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कैलाश सारंग : अटूट मैत्री का 51 साल का सफर

23 Mar, 2022 | 1213 views

कैलाश सारंग : अटूट मैत्री का 51 साल का सफर
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कैलाश सारंग : अटूट मैत्री का 51 साल का सफर -  राधेश्याम शर्मा

बड़ी खुशी और आनंद का समाचार है । प्रियवर कैलाश सारंग ने जो कई मायने में मेरे लिये छोटे भाई की तरह हैं , जिंदगी की तीन चौथाई सदी पूरी कर ली है और भोपाल में उनकी मित्र मंडली , सहयोगी , प्रशंसक एवं हितैषी मिलकर अमृत महोत्सव का आयोजन कर रहे हैं । प्रिय सारंग को हार्दिक बधाई , शुभ कामनाएं और आयोजकों को ऐसे आयोजन के लिये साधुवाद । आखिरकार सार्वजनिक जीवन , समाज , देश एवं राष्ट्रीय निर्माण की साधना में समर्पित भाव से सारा जीवन लगाने वाले कर्मठ व्यक्ति के कार्यों का स्मरण सामाजिक दृष्टि से भी जरूरी है , क्योंकि इससे समाज एवं देश के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध लोगों का हौसला बढ़ता है तथा नई पीढी को भी एक सार्थक संदेश मिलता है । दिशा भी मिलती है । 

       यह ठीक है कि जीवन के संघर्ष में एवं किसी उद्देश्य के प्रति जी जान से जुटे रहने में यदि सफलता एवं यश मिलते हैं , तो कुछ विफलताएं भी मिलती हैं । चार लोग खुश होते हैं तो इक्का दुक्का रुष्ट भी होते हैं । सबको एक साथ तो भगवान भी संतुष्ट नहीं कर सकते । बड़े - बड़े नेताओं , समाजसेवियों , महात्माओं के भी आलोचक मिल जाते हैं । लेकिन महत्वपूर्ण है , टीका टिप्पणी , विरोध , छिद्रान्वेषण की चिंता किये बगैर अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित भाव से लगातार लगे रहना विफलता या आलोचना के बावजूद कार्य करते रहना । यदि एक पद या अवसर हाथ से गया तो दूसरा क्षेत्र तलाशकर तत्काल फिर सक्रिय हो जाना । यानी ऋग्वेद के आर्षवचन “ चरैवेति चरैवेति ” चलते रहो , चलते रहो , की भावना से लगातार सक्रिय रहना , चलते जाना । पं . दीनदयाल उपाध्याय की इस आर्षवचन पर दृढ़ आस्था थी और वे आजीवन इस पर अमल करते भी रहे । वे कहते भी थे कि यदि संकोचवश , डरकर , आलोचना से घबराकर , खीजकर , निराश होकर , छींटाकशी या तानाकशी से चिढ़कर रुक गए तो पैरों में चलने की गति भी नहीं रहेगी । सूखे पेड़ की तरह ठूंठ बनकर रह जायेंगे । फिर पैर में चलने की ताकत और आगे बढ़ते जाने की मंशा भी नहीं रहेगी । यह ध्यान रहना चाहिये कि सक्रियता , गतिशीलता ही जिंदगी है और निष्क्रियता ही मौत का दूसरा नाम है । 

            मैं कैलाश सारंग का इसलिए प्रशंसक हूं कि उन्होंने खुद को केवल राजनीति तक सीमित नहीं होने दिया । उनमें संगठन कुशलता प्रबल है । समाज सेवा , पत्रकारिता , लेखन कार्य आदि क्षेत्रों में भी भरपूर दिलचस्पी ली । पत्र - पत्रिकाएं निकाल और निकाल रहे हैं । समाज में चेतना लाने , कुरीतियों अंधविश्वास से जूझने , नई पीढ़ी के जागरण में भी जुटे रहे हैं । संसद भी पहुंचे तो वहां भी सक्रिय रहे । वहां से मुक्त हुए तो दूसरा मोर्चा खोल लिया । विधानसभा चुनाव भी लड़ा , हार गये तो भी निराश होकर नहीं बैठे , लगे रहे । काफी समय बाद आखिर बेटे को विधानसभा एवं नगर निगम में बैठाकर नई पीढ़ी को भी देश सेवा में जुटने के लिये आगे बढ़ाया । अनेक मित्रों को भी समाज सेवा व पत्रकारिता में मौका दिया । राजनीति भी की , कूटनीति भी , ' किंग मेकर ' का रोल भी निभाया । पार्टी भी चलाई । सरकार भी चलाई । मंत्री या मुख्यमंत्री के सलाहकार भी बने रहे , जनसमस्याओं के हल में ताकत लगाई । अब ऐसे काम करेंगे तो आलोचना , आरोप , बुराई का दंश तो लगेगा ही । उसे सहन करके भी या कोई पद छिन जाने पर भी मैदान में , कार्य में डटे रहे और डटे हैं । इनके एक छोटे भाई गोविंद जी ने सारा जीवन देश सेवा , देश भक्ति , देश निष्ठा , राष्ट्रीयता की भावना के निर्माण में लगा दिया , घर नहीं बसाया । अहिर्निश देश व समाज की चिंता की , शरीर की चिंता नहीं की , आखिर बीमार हो गये और असमय चल बसे । अब बेटों को भी अपने कारोबार के साथ - साथ देश सेवा में जुटाया । इन सारी बातों का पूर्वधारणा से हटकर सभी को सकारात्मक दृष्टि से जायजा लेना उचित होता है । भूलों पर भी ध्यान दिला सकते है । 

            कैलाश सारंग से मेरा परिचय दिसम्बर , 1958 से है , जब वे शिक्षक थे और मैं विशेष संवाददाता ( दैनिक युगधर्म ) बनकर जबलपुर से भोपाल 1957 में आया था । 1958 से स्थाई रूप से यहां आ गया , तब बरखेड़ी में रहता था । कुछ दिन बाद सारंग जी का तबादला हो गया तो वे भी बरखेड़ी में पड़ोस में आकर रहने लगे । दो छोटे भाई पढ़ते थे , पिताजी आजीवन शिक्षक रहकर रिटायर हुये थे । माता जी थीं नहीं । कुछ दिन बाद इनकी शादी तय हुई तो वधू का सामान लाने मेरी पत्नी इनके पिताजी के साथ बाजार जाती । शादी के बाद गोद भरने का काम मेरी श्रीमती जी ने पूरा किया , यानी पारिवारिक मित्रता हो गई । यह निकटता बढ़ती गई । इनकी पत्नी श्रीमती प्रसून सारंग सागर की थीं और प्रसिद्ध लेखक , कवि , प्रोफेसर डॉ ० रामकुमार वर्मा एवं भूतपूर्व डी.पी.आई. एवं कवि चंद्रप्रकाश वर्मा के परिवार से थीं । स्वाभिमानी , धीर गंभीर , विवेकशील , निष्ठावान , सेवाभावी , अग्रसोची आत्मविश्वास से सराबोर । कैलाश जी की सफलता में उनका बड़ा योगदान रहा , सारा परिवार बसाया , चलाया । असुन , देवर , ननदों , सबका ध्यान रखा । सारंग जी के सारे रिश्तेदारों , मित्रों , राजनीतिकों से रिश्ते निभाए । सबको मान सम्मान दिया । में कई बार टिप्पणी कर देता कि सारंग जी से प्रसून जी ज्यादा समझदार हैं । वे अब इस दुनिया में नहीं है , यह दुखद है । 

               बाद में सारंग जी नौकरी छोड़कर राजनीति से जुड़ गए । जनसंघ ( बाद में भाजपा ) के प्रादेशिक कार्यालय के स्थाई मंत्री बन गये । श्री कुशाभाउ ठाकरे के अनुरोध पर सरकारी नौकरी छोड़ दी । प्रादेशिक कार्यालय बनाया , संवारा , उसे नये आयाम दिए , दिन रात संगठन की सेवा की । संगठन की पत्रिका चरैवेति ' भी चलायी । कार्यकर्ताओं की सेवा भी की और उनका मार्गदर्शन भी किया । संगठन की छवि बनाने में शक्ति लगायी । कुशाभाऊ ठाकरे का विश्वास एवं मार्गदर्शन उनके लिये बहुत सहायक रहा । ठाकरे जी एक त्यागी , तपस्वी , राष्ट्र को समर्पित समाजसेवी थे । व्यक्ति की परख का बड़ा गुण उनमें था । 

             1972 में में दैनिक युगधर्म का संपादक होकर जबलपुर चला गया । किंतु हमारा संपर्क एवं पारिवारिक निकटता बनी रही । 1975 में आपातकाल लगा तो सारंग जी के नाम भी वारंट था । वे भूमिगत होकर कार्य करते रहे । में भी भुक्तभोगी था । दैनिक युगधर्म जबलपुर के प्रकाशन पर पाबंदी लग गई । वैसे मुझे परेशान नहीं किया , में पाबंदी हटवाने के अभियान में भोपाल दिल्ली के चक्कर काटता रहा । श्रमजीवी पत्रकार नेता भी कन्नी काट गये । भूमिगत सारंग जी से , भोपाल आता तो भेंट कर लेता था । भूमिगत होकर भी वे मुस्तैदी से डटे रहे । परिवार के हालचाल भी पूछ आता प्रसून जी संकोच करती होंगी , यह सोचकर कभी श्रीमती जी को भोपाल लाकर उनकी कुशल - क्षेम पूछने को कहता । बाद में कैलाश जी गिरफ्तार भी हो गये , लेकिन प्रसून जी ने उस दौर में जिस साहस , आत्म विश्वास एवं संघर्षशीलता से परिवार एवं बच्चों का ध्यान रखा वह प्रशंसनीय है । 

           1977 में आपातकाल हटने के बाद मैं 1978 में चंडीगढ़ आ गया । कैलाश जी सक्रिय राजनीति में प्रवेश कर गए , प्रादेशिक कार्यालय की सीधी जिम्मेदारी से संगठन कार्य एवं राजनीति में ज्यादा सक्रिय होते गए । अब राजनीति में जो रहेगा , उसके यदि कुछ प्रशंसक होंगे तो कुछ आलोचक भी होंगे । कोई भी राजनेता ईर्ष्या एवं द्वेष तथा पूर्वधारणा अथवा शक - सुबाह की बीमारी से भी बच नहीं पाता । हमारे देश में यह बीमारी शायद कुछ ज्यादा ही है । वे इस बीच राज्य सभा सदस्य भी बने । पार्टी में कुछ नेताओं के कोपभाजन का शिकार भी हुए , लेकिन अपने कार्य में डटे रहे । राजनीति में और पत्रकारिता में वे अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के आजकल अध्यक्ष हैं , इस नाते पूरे देश का प्रवास हुये अपना दायित्व निभाते हैं , लेकिन अध्यक्ष बनने से पहले भी उसमें सक्रिय थे । जाति और समाज का उत्थान , उसमें जाग्रति लाना , अंधविश्वास एवं कुरीतियों के जंजाल से उसे मुक्त करना भी अपने आप में बड़ी देश सेवा है । हां , जातिगत विद्वेष , दुर्भावना या विघटन पैदा करके राजनीतिक रोटियां सेंकना अथवा घटिया राजनीति से सस्ती लोकप्रियता की पेशकश घटिया और देशघातक आचरण है । सारंग जी ऐसी संकुचितता से बचने की सदैव सावधानी बरतते हैं , यह अच्छी बात है क्योंकि ऐसी मनोवृत्ति राष्ट्रीय एकता , एकात्मकता और सामाजिक समरसता में बाधक होती है । 

             इसके अलावा आजकल सारंग जी ' नवलोक भारत ' नामक पाक्षिक पत्रिका भी निकाल रहे हैं । पिछले कुछ वर्षों में इस पत्रिका ने अपनी विशेष पहचान बनाई है । प्रदेश और राष्ट्रीय महत्व की सामयिक घटनाओं पर इसमें दमदारी से सामग्री प्रकाशित होती है । प्रधान संपादक के बतौर लगातार लेखन से सारंग जी ने राजनीति के अलावा पत्रकार के रूप में भी अपनी और अपनी कलम की पहचान बनाने की कोशिश की है , यह अच्छी बात है क्योंकि प्रबुद्ध वर्ग के समक्ष अपनी बात रखना , राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर स्वस्थ परिचर्चा को बढ़ावा देना भी जरूरी है , ताकि जागृत जनमत द्वारा लोकतंत्र स्वस्थ एवं मजबूत बन सके । 

            सारंग जी के प्रशंसक यदि काफी संख्या में हैं तो आलोचक ( प्रकट या प्रच्छन ) भी कम नहीं हैं । कुछ उन पर महत्वाकांक्षी होने का आक्षेप करते हैं , इसमें बुराई क्या है ? हर व्यक्ति को चाहे वह राजनीतिक व्यक्ति भी क्यों न हो , महत्वाकांक्षी होना चाहिये । इसके बिना व्यक्ति आगे कैसे बढ़ेगा । हां , अति महत्वाकांक्षी होना या संगठन और देश से अपनी महत्वाकांक्षा बड़ी नहीं हो , इसका ध्यान रखना जरूरी है । सारंग जी ने जिस क्षेत्र में काम किया , अपनी विशेष पहचान बनाई । यह उनके मित्रों के लिये संतोष की बात है । वे और भी ज्यादा आगे जा सकते हैं , इसमें संदेह नहीं है । उनमें संगठन कुशलता का बड़ा गुण है , कार्य करने की भी क्षमता है और साधन जुटाने का सामर्थ्य एवं चतुराई भी है । उम्मीद की जानी चाहिये कि वे ज्यादा सावधानी , ज्यादा सतर्कता एवं ज्यादा दूरदर्शिता एवं भूलों में सुधार कर अपने ध्येय पथ पर आगे बढ़ते रहेंगे । व्यक्ति चाहे और तय कर ले तो बिना किसी पद के भी बहुत कुछ कर सकता है , पद तो एक माध्यम होता है । 

            सारंग जी की एक विशिष्टता यह है कि वे संवेदनशील , सेवा भावी और मित्रों के मित्र हैं । ऐसे कई प्रसंगों में एक प्रसंग मुझे सदैव याद रहता है । मार्च 1969 की शाम की बात है । मेरा स्कूटर एक्सीडेंट रेतघाट पर हो गया । में तो वहीं बेहोश हो गया । श्रीमती जी और छोटी बिटिया साथ थे । वे बच गये । मुझे लोगों ने अस्पताल पहुंचाया । सूचना मिलते ही अस्पताल तत्काल पहुंचने वालों में कैलाश सारंग आगे थे । वे अस्पताल से हिले नहीं रातभर मेरे सिरहाने बैठे सेवा में लगे रहे , मुझे दूसरे दिन होश आया तब सबको राहत मिली । ऐसे उनके सेवाभाव के कई प्रसंगों का में प्रत्यक्ष दर्शक रहा हूं , वे पहले बड़े भावुक थे । जैसे ही पं . दीनदयाल उपाध्याय के कत्ल की खबर आयी , जनसंघ दफ्तर में फूट - फूटकर रोने लगे । प्रेस रिपोर्टरों के साथ मैं भी पहुंचा तो कहा ' भाई , रोने से कैसे काम चलेगा ? प्रेस के लिये सामग्री दो , वे मित्रों , परिचितों के कष्टों के प्रति भी संवेदनशील रहे हैं , शायद अब राजनीति में पकने के बाद थोड़ा संयम रखने लगे हैं । 

               मुझे ' अमृत महोत्सव समारोह समिति ' के भाई मेघराज जैन और भाई रमेश शर्मा ने अभिनंदन ग्रंथ के लिए लेख लिखने को कहा । स्मरण पत्र भी भेजे , कुछ शीर्षक एवं प्रश्न भी भेजे । हमारी और कैलाश जी की मित्रता 51 वर्ष पुरानी है । स्थान परिवर्तन और बीच के लंबे अंतराल के बाद चंडीगढ़ आ जाने के बावजूद भी संपर्क , मित्रता और आत्मीयता बनी नहीं , यह क्या कम है ? 1990 से 1995 तक मुझे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल के संस्थापक महानिदेशक ( कुलपति ) के बतौर पुनः भोपाल रहना पड़ा । फिर निकटता हो गई हालांकि तब तक उनके स्थापित नेता बन जाने से कभी कुछ खटपट या सहमति असहमति अथवा पृथक राय के दौर भी आये , लेकिन यह तो समाज जीवन और कार्यक्षेत्र की विभिन्नता के कारण सामान्य बात है । फिर भी मित्रता निभती नही , यह बड़ी उपलब्धि है । ताली तो दोनों हाथों से ही बज सकती है । 

                मैंने लेख में प्रशस्तिगान , जिन्दागान , लच्छेदान शब्दावली , खुशामदी गुणगान से बचकर मित्रता की यात्रा का एक सफरनामा पेश किया है । आयु के जिस सोपान पर हम सफर में हैं , उसमें बनावटीपन , दिखावा या किसी किस्म के नफा - नुकसान , कोई अपेक्षा अथवा कुछ लेन देने वाली बात नहीं है । इसलिए जो महसूस किया या महसूस करता हूं , उसी अहसास को यहां प्रस्तुत किया है । यह एक निकट मित्र की मित्रता के कुछ मधुर क्षणों का स्मरण मात्र है । कैलाश सारंग दीर्घजीवी हो और देशसेवा , समाजसेवा , राजनीति , पत्रकारिता एवं अन्य क्षेत्रों में ऊंचाइयों को छुएं , यही कामना है । अमृत महोत्सव पर उन्हें पुनः बधाई और उत्तम भविष्य के लिए शुभकामनाएं । 

                           

                        ( लेखानुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल के पूर्व महानिदेशक ( कुलपति ) और दैनिक ट्रिब्यून चंडीगढ़ के पूर्व संपादक है । )

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