मैरियट में हेमेंदु सिन्हा की ग़ज़लों की पुस्तक ‘बेज़बाँ नहीं जज़्बात मेरे’ के विमोचन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए। श्री मनोज श्रीवास्तव (आईएएस), राज्य निर्वाचन आयुक्त, मध्य प्रदेश
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हेमेंदु सिन्हा पटना से हैं और इस पुस्तक का विमोचन भोपाल से करवा रहे हैं। यह बात इस अर्थ में ठीक है कि भोपाल दुष्यंत का शहर है और इस पुस्तक के शीर्षक से मुझे दुष्यंत की ही एक ग़ज़ल याद आई-
वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है
माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है
वो आदमी मिला था मुझे उस की बात से
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बे-ज़बान है
अटल जी की 51 कविताएँ हैं। यहाँ 51 ग़ज़ल हैं इस संग्रह में। किताब का यह शीर्षक बड़ी पोयटिक Vitality का पता देता है। इसमें बड़ा ऊर्जस्वी उद्घोष है। दावा है कि उसकी भावनाओं का जो आंतरिक जीवन है उसे चुप नहीं कराया जा सकता। आज के युग में जहां प्रतिबंधों और शिष्टाचार की माँगों ने हृदय की तरंगों का गला घोंट रखा है, यह शीर्षक गज़लों की मुक्तिकामी-मुक्तिकारी ताकत का पता देता है। कविता ऐसे ही जन्म लेती है। वह भावना का प्रामाणिक दबाव, वह जब मन की बहुत निजी कोनों की उथल पुथल शेरों में ढलकर एक शेयर्ड अनुगूंज बन जाती है। तो यह शीर्षक अपने आप में एक छोटा मोटा defiance है - समाज का वह यथार्थ जो हमें अपनी संवेद्यताओं के बारे में कुछ भी उच्चरित करने से मना करता है उसके खिलाफ।
वर्डसबर्थ कहते थे Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings recollected in tranquility. अब मुझे मालूम नहीं कि जिस तरह का कारपोरेट जॉब हेमेंदु करते हैं उसमें कोई tranquility कोई शान्ति है कि नहीं पर फीलिंग्स, जज़्बात जरूर हैं और पॉवरफुल हैं। एमिली डिकेन्सन कहती थीं I felt a funeral in my brain. मेरे दिमाग में एक चिता जल रही है।
शीर्षक तो यह कहता है कि चुप रहना यदि सत्य से शत्रुता हो तो बोलना फर्ज है। शीर्षक एक वादा है कि आगे पेज पलटने पर इसी निर्भीक साहस के दर्शन होंगे। मैकबेथ में शेक्सपीयर की यही सलाह थी कि
Give sorrows words.
that does not speak bids the overfraught heart break.
तो यही किया है शायर ने कि दुख को शब्द दिये हैं। रुसवाई के डर को लाँघ कर। वो किसी फिल्म का गीत था न-
कहाँ शाम-ओ-सहर ये, कहाँ दिन रात मेरे बहुत रुसवा हुए हैं, यहाँ जज़्बात मेरे
इस संग्रह की विशेषता यही है कि इसमें जज़्बात का पूरा स्पेक्ट्रम है - खुशी और गम, विस्मय और निराशा समर्पण। जज्बात को कब में दफ़्न करने से किया गया यह इंकार एक confession ही नहीं है।एक कैथार्सिस भी है।
अब मैं इस संग्रह के कुछ अशआर पर बात कर लेता हूँ जो मुझे अच्छे लगे। आपने देखा होगा यहीं कार्यक्रम में बैठे बैठे मैंने कुछ नोट्स बनाये हैं। तो लीजिए कवि का परिचय:
वो जान लेगा मुसन्निफ़ को, जो पढ़ लेगा मज़मून इक बार भी,
अपने माशूक़ के घर ख़त, अबकी बार मैं बेनाम दे आया हूँ।
बड़ा subtle और profound का नकाब नहीं है, यह विश्वास है अपने कलाम पर। शायर की यही तो बेनामी प्रापर्टी होती है। कविता, poetic writing or work. मजमून पर ही नहीं, उसके टेक्सचर में निहित। हर अबोली तड़प पर गजल में लेखक के emotional signature होते हैं। वह एक मौजूदगी रहती है। वह हाथ न दिखे न दिखे पर वो हृदय दिखता है। एमिली डिकिन्सन फिर याद आईं The Heart wants what it wants, or else it does not care. दिल जो चाहता है चाहता है, नहीं तो परवा नहीं पालता।
एक और शे’र मुलाहिज़ा फरमाएँ:
वो सारे ख़त, जो मैंने उसको, अपने खूँ से लिखे थे,
किताब-ए-इश्क़ का हर पन्ना, वो पानी में बहा के गया
कभी इस शेर में भावना का जो हैमरेज है, उस पर गौर करें। यह वह प्यार है जो ब्लीड कर रहा है। यहां एक personal suffering है, निज मन की व्यथा है, पर वह ईसाई सेक्रामेंट जैसी हो गई है। वहां वह ब्रेड खून में डूबी हुई है, और यहाँ ख़त ही ख़ून में डूबा हुआ है और त्रासदी यह है कि वह तब भी व्यर्थ है। खून पानी न हुआ पर खून से लिखा पानी में गया। लार्ड बायरन ने डॉन जुआन में यही कहा था न कि Love is a Fire that burns unseen. तो गई भैंस पानी में की बात नहीं है। पर आँसुओं के साथ जो आता है वह मनोभूमि को और उर्वर बनाता है और ऐसी गज़लें संभव होती हैं।
अब एक और शे’र पर तवज्जो दें :
मैं उसे जानता तक नहीं, है फिर भी वो ख़फ़ा मुझसे,
शायद पिछले जन्मों के शिकवों के कुछ सिलसिले होंगे।
इसमें एक अपरिचय है, एक अजनबीपन। पर जो बात ध्यान देने की है कि इसमें पुनर्जन्म को मानने के भारतीय संस्कार ही नहीं हैं, बल्कि कर्मफल के सिद्धांत की भी स्वीकृति है। संचित कर्म। पूर्व जन्म नहीं, पूर्वजन्मों के। Law of Karma. आत्मा की जन्म जन्मान्तरों की यात्रा। रिलेशनल रिडल्स। रिश्तों की पहेलियां। मिल्टन के पैराडाइज लॉस्ट का वह 'अन्हीन दुःख बोध' वह sense of endless grief. वह accumulated Karmic tension - वह सब इस छोटे से शे’र में मिलेगा।
पर चलिये आगे बढ़ते हैं। एक और बात सुनें :
इतनी जफ़ाओं के बाद भी क्या तू थकता नहीं सनम,
इतने सितम तो दुश्मन भी कभी कोई ढा नहीं सकता।
प्रिया की duplicities का स्टेमिना। पता नहीं कितने विश्वासघात। वह धोखेबाजी को जारी रखने की ग़ज़ब की इनर्जी। शायर को दुःख से ज्यादा तअज्ज़ुब है, आश्चर्य है. वफ़ा न करने पर। कि fidelity न सही न सही। पर ये बहाने बनाने का स्केल, उस की inventive powers तो अथक है। दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है। पता नहीं क्या क्या सितम और जैसे उनका झरना है। कहते हैं कि मर्द को प्यार बहुत सी चीजों में से एक चीज है और स्त्री के लिए वह पूरा अस्तित्व है। पर यहां तो जैसे उसे उल्टा दिया गया है। कंपलीट inversion. जफ़ाओं के हाइड्रा हेड्स। धोखों के अगनित फ़न। और शायरकी चिन्ता फिर भी यह कि वह माशूक़ थक तो न गया यह करते करते। वो एक फिल्म थी न पुरानी- च च च। उसमें नीरज का एक बड़ा प्यारा सा गीत है-
वो हम न थे, वो तुम न थे, वो रहगुज़र थी प्यार की
लुटी जहाँ पे बेवजह, पालकी बहार की
उसी का आखिरी स्टैंजा है और उसमें भी कवि को अपने दुख से ज्यादा दुख देने वाले की चिंता है:
गुज़र रही है तुम पे क्या
बना के हमको दरबदर
ये सोच कर उदास हूँ,
ये सोच कर हैं चश्म तर
न चोट है ये फूल की,
न है ख़लिश ये ख़ार की
ऐसा ही एक expression तब है जब हेमेन्दु कहते हैं:
मोहब्बत तिजारत जो हो, तो तेरे मुनाफे के लिए,
अपने तमाम सरमाये का भी हम खसारा कर लेंगे।
मुझे उससे हमारे मध्यप्रदेश के ही एक मरहूम शायर राहत इंदौरी का वह शे’र बेसाख़्ता याद आ गया:
तेरी हर बात मोहब्बत में गवारा कर के
दिल के बाज़ार में बैठे हैं ख़सारा कर के
हेमेन्दु के इस कथन में selfless devotion ज्यादा है। शायर अपना हर possession लुटाने को तैयार है। हर सीक्योरिटरी, अपने पुराने आत्म का हर टुकड़ा। प्यार इस तरह के रैडिकल सरेंडर से एक ट्रांसेंडिंग अनुभव बन जाता है, एक भगवदभक्ति, एक यज्ञ की वेदिका जिसमें अपना सब कुछ समिधा की तरह अर्पित करना है।
उनका एक और अंदाज़ देखिये:
सज्दे किए हैं मैंने, हर रोज़ उसके दर इक दिन
ख़ुदा मेरी भी, तक़दीर बनाएगा ज़रूर
बाइबिल के Psalm में कहा गया My Soul waits for the Lord more than watchmen for the morning. पर यहां शायर उससे भी आगे की एक redemptive hope की, एक prayerful trust की बात कह रहा है कि तकदीर या फेट बना बनाया नहीं है, वह सज़दों से बनता है। अब यह आध्यात्मिक आत्मविश्वास देखने लायक है।
अब जो इस संग्रह का शे’र मैं पढ़ रहा हूँ वह मुझे बहुत प्रिय लगा है-
सितारों को जोड़ कर मैं, इक मंदिर बना तरफ लूँगा,
पिरो कर ओस की बूँदें, तुम माला बना लाना।
इसमें भक्ति का एक नया आर्किटेक्चर है। एक Celestial Temple की अमरता। और ओस बिंदुओं की नश्वरता। एक तरफ इस आशिक की Godlike महत्वाकांक्षा है, सितारों को जोड़कर मंदिर बना लेने की। एक Cosmic engineering जिस में ओस की बूंदों की मृदुल नमी का भी योग हो। कवि को इसीलिए प्रजापति कहा गया- ब्रह्मा कहा गया। प्यार जितना जागतिक है, उतना अन्तरंग और घनिष्ठ। एक तरफ ईश्वर का ऐश्वर्य दूसरी ओर ओस की अस्थिरता। एक तरफ सितारों का सनातन और एक तरफ ओस की ताजगी। ग़ज़ल में ऐसे मेटाफर निभा जाना बड़ी बात होती है। पर हेमेंदु ने यह किया है जैसे उनका यह शे’र :
इस वुस'अत-ए-सहरा में, अपने सर इक छाँव की ख़ातिर,
चलो किसी गैर के फ़लक से दो मुट्ठी बादल उधार लेते हैं।
अब एक ये अंत में :
हुई हैं साँसें मद्धम, और नज़र पथराई है ज़रा फिर भी,
दुआ लेकर ही जाऊँगा, तुम्हारे दर से अभी उठा नहीं हूँ।
याद आया आपको - लौ थरथरा रही है अब शम्मे जिंदगी की। यह एक patient expectancy का शेर है। प्यार जब अध्यात्म बन जाता है। धृति और आशा का। एक शील्ड और एक कंपास। यह सिर्फ प्यार की बात नहीं, theology है। बाइबल फिर याद आ गई मुझे: I waited for the Lord. He inclined towards me and heard my cry. ऐसी ही भक्ति नियति को भी झुका लेती है जब waiting ही worship बन जाए।
मेरी ओर से हेमेंदु जी को सारी शुभकामनाएँ। भविष्य में और बेहतर लिखें। ऑल द बेस्ट।
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