते हैं , लेकिन टालते नहीं हैं । यही कारण है कि उनके चाहने वाले हजारों लोग उनके इस गुण से प्रभावित है । मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि श्री सारंग जी को शतायु बनाएं । 

                                                                                                                              ( लेखक प्रतिष्ठित पत्रकार हैं )

 

 

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20 Oct, 2021

श्री कैलाश नारायण जी सारंग भोपाल की गंगा - जमनी तहज़ीब के एक सुतून हैं ।

श्री कैलाश नारायण जी सारंग भोपाल की गंगा - जमनी तहज़ीब के एक सुतून हैं ।       -जावेद यज़दानी

मैं समझता हूँ भोपाल में रहने वाला कोई भी शख्स ये नहीं कहेगा कि मैं उन्हें नहीं जानता , जब मुझसे भी उनके बारे में लिखने को कहा गया तो मैं कैसे इंकार कर सकता था , श्री कैलाश नारायण सारंग कायस्थ समाज के फरज़न्द हैं और इस समाज में उर्दू के बड़े - बड़े जानकार हुए हैं , खुद सारंग साहब बहुत अच्छी उर्दू बोलते हैं और जब बोलते हैं तो मुंह से फूल झड़ते हैं शायद इसीलिये उर्दू वाले भी उन्हें अपना ही समझते हैं । उनका अंदाजे बयां दिलों को छू लेता है । दिल के बड़े साफ़ अपने समाज के बड़े योद्धा गहरी सूझ बूझ वाले सारंगजी अपनी तकरीरों में अफलातून लगते हैं , उनकी फिक्र ( चिंतन ) उनकी पार्टी का अनमोल सरमाया है । 

    श्री कैलाश नारायण सारंग हमेशा से ही उर्दू जुबान के दिलदार रहे हैं , उनकी जादूगरी शख्शियतों में उर्दू जुबान का बहुत योगदान है , इसीलिए वह अकसर उर्दू एकेडमी में बुलाये जाते हैं श्री सारंग ज़बरदस्त राजनैतिक और सामाजिक पकड़ रखते हुए बहुत सादा मिजाज़ हैं अपने हर मिलने वाले को खुशआमदीद कहते हैं । 

    मुझे हैरत इस बात पर है कि ऐसे असर - रसूख वाले शख्स को पार्टी ने अभी तक भोपाल का सांसद नहीं बनाया । 

        श्री सारंग भोपाल के साथ ही आस - पास के क्षेत्रों में अपनी अच्छी पकड़ रखते हैं अगली बार पार्टी उनको सांसद बनाती है तो यह भोपालियों के साथ इंसाफ होगा उनकी खूबी यह है कि वह सभी वर्गों में मक़बूल हैं , उनकी मक़बूलियत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उनका बेटा विश्वास सारंग कारपोरेशन से लेकर असेम्बली तक किसी चुनाव में नहीं हारा । श्री आरिफबेग ने जब उर्दू साप्ताहिक अयाज़ को खैरबाद कहा तो श्री सारंग जी ने बरसों उस अखबार की सरपरस्ती की । उर्दू वाले श्री सारंग की न सिर्फ इज्जत करते हैं । अपना रहनुमा भी मानते हैं एक बार मुझसे उन्होंने उर्दू पत्रिका “कारवाने अदब ” की न सिर्फ तारीफ़ की बल्कि बहुत सराहा भी । उसके मज़ामिन की तारीफ में बहुत कुछ कहा था , वह मुझे अब भी याद है । उर्दू एकेडमी की भी उन्होंने भरपूर मदद की है । 

   भोपाल के मुसलिम घरानों में उनके करीबी ताअल्लूकात हैं , हिन्दू मुस्लिम एकता के वह पुरजोर हिमायती हैं । 

        दिलकश खट्टोखाल के धनी श्री कैलाश नारायण सारंग अभी भी युवाओं से अधिक फूर्तीले हैं , चुस्त हैं दुरुस्त हैं । खुदा उनको लम्बी उम्र दे |
                         
                                                                               ( लेखक एडिटर दैनिक भोपाल हलचल , उर्दू साहित्य पत्रिका ' कारवाने अदब ' हैं )

 

 

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20 Oct, 2021

पत्रकार - राजनेता श्री सारंगजी

पत्रकार - राजनेता श्री सारंगजी    -प्रियकुमार

श्री कैलाश नारायण सारंगजी देश के उन गिने चुने राजनेताओं में से एक हैं जिन्होंने पत्रकारिता से राजनीति में प्रवेश किया और राजनीति के क्षेत्र में पद और प्रतिष्ठा का प्रभामण्डल चारों ओर होने के बावजूद पत्रकारिता से अपने पहले प्यार को वे विस्मृत नहीं कर सके । राजनीति के क्षेत्र में कुछ समय के लिए उन्होंने भले तटस्थ भाव अपना लिया हो परन्तु उनके अन्दर का पत्रकार हमेशा जीवित रहा । जनसंघ , जनता पार्टी और फिर भारतीय जनता पार्टी में महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए उन्होंने समाज और संगठन के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह पूरी निष्ठा एवं ईमानदारी से किया परंतु इस दौरान भी पूरे समय पत्रकारिता से जुड़े रहकर लोकतंत्र के सजग प्रहरी की भूमिका के साथ भी उन्होंने पूरा न्याय किया । एक सफल राजनेता को उन्होंने एक सजग पत्रकार के ऊपर कभी हावी नहीं होने दिया । इसका सबूत पाक्षिक पत्रिका नवलोक भारत के अंतिम पृष्ठ पर “ विचार अनुभूति ” शीर्षक स्थायी स्तम्भ के अंतर्गत नियमित प्रकाशित होने वाले उन आलेखों से मिलता है जिनमें श्री सारंग ने अपनी पार्टी भारतीय जनता पार्टी की तीखी आलोचना से कभी परहेज नहीं किया । इस पत्रकार राजनेता की पैनी कलम “ न दवाब न भेदभाव ” की नीति पर अनवरत चलती रही । ‘ अपने और पराए ' का तत्व कभी भी लेखनी पर हावी नहीं हो पाया । उनके लेखन में “ सबसे पहले राष्ट्रहित और सबसे ऊपर राष्ट्रहित ” के तत्व की प्रधानता रही । वे इन तमाम वर्षों में विशुद्ध रूप से एक राष्ट्रवादी पत्रकार के रूप में हमारे सामने आए हैं । 

          जब उन्होंने भोपाल से पाक्षिक नवलोक भारत का प्रकाशन प्रारंभ किया था तब पत्रिका का ध्येय वाक्य ही यही था “ पत्रकारिता राष्ट्र के लिए , समर्पण सिद्धांत के लिए । ” विचार अनुभूति में प्रकाशित उनके सारे आलेख इस ध्येय वाक्य की कसौटी पर खरे उतरते हैं । इस व्यावसायिक युग में भी सारंग जी के लिए पत्रकारिता एक मिशन है । वे जब लिखने के लिए बैठते हैं तब वे केवल पत्रकार होते हैं , एक ऐसा निर्भीक पत्रकार , जो राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरित होकर लिखता है । उस समय सारंग जी के अन्दर बैठा पत्रकार न तो भाजपा का वरिष्ठ नेता होता है और न ही किसी एक विचारधारा का पोषक । लिखते वक्त उनके समक्ष राष्ट्र और समाज का हित ही सर्वोपरि होता है । सारंगजी बेलाग लिखते हैं , बेबाक लिखते हैं , साफगोई के साथ लिखते हैं और बेपरवाह होकर लिखते हैं । लिखते वक्त वे यह चिंता नहीं करते कि उनकी साफगोई और बेबाक लेखन से उनके निजी हित भी प्रभावित हो सकते हैं । 

        स्पष्ट लेखन के बावजूद उनकी भाषा में कहीं हल्के प्रहार नहीं होते । मंजी हुई भाषा और नपे तुले शब्दों में वे अपनी बात इस अंदाज में कहते हैं कि दिल की गहराईयों तक उतर जाती है । वे अपने दल की खामियों पर भी वैसा ही तीक्ष्ण प्रहार करते हैं जैसा कि कांग्रेस , साम्यवादी या अन्य दलों पर राष्ट्र की सुरक्षा में लापरवाही , समाज में फैली कुरीतियों और व्यवस्था के दोषों पर उनकी कलम कई बार आग उगलती दिखती है । व्यवस्था की खामियों के लिए जिम्मेदार लोगों पर वे तीखे प्रहार करते हैं । सार्वजनिक जीवन में शुचिता के पक्षधर सारंगजी आजकल के सुविधाभोगी नेताओं की आडंबरपूर्ण जीवन शैली को भी निशाना बनाने से नहीं चूकते । उनके लेखन में उनके गहन अध्ययन मनन और चिंतन की झलक मिलती है । वे ऐतिहासिक संदर्भों में वर्तमान घटनाओं की व्याख्या करते हैं । अकाट्य तर्कों के साथ प्रामाणिक लेखन ही उनकी असली पहिचान है । 

      सिद्धांतों पर अडिग रहने का उनका चिरपरिचित स्वभाव लेखन में कई बार उन्हें कठोर भी बना देता है । वे आक्रामक भी हो उठते हैं परन्तु कहीं भी उसमें कटुता दिखाई नहीं देती । यह इस बात का परिचायक है कि बेलाग लेखन करने वाला यह पत्रकार राजनेता अन्दर से कितना संवेदनशील है । सक्रिय राजनीति में पदार्पण के पूर्व श्री सारंग ने प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्रों जागरण और नवभारत के संपादकीय विभाग में अपनी सेवाएं प्रदान की थीं । राजनीति में व्यस्तता के बाद भी पत्रकारिता में उनकी रुचि बनी रही । भाजपा कार्यालय से निकलने वाली चरैवति ( हिन्दी ) , अयाज ( उर्दू ) और मूवआन (अंग्रेजी ) पत्रिकाओं के सफल और नियमित प्रकाशन के सूत्रधार श्री सारंग ही थे । श्री सारंग की मौलिक सूझबूझ और परामर्श से इन पत्रिकाओं का रूप निखरा । पत्रिकाओं का हर अंक संग्रहणीय होता था । श्री सारंग हमेशा इस बात पर जोर देते थे कि उक्त तीनों पत्रिकाओं में भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं के विचारों के साथ ही देश के प्रमुख विचारकों , चितंकों , मनीषियों के आलेख भी प्रमुखता से प्रकाशित किए जाएं । कालांतर में अयाज एवं मूवआन पत्रिकाओं का प्रकाशन अवरुद्ध हो गया । चरैवति प्रदेश भाजपा कार्यालय दीनदयाल परिसर से नियमित रूप से प्रकाशित हो रही है । समाचार पत्रों को लोकतंत्र का सजग प्रहरी मानने वाले श्री सारंग ने चरैवेति प्रकाशन के स्थानांतरित होने के बाद नवलोक भारत का प्रकाशन प्रारंभ करने का निश्चय किया । दृढ़ इच्छा शक्ति के धनी श्री सारंग ने शीघ्र ही नवलोक भारत को हिन्दी भाषी क्षेत्रों की लोकप्रिय पत्रिका के रूप में राष्ट्रीय प्रतिष्ठा दिलाने में सफलता पाई । श्री सारंग के अथक प्रयासों का ही सुफल है कि ' नवलोक भारत ' आज संपूर्ण रंगीन पत्रिका के रूप में प्रकाशित हो रही है जिसका विशाल पाठक परिवार है तथा जिसमें विख्यात लेखकों , विचारकों की उत्कृष्ट रचनाओं का समावेश होता है । ' नवलोक भारत ' की मुख्य विशेषता यह है कि पत्रिका में सामग्री चयन में कोई समझौता नहीं किया जाता । व्यावसायिकता के इस युग में भी पत्रिका अपने स्थापित मानदण्डों से कभी विचलित नहीं हुई । कभी कभी ऐसा नियमित प्रतीत होता है कि सारंगजी मूलतः एक पत्रकार ही हैं । खूब पढ़ते हैं , खूब लिखते हैं , लिखते हैं । उनका चैम्बर एक व्यस्त राजनेता का कक्ष नहीं बल्कि एक जीनियस का ' स्टडी रूम ' या लाइब्रेरी रूप प्रतीत होता है । श्री सारंग के कक्ष की कई आलमारियों में आपको विश्व के प्रसिद्ध विद्वानों के पठनीय ग्रंथ करीने से रखे हुए मिल जाएंगे । उनकी लायब्रेरी में किताबों की संख्या में इजाफा एक नियमित प्रक्रिया है । सुबह उठकर देशभर के प्रमुख अखबार पढ़ने का उन्हें पुराना नशा है । सारी व्यस्तताओं और यहां तक कि रोगावस्था में भी वे अखबार पढ़े बिना नहीं रह सकते । कहीं किसी हादसे की खबर पढ़कर उनके इस संवदेनशील पत्रकार के चेहरे पर वेदना की लकीरें खिंच जाती हैं तो आंतरिक सुरक्षा में सरकार की लापरवाही के समाचार पर वे उद्विग्र हो उठते हैं । कमजोर तबके के लोगों पर अत्याचार की खबरें पढ़ते ही वे स्वयं उसके निराकरण की पहल करते हैं । वे केवल आलोचना नहीं करते बल्कि समस्या का समाधान भी सुझाते हैं । वे सनसनीखेज पत्रकारिता के ऊपर उद्देश्यपूर्ण पत्रकारिता को तरजीह देते हैं । वे कभी नकारात्मक दृष्टिकोण से प्रेरित होकर नहीं लिखते । दुष्यंत कुमार का यह शेर इस राजनेता पत्रकार के लेखन पर खरा उतरता है 
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं 
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए ॥ 
     अंत में , मैं यही कहना चाहूंगा कि सारंगजी मूलतः एक पत्रकार ही हैं राजनेता तो वे बाद में बने  , राजनीति में उनकी सक्रियता कम ज्यादा भले होती रही हो परंतु उद्देश्यपूर्ण पत्रकारिता के पथ पर वे हमेशा आगे बढ़ते रहे । ईश्वर से प्रार्थना है कि इस पत्रकार राजनेता को दीर्घायु प्रदान कने और वे स्वस्थ रहकर अपनी अशक्त लेखनी के जरिए देश , समाज और राजनीति की ' सूरत ' बदलने के मकसद में कामयाब होते रहें । 

                                                                                                                                           ( लेखक पत्रकार हैं )

 

 

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20 Oct, 2021

उन्हीं की वजह से मेरी रिपोर्टिंग परिपक्व हुई

उन्हीं की वजह से मेरी रिपोर्टिंग परिपक्व हुई   -प्रकाश भटनागर , 

मैं भोपाल का नहीं हूं लेकिन भोपाल से अपनी पत्रकारिता शुरू करते ही सारंग जी के संपर्क में आया था । उनसे मेरी पहचान एक पत्रकार के रूप में हुई थी और जल्दी ही वे मेरे भी चाचा जी के रूप में तब्दील हो गए । यह उनके सहज , सरल और हंसमुख स्वभाव की वजह से ही संभव हुआ , इसमें मेरे कायस्थ होने का कोई योगदान कम से कम नहीं था । मैंने 1989 में देशबंधु से भोपाल में अपने केरियर की शुरूआत की थी । यह एक ऐसा अखबार था जिसमें किसी को उम्मीद नहीं थी कि प्रदेश में भाजपा अपने दम पर सरकार बना लेगी । यह भी तब था जब लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रदेश की चालीस में से 27 सीटें जीत चुकी थी , सिवनी से प्रहलाद पटेल निर्दलीय और चार सीटें उसके गठबंधन की सहयोगी जनता दल ने जीती थी । देशबंधु में स्वर्गीय राज भारद्वाज जी राजनीतिक संवाददाता थे और उनका मानना था कि भाजपाई बहुत असहिष्णु किस्म के लोग होते हैं और उनके बारे में सोच विचार कर ही खबर लिखना चाहिए । मैं मंदसौर का था और यहां भाजपा के प्रदेश कार्यालय मंत्री उस समय रघुजी थे , मेरा उनका मंदसौर का परिचय था इसलिए स्वाभाविक रूप से राजनीतिक रिपोर्टिंग से मेरा कोई लेना देना नहीं होते हुए भी मैं वहां आया जाया करता था । इस दौरान भाजपा में किसी की रूचि नहीं थी वहां भाजपा मेरी स्वाभाविक बीट हो गई । मुझ नौसिखिए को शुरूआत में ही राजनीतिक रिपोर्टिंग का मौका मिल गया । उस समय शीशमहल में कैलाश सारंग जी चुनावी माहौल में भाजपा की नियमित ब्रीफिंग को संबोधित करते थे और मैं इसकी रोज रिपोर्ट करता था । यह उनसे मेरे परिचय की शुरूआत थी । पटवा सरकार बनने के बाद सारंग जी भाजपा के सर्वाधिक ताकतवर लोगों में गिने जाते थे । मैं उनसे जब भी शीशमहल में जाकर मिलता था उनसे मिलने लोगों की लाईन लगी रहती थी । भोपाल का हर भाजपा कार्यकर्ता और यहां के स्थानीय पत्रकार बंधु भी उन्हें चाचा जी के नाम से संबोधित करते थे और ऐसे में मैं भी उन्हें पता नहीं कब उन्हें चाचा जी कहने लगा । बाद में भाजपा के आंतरिक विवादों के कारण सारंग जी कुछ समय पार्श्व में - रहे । उस वक्त मैंने उनके साथ बहुत समय बिताया और भाजपा और उसके नेताओं की कार्यशैली को समझने में सारंग जी से मुझे बहुत मदद मिली । इसका फायदा यह भी हुआ , ऐसा मुझे लगता है कि भाजपा और राजनीति के बारे में मेरी रिपोर्टिंग परिपक्व हुई । इसके लिए मैं जिन लोगों का ताउम्र आभारी रहूंगा , सारंग जी का स्थान उसमें सबसे ऊपर है । मैं उनके सुदीर्घ जीवन की कामना करता हूँ ।

                                                                                                                        ( लेखक दैनिक ' जागरण ' समाचार सम्पादक हैं )

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20 Oct, 2021

सादगी , शिष्टाचार और सौजन्यता की प्रतिमूर्ति कैलाश सारंग

सादगी , शिष्टाचार और सौजन्यता की प्रतिमूर्ति कैलाश सारंग - शिवप्रसाद मुफलिस 

श्री कैलाश सारंग को मैं लगभग 45 वर्षो से जानता हूँ । मैं पहली बार उनके सम्पर्क में आया जब मैं स्व . कुशाभाऊ ठाकरे जी से मिलने पीरगेट स्थित पार्टी कार्यालय गया । सारंग जी पार्टी कार्यालय में ही एक कमरे में निवास करते थे । मै कास्मोपालिटन इन्स्टीटयूट आफ पब्लिक अफेयर्स ' सीपा ' नामक संस्था का महामंत्री था । यह संस्था देश - विदेश के जाने माने विचारकों को अपने विचार व्यक्त करने के लिये आमंत्रित किया करती थी । मुझे स्मरण पड़ता है कि श्री अटल बिहारी बाजपेई , श्री बलराज मधोक , श्री दीनदयाल उपाध्याय , श्री सुब्रमणियम स्वामी आदि को बुलाने में श्री कुशाभाऊ ठाकरे एवं श्री कैलाश सारंग ने बहुत मदद की थी । देखते - देखते भाई कैलाश सारंग जीवन के जिस पायदान पर जा पहुंचे हैं उससे आभास होता है कि श्री सारंग में दीर्घजीवियों जैसी मुख मुद्रा , प्रसन्न चित्त और स्फूर्ति अभी बरकरार है । हमारा मानना है कि भाई कैलाश सारंग सृजन और सेवा के मिलन बिन्दु हैं। आपकी लेखनी असरदार और वाणी में वह ताकत है कि वह हर किसी को भी अपनी ओर खींच लेती है । किसी भी इंसान की खूबियों और कार्यों का स्मरण करते समय हमें यह समझ लेना चाइए कि इंसानों की जिन्दगी कायनात में समुद्र की लहरों की तरह है जो थोड़ी देर के लिये बात से उभरती है और फिर उसी में मिल जाती है । देखने वालों को यह लहरें एक ही ढर्रे पर हुई दिखाई पड़ती है , मगर कभी कभी हवा के थपेड़ों से कोई जबरदस्त मौज उठती है , जो दूर तक पानी की सतह पर हलचल पैदा कर देती है । 

       ऐसी जानदार और पुरकशिश हस्ती का जमाने में आम लोगों के लिये दिलकश भी होती हैं और यादगार भी । ऐसी ही एक खरिव्सयत का नाम है कैलाश सारंग ।

 मैं सारंगजी की मिसाल ऐसे हीरा से करता हूं जिसके कई पहलू होते हैं । सारंगजी की सियासी समाजी और साहित्य की खिदमत और पत्रकारिता के प्रति उनका प्रेम बेमिसाल है । आगे देश की हैसियत से , भारत वर्ष को एक ऐतिहासिक करवट बदलनी ही है और तब की आहट को सुनने तथा इसके नाभिक तत्वों और स्पंदनों को पहचानने में समर्थ लोग जरूरी होंगे । इनमें भाई कैलाश सारंग भी हों , यही मेरी कामना है । 
                                                                         

                                                                                                                                                          ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )

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20 Oct, 2021

राजनीति में हकीम लुकमान

राजनीति में हकीम लुकमान   -  महेश श्रीवास्तव    
                                                                                           

 श्री कैलाश सारंग के बारे में यदि मैं कहूं कि उन्हें यौवन की देहरी पार करते हुए मैंने बड़ा भाई मान लिया था और आज तक वैसा ही मानता हूं , किसी अनजान क्षण में मन की किसी परत पर बनी वह छाप आज भी उसी प्रकार बरकरार है तो शायद बिल्कुल गलत नहीं होगा । इस मान लेने या इस छाप के बनने और बने रहने पर कभी कोई प्रश्न मन में नहीं उठा । स्वयं के पत्रकार होने और उनके राजनीतिज्ञ होने के बावजूद सदैव रिश्ते मन के रहे , तर्क या विश्लेषण , स्वार्थ या लाभ - हानि के धागे कभी बीच में नहीं आए । नहीं आए या नहीं आ सके तो शायद इसलिए क्योंकि भावना के संबंधों में इस प्रकार के धागों की कोई जरूरत भी नहीं होती । जिन दिनों संपर्क काफी रहा उन दिनों भी और जब संपर्क क्षीण हो गया तब भी अनुभव के स्तर पर रिश्तों में कभी जंग नहीं लगी ।

            मेरी ओर से रिश्तों में भावनात्मक गहराई शायद इस कारण रही क्योंकि 1960 के दशक के बिल्कुल प्रारंभिक समय में जब मैं अपने बड़े भाई श्री जगदीश श्रीवास्तव के साथ भोपाल के तलैया मोहल्ले के एक बहुत साधारण से कच्चे मकान में रहता था तब श्री कैलाश सारंग बहुधा मेरे बड़े भाई साहब के पास आते थे । घर में उनका प्रवेश बिल्कुल एक भाई की तरह होता और सीढ़न भरे कमरे की ठंडी फर्श पर छादली बिछाकर वे पूरी सहजता के साथ अधिकार पूर्वक रोटियां खाते थे । बड़ा भाई स्वीकार कर लिया जैसे अपने बड़े भाई श्री जगदीश को स्वीकृत किए हुए था । उस समय श्री सारंग शिक्षक थे और मेरे भाई भी शिक्षक होने के साथ साथ हिन्दी साहित्य में एम.ए. की परीक्षा की तैयारी कर रहे थे , जो उन्होंने प्रथम स्थान और स्वर्ण पदक प्राप्त कर उत्तीर्ण की थी । श्री सारंग शिक्षक होने के साथ संघ के उद्द्भट स्वयं सेवक भी थे । दोनों मेरे बड़े भाई एक ज्ञान के क्षेत्र में तो दूसरा मैदान में अतुलनीय हैं , यह धारणा तब मेरे मन में गहरे समाई हुई थी ।
             
            साठ के दशक के प्रारंभिक एक दो वर्षों के बाद एक लम्बा समय मुलाकातों की न्यूनता का रहा । मुलाकातों का सिलसिला सत्तर के दशक में फिर तब बढ़ा जब मेरे पांव पत्रकारिता की जमीन पर दृढ़ता से टिकने लगे और आरंग जी सोमवारा स्थित तत्कालीन जनसंघ कार्यालय के एक भाग में सपरिवार स्थापित हो गए । वे कार्यालय में ही नहीं पार्टी में भी स्थापित हो गए । उनके पास में पारिवारिक रूप से जाता था और उनसे सदैव एक बड़े भाई का स्नेह पाता था । जितना स्नेह उनसे प्राप्त होता था उससे अधिक भाभीजी से प्राप्त होता था । इतनी सौम्य , उदार , वात्सल्यपूर्ण और संघर्षशील महिलाएं संसार में कम ही मिलती हैं । तब मेरी मान्यता बनी थी कि सारंग जी की सफलताओं में प्रसून भाभी की कठिनाइयां सहकर भी उदार और सहज बने रहने की क्षमताओं का बहुत हाथ है । मैं उन्हें श्री सारंग का सौभाग्य और उनके जीवन की जागृत कुण्डली मानता था । तब चूंकि भोपाल मैं अकेला रहता था सारंग जी का स्नेह और प्रसून भाभी का वात्सल्य मुझे आंतरिक एकान्त का पारिवारिक आश्रय स्थल लगता था ।

        सारंग जी के परिवार में जाना आना किसी पत्रकार का किसी राजनीतिज्ञ के यहां जाने जैसा कतई नहीं होता था किन्तु कार्यालय भवन राजनीति का निवास भी था अतः प्रदेश की राजनीति के शीर्ष पुरुषों से संपर्क को विश्वास की पकड़ वहीं प्राप्त हुई । भवन के ऊपरी माले पर श्री कुशाभाऊ ठाकरे और श्री प्यारेलाल खण्डेवाल भी रहते थे , उनमें भी मेरे प्रति अपनत्व और भरोसे का भाव पैदा हुआ और राजनीति की अनेक अन्तर्कथाओं से भी मैं परिचित हुआ किन्तु पत्रकार होते हुए भी , गोपनीयता की मर्यादाओं का मैंने सदैव ध्यान रखा और अज्ञेय को कभी उजागर नहीं किया । इससे आपसी भरोसे का बंधन और मजबूत हुआ । मेरे लेखन से प्रायः सभी नेता मुझे प्रभावित प्रतीत होते थे किन्तु सारंग जी की प्रशंसा में एक बड़े भाई को अनुभव होने वाले गौरव भाव को भी मैं अनुभव करता था । तब वे चरैवेति के सम्पादक भी थे और उनके आदेश से मैंने उसमें कुछ समय तक लिखा भी । लेखन और विचारों को लेकर कई बार तल्ख बहसें भी हुई । स्वीकार प्रायः छोटे को ही करना पड़ता था किन्तु कभी - कभी बड़े को भी , जब कोई उत्तर नहीं सूझता था तो वे अपने स्नेहपूर्ण उलाहने से बात समाप्त कर देते थे । “ तुम तो बड़े विद्वाना हो गए हो यार ” , अथवा “ बहुत बदमाश हो गए हो महेश ” जैसे वाक्यों के साथ ।

श्री सारंग राजनीति में सराबोर रहे और भारतीय जनता पार्टी में वे लुकमान हकीम की तरह माने जाते थे । संगठन के बिखरे हुए मोतियों को पिरोना हो अथवा नई माला बनाना हो , ठाकरे जी को अनेक बार उन्हें महत्वपूर्ण दायित्व देते हुए मैंने देखा , जिसका उन्होंने बखूबी निर्वाह भी किया । पार्टी का खजाना खाली होता तो श्री कैलाश जोशी के साथ उन्हें उगाही यात्रा करते हुए भी मैंने देखा । लम्बे समय तक वे जनसंघ और भाजपा में ' टू इन वन ' ही नहीं “ मेनी इन वन ” बने रहे । राज्यसभा की सदस्यता उनके राजनीतिक जीवन का एक उपलब्धिपूर्ण आयाम था।

           श्री सारंग के साथ मेरे संबंध इतने समय तक रहे हैं कि यदि लिखता रहूं तो बात दूर तलक चले । कई बार लगातार संपर्क रहा तो बार कई कई दिनों तक संपर्क नहीं हुआ । मगर मन में उपस्थिति सदैव बनी रही अक्षुण्ण और अडिग । जिनके विषय में आप सोचते नहीं सिर्फ अनुभव करते हैं ऐसे रहे मेरे लिए वे । अपनत्व और प्रेम का शायद यही जादू है कि एक बार जिसकी जो छवि बन गई वह घटती बढ़ती नहीं है । हां , उनके व्यक्तित्व के सौम्य , अपनत्व और सरसता ने उस छवि का परिष्कार अवश्य किया । वे अलग अलग तरह से किन्तु एक साथ अपने और पराए , पक्ष और विपक्ष , अच्छे और बुरे सबके लिए अपने तरीके से धरोहर हैं । यह धरोहर शतायु हो , यह कामना सभी करते हैं ।
                                                               
                                                                                                                (लेखक दैनिक 'पीपुल्स समाचार 'के प्रधान संपादक हैं )

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