सारंग साहब , अनेक रंगों में एक रंग- उर्दू प्रेम - आरिफ अजीज
मोहतरम कैलाश सारंग साहब के व्यक्तित्व के कई पहलू ( रंग ) जैसे किसी आइने खाने में एक ही व्यक्ति की कई तस्वीरें नजर आती हैं , उनके व्यक्तित्व के बहुरंगी आयामों को समेटना मुश्किल है , इसलिये में उनके अंदर उर्दू जबान नो अदब के परस्तार की जो खुसुशियत देखी । उन पर रोशनी डालना चाहता हूँ ।
यह सही है कि उनकी पहली पहचान एक सियासी नेता की है लेकिन सियासत से राजनीति तक , कल्चर से धर्म तक इसका सिलसिला फैला हुआ है , उम्र की 75 बहारें देखने के बावजूद सारंग साहब में काम करने की जो लगन दिखाई देती है , वो आज के नौजवानों के लिये मशहदें राहें ( रास्ते की रोशनी ) है । सारंग साहब अदीब और शायर नहीं लेकिन अदब में उनकी दिलचस्पी काफी गहरी है , उर्दू अकादमी के प्रोग्राम हों या दूसरी तकरीबात , अगर उनको बुलाया जाए तो निहायत खुशी के साथ शिरकत करते हैं , और मौका देखते हुए खुदा लत्ती बात भी कह जाते हैं , ऐसे ही एक जलसे की कार्यवाही मुझे याद आ रही है शहर के उर्दू वाले उर्दू हफ्ता मना रहे थे । इसके एक जलसे में मेहमान खुसुसी की हैसियत से सारंग साहब को भी बुलाया गया था , वहां सारंग साहब ने उर्दू जवान की वका व फरोग ( प्रगति व प्रसार ) के लिये कई तजाबीज पेश किये और खासतौर पर इस पर जोर दिया कि उर्दू को मुसलमान की जबान की हैसियत से पेश नहीं किया जाये । क्योंकि यह देश के मुख्तलिफ वर्गों और धर्मों को मानने वालों की मिली जुली जबान के दूसरे दिन कुछ अखबारों ने उनके संबंध में यह खबर दे दी कि सारंग साहब ने मध्यप्रदेश में उर्दू को दूसरी जबान बनाने की मांग की है ।
मैं भी इस जलसे में दैनिक आफताब जदीद ( उर्दू ) के रिर्पोटर की हैसियत से मौजूद था मैंने जलसे की रिपोटिंग में वही बातें लिखी जो सारंग साहब ने कही थी , कोई दूसरा राजनेता होता तो इसको खामोशी से पी जाता कि जो हुआ , सो हुआ । लेकिन यह सारंग साहब की सच्चाई थी कि दूसरे दिन अपने प्रतिवेदन में कहा कि उर्दू मेरी जबान है , में इसमें लिखता पढ़ता हूं , इसका अखबार निकालता हूं जलसे करता हूं और यह भी चाहता हूं कि दूसरों में इस जबान का चलन हो , लेकिन मध्यप्रदेश जैसे राज्य जहां कि कुछ शहरों में उर्दू बोलने वाले की तादाद जरूर मौजूद हे बाकी बड़ा क्षेत्र हिन्दी भाषी है और आदिवासी लोगों की बड़ी आबादी है ऐसे राज्यों में उर्दू को दूसरी जबान बनाना मेरे ख्याल में अमल की कसौटी में खरा नहीं उतरेगा ।
यह बातें कहकर सारंग साहब ने चाहे उर्दू वालों को नाराज कर दिया , लेकिन निजी बातचीत में उनका यही कहना था , जो मैं सही समझता हूं वही बात पब्लिक में आना चाहिये , जबान के सवाल पर जब बातचीत ने पहले भी कई मसाईल खड़े किये हैं और आज भी सस्ती लोकप्रियता के लिये लोग इसका इस्तेमाल कर रहे हैं , मैं ऐसे लोगों में खुद को शामिल नहीं करना चाहता हूँ ।
सारंग साहब कई वर्षों तक दीनदयाल विचार प्रकाशन में कर्ताधर्ता की हैसियत से काम करते थे उन्होंने अनुकूल परिस्थितियों में भी स्वयं पार्टी के एक वर्ग की मुखालफत के बावजूद साप्ताहिक अयाज को जारी रखा और घाटे के इस सौदे को उस वक्त तक निभाते रहे जब तक दीनदयाल विचार प्रकाशन का काम उनकी जिम्मेदारी में रहा ।
साप्ताहिक “ अयाज ” की दस साल तकरीबात ( उत्सव ) के दौरान मुझे उन्हें बहुत करीब से देखने और समझने का मौका मिला तो अंदाजा हुआ अपने फराईज की अदायगी ( कर्तव्य निभाने ) का काम किस लगन और शौक से करते हैं , बारह बारह , सोलह सोलह घंटे किसी न किसी फ्रिक में डूबे रहते थे कि आयाज के प्रोग्राम यादगार तरीके पर संपन्न हो इनमें कोई कौर कसर न रह जाएं , इण्डो पाक मुशायरा उर्दू सहाफत पर सेमीनार , अयाज का भोपाल नंबर , और उर्दू डायरी की तरतीब ( संकलन ) सभी काम बेहतर तौर पर अंजाम पाये ।
यह पहला मौका था , जब मुशायरे में शिरकत करने वाले मुकामी शोहरा को भी नजराना (पारिश्रमिक ) पेश किया गया था , इसके बाद उर्दू शायरों , अदीबों की याद में और बाहर से आये कलमकारों के इस्तकबाल में दर्जनों जलसे हुए , जिसमें भाजपा के बड़े नेता कवि श्री अटल बिहारी वाजपेयी , तो कभी श्री कुशाभाऊ ठाकरे , कभी कृष्ण लाल शर्मा , कवि श्री प्यारेलाल खण्डेलवाल , कवि श्री सुंदरलाल पटवा व श्री कैलाश जोशी शिरकत करते रहे , इस तरह अयाज ने एक फोरम की सूरत इरिव्तयार कर ली , जो प्रदेश उर्दू अकादमी के समान्तर काम कर रहा था अयाज की तकरीबात और उसके भोपाल नंबर के लिये सारंग साहब ने जहां से मदद का हाथ बढ़ा , उसे थाम लेने में झिझक मुजाहिरा नहीं किया । जनाब इश्तियाक आरिफ साहब , जनाब ईशरत कादरी साहब , जनाब कमर जमाली साहब , जनाब प्रो . आफ़ाक साहब , जनाब हमीद हुसैन , जनाब इक़बाल मजीद , जनाब एम . रफीक , जनाब शौकत रमुजी , जनाब मुस्लिम सलीम को इस काफिले में जोड़े रखा , मिर्जा जनाब फहीम बेग साहब की कियादत में एक मामूली कारकून की तरह वो दिनरात तकरीबात को कामयाब बनाने में मशरूफ रहे । जिसके नतीजे में यह तकरीबात शानदार पैमाने पर अंजाम पायी और आज भी इसकी मिसालें दी जाती हैं , साप्ताहिक अयाज का भोपाल पर विशेष अंक तो मील का पत्थर साबित हुआ , इसके बाद अन्य कलमकार और संस्थाओं ने भी भोपाल पर केन्द्रित विशेष अंकों का प्रकाशन किया ।
अयाज की तकरीबात के बाद भी मुझे सारंग साहब से मुलाकात का मौका मिलता रहा , इन मुलाकातों की बुनियाद पर मैं उनका मिज़ाज दा होने का दावा तो नहीं कर सकता , लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि वो गंगा जमुनी तहजीब के नुमाईन्दे हैं । गुलु अमेल कौम परस्ती की वजह से निठायत तेजी से जाहिर हो रही है । सारंग साहब साबिक नवाबी रियासत भोपाल के कस्बे बरेली में पैदा हुए वो जिसका अक्सर जिक्र करते हैं कि उन्होंने शहूर ( सोचने समझने ) की आंखें खोली तो वहां नवाब हमीदउला का राज था । इस खानदान से उनकी मोहब्बत और अकीदत की यह मिसाल है कि अयाज की तकरीबात के वक्त उन्होंने नवाब साहब की बेगम ( बड़ी बिया ) पर तकरीबात कमेटी के सदस्यों के साथ जाकर मुलाकात की । उनको तकरीबात कमेटी का संरक्षक बनाया , कुछ दिन बाद ही बड़ी बेगम का इन्तेकाल हो गया , एक जलसा करके उन्हें निवनराजे अकीदत पेश किया ।
यहां एक बात का जिक्र बैमौके न होगा कि कांग्रेस के मुकाबले आज भी भारतीय जनता पार्टी में उर्दू जबान बोलने वाले लोगों की तादाद ज्यादा है । कांग्रेस में ऐसे नेता जिनका ओढ़ना बिछौना उर्दू हो , खत्म होते जा रहे हैं । दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी में कैलाश नारायण सारंग साहब , नारायण प्रसादजी गुप्ता जी और बाबूलाल गौर की मौजूदगी जाहिर करती है कि भारतीय जनता पार्टी में उर्दू से प्रेम रखने वाले पाये जाते हैं ।
सारंग साहब की शख्शियत में बेहद रंगाढंगी हैं , वो खुशमिजाज सियासत दा हैं जहां वो अपनी कम्युनिटी के लिए काम करते हैं वही दूसरों के लिये भी उनके दरवाजे खुले मिलेंगे । एक तरफ पैयामे इंसानियत के जलसे में शिरकत करते रहे हैं दूसरी तरफ बरकतउल्लाह यूनिवर्सिटी की अरबी प्रभाग में बुलाये जा रहे हैं , उर्दू अकादमी में जब वो मेंबर नहीं थे तब भी वहां के कामों की फिक्र रखते थे । अब अकादमी के सदस्य है और अकादमी के फैसलों में भी बराबर शरीक रहते हैं , उर्दू अकादमी के पूर्व सेक्रेटरी इक़वाल मजीद और प्रो . कवी दसनवी को अकादमी का सेकेटरी बनवाने में अहम रोल रहा है , आज भी अकादमी अमला अपने अनेक काम को पूरा कराने के लिये आपका सहारा लेता है ।
आज मैं अपने एक जाती राज का उल्लेख करना चाहता हूँ उर्दू सहाफत ( पत्रकारिता ) के ताल्लुक से मेरा कैरियर सारंग साहब की देन है वो अगर मुझे दैनिक आफताब जहीद में काम करने की सिफारिश नहीं करते तो आज मैं किसी दूसरे काम में मशरूफ होता , हुआ यूं कि इनके साप्ताहिक अयाज में काम के दौरान एक मर्तबा सारंग साहब ने स्टाफ की मीटिंग बुलाई , जिसमें मेरे अलावा गौहर जमाली साहब , रियाज अली काका शरीक हुए , उस वक्त अयाज के एडिटर अशफाक मो कुछ समय के लिय दिल्ली चले गये थे और गौहर साहब और मैं अयाज का काम देख रहे थे , मीटिंग में सारंग साहब ने यह शिकायत की कि अयाज के काम में मेरी तरफ से कोई दिलचस्पी नहीं दी जा रही है । मैंने पुरजोर शब्दों में इसका खण्डन किया और मशवरा दिया कि अयाज की फाईल मंगवा ले अभी सच्चाई सामने आ जाएगी । जब फाईल आई और काम का विश्लेषण हुआ तो शिकायत गलत साबित हुई उसके बाद सारंग साहब ने बड़े दुख के साथ कहा कि उर्दू हलकों के बारे में हमने सुन रखा था कि वहां काम करने से ज्यादा टांगे खींची जाती है और आज इन्सका अनुभव भी हो गया । हम लोग जिस संस्था से तालुक रखते हैं वहां यह सब नहीं होता है इसलिये आइंदा ऐसे कामों से बचें फिर उन्होंने मुझे आफताब जदीद में काम करने की पेशकश की जिसे मैंने इसलिये भी कबूल कर लिया कि उर्दू पत्रकारिता जोड़े रखेगा , यही हुआ कि उर्दू पत्रकारिता मेरा ओढ़ना बिछोना बन गई ।
अयाज की तरक्की और तोशी के लिये सारंग साहब ने जो भी बन सका किया , काम से कभी मुंह नहीं मोड़ा , उन्हें अशफाक न दवी के रूप में जिम्मेदार आदमी मिल गया , एक मर्तबा श्री लालकृष्ण आडवाणी पहली बार पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद भोपाल आये सारंग साहब से ताज्जुब के साथ सवाल किया था कि इतने वर्षों तक हिन्दी उर्दू अंग्रेजी के साप्ताहिक कैसे निकाल रहे हैं आपके अनुभव से हम भी फायदा उठाना चाहते हैं , आडवाणी जी बहुत अच्छी उर्दू जानते हैं इसलिये आयाज को पढ़ते और सराहते थे । सारंग साहब की बड़ी तमन्ना थी कि वो अयाज को दैनिक कर दें , लेकिन कई वजहों से उन्हें इसमें कामयाबी नहीं मिली क्योंकि वे बड़े व्यवहारिक आदमी हैं , जो काम करते हैं उसके संबंध से पहले योजना बना लेते हैं ताकि यादगार प्रोग्राम हो ।
सारंग साहब की यह खूबी उन्हें बड़ा इंसान बनाती है उर्दू जबान के लिये उनके दिल में जो मोहब्बत और लगाव है , उसको में सलाम करता हूँ और उनकी सेहत और आफीयत के लिये दिया करता हूँ ।
( लेखक विशेष प्रतिनिधि दैनिक नदीम ( उर्दू ) हैं )
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