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गरल पीकर अमृत कुण्ड में स्नान

18 Feb, 2022 | 529 views

गरल पीकर अमृत कुण्ड में स्नान
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गरल पीकर अमृत कुण्ड में स्नान - कैलाशचंद्र पंत

एक ऐसे मित्र के संबंध में लिखना दुविधापूर्ण होता है जिससे आत्मीयतापूर्ण रिश्ते रहे हों । यह दुविधा तब और अधिक बढ़ जाती है , जब व्यक्ति ने निरंतर छलांग लगाकर राजनीति में नेता की हैसियत प्राप्त कर ली हो । तब भय लगता है कि कहीं पुरानी यादों को ताजा करने के फेर में उस व्यक्ति की अर्जित प्रतिष्ठा को धक्का न पहुँचे । तब सोचता हूं कि उस लेखन का अर्थ ही क्या रह जायेगा , जो स्व निर्मित सीमाओं में बंधकर लिखा जायेगा । फिर याद आता है कि जिस अवसर के लिये लिख रहा हूं वह अमृत छलकाने का क्षण है । पर अमृत से पहले समुद्र मंथन में विष ही तो निकला था । इससे कुछ फर्क नहीं पड़ेगा । विष को धारण करने वाले शंकर का निवास कैलाश पर्वत पर ही तो है । आश्वस्त होता हूं कि जिस मित्र के संबंध में लिख रहा हूं उनका नाम कैलाश सारंग ही है ।

       यह संयोग ही है कि हम दोनों की नाम राशि समान है । किंवदन्ती प्रचलित है कि ऐसे संयोगों के बीच पटती भी प्रगाढ़ता के साथ है और विरोध भी धारदार होते हैं । सारंग जी से मेरे संबंधों का ग्राफ कुछ इसी तरह उतरता चढ़ता रहा । वे पारिवारिक रिश्तों की सीमाएं पहिचानते हैं । बखूबी निभाते हैं । रिश्तों की यह डोर कभी टूटी नहीं ।

           भोपाल आते ही मेरा परिचय सारंग जी से हो गया था । यह सन् 1963 के आसपास की बात है । पैंतालीस वर्षों के अंतराल की अनेक घटनाएं घूम जाती हैं । हमारे संबंधों में प्रगाढ़ता खण्डेलवाल परिवार के कारण आई । प्यारेलाल जी खण्डेलवाल उन दिनों प्रमुख नेता थे । यद्यपि प्यारेलाल जी को महू से ही जानता था जब वे संघ के तहसील प्रचारक होकर आए थे लेकिन मेरी मित्रता उनके अग्रज स्व . जगन्नाथ गुप्ता से इंदौर के दिनों से थी । प्यारेलाल जी और सारंग जी संगठन में तो साथ काम करते ही थे , वैसे भी अभिन्न मित्र थे । बाद में प्यारेलाल जी के अग्रज श्री गुलाबचंद खण्डेलवाल के साथ मैंने जब मुद्रण मंदिर प्रारंभ किया तो सारंग जी से औपचारिक संबंध नितांत आत्मीय होते चले गए और धीरे धीरे पारिवारिकता में परिणित हो गये । इन संबंधों की निरंतरता आज भी बरकरार है । 25 जून 1975 को जब आपातकाल की घोषणा हुई थी , मैं सपरिवार दिल्ली में था और मेरे निवास पर महू के कुछ मित्र ठहरे हुए थे । जनसंघ का कार्यालय मेरे निवास के निकट ही था । संभावित खतरा समझते हुए सारंगजी अपने निवास से हटकर मेरे घर चले आये । हमें अनुपस्थित पाकर उनकी प्रतिक्रिया क्या हुई यह तो पता नहीं चला । लेकिन ठहरे हुए अतिथि मित्रों में से दो को सारंग जी से मेरी मित्रता का अनुमान था । राजनीतिक रूप से जागरूक मित्रों ने इस समय स्थिति की गंभीरता को समझते हुए भी , सारंग जी की सम्यक व्यवस्था कर दी । मेरी पत्नी और बच्चे दिल्ली से पहले लौट आये । मुझे कार्यवश दिल्ली रूकना पड़ा । पत्नी के लौट आने के बावजूद सारंग जी ठहरे रहे ।दो दिन बाद श्री रामनाथ गुप्ता ने उनकी अन्यत्र व्यवस्था कर दी । यद्यपि इस स्थान परिवर्तन के कुछ दिन बाद ही श्री त्रिभुवनदास मेहता के साथ वे गिरफ्तार कर लिये गये । यह संस्मरण बताता है कि सारंगजी पारिवारिक रिश्ते बनाते ही नहीं , उन्हें जीते भी हैं । कहीं न कहीं उन्हें विश्वास रहा होगा कि संकट की उस घड़ी में उन्हें निराश नहीं होना पड़ेगा । 

          यह कहना तो सत्य का अतिक्रमण होगा कि सारंगजी के साथ मेरे अनुभव मीठे ही रहे और उनमें खटास पैदा ही नहीं हुई हो । लेकिन उस खटास के बावजूद कटुता नहीं उपजी - मतभेद जरूर सतह पर आ गये । फिर भी मन के किसी कोने में मिठास बरकरार रही । माना जा सकता है कि इसके पीछे राजनीतिज्ञ की व्यावहारिक बुद्धि ने काम किया हो । लेकिन मुझे लगता रहा कि पारिवारिक संबंधों का निर्वाह वे बहुत दूर तक करते हैं । यह अवश्य है कि एक कुशल राजनेता की तरह वे अनुयायी बनाना ज्यादा पसंद करते हैं और मुझमें स्वाभिमान के प्रति विशेष सजगता रही है । शायद हमारे टकराव का यही बिन्दु था ।

          मुझे याद आता है 1986 का वह समय जब भोपाल में हिन्दू एकता मंच का गठन किया गया । इसकी शुरुआत सिर्फ तेरह व्यक्तियों की एक बैठक में की गई । उपस्थित लोगों में से किसी का भी किसी राजनीतिक दल से प्रत्यक्ष संबंध नहीं था । उन सभी को सामान्य नागरिक कहना ही ज्यादा मुनासिब होगा । श्री ओम मेहता को उसका संयोजक मनोनीत किया गया । भाई जी श्री उद्धवदास मेहता भोपाल के वास्तविक जननेता थे । उनके त्याग और तपस्या से , नवाबी शासन में उनके संघर्ष से हिन्दू जनता उन्हें दिल से प्यार करती तथा सम्मान देती थी । श्री ओम मेहता को उनके उत्तराधिकारी के रूप में हिन्दू एकता मंच का संयोजक बनाने का विचार सबने पसंद किया । मंच ने तीन सफल प्रदर्शन किये और उसका दीर्घकालीन प्रभाव हिन्दू समाज में नई चेतना का संचार करने वाला कारक तत्व रहा । एक राजनेता की भांति सारंग जी ने शायद उसे सामानांतर सत्ता केन्द्र माना । मुझे उनके इस दृष्टिकोण से सख्त एतराज था । मुझे लगा कि मंच के पीछे अन्तर्निहित मूल भावना को सारंगजी जैसे व्यक्ति ने समझने की गलती कैसे कर दी । शायद उनकी पार्टी निष्ठा उन पर हावी थी । पर मैं उस घटना को उनकी ऐतिहासिक भूल करार देता हूं । यह गाँठ समय के साथ ढीली जरूर हो गई है ।

         इस घटना के कुछ वर्ष पूर्व ही सारंगजी एक उपचुनाव में खड़े हुए थे । मैंने सक्रिय राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने से परहेज ही किया है । लेकिन श्री सारंग का चुनाव जीतना आवश्यक मानता था । इसलिये मैंने व्यक्तिगत स्तर पर उनके समर्थन में काम किया । मेरी गतिविधियाँ पार्टी कार्यकर्ताओं से निरपेक्ष चल रही थीं । मुझे न तो किसी के समक्ष अपनी सक्रियता का दिखावा करना था और न पार्टी में कोई हैसियत हासिल करनी थी । दुर्भाग्य से सारंग जी पराजित हो गये । पूरे चुनाव अभियान में मेरी भेंट उनसे नहीं हुई । शायद वे मानते रहे कि मैं चुनाव में उनकी खिलाफत करता रहा । यह भी संभव है कि हमारे संबंधों से ईर्ष्या रखने वाले कुछ व्यक्तियों ने सारंगजी को गलत जानकारी दी हो । मेरे स्वाभिमान ने इस बात की इजाजत नहीं दी कि अपनी स्थिति स्पष्ट करूँ । मैंने उनके पक्ष में जो काम किया था उससे मैं संतुष्ट था उसके पीछे न तो किसी प्रकार का लाभ लेने की इच्छा थी और न ही किसी प्रकार का अहसान जताने की ।

        एक बात तो स्वयंसिद्ध है की स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे ने उन्हें जब अपना विश्वत सेनापति बनाया था तो निःसंदेह यह उनकी विशेषताओं को पहिचान कर ही लिया था क्यों की व्यक्ति की परख में ठाकरे जी की दृष्टि एक जौहरी की थी । उनके समक्ष पार्टी के प्रति निष्ठा सर्वोपरि कसौटी थी । यह निष्ठा सारंग जी में पूरी तरह विद्यमान रही । सारंग जी की वैचारिक निष्ठा परीक्षा की घड़ी में भी विचलित नहीं हुई । सारंग जी की जीवन यात्रा स्पष्टतः उनके परिश्रमशील जीवन की कहानी स्वयं कहती है । भाजपा जैसे संगठन के सूत्रों का राजनीतिक उपयोग करने का कौशल भी उनके पास है और रूठे हुए कार्यकर्ताओं को बहलाने की क्षमता भी उनमें है ।

          जो राजनीति में काम करता है उसे आलोचना के प्रहार भी झेलने पड़ते हैं । सारंग जी को वह सब कुछ झेलना पड़ा है । लेकिन उन्होंने धैर्यपूर्वक सभी कुछ सहा और सही वक्त का इंतजार किया । मौका पाते ही प्रत्याक्रमण करने का कौशल भी उन्होंने दिखाया । इसीलिये लोग उनसे आतंकित भी रहते हैं और वे भी बखूबी यह समझते हैं कि उनके निकट आने वाले अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिये ही उन्हें घेरते हैं । ऐसे व्यक्तियों या भीड़ से वे घिरते नहीं , प्रत्युत उनका उपयोग कर लेते हैं । पराजित लोग उनकी आलोचना करते हैं , तो उनका क्या दोष ? 

            सारंग जी के संबंध में बात तब तक अधूरी रहेगी जब तक उनकी साहित्यिक अभिरूचि की चर्चा न कर ली जाय । वे कविता और शायरी में समान रूप से रस लेते हैं । रस ग्रहण की यह क्षमता उन्हें रसिक बनाती है । जो रसिक होता है उसमें मानवीय संवेदना भी कुछ गहरी होती है । राजनीति के मरुस्थल में साहित्यिक अभिरूचि एक रजतद्वीप है । यही कारण है कि वे साहित्य पढ़ते हैं और विषय की व्याख्या में बौद्धिकता का समावेश करते हैं । नवलोक भारत का प्रकाशन और समय - समय पर वैचारिक संगोष्ठियों का आयोजन सारंगजी के व्यक्तित्व के उजले पक्ष हैं । अनेक पत्रकार और लेखक उनकी संवेदना से उपकृत होते रहे हैं । कुछ लोगों को गाढ़े समय में उन्होंने सहारा प्रदान किया यद्यपि वे समाज की इस रीति से परिचित हैं कि उपकारों को भुला देना दुनिया का दस्तूर है । 

       जीवन के 75 वर्ष पूरे करने पर सारंगजी उस शिखर पर खड़े हैं , जहां खोने के लिये अब कुछ नहीं है । वे अनुभवों का समृद्ध कोष संजोए हैं और यह मौका है कि वे आत्माभिमुख ठोकर अमृत का पान करें और गर्व से कहें ' हम विषपायी जनम के ' । स्वयं नीलकंठ बनकर अपने अनुभवों का अमृत कुण्ड नई पीढ़ी को बाँटे । वे समाज को रचनात्मक राजनीति की नई दिशा दें । यह नया भाव - बोध सारंगजी के भीतर बैठे उस मनुष्य का दर्शन करायेगा जिसे अक्सर अनदेखा किया गया था जो उपेक्षित रह गया । मंगलमय भगवान उन्हें संकल्प के नये सोपान पर चढ़ने की शक्ति और सामर्थ्य प्रदान करें । 

                                                                                                                                            ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार है )

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