विद्रोह का अर्थ
गुजरात में हुए पुलिस विद्रोह, सशस्त्र बल में व्याप्त असंतोष की खतरनाक परिणति और अदूरदर्शी राजनीतिज्ञों तथा पुलिस अफसरों की असावधानियों पर प्रहार।(25.7.1988)
विद्रोह न तो यह शब्द बहुत कोमल है और न ही जिन घटनाओं को यह अर्थ देता है ये ही बहुत सहज होती है। शोषण, अत्याचार की गंभीर यंत्रणा भी अवसर मनुष्य को विद्रोह की देहरी तक नहीं ले जा पाती क्योकि विद्रोह बहुत कुछ तोड़ता है और अनेक खतरों को जन्म देता है। खतरे उठाना क्योंकि भारतीय मानस की सहज प्रवृत्ति नहीं है और स्वार्थ सिद्धि की आशा में दमन या शोषण से समझौते का गुण बेहद विकसित हो गया है, अत: विद्रोह जैसा शब्द किसी राजनीतिक दल की स्थाई प्रेरित असंतुष्ट गतिविधि में भी अपना अर्थ प्रकट करने लगा है। मगर गुजरात में जो कुछ हुआ है वह शब्द के सही अर्थ के निकट जैसी कोई घटना है हिंसा न भी हुई है तो भी विद्रोह को दबाने वाली शक्ति के द्वारा विद्रोह की भावना की अभिव्यक्ति हुई है जो सिद्ध करती है कि कानून का पालन करवाने वाली ताकत में कानून के प्रति आस्था डगमगाई है और जो ताकत अनुशासन को लागू करने वाली है उसने सीधा आपका सामना न भी किया है तो भी कानून सम्मत नियंत्रण केन्द्र का आदेश मानने से इंकार कर दिया है और यह भी किसी प्रकार के विद्रोह से कम नहीं। भारतीय संदर्भ में आप इसे अहिंसक विद्रोह की संज्ञा देने का मोह भी पाल सकते हैं।
ऐसा नहीं कि गुजरात की पुलिस ही देश भर में ऐसी पुलिस है जिसने विद्रोह के तेवर पहली बार दिखाये हों। अन्य राज्यों में तो सशस्त्र विद्रोह की आग भड़कने तक के उदाहरण हमारे सामने हैं यह भी नहीं कि गुजरात की पुलिस अपने असंतोष के तेवर पहली बार इस सीमा तक ले आई हो। 1985 और 1987 में भी वह ऐसे संकेत दे चुकी थी। अर्थात् असंतोष की कोई आग थी जो काफी पहले से सुलग रही थी, जिसने घर नहीं जलाया था तो भी अपनी आंच दिखा दी थी और तब से लेकर आज तक सरकार ने उस आग को चूल्हे की आग बना लेने या टेंकर डालकर हमेशा हमेशा के लिये बुझा देने का कोई सार्थक प्रयत्न कभी किया हो, इस बात की भी फिलहाल कोई जानकारी नहीं है। अब मुख्यमंत्री कह रहे हैं, कि पुलिस यूनियन के नेता आपराधिक गतिविधियों में लिप्त थे, राष्ट्रपति के प्रति उन्होंने असम्मान प्रदर्शन किया था या प्रधानमंत्री की दाण्डी यात्रा के समय उसमें बाधा पहुंचाने की कोशिश की थी तो यह प्रश्न सहज ही उत्पन्न होता है कि तब से लेकर आज तक मुख्यमंत्री ने कोई कार्यवाही क्यों नहीं की? और यदि कार्रवाई नहीं की गई तो यह विचार भी सहज ही उठता है कि आरोपों की सत्यता ही तो कहीं प्रश्नों की परिधि में नहीं है और कहीं इस सबके पीछे सरकार की संदिग्ध निश्चितता भी तो उजागर नहीं हो रही है?
पुलिस में विद्रोह उस गैंगरीन रोग की तरह है जिसका इलाज प्रभाव वाले अंग को ही नहीं, संभावित प्रभाव वाले अंग को भी काट डालने की कठोर शल्य क्रिया के अतिरिक्त और कुछ नहीं यह इलाज होगा भी और होना भी चाहिए सेना और केन्द्रीय सुरक्षित बल के डाक्टर इस प्रकार की चिकित्सा के लिये गुजरात पहुंचे ही नहीं सक्रिय भी हो गये हैं। मगर देखना यह होगा कि बार-बार यह रोग होता क्यो है और कही हम ही तो जाने अनजाने ठोकरें मार-मार कर समाज शरीर में गैंगरीन पैदा नहीं कर रहे हैं? यदि गैंगरीन पैदा करने और अहंकार में हड्डी का एक टुकड़ा काटकर फेंक देने की विकृत मानसिकता से ही हम ग्रस्त हो गये हैं तो यह भी जान लेना चाहिये कि समाज देह की हड्डियां असीमित नहीं और टांग या हाथ को काटकर दिल रूपी नेता तथा दिमाग रूपी अफसर भी चिरकाल तक अमृत महोत्सव नहीं मना सकते। गुजरात के अदना पुलिस कर्मियों की कुछ मांगें हैं और हो सकता है, उन में से बहुत सी गैर वाजिब भी हों मगर उनका विद्रोह केवल मांगों को लेकर नहीं, उन आला अफसरों के व्यवहार के विरुद्ध भी है जो उनके शोषण का माध्यम बनते है और आई.पी.एस. के किले में बैठकर राजनेता के इशारे पर मनमाने आदेशों का पालन करवाते हैं। उनका विद्रोह उन राजनेताओं के आचरण और व्यवहार के प्रति भी है जो कानून का मुखौटा पहनकर उन्हें गैर कानूनी इशारे करते तथा केवल इशारे ही नहीं करते उनसे गैर कानूनी काम भी करवाते हैं। यदि विद्रोह के कारण यह है तो जिसे हम आज देख रहे हैं। प्रमाणित नहीं कर पा रहे हैं, ऐसे माहौल में, वे गैर वाजिव भी नहीं लगते कौन सा प्रदेश है जिसमें पुलिस बल में अफसरों की फौज और उनकी सुविधाओं में बेलगाम वृद्धि नहीं हुई है और कौन सा प्रदेश है जिसमें सिपाही की भूमिका अर्दली की भूमिका बनकर नहीं रह गई है। कौन से प्रदेश के सत्तासीन नेता ने (वह कांग्रेस का हो, लोकदल का हो अथवा कम्युनिस्ट पार्टी का) अपने राजनीतिक विरोधियों तथा असहमति व्यक्त करने वाले लोगों के मुंह बंद करने के लिये पुलिस का गुण्डों की तरह इस्तेमाल नहीं किया है? और यदि यह सब हुआ है तो हमें यह खोजना पड़ेगा कि विद्रोह के कारण कहीं अपने स्वार्थों के लिए राजनेता की चापलूसी कर रहे अफसर या अपने राजनीतिक हितों के लिये लोकतान्त्रिक शासन को जागीर मान रहे राजनेता के आचरण में तो निहित नहीं है जिस देश में चरित्र हनन ही राजनीति का प्रमुख औजार बन गया हो, देश के सर्वोच्च से लेकर अदना से पद तक को भ्रष्टाचार के आरोप से कलकित कर देने में हमने शर्म महसूस नहीं की हो और जिस देश में सत्तापिपासु नेता, स्वार्थ प्रेरित अफसर तथा अवसरवादी बुद्धिजीवियों की त्रयी ने गिरोह का रूप धारण कर लिया हो वहां हम पुलिस को ही क्या समाज के किसी भी वर्ग को भ्रष्टाचार या अपराध कर्म से दूर रहकर त्यागी अथवा तपस्वी के रूप में अनुशासित रहकर कर्तव्य परायणता का उपदेश देने के अधिकारी रह जाते हैं क्या ?
गुजरात की घटना एक बहुत छोटी घटना है और इस पर नियंत्रण भी कोई कठिन काम नहीं मगर ऐसे कितने गैंगरीन शरीर की किस किस हड्डी में पनप रहे. हैं और क्यों पनप रहे हैं जब तक यह जांचा परखा नहीं जायेगा अपना ही अंग काटकर इलाज कर लेना भी हमेशा संभव नहीं होगा क्योंकि अंग भी असीमित नहीं है और अस्थियों की भी सीमा है।
महेश श्रीवास्तव